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शुक्ल पक्ष · एकादशी तिथि · कार्तिक

देवउठनी एकादशी 2026 कब है?

देवउठनी एकादशी 2026

25 दिन बाद

शुक्र, 20 नवंबर

2026 में देवउठनी एकादशी शुक्रवार, 20 नवंबर को है। नई दिल्ली में पारण 21 नवंबर को दोपहर 1:10 से दोपहर 3:18 तक है; एकादशी तिथि 20 नवंबर, सुबह 7:16 से 21 नवंबर, सुबह 6:32 तक रहेगी।

2027: बुधवार, 10 नवंबर 2027

देवउठनी एकादशी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

देवउठनी एकादशी 2026: तारीख और तिथि का समय

शुक्रवार, 20 नवंबर 2026

तिथि
एकादशी, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
कार्तिक
तिथि आरंभ
20 नवंबर, सुबह 7:16
तिथि समाप्त
21 नवंबर, सुबह 6:32
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
20 नवंबर, सुबह 6:47

इस बार तिथि क्षय है। एकादशी तिथि एक निर्णायक क्षण के बाद शुरू होकर अगले से पहले ख़त्म हो जाती है, यानी किसी को नहीं छूती, और सामान्य नियम दिन नहीं चुन पाता। पर्व रद्द नहीं होता: वह उस दिन मनाया जाता है जिस दिन यह तिथि चलती है, जो ऊपर की तारीख है। यह बताना ज़रूरी है — सिर्फ़ तारीख छापने का मतलब होता कि वह नियम लागू हुआ जो इस साल लागू नहीं हुआ।

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: देवउठनी एकादशी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

देवउठनी एकादशी 2026 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

देवउठनी एकादशी 2026 शुभ मुहूर्त

देवउठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं, कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जब भगवान विष्णु चातुर्मास की चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और विवाह जैसे शुभ कार्य फिर शुरू होते हैं। नई दिल्ली में यह शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को है: व्रत सूर्योदय से रखा जाता है, शाम को शंख, घंटी और 'उठो देव' गीत से भगवान को जगाया जाता है, और व्रत द्वादशी को पारण से पूरा होता है। नई दिल्ली में पारण: 21 नवंबर, दोपहर 1:10 से दोपहर 3:18 तक।

देवउठनी एकादशी 2026 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
पारण: व्रत खोलने का समय21 नवंबर, दोपहर 1:10 से दोपहर 3:18 तकहरि वासर सुबह के बाद तक चलता है, इसलिए पारण मध्याह्न के बाद, अपराह्न में।

व्रत के अगले दिन, द्वादशी को वह समय जिसमें व्रत पूरा किया जाता है। यह हरि वासर समाप्त होने के बाद खुलता है और सुबह का समय सबसे उत्तम माना जाता है; जिस साल हरि वासर सुबह के बाद तक चले, उस साल पारण दोपहर बाद होता है, और यहाँ दिया गया समय इसी नियम से निकला है। पहले तुलसी दल और एक घूँट जल लें, फिर सादा भोजन करें, और द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण कर लें।

हरि वासर समाप्ति21 नवंबर, दोपहर 12:08द्वादशी के पहले चौथाई भाग का अंत; इसके भीतर व्रत नहीं खोला जाता।

हरि वासर, यानी द्वादशी का पहला चौथाई भाग, भगवान विष्णु का समय माना जाता है, और इसमें व्रत कभी नहीं खोला जाता। पारण इसी क्षण के बाद शुरू हो सकता है, इसीलिए हर साल पारण सूर्योदय से नहीं खुलता।

ब्रह्म मुहूर्तसुबह 5:00 से सुबह 5:53 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।

एकादशी की भोर से पहले का समय। इसी में उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें; बहुत से मंदिरों में भगवान की सुबह की पूजा इसी समय शुरू होती है।

सूर्योदयसुबह 6:47क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

नई दिल्ली में एकादशी के सूर्योदय से व्रत शुरू होता है और द्वादशी के पारण तक चलता है।

प्रदोष कालशाम 5:25 से रात 8:06 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)।

सूर्यास्त के बाद रात का पहला भाग, जब उत्तर भारत के ज़्यादातर घरों में देव उठाए जाते हैं: बनाए गए देव के पास दीये जलते हैं, गीत गाते और थाली बजाते हुए भेंट पर रखी डलिया हटाई जाती है, और फिर आरती होती है। जो परिवार एकादशी की शाम ही तुलसी विवाह करते हैं, वे भी यही समय लेते हैं।

सूर्यास्तशाम 5:25सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज से ओझल होने का समय।

नई दिल्ली में गोधूलि बेला में तुलसी, मुख्य द्वार और बनाए गए देव के पास दीये जलाए जाते हैं; इसके बाद शाम की पूजा होती है।

निशीथ कालरात 11:40 से रात 12:33 (21 नवंबर) तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, आधी रात के आसपास।

आधी रात का समय। जो परिवार रात भर जागरण और कीर्तन करते हैं, वे इस समय आरती करते हैं; कार्तिक माहात्म्य इस रात जागने की बड़ी महिमा बताता है।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • चर सुबह 6:47 से सुबह 8:07 तक
  • लाभ सुबह 8:07 से सुबह 9:26 तक
  • अमृत सुबह 9:26 से सुबह 10:46 तक
  • शुभ दोपहर 12:06 से दोपहर 1:26 तक
  • चर शाम 4:06 से शाम 5:25 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

