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शुक्ल पक्ष · एकादशी तिथि · ज्येष्ठ

निर्जला एकादशी 2027 कब है?

निर्जला एकादशी 2027

231 दिन बाद

सोम, 14 जून

2027 में निर्जला एकादशी सोमवार, 14 जून को है। नई दिल्ली में पारण 15 जून को दोपहर 1:45 से शाम 4:32 तक है; एकादशी तिथि 14 जून, रात 2:12 से 15 जून, रात 2:08 तक रहेगी।

2028: शनिवार, 3 जून 2028

पारण

दोपहर 1:45 – शाम 4:32

नई दिल्ली

निर्जला एकादशी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

निर्जला एकादशी 2027: तारीख और तिथि का समय

सोमवार, 14 जून 2027

तिथि
एकादशी, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
ज्येष्ठ
तिथि आरंभ
14 जून, रात 2:12
तिथि समाप्त
15 जून, रात 2:08
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
14 जून, सुबह 5:22

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: निर्जला एकादशी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

निर्जला एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

निर्जला एकादशी 2027 शुभ मुहूर्त

निर्जला एकादशी बिना जल की एकादशी है: ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में, साल के सबसे गरम हफ़्तों में, सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक न अन्न और न जल लेकर रखी जाती है, और माना जाता है कि इसमें सभी चौबीस एकादशियों का पुण्य है। नई दिल्ली में यह सोमवार, 14 जून 2027 को है: व्रत सूर्योदय (सुबह 5:22) से शुरू होता है और द्वादशी को 15 जून, दोपहर 1:45 से शाम 4:32 तक में खोला जाता है। इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं।

निर्जला एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
पारण: पहला जल15 जून, दोपहर 1:45 से शाम 4:32 तकहरि वासर सुबह के बाद तक चलता है, इसलिए पारण मध्याह्न के बाद, अपराह्न में।

द्वादशी की सुबह का वह समय, जिसमें निर्जल व्रत पूरा किया जाता है; यह हरि वासर बीतने के बाद शुरू होता है, हरि वासर देर तक चले तो दोपहर के बाद होता है, और द्वादशी समाप्त होने के बाद कभी नहीं। शुरुआत धीरे-धीरे जल के घूँटों से करें, फिर शरबत या फल। यहाँ दिया समय नई दिल्ली के लिए गणना करके दिया गया है।

हरि वासर समाप्ति15 जून, सुबह 8:14द्वादशी के पहले चौथाई भाग का अंत; इसके भीतर व्रत नहीं खोला जाता।

हरि वासर द्वादशी का पहला चौथाई भाग है। इसमें व्रत नहीं खोला जाता, चाहे सुबह हो चुकी हो, इसलिए नई दिल्ली में इसकी समाप्ति ही पारण का सबसे पहला क्षण है।

ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:02 से सुबह 4:42 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।

एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले का समय: उठने, स्नान करने और व्रत का संकल्प लेने का पारंपरिक समय।

सूर्योदय: निर्जल व्रत का आरंभसुबह 5:22क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

निर्जला व्रत एकादशी के सूर्योदय से गिना जाता है: इस क्षण से द्वादशी के पारण तक न अन्न लिया जाता है, न जल, केवल आचमन का घूँट।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • अमृत सुबह 5:22 से सुबह 7:07 तक
  • शुभ सुबह 8:52 से सुबह 10:36 तक
  • चर दोपहर 2:06 से दोपहर 3:50 तक
  • लाभ दोपहर 3:50 से शाम 5:35 तक
  • अमृत शाम 5:35 से शाम 7:20 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। जो परिवार भोर में पूजा नहीं कर पाते, वे मुख्य पूजा के लिए इनमें से कोई समय चुनते हैं।

प्रदोष काल: संध्या दीपशाम 7:20 से रात 9:20 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)।

सूर्यास्त के बाद का समय, जब भगवान विष्णु के आगे और तुलसी के पास दीप जलाए जाते हैं और फिर से आरती होती है।

निशीथ काल: रात्रि जागरण15 जून, रात 12:01 से रात 12:41 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, आधी रात के आसपास।

आधी रात का समय, जागरण का केंद्र। जो रात भर जागते हैं, वे यह भाग कीर्तन और जप को देते हैं।

राहु काल (वर्जित समय)इस समय टाला जाता हैसुबह 7:07 से सुबह 8:52 तकदिन का वह आठवाँ भाग जो वार के अनुसार राहु का है: इसमें पूजा, खरीदारी या यात्रा शुरू नहीं की जाती।

नई दिल्ली में एकादशी के दिन का राहु काल। बहुत से परिवार संकल्प या मुख्य पूजा इसके भीतर शुरू नहीं करते; इससे व्रत या पारण का समय नहीं बदलता।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तसुबह 11:53 से दोपहर 12:49शुभ
अमृत कालसुबह 10:56 से दोपहर 12:34सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:02 से सुबह 4:42शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालसुबह 7:07 से सुबह 8:52
यमगण्ड कालसुबह 10:36 से दोपहर 12:21
दुर्मुहूर्त (पहला)दोपहर 12:49 से दोपहर 1:45
दुर्मुहूर्त (दूसरा)दोपहर 3:36 से शाम 4:32
वर्ज्यम्रात 11:17 से रात 12:56

