अहोई अष्टमी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह पूर्णिमांत गणना में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है। दक्षिण और पश्चिम भारत की अमांत गणना में यही तिथि आश्विन कृष्ण अष्टमी कहलाती है — दिन वही है, केवल महीने का नाम अलग। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।
तारे और चंद्रोदय · रविवार, 1 नवंबर 2026
अहोई अष्टमी 2026: शहर के अनुसार तारे देखने और चाँद निकलने का समय
अहोई अष्टमी की शाम हर शहर में पहले तारे कब दिखेंगे (सिविल ट्वाइलाइट का अंत) और चाँद कब निकलेगा — उसी शहर के लिए गणना करके। आधी रात के बाद का चंद्रोदय तारीख के साथ लिखा है, और वह भी पिछली शाम का ही गिना जाता है।
अहोई अष्टमी 2026: शहर के अनुसार तारे देखने और चाँद निकलने का समय
सिविल ट्वाइलाइट का अंत, जब सूर्य क्षितिज से छह अंश नीचे होता है और पहले तारे दिखते हैं; तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।
अहोई माता पूजा (शाम)
शाम 5:36 से शाम 6:54
सूर्यास्त के बाद संध्या काल: तीन घटी, यानी रात का दसवाँ भाग — अहोई माता की शाम की पूजा।
चंद्रोदय
रात 11:35
उन परिवारों के लिए जो तारों के बजाय चाँद देखकर व्रत खोलते हैं।
तिथि
अष्टमी, कृष्ण पक्ष
हिंदू मास
कार्तिक (पूर्णिमांत) / आश्विन (अमांत)
तिथि आरंभ
1 नवंबर, दोपहर 2:52
तिथि समाप्त
2 नवंबर, दोपहर 1:11
दिन का निर्णय
चंद्रोदय (उसी रात)
नई दिल्ली में चंद्रोदय (उसी रात)
1 नवंबर, रात 11:35
ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: अहोई अष्टमी का निर्णय उस रात चाँद निकलने के समय (आधी रात के बाद भी) चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके चंद्रोदय (उसी रात) पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।
अर्थ और परंपरा
अहोई अष्टमी क्या है, और व्रत कब खोला जाता है?
अहोई अष्टमी माताएँ अपनी संतान के लिए रखती हैं। यह उत्तर भारत की गणना में कार्तिक कृष्ण अष्टमी है — करवा चौथ के चार दिन बाद और दिवाली से लगभग एक सप्ताह पहले। दीवार पर अहोई माता और सात पुत्रों की कथा का चित्र बनाया जाता है, या छपा हुआ कैलेंडर लगाया जाता है, और शाम को पूजा होती है।
व्रत सूर्योदय से शाम तक रहता है। अधिकतर परिवार पहले तारे दिखने पर उन्हें जल (अर्घ्य) देकर व्रत खोलते हैं; कुछ चंद्रमा की प्रतीक्षा करते हैं, जो इस रात लगभग आधी रात को निकलता है। दोनों समय ऊपर आपके शहर के लिए निकाले गए हैं।
तारीख वह दिन है जिसके चंद्रोदय पर अष्टमी हो — यही नियम 2014 से 2036 तक हर साल द्रिक पंचांग की तारीख देता है। आधी रात के बाद निकलने वाला चाँद भी पिछली शाम का ही गिना जाता है, क्योंकि हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है।
दक्षिण और पश्चिम भारत की अमांत गणना में यही दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी कहलाता है — महीने का नाम अलग है, दिन वही।
ब्रज में यही रात बहुलाष्टमी है, जब गोवर्धन में राधा कुंड में आधी रात को स्नान होता है।
अहोई अष्टमी 2026 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली
अहोई अष्टमी 2026 अहोई माता पूजा मुहूर्त
अहोई अष्टमी वह व्रत है जो माताएँ अपनी संतान के लिए कार्तिक कृष्ण अष्टमी को, करवा चौथ के चार दिन बाद, रखती हैं: संध्या में अहोई माता की पूजा होती है, उनकी कथा सुनी जाती है, और पहले तारे दिखने पर व्रत खोला जाता है। अहोई अष्टमी 2026 नई दिल्ली में रविवार, 1 नवंबर 2026 को है। पूजा का मुहूर्त शाम 5:36 से शाम 6:54 तक है, और तारे शाम 6:00 से दिखने लगते हैं; जो परिवार चाँद की प्रतीक्षा करते हैं, वे चंद्रोदय, रात 11:35, पर व्रत खोलते हैं।