एकादशी के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया, दिन में पूजा के लिए, या उन परिवारों के लिए जो चातुर्मास की समाप्ति पर इसी दिन कोई नया काम या खरीदारी शुरू करते हैं।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तसुबह 11:45 से दोपहर 12:27शुभ
अमृत कालरात 2:04 से रात 3:39सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 5:00 से सुबह 5:53शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालसुबह 10:46 से दोपहर 12:06
यमगण्ड कालदोपहर 2:46 से शाम 4:06
दुर्मुहूर्त (पहला)सुबह 8:55 से सुबह 9:37
दुर्मुहूर्त (दूसरा)दोपहर 12:27 से दोपहर 1:10
वर्ज्यम्शाम 4:30 से शाम 6:06

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पारण · नई दिल्ली

देवउठनी एकादशी 2026 पारण का समय

शनिवार, 21 नवंबर 2026, दोपहर 1:10 से दोपहर 3:18

पारण द्वादशी को होता है, और हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग, जो इस बार 21 नवंबर, दोपहर 12:08 पर समाप्त होता है — में व्रत नहीं खोला जाता। इस बार हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) पूरे प्रातःकाल तक चलता है। हरि वासर में व्रत नहीं खोला जाता, और ऐसी स्थिति में परंपरा मध्याह्न बीतने तक रुकने को कहती है — इसलिए पारण अपराह्न में है।

व्रत के बारे में यहाँ दी गई बातें परंपरा का वर्णन हैं, चिकित्सा सलाह नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या दवाइयों की स्थिति में व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

शुक्ल पक्ष · कार्तिक

देवउठनी एकादशी 2026: स्मार्त और वैष्णव तारीख

इस पेज की तारीख (स्मार्त, सूर्योदय का नियम)
शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 — जिस दिन के सूर्योदय पर एकादशी तिथि है, व्रत उसी दिन का माना जाता है — यही दिन एस्ट्रोसेज और यह साइट देती है।
वैष्णव (इस्कॉन), अरुणोदय का नियम
शनिवार, 21 नवंबर 2026 — एकादशी (20 नव, सुबह 7:16 से 21 नव, सुबह 6:32) शनिवार, 21 नवंबर 2026 के अरुणोदय — सूर्योदय से पहले के 96 मिनट — में भी है, इसलिए वैष्णव व्रत उस अगली सुबह रखा जाता है।

ऊपर का हर दिन नई दिल्ली के लिए उन्हीं तिथि-क्षणों से निकाला गया है। इस्कॉन मंदिर हर शहर के लिए अपना कैलेंडर छापते हैं और कुछ वर्षों में महाद्वादशी के नियम से व्रत द्वादशी पर भी ले जाते हैं — आपके मंदिर का कैलेंडर अलग हो तो उसी का पालन करें।

महत्व और व्रत कथा

देवउठनी एकादशी व्रत कथा और महत्व

अन्य नाम: प्रबोधिनी, देवोत्थान एकादशी।

देवउठनी एकादशी कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी है — वह दिन जब भगवान विष्णु देवशयनी से शुरू हुई चार महीने की निद्रा से जागते हैं। इसी के साथ चातुर्मास समाप्त होता है और विवाह जैसे शुभ कार्य फिर शुरू होते हैं। घरों में चावल के घोल से भगवान के चरण बनाए जाते हैं, गन्ना, सिंघाड़ा और मौसमी फल रखे जाते हैं, और घंटी, शंख और गीतों से भगवान को जगाया जाता है; द्वादशी को या उसी शाम तुलसी विवाह होता है। इसे प्रबोधिनी, देवोत्थान और हरिबोधिनी एकादशी भी कहते हैं।

देवउठनी एकादशी की कथा

संक्षेप में, अपने शब्दों में — स्रोत: स्कंद पुराण का कार्तिक माहात्म्य, जहाँ ब्रह्मा जी नारद को प्रबोधिनी का महत्व बताते हैं; भगवान के शयन का कारण भागवत और वामन पुराण की वामन कथा है।

जब भगवान विष्णु ने वामन रूप में तीन पग में राजा बलि से तीनों लोक ले लिए और उन्हें पाताल का राजा बनाकर भेजा, तब बलि ने बदले में एक ही वर माँगा — कि भगवान उनके साथ रहें। भगवान ने स्वीकार किया, और परंपरा कहती है कि इसीलिए हर साल चार महीने — आषाढ़ की देवशयनी से कार्तिक की इस एकादशी तक — वे क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में रहते हैं, जबकि उनकी उपस्थिति बलि के साथ रहती है।

यही चार महीने चातुर्मास हैं। लक्ष्मी जी पहरा देती हैं, देवता भी विश्राम करते माने जाते हैं, और घरों में विवाह, गृह प्रवेश और नए कार्य तब तक टाले जाते हैं जब तक भगवान जाग न जाएँ।

कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवता एकत्र होकर शंख, घंटी और स्तुति से उन्हें जगाते हैं — "उत्तिष्ठ गोविंद" — और संसार फिर अपने काम में लगता है। कार्तिक माहात्म्य में ब्रह्मा जी नारद से कहते हैं कि इस दिन का व्रत, रात भर कीर्तन और भगवान के आगे दीपदान अनेक यज्ञों से बढ़कर है, और उसका पुण्य मनुष्य के पूरे जीवन तक पहुँचता है।