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए सोमवार, 14 जून 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पारण · नई दिल्ली

निर्जला एकादशी 2027 पारण का समय

मंगलवार, 15 जून 2027, दोपहर 1:45 से शाम 4:32

पारण द्वादशी को होता है, और हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग, जो इस बार 15 जून, सुबह 8:14 पर समाप्त होता है — में व्रत नहीं खोला जाता। इस बार हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) पूरे प्रातःकाल तक चलता है। हरि वासर में व्रत नहीं खोला जाता, और ऐसी स्थिति में परंपरा मध्याह्न बीतने तक रुकने को कहती है — इसलिए पारण अपराह्न में है।

व्रत के बारे में यहाँ दी गई बातें परंपरा का वर्णन हैं, चिकित्सा सलाह नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या दवाइयों की स्थिति में व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

शुक्ल पक्ष · ज्येष्ठ

निर्जला एकादशी 2027: स्मार्त और वैष्णव तारीख

इस पेज की तारीख (स्मार्त, सूर्योदय का नियम)
सोमवार, 14 जून 2027 — जिस दिन के सूर्योदय पर एकादशी तिथि है, व्रत उसी दिन का माना जाता है — यही दिन एस्ट्रोसेज और यह साइट देती है।
वैष्णव (इस्कॉन), अरुणोदय का नियम
सोमवार, 14 जून 2027 — इस बार वही दिन। वैष्णव नियम तिथि सूर्योदय पर नहीं, अरुणोदय — सूर्योदय से पहले के 96 मिनट — पर देखता है; सोमवार, 14 जून 2027 का अरुणोदय (14 जून, रात 3:46) एकादशी में है, दशमी में नहीं।

ऊपर का हर दिन नई दिल्ली के लिए उन्हीं तिथि-क्षणों से निकाला गया है। इस्कॉन मंदिर हर शहर के लिए अपना कैलेंडर छापते हैं और कुछ वर्षों में महाद्वादशी के नियम से व्रत द्वादशी पर भी ले जाते हैं — आपके मंदिर का कैलेंडर अलग हो तो उसी का पालन करें।

महत्व और व्रत कथा

निर्जला एकादशी व्रत कथा और महत्व

अन्य नाम: भीमसेनी एकादशी।

निर्जला एकादशी ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी है, उत्तर भारत की सबसे गर्म ऋतु में, और इसका व्रत निर्जल — बिना जल के भी — सूर्योदय से अगले दिन के पारण तक रखा जाता है। नीचे की कथा के कारण इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। इस दिन जल से भरे घड़े, पंखे, छाते, शरबत और अन्न का दान किया जाता है और राहगीरों के लिए पानी रखा जाता है। उस गर्मी में निर्जल व्रत कठिन है, और कई परिवार वृद्ध, बीमार और गर्भवती सदस्यों के लिए हल्का व्रत रखते हैं।

निर्जला एकादशी की कथा

संक्षेप में, अपने शब्दों में — स्रोत: ब्रह्मवैवर्त पुराण, एकादशी माहात्म्य, जहाँ व्यास जी भीम से बात करते हैं (हिंदी व्रत-कथा पुस्तकें इसे महाभारत की परंपरा से भी जोड़ती हैं)।

पांडव हर एकादशी का व्रत रखते थे — युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी और माता कुंती, सब महीने में दो बार उपवास करते थे। भीम ऐसा नहीं कर पाते थे। वे कहते थे कि उनके पेट में वृक नाम की ऐसी अग्नि है जो भोजन से ही शांत होती है; वे दान कर सकते हैं, विष्णु की पूजा कर सकते हैं, पर बिना खाए एक दिन भी नहीं रह सकते।

चिंतित होकर वे व्यास जी के पास गए और पूछा कि क्या उन जैसे व्यक्ति के लिए भी एकादशी के पुण्य में भागी होने का कोई मार्ग है। व्यास जी ने उन्हें हर बार भूखा रहने को नहीं कहा।

उन्होंने कहा कि साल में एक दिन है — ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी। उस दिन पूरा व्रत रखो — आचमन के जल के सिवा न अन्न, न जल, सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक — और दूसरों को भोजन कराकर, जल और दान देकर पारण करो। यह एक व्रत सभी चौबीस एकादशियों का पुण्य देता है।

भीम ने यह व्रत रखा और यह उन्हीं के नाम पर भीमसेनी एकादशी कहलाया। व्यास जी कहते हैं कि जो इसे श्रद्धा से रखता है, जीवन के अंत में उसे यमदूत नहीं, विष्णु के दूत लेने आते हैं।