अहोई अष्टमी 2026 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्त
नई दिल्ली में समय
किसके लिए
अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त
शाम 5:36 से शाम 6:54 तकसूर्यास्त के बाद संध्या काल: तीन घटी, यानी रात का दसवाँ भाग।
सूर्यास्त से शुरू होने वाला, लगभग सवा घंटे का संध्या समय: अहोई माता की पूजा, हाथ में गेहूँ के दाने लेकर कथा सुनने, स्याहू की माला पहनने और बायना देने का समय।
तारे देखने का समय
शाम 6:00सांध्य प्रकाश समाप्त होने का समय, जब पहले तारे दिखने लगते हैं।
सूर्यास्त के बाद वह समय जब तक आपके शहर में पहले तारे दिखने लगते हैं। ज़्यादातर परिवार करवे के जल से तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं; यह सूर्यास्त के साथ बदलता है, इसलिए अपने शहर का समय देखें।
चंद्रोदय
रात 11:35इस सूर्योदय के बाद और अगले सूर्योदय से पहले का पहला चंद्रोदय।
अष्टमी का घटता चाँद देर से, लगभग आधी रात के आसपास निकलता है। जिन परिवारों में तारों की जगह चाँद देखकर व्रत खोलने की रीति है, वे इसकी प्रतीक्षा करते हैं; आधी रात के बाद निकलने वाला चाँद भी इसी शाम का माना जाता है, क्योंकि वैदिक दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है।
ब्रह्म मुहूर्त (सरगी)
सुबह 4:49 से सुबह 5:41 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।
सूर्योदय से पहले के दो मुहूर्त, जब करवा चौथ की तरह व्रत से पहले सरगी लेने वाली महिलाएँ उसे खाती हैं और पानी पीती हैं।
सूर्योदय
सुबह 6:32क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।
व्रत सूर्योदय से शुरू होता है; सुबह के स्नान के बाद संतान के लिए संकल्प लें।
उस दिन के शुभ समय
उस दिन के शुभ समय
मुहूर्त
नई दिल्ली में समय
प्रकृति
अभिजित मुहूर्त
सुबह 11:42 से दोपहर 12:26
शुभ
अमृत काल
रात 10:25 से रात 11:56
सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्त
सुबह 4:49 से सुबह 5:41
शुभ
जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।
जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधि
नई दिल्ली में समय
राहु काल
शाम 4:13 से शाम 5:36
यमगण्ड काल
दोपहर 12:04 से दोपहर 1:27
दुर्मुहूर्त (पहला)
शाम 4:07 से शाम 4:52
वर्ज्यम्
दोपहर 1:16 से दोपहर 2:48
ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए रविवार, 1 नवंबर 2026 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।
पूजा विधि · घर पर, क्रम से
अहोई अष्टमी पूजा विधि
एक दिन पहले
अहोई माता का छपा कैलेंडर ले आएँ, या दीवार पर बनाने के लिए गेरू तैयार रखें; स्याहू की माला तैयार करें — परंपरा हो तो चाँदी का एक नया लॉकेट या मोती जोड़ें; सरगी लेती हों तो उसकी योजना बना लें।
सुबह का संकल्प
भोर से पहले सरगी (वैकल्पिक) और सुबह के स्नान के बाद हाथ में जल, चावल और फूल लेकर संकल्प लें: संतान की लंबी आयु और कुशलता के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखूँगी। स्वास्थ्य के अनुसार निर्जल, या जल और फल के साथ व्रत रखें।
अहोई माता का चित्र या कैलेंडर
साफ़ दीवार पर गेरू से अहोई माता बनाएँ — देवी, अपने बच्चों के साथ स्याहू (साही), और कथा के सात पुत्र — या छपा कैलेंडर लगाएँ। नीचे लाल कपड़े वाली चौकी रखें।
करवा और थाली
करवे या कलश में जल भरें, रोली से स्वस्तिक बनाएँ और मौली बाँधें; बहुत सी महिलाएँ करवा चौथ वाला करवा ही लेती हैं। थाली में रोली, चावल, फूल, दीया, धूप, भोग और स्याहू की माला तैयार रखें।
संध्या पूजा