अगले दिन, द्वादशी को, जागे हुए भगवान का शालिग्राम रूप में तुलसी से विवाह होता है, और उसी विवाह से विवाहों का मौसम खुलता है।

व्रत कैसे रखा जाता है

  • व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है। बहुत से परिवार एक दिन पहले, दशमी की शाम, एक बार सादा भोजन करते हैं।
  • एकादशी को अन्न और चावल नहीं लिए जाते। जो पूरा उपवास नहीं रख पाते वे फल, दूध या फलाहार लेते हैं; निर्जल व्रत वही रखते हैं जिनकी परंपरा और स्वास्थ्य इसकी अनुमति दें।
  • भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल, दीप और उनके नामों से होती है; उस दिन की कथा पढ़ना या सुनना व्रत का अंग है, और कई लोग रात का कुछ भाग कीर्तन या जप में जागकर बिताते हैं।
  • पारण द्वादशी को होता है, हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग — बीतने के बाद। आपके शहर का पारण समय ऊपर गणना करके दिया गया है।

उपवास के नियम यहाँ परंपरा के रूप में बताए गए हैं, चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या किसी दवा के चलते उपवास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

सभी 26 · नई दिल्ली

सभी एकादशी और उनकी अगली तारीख

साधारण वर्ष में चौबीस, और अधिक मास वाले वर्ष में दो और। हर एकादशी का अपना पेज है — कथा, पारण और स्मार्त-वैष्णव तारीख के साथ।

अगली एकादशी और उसका पारण · 2026 की सभी एकादशी — तिथि और पारण के समय के साथ

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

देवउठनी एकादशी पूजा विधि

  1. एक दिन पहले (दशमी)

    दशमी को एक बार सादा सात्विक भोजन करें, हो सके तो सूर्यास्त से पहले, बिना लहसुन-प्याज़ के। अगले दिन की पूजा के लिए तुलसी दल आज ही तोड़ लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।

  2. स्नान और संकल्प

    ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करके साफ कपड़े पहनें, हो सके तो पीले। भगवान के सामने दाहिने हाथ में जल और फूल लेकर अपना नाम बोलें और संकल्प करें कि आप भगवान विष्णु के लिए प्रबोधिनी एकादशी का व्रत रखेंगे, फिर जल छोड़ दें।

  3. सुबह की पूजा

    पूजा स्थान साफ करें और पीले कपड़े वाली चौकी पर भगवान विष्णु, शालिग्राम या श्रीकृष्ण को विराजित करें। जल, धातु की मूर्ति हो तो पंचामृत, चंदन, पीले फूल, तुलसी दल, घी का दीपक, धूप और फल अर्पित करें और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें।

  4. व्रत का दिन

    जितना स्वास्थ्य अनुमति दे, उतना व्रत रखें: फल-दूध का फलाहार, या परिवार की परंपरा हो तो कठोर व्रत। दिन जप, विष्णु सहस्रनाम या गीता पाठ में बिताएँ, और व्रत कथा पढ़ें या सुनें।

  5. देव बनाएँ

    दोपहर बाद आँगन, पूजा घर या तुलसी के पास जगह साफ करें। गेरू और चावल के आटे के घोल से एक चौकोर चौक बनाएँ और उसके भीतर देव बनाएँ: भगवान के चरण, या देवताओं की सरल आकृतियाँ, साथ में सूरज, चाँद और कमल, जैसे आपके घर में बनाए जाते हैं।

  6. मौसम की नई फसल रखें

    चौक पर गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, मौसमी फल, मिठाई और एक दीया रखें। बहुत से घरों में इन्हें देव उठाने तक बड़ी डलिया, छलनी या परात से ढक दिया जाता है, और कुछ परिवार गन्नों को बाँधकर देव के ऊपर छोटा मंडप बनाते हैं।

  7. गोधूलि में दीये

    सूर्यास्त पर देव, तुलसी, मुख्य द्वार और पूजा स्थान पर घी के दीये जलाएँ।

  8. देव उठाएँ

    शाम को घर की महिलाएँ थाली या सूप बजाती हैं, घंटी और शंख बजता है, डलिया हटाई जाती है और 'उठो देव, बैठो देव' से शुरू होने वाला लोकगीत गाया जाता है। फिर फूल और तुलसी अर्पित करते हुए 'उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द' मंत्र बोलें।

  9. भोग और आरती

    गन्ना, सिंघाड़ा, फल और बिना अन्न की मिठाई जल के साथ अर्पित करें। 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती गाएँ, देव या तुलसी की परिक्रमा करें और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें।

  10. शाम को तुलसी पूजा

    तुलसी के पास दीया जलाएँ, जल और लाल चुनरी अर्पित करें। जो परिवार एकादशी की शाम तुलसी विवाह करते हैं, वे अब उसे आरंभ करें; बहुत से दूसरे परिवार इसे अगली शाम, द्वादशी को करते हैं।

  11. जागरण

    रात का कुछ भाग या पूरी रात भगवान के सामने कीर्तन और भजन में बिताएँ, दीपक सुरक्षित जलता रहे।