व्रत कैसे रखा जाता है

  • व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है। बहुत से परिवार एक दिन पहले, दशमी की शाम, एक बार सादा भोजन करते हैं।
  • एकादशी को अन्न और चावल नहीं लिए जाते। जो पूरा उपवास नहीं रख पाते वे फल, दूध या फलाहार लेते हैं; निर्जल व्रत वही रखते हैं जिनकी परंपरा और स्वास्थ्य इसकी अनुमति दें।
  • भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल, दीप और उनके नामों से होती है; उस दिन की कथा पढ़ना या सुनना व्रत का अंग है, और कई लोग रात का कुछ भाग कीर्तन या जप में जागकर बिताते हैं।
  • पारण द्वादशी को होता है, हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग — बीतने के बाद। आपके शहर का पारण समय ऊपर गणना करके दिया गया है।

उपवास के नियम यहाँ परंपरा के रूप में बताए गए हैं, चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या किसी दवा के चलते उपवास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

सभी 26 · नई दिल्ली

सभी एकादशी और उनकी अगली तारीख

साधारण वर्ष में चौबीस, और अधिक मास वाले वर्ष में दो और। हर एकादशी का अपना पेज है — कथा, पारण और स्मार्त-वैष्णव तारीख के साथ।

अगली एकादशी और उसका पारण · 2027 की सभी एकादशी — तिथि और पारण के समय के साथ

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

निर्जला एकादशी पूजा विधि

  1. एक दिन पहले: दशमी

    दशमी को जल्दी, हल्का सात्विक भोजन करें और दिन भर भरपूर पानी पिएँ, क्योंकि अगला व्रत निर्जल है। शाम को ही दाँत साफ कर लें और ज़रूरत के तुलसी दल तोड़ लें, और रात शांति से बिताएँ।

  2. जल्दी उठें और स्नान करें

    एकादशी की सुबह जल्दी, हो सके तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें (पानी में गंगाजल की कुछ बूँदें हों तो अच्छा) और साफ कपड़े पहनें; भगवान विष्णु की पूजा में पीले वस्त्र पारंपरिक हैं।

  3. निर्जल व्रत का संकल्प

    सूर्योदय पर दाहिने हाथ में थोड़ा जल लेकर भगवान विष्णु के लिए निर्जला का संकल्प करें: इस सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक न अन्न, न जल, केवल आचमन का घूँट। जो उम्र या सेहत के कारण बिना पानी के न रह सकें, वे जल या फल पर व्रत का संकल्प लें; परंपरा स्वयं हल्के रूप की अनुमति देती है।

  4. चौकी सजाएँ

    साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र रखें (घर में शालिग्राम या लड्डू गोपाल हों तो उन्हें), साथ में घी का दीपक और जल से भरा छोटा कलश या लोटा। हर पूजा की तरह पहले एक फूल और 'ॐ गं गणपतये नमः' से गणेश जी का स्मरण करें।

  5. भगवान विष्णु का पूजन

    धातु की प्रतिमा या शालिग्राम को पहले जल, फिर पंचामृत और फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ (चित्र हो तो फूल से जल छिड़कें)। चंदन, पीले फूल, पीला वस्त्र या मौली, धूप, दीप और एक दिन पहले तोड़े गए तुलसी दल अर्पित करें, साथ में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें। बहुत से घरों में एकादशी की पूजा में चावल बिल्कुल नहीं लिया जाता; अक्षत की जगह फूल या थोड़े तिल चढ़ाए जाते हैं।

  6. जल, फल और पंखे का भोग

    भगवान विष्णु को ठंडे जल का घड़ा, आम या खरबूज़ा और मिठाई, हर एक पर तुलसी दल, और पास में एक हाथ का पंखा अर्पित करें। अन्न से बना कुछ भी न चढ़ाएँ।

  7. कथा और आरती

    नीचे दी गई निर्जला एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और हो सके तो विष्णु सहस्रनाम या गीता का एक अध्याय भी। फिर घी के दीपक या कपूर से 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती गाएँ और पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें।

  8. निर्जल घंटों में

    गर्मी में घर के भीतर, धूप और मेहनत से दूर, शांत रहें, भगवान का नाम लें, और सेहत की अनुमति तक दिन में सोने से बचें। चक्कर, कमज़ोरी या तबीयत बिगड़ने लगे तो तुरंत पानी पिएँ: व्रत अपने को नुकसान पहुँचाने को नहीं कहता।

  9. दूसरों के लिए जल

    राहगीरों के लिए ठंडे पानी का घड़ा रखें, और ज़रूरतमंदों को जल से भरे घड़े, हाथ के पंखे, छाते, शरबत या अन्न दें: यही इस दिन के पारंपरिक दान हैं, और यही इस मौसम में इस व्रत का अर्थ भी।

  10. संध्या दीप

    सूर्यास्त पर भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक और तुलसी के पास एक दीपक जलाएँ, उसके पत्ते तोड़े बिना, और फिर से आरती गाएँ।