पूजा मुहूर्त में दीया जलाकर अहोई माता को रोली, चावल, फूल और धूप अर्पित करें, और भोग लगाएँ: परिवार की रीति से आठ पुए या आठ पूरियाँ, हलवा और चने। बहुत सी महिलाएँ पहले गणेश जी की छोटी प्रार्थना करती हैं।
कथा सुनें
हाथ में गेहूँ के सात दाने लेकर अहोई माता की कथा — माँ और साही के बच्चे की कहानी — सुनें, जो कोई बड़ी महिला सुनाती है या कैलेंडर से पढ़ी जाती है; कुछ परिवार गणेश जी की कथा भी जोड़ते हैं। फिर दाने अर्पित करें।
स्याहू की माला पहनें
स्याहू की माला के चाँदी के लॉकेटों पर रोली लगाएँ, माला अहोई माता को अर्पित करें, फिर पहन लें; यह दिवाली तक पहनी जाती है, फिर अगले वर्ष के लिए सँभालकर रख दी जाती है।
बायना दें
बायना — भोग, मिठाई, कुछ रुपये या कपड़े — सास या किसी बड़ी महिला को दें और पैर छूकर आशीर्वाद लें।
तारों को अर्घ्य
पहले तारे दिखने पर खुली जगह पर जाकर करवे के जल में थोड़े चावल डालकर तारों को अर्घ्य दें और संतान की लंबी, स्वस्थ आयु की प्रार्थना करें। अगर परिवार में चाँद देखकर व्रत खुलता है, तो प्रतीक्षा करके चंद्रोदय पर अर्घ्य दें।
व्रत खोलें
जल और प्रसाद से व्रत खोलें, फिर सादा भोजन करें; प्रसाद अपने बच्चों के साथ बाँटें।
आरती
कैलेंडर या कथा पुस्तिका में छपी अहोई माता की आरती, चित्र के सामने दीया घुमाते हुए, गाएँ और घर के हर बच्चे के लिए प्रार्थना से समापन करें।
सामग्री · पहले से तैयार रखें
अहोई अष्टमी पूजा सामग्री सूची
अहोई माता का कैलेंडर या चित्रस्याहू, उसके बच्चों और सात पुत्रों के साथ छपा; या गेरू से बनाएँ।
गेरूदीवार पर अहोई माता बनाने के लिए, अगर बनाएँ।
चौकी और लाल कपड़ाचित्र या कैलेंडर के नीचे रखने के लिए।
जल भरा करवा या कलश, ढक्कन सहितअक्सर करवा चौथ वाला करवा ही लिया जाता है; इसका जल तारों को अर्पित होता है।
स्याहू की मालामौली या धागे में पिरोए चाँदी के स्याहू लॉकेट और मोती; बहुत सी महिलाएँ हर वर्ष एक जोड़ती हैं।
रोली, हल्दी, कुमकुम और अक्षतस्वस्तिक, तिलक और अर्पण के लिए।
मौली (कलावा)करवे पर बाँधने और स्याहू की माला पिरोने के लिए।
फूलअहोई माता के लिए।
दीया, घी और बत्तीपूजा और तारों के अर्घ्य के लिए।
अगरबत्ती और कपूरपूजा और आरती के लिए।
गेहूँ के सात दानेकथा सुनते समय हाथ में रखने के लिए।
भोग: आठ पुए या आठ पूरियाँ, हलवा और चनेपरिवार की गिनती और व्यंजन मानें।
मिठाई और फलभोग और बायने के लिए।
थोड़ा कच्चा दूध मिला जल का लोटाअर्घ्य के लिए, अगर करवा न लें।
बायना: मिठाई, रुपये या कपड़ेसास या किसी बड़ी महिला के लिए।
कथा पुस्तिकाबहुत से कैलेंडरों के पीछे कथा और आरती छपी होती है।
सरगी का सामान (वैकल्पिक)भोर से पहले के लिए फल, दूध, सेवइयाँ या परांठा।
माचिसबाहर दीया जलाने के लिए।
मंत्र · अर्थ के साथ
अहोई अष्टमी के मंत्र
वक्रतुंड (गणेश वंदना)
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
Vakratunda Mahakaya Suryakotisamaprabha, Nirvighnam Kuru Me Deva Sarvakaryeshu Sarvada
अर्थ: हे टेढ़ी सूँड़ और विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव, मेरे सब काम सदा निर्विघ्न करें।
कब और कैसे: पूजा से पहले एक बार; जो परिवार अहोई कथा के साथ गणेश जी की कथा पढ़ते हैं, वे इसी से शुरू करते हैं।
या देवी — माता रूप में (दुर्गा सप्तशती)
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
Ya Devi Sarvabhuteshu Matrirupena Samsthita, Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में माता के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
कब और कैसे: दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय से। रक्षा करने वाली माता अहोई देवी के सामने तीन या ग्यारह बार पढ़ें।