  12. द्वादशी को पारण

    द्वादशी को स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें, किसी ज़रूरतमंद को भोजन, फल या गर्म कपड़े दें, और पारण के समय में व्रत खोलें: पहले तुलसी दल और जल, फिर सात्विक भोजन।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

देवउठनी एकादशी पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु, शालिग्राम या श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र जो आपके पूजा घर में हो; शेषनाग पर विश्राम करते विष्णु जी का चित्र इस दिन के लिए उपयुक्त है।
  • चौकी और पीला कपड़ा पीला भगवान विष्णु का रंग है; साफ लाल कपड़ा भी चलेगा।
  • गेरू देव और चौक बनाने के लिए; पूजा की दुकान पर मिलता है। न मिले तो पानी में घुली रोली।
  • चावल का आटा या खड़िया का घोल आकृति की सफेद रेखाओं के लिए; परंपरा से चावल का आटा।
  • बड़ी डलिया, छलनी या परात देव उठाने तक भेंट ढकने के लिए।
  • गन्ना इस दिन की पहचान; कुछ गन्ने, या एक गन्ना टुकड़ों में। कुछ परिवार गन्नों से छोटा मंडप बनाते हैं।
  • सिंघाड़ा उत्तर भारत में मौसम की पहली भेंट।
  • शकरकंद कच्चा या भुना हुआ; यह व्रत का भोजन भी है।
  • बेर, अमरूद, केला और मौसमी फल जो मौसम में मिले; जहाँ मिले वहाँ आँवला भी।
  • तुलसी दल दशमी को तोड़े हुए, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
  • पीले फूल और गेंदा भगवान और चौक के लिए।
  • पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर, धातु की मूर्ति के स्नान के लिए।
  • गंगाजल पवित्रीकरण के लिए; साफ पानी में गंगाजल की कुछ बूँदें भी चलेंगी।
  • चंदन, रोली और हल्दी तिलक और पूजा के लिए।
  • घी के दीये और रुई की बत्ती देव, तुलसी, द्वार और पूजा स्थान के लिए।
  • कपूर और धूप आरती के लिए।
  • शंख, घंटी, थाली या सूप देव उठाने के लिए; चम्मच से बजाई गई कोई भी धातु की थाली काम आती है।
  • भगवान के लिए पीला वस्त्र देव उठने के बाद नया वस्त्र अर्पित करने के लिए।
  • बिना अन्न की मिठाई मखाने की खीर, पेड़ा या दूध और मेवे की मिठाई, व्रत वाले घर के लिए।
  • मौली (कलावा) कलाई पर बाँधने और गन्नों का मंडप बाँधने के लिए।
  • लाल चुनरी शाम को तुलसी के लिए।
  • विष्णु सहस्रनाम या व्रत कथा की पुस्तक दिन के पाठ के लिए।
  • पान और सुपारी भोग के अंत में अर्पित करने के लिए।

मंत्र · अर्थ के साथ

देवउठनी एकादशी के मंत्र और आरती

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द (भगवान को जगाने का मंत्र)

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते ।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम् ॥
उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव ।
गता मेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मला दिशः ॥
शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव ॥

Uttishthottishtha Govinda tyaja nidram Jagatpate
Tvayi supte Jagannatha jagat suptam bhaved idam
Utthite cheshtate sarvam uttishthottishtha Madhava
Gata megha viyach chaiva nirmalam nirmala dishah
Sharadani cha pushpani grihana mama Keshava

अर्थ: हे गोविंद, उठिए, उठिए, निद्रा त्यागिए, हे जगत्पति; हे जगन्नाथ, आपके सोते हुए यह सारा जगत सोया रहता है। आपके उठने पर ही सब कुछ चलता है: उठिए, उठिए, हे माधव। बादल छँट गए हैं, आकाश और दिशाएँ निर्मल हैं; हे केशव, मेरे ये शरद ऋतु के फूल स्वीकार कीजिए।

कब और कैसे: देव उठाते समय, शंख और घंटी की ध्वनि के बीच फूल और तुलसी अर्पित करते हुए। निर्णयसिन्धु वराह पुराण से प्रबोधिनी एकादशी पर भगवान को जगाने के लिए यही श्लोक देता है; एक या तीन बार बोलें।

शान्ताकारं (विष्णु ध्यान श्लोक)

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

Shantakaram bhujagashayanam padmanabham suresham vishvadharam gaganasadrisham meghavarnam shubhangam
Lakshmikantam kamalanayanam yogibhir dhyanagamyam vande Vishnum bhavabhayaharam sarvalokaikanatham

अर्थ: मैं उन भगवान विष्णु को प्रणाम करता हूँ जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवताओं के स्वामी, विश्व के आधार, आकाश जैसे व्यापक, मेघ के समान श्यामवर्ण और सुंदर अंगों वाले हैं; जो लक्ष्मी जी के प्रिय, कमल-नयन, योगियों के ध्यान से प्राप्त होने वाले, संसार के भय को हरने वाले और सब लोकों के एकमात्र स्वामी हैं।

कब और कैसे: पारंपरिक ध्यान श्लोक, जो विष्णु सहस्रनाम के आरंभिक श्लोकों में पढ़ा जाता है। सुबह की पूजा से पहले, शेषनाग पर विश्राम करते भगवान का ध्यान करते हुए बोलें, क्योंकि आज इसी रूप को जगाया जाता है।