  11. रात्रि जागरण

    रात का जितना भाग हो सके, कीर्तन, जप या पाठ में जागकर बिताएँ; आधी रात का समय जागरण का केंद्र है। जो पूरी रात न जाग सकें, वे उसका कुछ भाग जागें।

  12. द्वादशी: दान, फिर पहले जल

    अगली सुबह स्नान करके भगवान का पूजन करें, और जैसा व्यास जी ने भीम से कहा, अपने पारण से पहले किसी को भोजन कराएँ, जल और दान दें। फिर पारण के समय के भीतर पारण का श्लोक बोलकर धीरे-धीरे जल के घूँटों से व्रत खोलें, फिर शरबत या फल, और उसके बाद ही हल्का भोजन।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

निर्जला एकादशी पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र चित्र भी काफी है; धातु की प्रतिमा, शालिग्राम या लड्डू गोपाल को पूजा में स्नान कराया जाता है।
  • चौकी और पीला कपड़ा पीला भगवान विष्णु का रंग है; साफ लाल कपड़ा भी चलता है।
  • तुलसी दल दशमी को तोड़े हुए, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती; हर भोग पर एक रखा जाता है।
  • घी का दीपक और रुई की बत्ती एक पूजा के लिए और एक शाम को तुलसी के पास; तिल का तेल भी ले सकते हैं।
  • पीले फूल और माला गेंदा, चंपा या कोई भी ताज़े पीले फूल; मिल सके तो कमल।
  • चंदन भगवान के तिलक के लिए; हल्दी का लेप भी चलता है।
  • रोली और हल्दी तिलक और कलश पर निशान के लिए।
  • पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर; प्रतिमा के स्नान और प्रसाद के लिए।
  • गंगाजल स्नान के जल में कुछ बूँदें और पूजा स्थान की शुद्धि के लिए; न हो तो शुद्ध जल।
  • कलश या जल भरा लोटा स्नान, आचमन और संकल्प के लिए।
  • धूप और अगरबत्ती जो आप रोज़ लेते हैं।
  • कपूर, आरती की थाली और घंटी आरती के लिए; घर में शंख हो तो वह भी।
  • मौली (कलावा) भगवान के वस्त्र के रूप में चढ़ाने या कलाई पर बाँधने के लिए।
  • भगवान के लिए पीला वस्त्र ज़रूरी नहीं; मौली से भी काम चलता है।
  • मौसमी फल केला, सेब, अमरूद, अनार या जो ताज़ा मिले; भोग के बाद फलाहार में भी।
  • बिना अन्न की मिठाई मखाने की खीर, मिश्री, पेड़ा या मेवे; आटे या चावल से बनी कोई चीज़ नहीं।
  • थोड़े तिल जिन घरों में एकादशी की पूजा में चावल नहीं लिया जाता, वहाँ अक्षत की जगह चढ़ाने के लिए।
  • तुलसी की माला मंत्र के 108 जप के लिए।
  • व्रत कथा, विष्णु सहस्रनाम या गीता पुस्तक या फ़ोन; कथा पढ़ना व्रत का अंग है।
  • द्वादशी का दान पारण से पहले देने के लिए अन्न, फल, वस्त्र या दक्षिणा।
  • मिट्टी का घड़ा (मटका) जल से भरा भगवान को अर्पित और फिर दान; इस दिन का अपना दान।
  • हाथ के पंखे और छाता इस मौसम के पारंपरिक दान, जल के साथ दिए जाते हैं।
  • शरबत, आम और खरबूज़ा भोग के लिए, और द्वादशी को जिन्हें भोजन कराएँ उनके लिए।
  • दान के लिए अन्न द्वादशी की सुबह पारण से पहले दिया जाता है।

मंत्र · अर्थ के साथ

निर्जला एकादशी के मंत्र और आरती

शान्ताकारं: विष्णु ध्यान श्लोक

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

Shantakaram bhujagashayanam padmanabham suresham vishvadharam gaganasadrisham meghavarnam shubhangam
Lakshmikantam kamalanayanam yogibhir dhyanagamyam vande Vishnum bhavabhayaharam sarvalokaikanatham

अर्थ: मैं विष्णु को नमन करता हूँ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, देवताओं के स्वामी, संसार के आधार, आकाश जैसे व्यापक, मेघ जैसे श्याम, शुभ अंगों वाले, लक्ष्मी के प्रिय, कमल-नयन, योगियों के ध्यान से प्राप्त, संसार का भय हरने वाले और सभी लोकों के एकमात्र स्वामी।

कब और कैसे: पूजा शुरू करने से पहले हाथ जोड़कर एक बार, भगवान के उसी रूप का ध्यान करते हुए जो श्लोक बताता है।

एकादशी संकल्प श्लोक

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि ।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

Ekadashyam niraharah sthitvaham apare'hani
Bhokshyami pundarikaksha sharanam me bhavachyuta

अर्थ: हे कमलनयन, मैं एकादशी को निराहार रहकर अगले दिन भोजन करूँगा। हे अच्युत, आप मेरी शरण बनें।