Sarvamangalamangalye Shive Sarvarthasadhike, Sharanye Tryambake Gauri Narayani Namostu Te
अर्थ: हे सब मंगलों की मंगलरूपा, कल्याणकारी, सब कामनाएँ पूरी करने वाली, शरण देने वाली, त्रिनेत्री गौरी नारायणी — आपको नमस्कार है।
कब और कैसे: दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11, श्लोक 10। अहोई माता को माता पार्वती का रूप मानकर पूजा जाता है; फूल चढ़ाते समय और अर्घ्य के समय पढ़ें।
कथा · कहानी और उसका अर्थ
अहोई अष्टमी की कथा और महत्व
कथा
एक साहूकार की पत्नी, सात पुत्रों की माँ, दिवाली से पहले घर लीपने के लिए मिट्टी खोदने जंगल गई। खोदते समय उसकी कुदाल एक स्याहू (साही) की माँद पर लगी और उसका एक बच्चा मर गया। दुखी स्याहू ने उसे श्राप दिया, और एक वर्ष के भीतर उसके सातों पुत्र एक-एक करके चल बसे।
दुखी होकर उसने गाँव की बड़ी-बूढ़ी महिलाओं को अपना दुख सुनाया। उन्होंने कहा कि उसके पश्चाताप से पाप पहले ही हल्का हो गया है, और सलाह दी कि वह कार्तिक कृष्ण अष्टमी को देवी के पास स्याहू और उसके बच्चों का चित्र बनाकर अहोई भगवती की पूजा करे, व्रत रखे और क्षमा माँगे। उसने वर्षों तक पूरी श्रद्धा से ऐसा किया, और देवी की कृपा से उसके पुत्र उसे वापस मिल गए।
एक दूसरी कथा में साही के बच्चे को साहूकार की बेटी मारती है, और सबसे छोटी बहू उसकी रक्षा के लिए श्राप अपने ऊपर ले लेती है; सुरही गाय की सेवा करके वह स्याहू तक पहुँचती है, उससे क्षमा पाती है, और उसकी संतानें लौट आती हैं। दोनों कथाओं का अंत एक है: संतान की रक्षा के लिए यह व्रत रखा जाता है, और इस दिन बहुत सी महिलाएँ धरती नहीं खोदतीं।
महत्व
अहोई अष्टमी माँ की प्रार्थना है: संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए उपवास का दिन। अहोई माता, माता पार्वती का एक रूप, लोक में ‘अनहोनी’ — अनचाही विपत्ति — टालने वाली देवी के रूप में समझी जाती हैं, और साही और उसके बच्चों वाला उनका चित्र परिवार को अनजाने में हुए अपराध की कथा की सीख याद दिलाता है।
पहले यह मुख्यतः पुत्रों के लिए रखा जाता था; आज ज़्यादातर माताएँ इसे बेटियों और बेटों, सभी संतानों के लिए रखती हैं, और कुछ महिलाएँ संतान की कामना से भी रखती हैं। ब्रज में संतान की इच्छा रखने वाले दंपति इस रात आधी रात को राधा कुंड में स्नान करते हैं; वहाँ यह रात बहुलाष्टमी कहलाती है।
यह करवा चौथ के चार दिन बाद और दिवाली से लगभग एक सप्ताह पहले आती है। दक्षिण और पश्चिम की अमांत गणना में यही दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी कहलाता है: महीने का नाम अलग है, दिन वही।
उपाय · परंपरा
अहोई अष्टमी के पारंपरिक उपाय
स्याहू की माला पहनें
पूजा में अभिमंत्रित और दिवाली तक पहने जाने वाले चाँदी के स्याहू लॉकेट परंपरा से उन संतानों की रक्षा करने वाले माने जाते हैं जिनके लिए व्रत रखा गया; बहुत सी माताएँ हर वर्ष एक जोड़ती हैं।
तारों को जल
करवे के जल से तारों को अर्घ्य देना और प्रार्थना में हर संतान का नाम लेना इस व्रत की परंपरा का हृदय है।
धरती न खोदें
कथा को याद करके बहुत सी महिलाएँ अहोई अष्टमी पर मिट्टी खोदने, निराई करने या छोटे जीवों को नुकसान पहुँचाने से बचती हैं — यह डर की नहीं, सावधानी की परंपरा है।
राधा कुंड स्नान
ब्रज में संतान की कामना रखने वाले दंपति इस रात आधी रात को राधा कुंड में डुबकी लगाते हैं; हर वर्ष हज़ारों लोग यह परंपरा निभाते हैं।
ज़रूरतमंद बच्चों को भोजन-वस्त्र
अपनी संतान के नाम से ज़रूरतमंद बच्चों को भोजन, कपड़े या पढ़ाई का सामान देना इस दिन का उचित दान है।