विष्णु द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

Om Namo Bhagavate Vasudevaya

अर्थ: ॐ, भगवान वासुदेव को नमस्कार। यह बारह अक्षरों का मंत्र है, जिसे भागवत पुराण में नारद जी बालक ध्रुव को देते हैं।

कब और कैसे: व्रत के दिन तुलसी की माला पर 108 बार, और पारण से पहले फिर एक बार।

पारण की प्रार्थना

अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव ।
प्रसीद सुमुखो नाथ ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥

Ajnana-timirandhasya vratenanena Keshava
Prasida sumukho natha jnana-drishti-prado bhava

अर्थ: हे केशव, मैं अज्ञान के अंधकार में अंधा हूँ: इस व्रत से प्रसन्न होइए, हे नाथ, कृपा-दृष्टि कीजिए और मुझे ज्ञान की दृष्टि दीजिए।

कब और कैसे: द्वादशी को पारण के समय, जल और तुलसी का पहला घूँट लेने से पहले एक बार। वैष्णव व्रत-पद्धतियों में यही पारण का श्लोक है।

आरती विष्णु जी की आरती: ॐ जय जगदीश हरे पूरी आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.
Om jai Jagdish hare.

Jo dhyave phal pave, dukh binse man ka, swami dukh binse man ka.
Sukh sampati ghar aave, sukh sampati ghar aave, kasht mite tan ka.
Om jai Jagdish hare.

Maat pita tum mere, sharan gahoon kiski, swami sharan gahoon main kiski.
Tum bin aur na dooja, tum bin aur na dooja, aas karoon main jiski.
Om jai Jagdish hare.

Tum pooran Parmatma, tum antaryami, swami tum antaryami.
Parabrahm Parmeshwar, Parabrahm Parmeshwar, tum sab ke swami.
Om jai Jagdish hare.

Tum karuna ke sagar, tum palankarta, swami tum palankarta.
Main moorakh phalkami, main sevak tum swami, kripa karo bharta.
Om jai Jagdish hare.

Tum ho ek agochar, sabke pranpati, swami sabke pranpati.
Kis vidhi miloon dayamay, kis vidhi miloon dayamay, tumko main kumati.
Om jai Jagdish hare.

Deen-bandhu dukh-harta, thakur tum mere, swami rakshak tum mere.
Apne haath uthao, apne sharan lagao, dwar pada tere.
Om jai Jagdish hare.

Vishay-vikar mitao, paap haro deva, swami paap haro deva.
Shraddha bhakti badhao, shraddha bhakti badhao, santan ki seva.

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'स्वामी' की जगह 'प्रभु', 'क्षण में' की जगह 'छिनमें' और 'फलकामी' की जगह 'खल कामी' छपा है; उसमें आधी पंक्तियाँ दोहराई नहीं गई हैं, 'दास जनों के संकट', 'मैं सेवक तुम स्वामी' और 'अपने शरण लगाओ' नहीं हैं, और 'ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे' की जगह 'तुम ठाकुर मेरे' है। छपा पाठ

महत्व

देवउठनी एकादशी का महत्व

प्रबोधिनी का अर्थ है जागरण, और देवोत्थान का अर्थ है भगवान का उठना। यह दिन देवशयनी एकादशी से शुरू हुए चातुर्मास को समाप्त करता है, इसलिए बरसात भर रुके विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और दूसरे संस्कार इसके बाद फिर शुरू होते हैं। इसी दिन से भीष्म पंचक भी शुरू होता है, व्रत और दीपों के पाँच दिन, जो कार्तिक पूर्णिमा पर पूरे होते हैं; इसे खासकर वैष्णव मानते हैं, और ओडिशा में यह पंचुका कहलाता है।

यह कार्तिक में आती है, जिसे परंपरा भगवान विष्णु का सबसे प्रिय महीना मानती है, और यह फसल का पर्व भी है: उत्तर भारत के बहुत से घरों में मौसम का पहला गन्ना, सिंघाड़ा और शकरकंद घर में खाने से पहले भगवान को अर्पित किए जाते हैं। महाराष्ट्र में यह कार्तिकी एकादशी है, जब आषाढ़ी एकादशी के बाद साल की दूसरी बड़ी यात्रा में श्रद्धालु पंढरपुर में विट्ठल के दर्शन को जाते हैं।

उपाय · परंपरा

देवउठनी एकादशी के पारंपरिक उपाय

तुलसी पर दीया

गोधूलि में तुलसी के पास घी का दीया जलाएँ और जल अर्पित करें; तुलसी भगवान विष्णु की प्रिया हैं, और बहुत से परिवार कार्तिक की हर शाम यह दीया जलाते हैं।

द्वादशाक्षर मंत्र का जप

व्रत के दिन तुलसी की माला पर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का 108 बार जप करें। इसे मन की स्थिरता और शांति की प्रार्थना के रूप में किया जाता है।

विष्णु सहस्रनाम

एकादशी को भगवान विष्णु के हज़ार नामों का एक बार पाठ करें या ध्यान से सुनें; परिवार इसे दिन का मुख्य पाठ मानते हैं।

पहली फसल पहले भगवान को

मौसम का गन्ना, सिंघाड़ा और फल किसी के खाने से पहले भगवान को अर्पित करें; यह फसल के लिए कृतज्ञता की परंपरा है।