कब और कैसे: सूर्योदय पर दाहिने हाथ में थोड़ा जल लेकर, निर्जल व्रत के संकल्प के साथ एक बार।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (द्वादशाक्षर मंत्र)

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

Om Namo Bhagavate Vasudevaya

अर्थ: ॐ, भगवान वासुदेव को नमस्कार, यानी सब प्राणियों में बसने वाले विष्णु को। यही मंत्र भागवत पुराण में नारद जी ने बालक ध्रुव को दिया था।

कब और कैसे: एकादशी का मुख्य जप: पूजा में तुलसी की माला पर 108 बार, और दिन भर व रात्रि जागरण में जितनी बार चाहें।

महामंत्र: हरे राम हरे कृष्ण

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥

Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare
Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare

अर्थ: सोलह नाम, हरे, राम और कृष्ण, हर नाम प्रभु को पुकार है, बिना कुछ माँगे। कलिसंतरण उपनिषद में 'हरे राम' वाला आधा पहले है; इस्कॉन सहित कई समुदाय 'हरे कृष्ण' वाला आधा पहले गाते हैं। दोनों तरह यह वही मंत्र है।

कब और कैसे: रात के कीर्तन में ऊँचे स्वर में, या दिन भर तुलसी की माला पर धीरे-धीरे।

पारण का श्लोक

अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव ।
प्रसीद सुमुखो नाथ ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥

Ajnana-timirandhasya vratenanena Keshava
Prasida sumukho natha jnana-drishti-prado bhava

अर्थ: हे केशव, अज्ञान के अंधकार से अंधे हुए मुझ पर इस व्रत से प्रसन्न हों। हे नाथ, कृपा करें और ज्ञान की दृष्टि दें।

कब और कैसे: द्वादशी को पारण के समय के भीतर, जल का पहला घूँट लेने से पहले एक बार।

आरती विष्णु जी की आरती: ॐ जय जगदीश हरे पूरी आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.
Om jai Jagdish hare.

Jo dhyave phal pave, dukh binse man ka, swami dukh binse man ka.
Sukh sampati ghar aave, sukh sampati ghar aave, kasht mite tan ka.
Om jai Jagdish hare.

Maat pita tum mere, sharan gahoon kiski, swami sharan gahoon main kiski.
Tum bin aur na dooja, tum bin aur na dooja, aas karoon main jiski.
Om jai Jagdish hare.

Tum pooran Parmatma, tum antaryami, swami tum antaryami.
Parabrahm Parmeshwar, Parabrahm Parmeshwar, tum sab ke swami.
Om jai Jagdish hare.

Tum karuna ke sagar, tum palankarta, swami tum palankarta.
Main moorakh phalkami, main sevak tum swami, kripa karo bharta.
Om jai Jagdish hare.

Tum ho ek agochar, sabke pranpati, swami sabke pranpati.
Kis vidhi miloon dayamay, kis vidhi miloon dayamay, tumko main kumati.
Om jai Jagdish hare.

Deen-bandhu dukh-harta, thakur tum mere, swami rakshak tum mere.
Apne haath uthao, apne sharan lagao, dwar pada tere.
Om jai Jagdish hare.

Vishay-vikar mitao, paap haro deva, swami paap haro deva.
Shraddha bhakti badhao, shraddha bhakti badhao, santan ki seva.

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'स्वामी' की जगह 'प्रभु', 'क्षण में' की जगह 'छिनमें' और 'फलकामी' की जगह 'खल कामी' छपा है; उसमें आधी पंक्तियाँ दोहराई नहीं गई हैं, 'दास जनों के संकट', 'मैं सेवक तुम स्वामी' और 'अपने शरण लगाओ' नहीं हैं, और 'ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे' की जगह 'तुम ठाकुर मेरे' है। छपा पाठ

महत्व

निर्जला एकादशी का महत्व

यह उन लोगों का उपवास है जो बाकी एकादशियाँ नहीं रख पाते। भीम, जो एक दिन भी भोजन के बिना नहीं रह सकते थे, व्यास जी से परिवार के पुण्य में भागीदारी का उपाय पूछने गए, और उन्हें साल का यही एक दिन मिला, जिसे पूरी तरह निभाना चौबीसों के बराबर है। इसीलिए कोई और एकादशी न रखने वाले बहुत से लोग यह एक रखते हैं, और यह दिन अपनी प्यास जितना ही दूसरों की प्यास का भी है: द्वार पर पानी का मटका, सड़क किनारे ठंडे पेय की छबील।

इससे एक दिन पहले गंगा दशहरा होता है, और कुछ दिन बाद जगन्नाथ की स्नान पूर्णिमा, जब पुरी के विग्रहों को खुले में स्नान कराया जाता है। संकल्प से पहले डॉक्टर की सलाह आती है: बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती या नियमित दवा लेने वाले पहले पूछें और हल्का रूप रखें। कथा में व्यास जी कहते हैं कि इसे श्रद्धा से रखने वाले को जीवन के अंत में यमदूत नहीं, भगवान विष्णु के दूत लेने आते हैं।