बड़ी महिलाओं का सम्मान
सास को बायना देना और उन बड़ी महिलाओं का आशीर्वाद लेना, जिन्होंने कथा की माँ को राह दिखाई थी, इस व्रत का हिस्सा है।
परंपरा, संक्षेप में
अहोई अष्टमी पर क्या करें, क्या न करें
क्या करें
व्रत स्वास्थ्य के अनुसार रखें; ज़रूरत हो तो पानी पिएँ।
तारों का समय और चंद्रोदय अपने शहर का देखें।
हाथ में गेहूँ के दाने लेकर कथा सुनें।
प्रार्थना में हर संतान — बेटियों और बेटों — का नाम लें।
सास या किसी बड़ी महिला को बायना दें।
दिवाली के बाद स्याहू की माला अगले वर्ष के लिए सँभालकर रखें।
क्या न करें
कथा की याद में इस दिन धरती न खोदें और छोटे जीवों को नुकसान न पहुँचाएँ।
गर्भावस्था, स्तनपान या अस्वस्थता में निर्जल व्रत न रखें; डॉक्टर से पूछकर हल्का व्रत रखें।
तारों या चाँद को अर्घ्य देने से पहले व्रत न खोलें — जब तक तबीयत ठीक हो।
तारों के लिए पूरे भारत का एक समय न मानें; यह आपके शहर के सूर्यास्त के साथ बदलता है।
बाहर जलता दीया बिना देखरेख न छोड़ें।
देश भर में
अहोई अष्टमी की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग
क्षेत्र के अनुसार
उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान
अहोई आठें: गेरू से बनी या छपे कैलेंडर में अहोई माता, स्याहू की माला, भोग में आठ पुए, और तारे देखकर व्रत खोलना।
ब्रज (मथुरा और गोवर्धन)
बहुलाष्टमी: संतान की कामना रखने वाले दंपति आधी रात को राधा कुंड में स्नान करते हैं, और कुंड पर विशेष पूजा होती है।
बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश
यहाँ माताओं का बड़ा व्रत जीवित्पुत्रिका (जितिया) है, जो एक महीने पहले पितृ पक्ष की अष्टमी को रखा जाता है; यहाँ अहोई अष्टमी कम मनाई जाती है।
दक्षिण और पश्चिम भारत
अमांत गणना में यह दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी है; वहाँ रहने वाले उत्तर भारतीय परिवार अहोई अष्टमी मनाते हैं।
भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन
पुएआटे और गुड़ के छोटे मीठे तले हुए पुए; बहुत से घरों में आठ चढ़ाए जाते हैं।
पूरी, हलवा और चनेबहुत से परिवारों में भोग और व्रत खोलने का भोजन।
सरगीजो लेती हैं उनके लिए: भोर से पहले फल, दूध, सेवइयाँ या परांठा।
जल और फलदिन भर हल्के व्रत के लिए।
सादा सात्विक भोजनअर्घ्य के बाद, प्रसाद बच्चों में बाँटकर।
आने वाले वर्षों में अहोई अष्टमी की तारीख
इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।
आने वाले वर्षों में अहोई अष्टमी की तारीख
वर्ष
तारीख
स्थिति
2026इस वर्ष
रविवार, 1 नवंबर 2026
आने वाली
2027
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2027
आने वाली
2028
बुधवार, 11 अक्टूबर 2028
आने वाली
पंचांगों में अहोई अष्टमी की तारीख अलग क्यों होती है
2026 में, नई दिल्ली के लिए: कुछ पंचांग चंद्रोदय लगभग 5 मिनट बाद, रात 11:40 पर, बताते हैं: जब चंद्रमा का केंद्र क्षितिज पर आता है, वायुमंडलीय अपवर्तन जोड़े बिना। यहाँ समय वह है जब उसका ऊपरी किनारा पहली बार दिखता है, यानी जब चाँद दिखाई देने लगता है।
दो पंचांग अहोई अष्टमी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।
तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: अहोई अष्टमी का निर्णय चंद्रोदय (उसी रात) से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।
अहोई अष्टमी 2026 नई दिल्ली में रविवार, 1 नवंबर 2026 को है। पूजा का मुहूर्त शाम 5:36 से शाम 6:54 तक है, तारे शाम 6:00 से दिखने लगते हैं, और चंद्रोदय रात 11:35 पर है; अष्टमी तिथि दोपहर 2:52 से दोपहर 1:11 (2 नवंबर) तक है।
अहोई अष्टमी की तिथि क्या है?