द्वादशी को दान

पारण से पहले किसी ज़रूरतमंद को भोजन, फल या गर्म कंबल दें, या गाय को चारा खिलाएँ। परंपरा मानती है कि व्रत दान से पूरा होता है।

जागरण

रात का कुछ भाग कीर्तन में जागकर बिताएँ; कार्तिक माहात्म्य इस रात की विशेष महिमा बताता है, और परिवार भगवान के जागने की खुशी में इसे निभाते हैं।

रुके हुए शुभ कार्य

चातुर्मास में टाले गए शुभ कार्य, जैसे विवाह, गृह प्रवेश या नया काम, परिवार अक्सर इस दिन के बाद शुरू करते हैं, हर कार्य का अपना मुहूर्त देखकर।

परंपरा, संक्षेप में

देवउठनी एकादशी पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • दशमी को हल्का सात्विक भोजन करें और पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले तोड़ लें।
  • एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक, जितना स्वास्थ्य अनुमति दे, उतना व्रत रखें।
  • शाम को घंटी, शंख, दीयों और गीत के साथ देव उठाएँ, और गन्ना व मौसमी फसल अर्पित करें।
  • तुलसी, मुख्य द्वार और बनाए गए देव के पास दीये जलाएँ।
  • दिन जप, विष्णु सहस्रनाम या गीता पाठ में बिताएँ और व्रत कथा पढ़ें।
  • पारण के समय में ही व्रत खोलें, हरि वासर के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले।
  • द्वादशी को खुद खाने से पहले भोजन या गर्म कपड़ों का दान करें।

क्या न करें

  • एकादशी को चावल या कोई अन्न न खाएँ।
  • एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें; एक दिन पहले तोड़े हुए पत्ते लें।
  • हरि वासर में या द्वादशी समाप्त होने के बाद व्रत न खोलें।
  • व्रत के भोजन या पारण में लहसुन, प्याज़ या मांसाहार न लें।
  • व्रत के दिन झगड़ा, कटु वचन या दिन में सोना टालें।
  • बीमारी, गर्भावस्था, बढ़ती उम्र या दवा चल रही हो तो निर्जल व्रत न रखें; फलाहार से भी व्रत पूरा होता है।
  • दीयों को कपड़े, गन्नों के मंडप या पर्दों के पास बिना देखरेख न छोड़ें।

देश भर में

देवउठनी एकादशी की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड
महिलाएँ गेरू और चावल के घोल से देव बनाती हैं, मौसम की फसल को डलिया से ढकती हैं, और शाम को थाली या सूप बजाकर 'उठो देव' गाते हुए भगवान को जगाती हैं।
राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से
देवउठनी ग्यारस से शादियों का मौसम खुलता है, और यह दिन खुद अबूझ सावा माना जाता है, यानी बिना पंचांग देखे शुभ, इसलिए इस दिन बहुत सी शादियाँ होती हैं।
महाराष्ट्र
कार्तिकी एकादशी पर लाखों वारकरी पंढरपुर में विट्ठल-रुक्मिणी के दर्शन को पहुँचते हैं, और वहाँ तड़के राज्य की ओर से शासकीय महापूजा होती है।
गुजरात
देव उठी अगियारस से लग्न का मौसम खुलता है; तुलसी विवाह गाजे-बाजे और भगवान की पूरी बारात के साथ मनाया जाता है।
ओडिशा
इस दिन से पंचुका शुरू होता है, कार्तिक के आख़िरी पाँच दिन, जो कार्तिक पूर्णिमा तक व्रत और शाकाहार के साथ निभाए जाते हैं।
इस्कॉन और वैष्णव मंदिर
इसे उत्थान एकादशी के रूप में मनाया जाता है, और इसी दिन भीष्म पंचक शुरू होता है। वैष्णव कैलेंडर एकादशी को सूर्योदय से पहले अरुणोदय पर देखता है, इसलिए उसकी तारीख स्मार्त तारीख से एक दिन अलग हो सकती है।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • गन्ना पहले भगवान को अर्पित, फिर खाया जाता है; उत्तर भारत के कई हिस्सों में गन्ने की कटाई परंपरा से इसी दिन के बाद शुरू होती है।
  • सिंघाड़ा और शकरकंद उबले, भुने या हलवे के रूप में, सब व्रत के भोजन हैं।
  • साबूदाना खिचड़ी या खीर सेंधा नमक के साथ, फलाहार के लिए।
  • कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की पूरी उनके लिए जिनके घर के व्रत में ये आटे चलते हैं।
  • मखाने की खीर दूध में पके मखाने, आम भोग और व्रत की मिठाई।
  • फल और दूध सबसे सरल फलाहार: मौसमी फल, दूध, दही और मेवे।
  • पारण का भोजन द्वादशी को तुलसी दल और जल के बाद सादा सात्विक भोजन, अक्सर दाल, चावल, सब्ज़ी और खीर, बिना लहसुन-प्याज़ के।

आने वाले वर्षों में देवउठनी एकादशी की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में देवउठनी एकादशी की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षशुक्रवार, 20 नवंबर 2026आने वाली
2027बुधवार, 10 नवंबर 2027आने वाली
2028शनिवार, 28 अक्टूबर 2028आने वाली

पंचांगों में देवउठनी एकादशी की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग देवउठनी एकादशी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: देवउठनी एकादशी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

देवउठनी एकादशी से जुड़े सामान्य प्रश्न

2026 में देवउठनी एकादशी कब है?