उपाय · परंपरा

निर्जला एकादशी के पारंपरिक उपाय

हर राहगीर के लिए पानी

पूरे दिन अपने दरवाज़े या दुकान के बाहर ठंडे पानी का मिट्टी का घड़ा, गिलास के साथ, रखें। जिस दिन आप स्वयं जल नहीं लेते, उस दिन दूसरों को जल देना ही निर्जला का मर्म है।

घड़े, पंखे और छाते

धूप में काम करने वालों को जल के घड़े, हाथ के पंखे और छाते दें: यही इस एकादशी के पारंपरिक दान हैं।

शरबत और आम

पड़ोसियों, मज़दूरों और बच्चों के साथ शरबत, आम और खरबूज़ा बाँटें; बहुत से नगरों में परिवार इस दिन सड़क किनारे मीठे पानी की छबील लगाते हैं।

खुद खाने से पहले दूसरों को

व्यास जी ने भीम से कहा था कि दूसरों को भोजन कराकर, जल और दान देकर ही व्रत खोलना। द्वादशी की सुबह अपने पारण से पहले किसी को भोजन कराएँ।

एक व्रत, पूरी तरह

भीम कोई और एकादशी नहीं रख सकते थे, इसलिए उन्होंने यह एक पूरी तरह रखी। यदि आप साल में एक ही एकादशी रख सकें, तो परंपरा कहती है वह यही हो, उस रूप में जिसकी आपकी सेहत अनुमति दे।

पक्षियों और पशुओं के लिए पानी

पक्षियों के लिए उथले बर्तन में और पशुओं के लिए नाँद में पानी रखें; ज्येष्ठ की गर्मी में यह ऐसा दान है जो घंटे भर में काम आ जाता है।

परंपरा, संक्षेप में

निर्जला एकादशी पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार हल्का सात्विक भोजन करें।
  • सुबह संकल्प लें और जैसा व्रत तय किया, वैसा ही निभाएँ।
  • हर भोग पर एक दिन पहले तोड़ा गया तुलसी दल रखें।
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें और कथा पढ़ें या सुनें।
  • शाम को भगवान विष्णु के सामने और तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
  • रात का कम से कम कुछ भाग कीर्तन या जप में जागें।
  • ज़रूरतमंद को भोजन या जल दें, और द्वादशी को पारण से पहले दान करें।
  • द्वादशी को पारण के समय के भीतर ही व्रत खोलें।
  • दशमी को भरपूर पानी पिएँ, और एकादशी को ठंडक में, शांत रहें।
  • राहगीरों के लिए पानी रखें और घड़े, पंखे, छाते या शरबत का दान करें।

क्या न करें

  • एकादशी को चावल, गेहूँ, दाल या कोई भी अन्न न खाएँ।
  • एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें।
  • दशमी से द्वादशी तक प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और मदिरा से दूर रहें।
  • दिन में न सोएँ।
  • झगड़ा, झूठ और कटु वचन से बचें।
  • हरि वासर में व्रत न खोलें, और द्वादशी बीतने से पहले पारण कर लें।
  • बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं और बच्चों पर कठोर व्रत का दबाव न डालें; डायबिटीज़ या किसी और बीमारी वाले, या रोज़ दवा लेने वाले लोग व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।
  • बुज़ुर्ग, गर्भवती, मधुमेह के रोगी, बीमार या दवा लेने वाले निर्जल व्रत न रखें।
  • भारी या तले भोजन से व्रत न खोलें; शुरुआत जल से करें।

देश भर में

निर्जला एकादशी की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

उत्तर भारत
परिवार राहगीरों के लिए सड़क किनारे पानी और शरबत की छबील लगाते हैं, और मिट्टी के घड़े, पंखे व छाते दान करते हैं।
गौड़ीय वैष्णव पंचांग
यह दिन पांडव निर्जला एकादशी के नाम से दिया जाता है।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • दशमी का भोजन दशमी को जल्दी, हल्का सात्विक भोजन, और दिन भर भरपूर पानी।
  • एकादशी को कुछ नहीं पूरे निर्जला व्रत में सूर्योदय से पारण तक न अन्न लिया जाता है, न जल, केवल आचमन का घूँट।
  • हल्के रूप के लिए जो बिना पानी के न रह सकें, वे सेहत के अनुसार जल, नारियल पानी, सेंधा नमक वाले नींबू पानी या फल पर व्रत रखते हैं।
  • पारण पर पहले जल धीरे-धीरे जल के घूँट, फिर थोड़ा शरबत, नींबू पानी या फल।
  • फिर हल्का भोजन मूँग की दाल, खिचड़ी या दाल-चावल दही के साथ; शुरुआत में कुछ भी भारी या तला नहीं।
  • दूसरों के लिए शरबत और आम इस दिन की मिठास बाँटी जाती है: राहगीरों के लिए शरबत, आम, खरबूज़ा और पानी।

आने वाले वर्षों में निर्जला एकादशी की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में निर्जला एकादशी की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षगुरुवार, 25 जून 2026बीत गई
2027सोमवार, 14 जून 2027आने वाली
2028शनिवार, 3 जून 2028आने वाली

पंचांगों में निर्जला एकादशी की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग निर्जला एकादशी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: निर्जला एकादशी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

निर्जला एकादशी से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में निर्जला एकादशी कब है?

नई दिल्ली में निर्जला एकादशी सोमवार, 14 जून 2027 को है। एकादशी तिथि रात 2:12 से रात 2:08 (15 जून) तक रहेगी; निर्जल व्रत उस दिन सूर्योदय (सुबह 5:22) से शुरू होकर अगली सुबह पारण पर पूरा होता है। यह ज्येष्ठ (जेठ) शुक्ल पक्ष की एकादशी है, और हमेशा मई के अंत से जून के अंत के बीच आती है।

निर्जला एकादशी की तिथि क्या है?

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 14 जून, रात 2:12 से 15 जून, रात 2:08 तक है, और निर्जला एकादशी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

निर्जला एकादशी का पारण कब करें?

मंगलवार, 15 जून 2027 को दोपहर 1:45 से शाम 4:32 तक। इस बार हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) पूरे प्रातःकाल तक चलता है। हरि वासर में व्रत नहीं खोला जाता, और ऐसी स्थिति में परंपरा मध्याह्न बीतने तक रुकने को कहती है — इसलिए पारण अपराह्न में है।

दूसरे कैलेंडर में निर्जला एकादशी की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल निर्जला एकादशी कब है?

2028 में शनिवार, 3 जून।

निर्जला एकादशी क्यों रखी जाती है?

निर्जला एकादशी ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी है, उत्तर भारत की सबसे गर्म ऋतु में, और इसका व्रत निर्जल — बिना जल के भी — सूर्योदय से अगले दिन के पारण तक रखा जाता है। नीचे की कथा के कारण इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। इस दिन जल से भरे घड़े, पंखे, छाते, शरबत और अन्न का दान किया जाता है और राहगीरों के लिए पानी रखा जाता है। उस गर्मी में निर्जल व्रत कठिन है, और कई परिवार वृद्ध, बीमार और गर्भवती सदस्यों के लिए हल्का व्रत रखते हैं।

निर्जला एकादशी की व्रत कथा किस ग्रंथ में है?

कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण, एकादशी माहात्म्य, जहाँ व्यास जी भीम से बात करते हैं (हिंदी व्रत-कथा पुस्तकें इसे महाभारत की परंपरा से भी जोड़ती हैं) में है। पूरी कथा ऊपर दी गई है।

क्या स्मार्त और वैष्णव निर्जला एकादशी अलग दिन है?

नहीं, इस बार दोनों सोमवार, 14 जून 2027 को हैं। वैष्णव नियम एकादशी को अरुणोदय पर देखता है, और उस दिन अरुणोदय पर भी एकादशी है।

निर्जला एकादशी का पारण कब है, और व्रत कैसे खोलें?

पारण द्वादशी की सुबह होता है: नई दिल्ली में 15 जून, दोपहर 1:45 से शाम 4:32 तक, हरि वासर समाप्त होने (15 जून, सुबह 8:14) के बाद। बिना पानी के दिन के बाद पारण का श्लोक बोलकर धीरे-धीरे जल के घूँटों से शुरुआत करें, फिर शरबत या फल, और उसके बाद ही हल्का भोजन। सुबह का समय छूट जाए तो मध्याह्न बीतने तक रुकें, और द्वादशी समाप्त होने से पहले व्रत खोल लें।

निर्जला एकादशी की व्रत कथा क्या है?

पांडव हर एकादशी रखते थे, पर भीम नहीं रख पाते थे: उनके पेट में ऐसी अग्नि थी जो भोजन से ही शांत होती थी। उन्होंने व्यास जी से उपाय पूछा, और व्यास जी ने एक दिन बताया, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी: उसे पूरा रखो, आचमन के घूँट के सिवा न अन्न, न जल, सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक, फिर दूसरों को भोजन कराकर व्रत खोलो। व्यास जी ने कहा कि यह एक व्रत सभी चौबीस का पुण्य देता है। भीम ने यह व्रत रखा। पूरी कथा ऊपर है।

इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी क्यों कहते हैं?

क्योंकि भीम, वह पांडव जो बाकी एकादशियाँ नहीं रख पाते थे, ने व्यास जी के कहने पर यह एक रखी, और यह उन्हीं के नाम से जानी गई: भीमसेनी एकादशी, या पांडव एकादशी। तीनों नाम एक ही दिन के हैं, और नई दिल्ली में यह सोमवार, 14 जून 2027 को है।

क्या निर्जला एकादशी पर पानी पी सकते हैं?

पूरा व्रत रखें तो नहीं: निर्जला का अर्थ ही है बिना जल के, सूर्योदय से पारण तक, केवल पूजा के आचमन का छोटा घूँट। परंपरा स्वयं उन सबके लिए, जिनकी उम्र या सेहत इसकी माँग करे, जल या फल वाले हल्के रूप की अनुमति देती है, और जिसे भी कमज़ोरी या चक्कर लगे, उसे तुरंत पानी पीना चाहिए।

निर्जला एकादशी के नियम क्या हैं?

दशमी को हल्का भोजन करें और भरपूर पानी पिएँ। एकादशी के सूर्योदय से न अन्न लें, न जल, केवल आचमन का घूँट; भगवान विष्णु की पूजा करें, कथा पढ़ें, ठंडक में रहें और मेहनत व दिन की नींद से बचें; दूसरों को जल और दान दें। द्वादशी को पारण के समय में, पहले जल से, व्रत खोलें। कमज़ोर सेहत वाले हल्का रूप रखें।

निर्जला एकादशी का व्रत कैसे करें?

दशमी को जल्दी खाएँ और भरपूर पानी पिएँ। सूर्योदय पर निर्जल व्रत का संकल्प लें, फिर स्नान करके तुलसी, पीले फूल, घी के दीपक और जल के घड़े से भगवान विष्णु की पूजा करें, और भीम की कथा पढ़ें। गर्मी में घर के भीतर रहें, पानी रखें और पंखे, घड़े या शरबत का दान करें, रात का कुछ भाग कीर्तन में बिताएँ, और द्वादशी को किसी को भोजन कराकर जल से व्रत खोलें।

निर्जला व्रत से पहले और बाद में क्या खाएँ?

दशमी को हल्का, जल्दी, सात्विक भोजन और भरपूर पानी। एकादशी को, पूरा व्रत हो तो कुछ भी नहीं, या हल्के रूप में जल और फल। पारण पर पहले धीरे-धीरे जल, फिर शरबत, नींबू पानी या फल, और बाद में मूँग की दाल या दही के साथ खिचड़ी जैसा हल्का भोजन; शुरुआत में भारी या तला खाना न लें।

निर्जला एकादशी पर क्या दान करें?

सारे पारंपरिक दान गर्मी का उत्तर हैं: जल से भरे मिट्टी के घड़े, हाथ के पंखे, छाते, शरबत, आम और अन्न, और राहगीरों के लिए रखा पानी। इन्हें अपने पारण से पहले दें, हो सके तो धूप में काम करने वालों को; परंपरा कीमत से अधिक दिए गए जल को महत्व देती है।

क्या गर्मी में निर्जल व्रत सुरक्षित है?

गरम दिन भर बिना पानी के रहने में पानी की कमी और लू लगने का सचमुच खतरा है। गर्भवती या दूध पिलाने वाली माँ, बुज़ुर्ग, मधुमेह के रोगी, दवा लेने वाले, या गुर्दे या हृदय की समस्या वाले निर्जल व्रत न रखें: परंपरा की अनुमति के अनुसार जल या फल पर रखें, और डॉक्टर से पूछें। उपवास के नियम यहाँ परंपरा के रूप में बताए गए हैं, चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं।

निर्जला एकादशी का महत्व क्या है?

कथा में व्यास जी भीम से कहते हैं कि यह एक निर्जल व्रत सभी चौबीस एकादशियों का पुण्य देता है, और जो इसे श्रद्धा से रखता है उसे जीवन के अंत में यमदूत नहीं, भगवान विष्णु के दूत लेने आते हैं। इसलिए यह वह एकादशी है जो लोग कोई और न रखें तब भी रखते हैं, और साल की सबसे बड़ी गर्मी में जल देने का दिन।

निर्जला एकादशी पर कौन सी आरती गाएँ?

सुबह की पूजा के बाद और फिर शाम के दीपों के साथ भगवान विष्णु की आरती 'ॐ जय जगदीश हरे', जो ऊपर पूरी दी गई है; बहुत से परिवार भीम की कथा के बाद व्रत पुस्तक से एकादशी माता की आरती भी गाते हैं। निर्जल व्रत हो तो शाम का कीर्तन किसी ठंडे कमरे में करें।

निर्जला एकादशी पर ब्रश कैसे करें?

परंपराएँ अलग हैं। बहुत से लोग दशमी की रात ब्रश कर लेते हैं और एकादशी को केवल कुल्ला करते हैं, पानी निगले बिना; कुछ लोग एकादशी को दातुन के लिए टहनी नहीं तोड़ते। ब्रश करें तो बहुत कम पानी लें और ज़रा भी न निगलें। सफाई रखना व्रत का अंग है, उसे तोड़ना नहीं।

निर्जला एकादशी पर कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

दिन का जप 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' है, जो निर्जल घंटों में जितनी बार चाहें धीमे स्वर में, और पूजा में तुलसी की माला पर 108 बार बोला जाता है। संकल्प श्लोक सूर्योदय पर और पारण का श्लोक द्वादशी को पहले घूँट से पहले; सभी मंत्र वाले भाग में हैं।