कार्तिक (पूर्णिमांत) / आश्विन (अमांत) मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 1 नवंबर, दोपहर 2:52 से 2 नवंबर, दोपहर 1:11 तक है, और अहोई अष्टमी का दिन उस रात चाँद निकलने के समय (आधी रात के बाद भी) चल रही तिथि से तय होता है।
नई दिल्ली में अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त क्या है?
नई दिल्ली में पूजा मुहूर्त शाम 5:36 से शाम 6:54 तक है — सूर्यास्त के बाद का वह समय जिसमें अहोई माता की पूजा होती है, कथा सुनी जाती है और स्याहू की माला पहनी जाती है। व्रत तारे दिखने के बाद खोला जाता है।
नई दिल्ली में अहोई अष्टमी पर तारे कितने बजे दिखेंगे?
नई दिल्ली में पहले तारे शाम 6:00 से दिखने लगते हैं। यह समय आपके शहर के सूर्यास्त के साथ चलता है और देश भर में बदलता है; जब तारे सचमुच दिखें, तब अर्घ्य दें।
नई दिल्ली में अहोई अष्टमी पर चाँद कितने बजे निकलेगा?
1 नवंबर, रात 11:35 पर, नई दिल्ली के लिए निकाला गया। अहोई अष्टमी का दिन इसी चंद्रोदय पर चल रही अष्टमी तिथि से तय होता है; आधी रात के बाद निकलने वाला चाँद भी पिछली शाम का गिना जाता है, क्योंकि हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है।
दूसरे कैलेंडर में अहोई अष्टमी की तारीख अलग क्यों है?
मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।
अगले साल अहोई अष्टमी कब है?
2027 में शुक्रवार, 22 अक्टूबर; 2028 में बुधवार, 11 अक्टूबर।
अहोई माता की कहानी क्या है?
सात पुत्रों की एक माँ से दिवाली से पहले जंगल में मिट्टी खोदते समय अनजाने में साही का एक बच्चा मर गया; दुखी स्याहू के श्राप से उसके पुत्र चल बसे। गाँव की बड़ी महिलाओं की सलाह पर उसने कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता की पूजा, व्रत और क्षमा-याचना की, और उसके पुत्र लौट आए। कथा ऊपर दी गई है।
अहोई अष्टमी का व्रत कैसे रखें?
सुबह स्नान के बाद संतान के लिए संकल्प लेकर दिन भर व्रत रखें। संध्या में रोली, चावल, फूल और भोग से अहोई माता की पूजा करें, गेहूँ के सात दाने हाथ में लेकर कथा सुनें, स्याहू की माला पहनें और बायना दें। तारों को, या परिवार की रीति हो तो चाँद को, अर्घ्य देकर व्रत खोलें।
स्याहू की माला क्या होती है?