नई दिल्ली में देवउठनी एकादशी 2026 शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को है। एकादशी तिथि सुबह 7:16 से सुबह 6:32 (21 नवंबर) तक रहेगी, और व्रत उस दिन होता है जिस पर एकादशी मानी जाए, सामान्यतः जिसके सूर्योदय पर एकादशी हो; व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी को है। पारण: 21 नवंबर, दोपहर 1:10 से दोपहर 3:18 तक। वैष्णव (इस्कॉन) तारीख कभी अलग हो सकती है, जैसा इस पेज पर बताया गया है।

देवउठनी एकादशी की तिथि क्या है?

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 20 नवंबर, सुबह 7:16 से 21 नवंबर, सुबह 6:32 तक है, और देवउठनी एकादशी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

इस बार तिथि को क्षय क्यों बताया गया है?

एकादशी तिथि इस बार एक निर्णायक क्षण के बाद शुरू होकर अगले से पहले ख़त्म हो जाती है, यानी किसी को नहीं छूती — यह क्षय तिथि है। पर्व रद्द नहीं होता: वह उसी दिन मनाया जाता है जिस दिन तिथि चलती है, जो ऊपर दी गई तारीख है।

देवउठनी एकादशी का पारण कब करें?

शनिवार, 21 नवंबर 2026 को दोपहर 1:10 से दोपहर 3:18 तक। इस बार हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) पूरे प्रातःकाल तक चलता है। हरि वासर में व्रत नहीं खोला जाता, और ऐसी स्थिति में परंपरा मध्याह्न बीतने तक रुकने को कहती है — इसलिए पारण अपराह्न में है।

दूसरे कैलेंडर में देवउठनी एकादशी की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल देवउठनी एकादशी कब है?

2027 में बुधवार, 10 नवंबर; 2028 में शनिवार, 28 अक्टूबर।

देवउठनी एकादशी क्यों रखी जाती है?

यह चातुर्मास के चार महीनों के बाद भगवान विष्णु के जागने का दिन है, संयम के मौसम का अंत और विवाह व नए कार्यों की वापसी। यह फसल का सम्मान भी है, जिसका पहला गन्ना और सिंघाड़ा भगवान को अर्पित होता है, और कार्तिक माहात्म्य में इसके व्रत और रात भर के कीर्तन को अनेक यज्ञों से बढ़कर बताया गया है।

देवउठनी एकादशी की व्रत कथा किस ग्रंथ में है?

कथा स्कंद पुराण का कार्तिक माहात्म्य, जहाँ ब्रह्मा जी नारद को प्रबोधिनी का महत्व बताते हैं; भगवान के शयन का कारण भागवत और वामन पुराण की वामन कथा है में है। पूरी कथा ऊपर दी गई है।

क्या स्मार्त और वैष्णव देवउठनी एकादशी अलग दिन है?

इस बार अलग है: स्मार्त तारीख शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 और वैष्णव (इस्कॉन) तारीख शनिवार, 21 नवंबर 2026। वैष्णव नियम एकादशी को अरुणोदय — सूर्योदय से 96 मिनट पहले — पर देखता है।

देवउठनी एकादशी का पारण कब है?

नई दिल्ली में द्वादशी को पारण का समय: 21 नवंबर, दोपहर 1:10 से दोपहर 3:18 तक। यह समय हरि वासर, यानी द्वादशी का पहला चौथाई भाग, समाप्त होने (21 नवंबर, दोपहर 12:08) के बाद ही खुलता है और द्वादशी समाप्त होने से पहले पूरा होना चाहिए। पहले तुलसी दल और एक घूँट जल लें, फिर सादा सात्विक भोजन करें।

देवउठनी एकादशी की व्रत कथा क्या है?

परंपरागत आधार वामन कथा है: भगवान विष्णु ने राजा बलि को उनके साथ रहने का वचन दिया, और परंपरा इसी को देवशयनी एकादशी से चार महीने की उनकी योगनिद्रा से जोड़ती है, जिससे वे इस दिन जागते हैं। ज़्यादातर परिवार जो व्रत कथा पढ़ते हैं, वह उस नौकर की लोककथा है जो व्रत नहीं रख पाया, नदी किनारे भोजन बनाकर भगवान को पुकारता था और भगवान उसके साथ भोजन करने आते थे; इससे राजा ने सीखा कि व्रत का फल शुद्ध मन से मिलता है। दोनों कथाएँ ऊपर कथा वाले भाग में हैं।

देवउठनी एकादशी की पूजा कैसे करें?

सूर्योदय से व्रत रखें और सुबह तुलसी, पीले फूल और दीपक से भगवान विष्णु की पूजा करें। दोपहर बाद गेरू और चावल के घोल से देव बनाएँ, उस पर गन्ना, सिंघाड़ा और मौसमी फल रखकर ढक दें। गोधूलि में दीये जलाएँ, घंटी, शंख, थाली बजाकर और 'उठो देव' गाकर भगवान को जगाएँ, 'उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द' बोलें, भोग लगाएँ और 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती गाएँ। पारण अगले दिन द्वादशी को होता है।

देवउठनी एकादशी पर देव कैसे बनाएँ?