धागे या मौली में पिरोए चाँदी के लॉकेट, जिन्हें स्याहू कहते हैं, अक्सर मोतियों के साथ, जो अहोई माता को अर्पित करके माँ अहोई अष्टमी से दिवाली तक पहनती है। बहुत सी महिलाएँ हर वर्ष या हर संतान के लिए एक लॉकेट या मोती जोड़ती हैं और माला अगले वर्ष के लिए सँभालकर रखती हैं।
अहोई माता का चित्र बनाएँ या कैलेंडर लगाएँ?
दोनों पारंपरिक हैं। पुराना तरीका दीवार पर गेरू से स्याहू, उसके बच्चों और सात पुत्रों के साथ अहोई माता बनाना है; ज़्यादातर परिवार अब छपा अहोई अष्टमी कैलेंडर लगाते हैं, जिस पर कथा भी होती है। ज़रूरी यह है कि चित्र साफ़ हो और पूजा उसी के सामने हो।
अहोई अष्टमी पर कौन-सी आरती गाएँ?
‘जय अहोई माता’ से शुरू होने वाली अहोई माता की आरती ज़्यादातर अहोई कैलेंडरों और कथा पुस्तिकाओं में छपी होती है और कथा के बाद दीया घुमाते हुए गाई जाती है; जिनके पास यह न हो, वे ‘ॐ जय जगदीश हरे’ से समापन करते हैं। अपने परिवार की आरती गाएँ।
क्या अहोई अष्टमी का व्रत केवल बेटों के लिए होता है?
पहले यह मुख्यतः बेटों के लिए रखा जाता था, जैसा कथा के सात पुत्र बताते हैं; आज ज़्यादातर माताएँ इसे बेटियों और बेटों, सभी संतानों के लिए रखती हैं, और कुछ महिलाएँ संतान की कामना से भी। प्रार्थना घर के सब बच्चों के लिए है।
क्या तारों की जगह चाँद देखकर व्रत खोल सकते हैं?
हाँ, अगर परिवार की यही रीति है। ज़्यादातर परिवार तारे देखकर व्रत खोलते हैं, पर कुछ चाँद की प्रतीक्षा करते हैं, जो इस रात देर से निकलता है — नई दिल्ली में रात 11:35। आधी रात के बाद निकलने वाला चाँद भी इसी शाम का माना जाता है।
क्या अहोई अष्टमी के व्रत में चाय या पानी पी सकते हैं?
बहुत सी महिलाएँ करवा चौथ की तरह इसे निर्जल रखती हैं, पर व्रत नुकसान नहीं माँगता: बहुत से परिवारों में पानी, चाय या फल लिए जाते हैं, ख़ासकर बुज़ुर्ग महिलाओं और अस्वस्थ लोगों द्वारा। परिवार की रीति और अपना स्वास्थ्य देखें।
अहोई अष्टमी के व्रत में क्या नहीं करना चाहिए?
कथा की याद में महिलाएँ मिट्टी खोदने और छोटे जीवों को नुकसान पहुँचाने से बचती हैं; तारों या चाँद को अर्घ्य देने से पहले व्रत नहीं खोला जाता; और दिन शांति से, बिना झगड़े के बिताया जाता है। बहुत से परिवार इस दिन काटने-सिलने का काम भी नहीं करते।
क्या गर्भवती महिला अहोई अष्टमी का व्रत रख सकती है?
पहले डॉक्टर से पूछें। बहुत सी गर्भवती महिलाएँ पानी और फल के साथ हल्का व्रत रखती हैं, या बिना व्रत के पूजा, कथा और अर्घ्य करती हैं; व्रत का उद्देश्य संतान की कुशलता है, जिसमें माँ की कुशलता भी शामिल है।
अहोई अष्टमी क्या है और क्यों मनाई जाती है?
यह कार्तिक कृष्ण अष्टमी का वह व्रत है जो माताएँ संतान की लंबी आयु और सुरक्षा के लिए रखती हैं — संध्या में माता पार्वती के रूप अहोई माता की पूजा करके और तारे देखकर व्रत खोलकर। यह उस माँ की कथा याद दिलाता है जिसने इसी व्रत से अपने पुत्र खोकर फिर पाए।
अहोई अष्टमी पर राधा कुंड स्नान क्या है?
ब्रज में अहोई अष्टमी की रात बहुलाष्टमी है, और संतान की कामना रखने वाले दंपति आधी रात को गोवर्धन के राधा कुंड में स्नान करके राधा रानी से प्रार्थना करते हैं; हर वर्ष हज़ारों लोग आते हैं।