आँगन, पूजा घर या तुलसी के पास जगह साफ करें। गेरू और चावल के आटे के घोल से चौकोर चौक बनाएँ और उसके भीतर भगवान के चरण या देवताओं की सरल आकृतियाँ, साथ में सूरज, चाँद और कमल, जैसे आपके घर में बनते हैं। उस पर फसल और दीया रखकर देव उठाने तक डलिया से ढक दें। कोई एक सही डिज़ाइन नहीं है: हर घर की अपनी परंपरा है।

भगवान को जगाने का मंत्र क्या है?

जगाने का श्लोक है 'उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते', यानी हे गोविंद, उठिए, उठिए, निद्रा त्यागिए। इसे शंख और घंटी की ध्वनि के बीच फूल और तुलसी अर्पित करते हुए बोला जाता है। दिन भर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें और पारण के समय 'अज्ञानतिमिरान्धस्य' प्रार्थना बोलें। सभी मंत्र अर्थ सहित मंत्र वाले भाग में हैं।

'उठो देव, बैठो देव' गीत क्या है?

यह उत्तर भारत की महिलाओं का भगवान को जगाने का लोकगीत है: थाली या सूप बजाते और भेंट पर रखी डलिया हटाते हुए वे 'उठो देव, बैठो देव' गाती हैं, और आगे घर की खुशहाली, अच्छी फसल और परिवार में शादियों की कामना करती हैं। इसके बोल गाँव-गाँव में अलग हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी मुँहज़बानी चलते आए हैं।

क्या देवउठनी एकादशी पर शादी कर सकते हैं, और विवाह मुहूर्त कब से शुरू होते हैं?

इसी दिन चातुर्मास समाप्त होता है, इसलिए इसके बाद शादियाँ फिर शुरू होती हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में यह दिन खुद अबूझ सावा माना जाता है, यानी बिना पंचांग देखे शुभ, और इस दिन बहुत सी शादियाँ होती हैं। फिर भी विधिवत विवाह मुहूर्त वर-वधू की कुंडली देखकर और गुरु व शुक्र के अस्त न होने पर चुना जाता है, इसलिए किसी साल पंचांग के पहले मुहूर्त कुछ दिन बाद आते हैं; साइट का विवाह मुहूर्त पेज आपके शहर के लिए इन्हें बताता है।

क्या देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह एक ही दिन है?

अक्सर नहीं, पर परंपराएँ अलग हैं। बहुत से पंचांग तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी के अगले दिन, द्वादशी की शाम को बताते हैं। बहुत से परिवार इसे एकादशी की शाम ही करते हैं, जैसे गुजरात के सौराष्ट्र में और उत्तर भारत के बहुत से घरों में; महाराष्ट्र में यह ज़्यादातर द्वादशी को होता है; और तुलसी विवाह का समय कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है, इसलिए बीच की किसी भी शाम कुछ परिवार इसे करते हैं।

देवउठनी एकादशी के व्रत में क्या खाएँ? क्या चावल खा सकते हैं?

एकादशी को चावल, अन्न और दालें नहीं ली जातीं; चावल पारण के बाद ही खाया जाता है। फलाहार में फल, दूध, दही, मेवे, मखाना, साबूदाना, शकरकंद, सिंघाड़ा और बहुत से घरों में कुट्टू या सिंघाड़े का आटा सेंधा नमक के साथ लिया जाता है। लहसुन-प्याज़ नहीं खाए जाते।

देवउठनी एकादशी पर कौन सी आरती गाएँ?

भगवान विष्णु की सबसे प्रसिद्ध आरती 'ॐ जय जगदीश हरे' देव उठाने के बाद और सुबह की पूजा में कपूर या घी के दीपक से गाई जाती है। इसका पूरा पाठ देवनागरी और रोमन अक्षरों में ऊपर आरती वाले भाग में दिया गया है।

देवउठनी एकादशी की पूजा सामग्री क्या है?

भगवान विष्णु या शालिग्राम की मूर्ति, पीले कपड़े वाली चौकी, देव बनाने के लिए गेरू और चावल का घोल, भेंट ढकने के लिए डलिया, गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद और मौसमी फल, एक दिन पहले तोड़े तुलसी दल, पीले फूल, पंचामृत, घी के दीये, कपूर, शंख या घंटी और बजाने के लिए थाली। विकल्पों के साथ पूरी सूची ऊपर है।

क्या देवउठनी एकादशी का व्रत निर्जला होता है?

ज़रूरी नहीं। कुछ भक्त पारिवारिक परंपरा से निर्जल व्रत रखते हैं, पर ज़्यादातर फलाहार करते हैं, और श्रद्धा से रखा गया व्रत दोनों तरह पूरा होता है। बीमारी, गर्भावस्था, बढ़ती उम्र या दवा चल रही हो तो बिना पानी का व्रत न रखें; उपवास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

देवउठनी एकादशी के और कौन से नाम हैं?

इसे प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी, हरिबोधिनी एकादशी, राजस्थान और मध्य प्रदेश में देवउठनी ग्यारस, गुजरात में देव उठी अगियारस और महाराष्ट्र में कार्तिकी एकादशी कहते हैं। सब एक ही दिन के नाम हैं, कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी।