गणेश मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
Om Gam Ganapataye Namah
अर्थ: ॐ, गं: गणों के स्वामी गणपति को नमस्कार।
कब और कैसे: पूजा की शुरुआत में 11 या 21 बार।
कृष्ण पक्ष · त्रयोदशी तिथि · कार्तिक (पूर्णिमांत) / आश्विन (अमांत)
शुक्र, 6 नवंबर
2026 में धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर को है। नई दिल्ली में धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6:02 से शाम 7:58 तक (वृषभ काल) है।
2027: बुधवार, 27 अक्टूबर 2027
धनतेरस पूजा (वृषभ काल)
शाम 6:02 – शाम 7:58
धनतेरस कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि है। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यही तिथि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी कहलाती है — दिन वही है, केवल महीने का नाम अलग। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।
धनतेरस से भाई दूज तक · नई दिल्ली
प्रदोष काल में स्थिर वृषभ लग्न, जब तक त्रयोदशी चल रही हो — हर शहर के अपने सूर्यास्त और लग्न से गणना। पूर्व से पश्चिम भारत तक यह समय आधे घंटे से ज़्यादा खिसकता है, इसलिए अपने शहर की पंक्ति देखें।
| शहर | धनतेरस पूजा मुहूर्त |
|---|---|
| नई दिल्ली | शाम 6:02–7:58 |
| मुंबई | शाम 6:35–रात 8:34 |
| बेंगलुरु | शाम 6:26–रात 8:20 |
| कोलकाता | शाम 5:28–7:26 |
| चेन्नई | शाम 6:15–रात 8:09 |
| हैदराबाद | शाम 6:16–रात 8:13 |
| पुणे | शाम 6:32–रात 8:31 |
| अहमदाबाद | शाम 6:30–रात 8:29 |
| जयपुर | शाम 6:11–रात 8:07 |
| लखनऊ | शाम 5:50–7:47 |
| पटना | शाम 5:36–7:33 |
| इंदौर | शाम 6:18–रात 8:16 |
| भोपाल | शाम 6:11–रात 8:09 |
| चंडीगढ़ | शाम 6:00–7:55 |
| सूरत | शाम 6:32–रात 8:31 |
| नागपुर | शाम 6:07–रात 8:06 |
| वाराणसी | शाम 5:45–7:42 |
| कानपुर | शाम 5:54–7:50 |
| नोएडा | शाम 6:02–7:57 |
| गुरुग्राम | शाम 6:03–7:59 |

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शुक्रवार, 6 नवंबर 2026
ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: धनतेरस का निर्णय सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके प्रदोष काल पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।
धनतेरस दिवाली का पहला दिन है, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी: इस दिन परिवार घर के लिए कुछ नया खरीदते हैं, धन्वंतरि, कुबेर और लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं और दक्षिण की ओर यम का दीपक जलाते हैं। नई दिल्ली में धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को है; पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6:02 से शाम 7:58 तक है, यानी स्थिर लग्न वृषभ वाला प्रदोष काल, और यम दीपदान प्रदोष काल (शाम 5:32 से शाम 6:51 तक) में होता है। खरीदारी के लिए त्रयोदशी रहते दिन के शुभ चौघड़िया अमृत: सुबह 10:31 से सुबह 10:42 तक; शुभ: दोपहर 12:04 से दोपहर 1:26 तक; चर: शाम 4:10 से शाम 5:32 तक; लाभ: रात 8:48 से रात 10:26 तक; शुभ: 7 नवंबर, रात 12:04 से रात 1:43 तक; अमृत: 7 नवंबर, रात 1:43 से रात 3:21 तक; चर: 7 नवंबर, रात 3:21 से सुबह 4:59 तक; शुभ: 7 नवंबर, सुबह 7:59 से सुबह 9:20 तक हैं।
| मुहूर्त | नई दिल्ली में समय | किसके लिए |
|---|---|---|
| धनतेरस पूजा मुहूर्त | शाम 6:02 से शाम 7:58 तकप्रदोष काल में स्थिर वृषभ लग्न, जब तक त्रयोदशी रहे। | लक्ष्मी, कुबेर और धन्वंतरि की पारिवारिक पूजा का शाम का समय: प्रदोष काल, जब स्थिर लग्न वृषभ उदित हो और त्रयोदशी चल रही हो। तर्क वही है जो दिवाली की लक्ष्मी पूजा का: स्थिर लग्न इसलिए कि जो घर आए, वह टिके। |
| यम दीपदान | शाम 5:32 से शाम 6:51 तकधनतेरस की सायं संध्या — सूर्यास्त के बाद तीन घटी — जब यम के लिए दक्षिण दिशा में दीपक जलाया जाता है। | यम का दीपक त्रयोदशी की संध्या, प्रदोष काल में जलाकर मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण की ओर रखा जाता है। यह परिवार की लंबी आयु और कुशलता की प्रार्थना है, जिसे उत्तर भारत के अधिकतर घर इसी शाम निभाते हैं। |
| खरीदारी चौघड़िया (सोना, चाँदी, बर्तन) |
| त्रयोदशी रहते धनतेरस के दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। बर्तन, सिक्का, गहना, झाड़ू या वाहन की खरीदारी इन्हीं में की जाती है, और दिन के राहुकाल से बचा जाता है, जो पंचांग में दिया होता है। |
| वृषभ काल (स्थिर लग्न) | शाम 6:02 से शाम 7:58 तकशाम को उदित स्थिर (वृषभ) लग्न। | शाम को वृषभ लग्न के उदय का पूरा समय। जो परिवार प्रदोष के भीतर पूजा पूरी न कर पाएँ, वे इसके बाकी भाग में पूजा जारी रखते हैं। |
| प्रदोष काल | शाम 5:32 से रात 8:09 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)। | सूर्यास्त के बाद रात के पहले तीन मुहूर्त। यम दीपदान और शाम की पूजा दोनों इसी में होते हैं; वृषभ वाला समय छोटा हो, तो त्रयोदशी रहते प्रदोष का कोई भी भाग मान्य है। |
| अभिजीत मुहूर्त | सुबह 11:42 से दोपहर 12:26 तकदिन के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, स्थानीय दोपहर के आसपास। | स्थानीय दोपहर के आसपास का मुहूर्त, जो त्रयोदशी के भीतर पड़े तो खरीदारी और नई शुरुआत के लिए खूब लिया जाता है। परंपरा से बुधवार को इसे नहीं लिया जाता। |
| शुभ चौघड़िया (रात) |
| रात के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया, उन परिवारों के लिए जो सूर्यास्त के बाद, त्रयोदशी रहते, खरीदारी या दुकान पर पूजा करते हैं। |
| सूर्यास्त | शाम 5:32सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज से ओझल होने का समय। | दिन के दीये, तेरह दीये और यम का दीपक, नई दिल्ली में सूर्यास्त के बाद जलाए जाते हैं। |
| मुहूर्त | नई दिल्ली में समय | प्रकृति |
|---|---|---|
| अभिजित मुहूर्त | सुबह 11:42 से दोपहर 12:26 | शुभ |
| अमृत काल | रात 10:31 से रात 12:10 | सर्वाधिक शुभ |
| ब्रह्म मुहूर्त | सुबह 4:52 से सुबह 5:44 | शुभ |
मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।
| अवधि | नई दिल्ली में समय |
|---|---|
| राहु काल | सुबह 10:42 से दोपहर 12:04 |
| यमगण्ड काल | दोपहर 2:48 से शाम 4:10 |
| दुर्मुहूर्त (पहला) | सुबह 8:47 से सुबह 9:31 |
| दुर्मुहूर्त (दूसरा) | दोपहर 12:26 से दोपहर 1:10 |
| वर्ज्यम् | दोपहर 12:36 से दोपहर 2:15 |
ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।
धनतेरस से दिवाली शुरू होती है, इसलिए घर और द्वार की सफाई पूरी करें, तोरण लगाएँ, रंगोली बनाएँ और भीतर आते लक्ष्मी जी के पदचिह्न बनाएँ।
त्रयोदशी रहते अमृत, शुभ, लाभ या चर चौघड़िया में घर के लिए कुछ नया खरीदें: पीतल, तांबे या चाँदी का बर्तन, चाँदी या सोने का सिक्का, झाड़ू, साबुत धनिया। नया बर्तन घर में खाली न लाएँ, उसमें पानी, चावल, शक्कर या मिठाई भरकर लाएँ।
सूर्यास्त से पहले स्नान करें और कमरे के उत्तर या ईशान में लाल या पीले कपड़े वाली चौकी रखें। उस पर गणेश जी, लक्ष्मी जी, कुबेर जी (चित्र, यंत्र या तिजोरी) और धन्वंतरि जी का चित्र रखें, और सामने दिन की खरीदी हुई चीज़ें।
देवताओं के सामने घी का दीपक जलाएँ और घर के लिए मिट्टी के तेरह दीये तैयार रखें, त्रयोदशी तक की हर तिथि का एक, जैसा बहुत से परिवार करते हैं।
स्वयं पर और सामग्री पर गंगाजल छिड़कें, धनतेरस पूजा का संकल्प लें और 'ॐ गं गणपतये नमः' बोलते हुए पहले गणेश जी को रोली, अक्षत, दूर्वा, फूल और लड्डू अर्पित करें।
भगवान धन्वंतरि को चंदन, अक्षत, पीले फूल और तुलसी अर्पित करें, धूप जलाएँ और उनका मंत्र 11 या 108 बार जपते हुए परिवार के हर सदस्य के स्वास्थ्य की प्रार्थना करें।
नए बर्तन, सिक्कों और तिजोरी पर रोली-अक्षत लगाकर उन्हें कुबेर जी और लक्ष्मी जी के सामने रखें। कुमकुम, फूल, कमलगट्टा और साबुत धनिया अर्पित करें और कुबेर मंत्र तथा 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' का जप करें।
मिठाई, खीर, फल और गुड़ के साथ धनिया का भोग लगाएँ, हो सके तो नए बर्तन में, साथ में पान, सुपारी, लौंग और आचमन के लिए जल।
कपूर या घी के दीपक से 'ॐ जय लक्ष्मी माता' आरती गाएँ और हाथ जोड़कर पुष्पांजलि दें।
प्रदोष काल में मिट्टी के चौमुखे दीपक में सरसों या तिल का तेल भरें, उसे मुख्य द्वार के बाहर थोड़े से गेहूँ या चावल पर रखें, लौ दक्षिण की ओर हो, और यम दीपदान का श्लोक एक बार बोलें। यह परिवार की लंबी आयु के लिए यमराज से प्रार्थना है।
तेरह दीये मुख्य द्वार, रसोई, पानी के स्थान, तुलसी और घर के कोनों में रखें।
प्रसाद बाँटें। सिक्का और नया बर्तन चौकी के पास ही रखें: दिवाली की रात लक्ष्मी पूजा में इनकी फिर पूजा होती है।
ॐ गं गणपतये नमः
Om Gam Ganapataye Namah
अर्थ: ॐ, गं: गणों के स्वामी गणपति को नमस्कार।
कब और कैसे: पूजा की शुरुआत में 11 या 21 बार।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वामयविनाशनाय त्रैलोक्यनाथाय श्रीमहाविष्णवे नमः ॥
Om namo bhagavate Vasudevaya Dhanvantaraye amritakalasha-hastaya sarvamaya-vinashanaya trailokyanathaya Shri Mahavishnave namah
अर्थ: ॐ, धन्वंतरि रूप भगवान वासुदेव को नमस्कार, जो हाथ में अमृत कलश लिए हैं, सब रोगों का नाश करने वाले, तीनों लोकों के स्वामी श्री महाविष्णु हैं।
कब और कैसे: धन्वंतरि पूजा में 11 या 108 बार, परिवार के स्वास्थ्य की प्रार्थना के रूप में। यह भक्ति है, इलाज का विकल्प नहीं।
ॐ राजाधिराजाय प्रसह्यसाहिने ।
नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे ।
स मे कामान्कामकामाय मह्यम् ।
कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ।
कुबेराय वैश्रवणाय ।
महाराजाय नमः ॥
Om rajadhirajaya prasahyasahine
Namo vayam Vaishravanaya kurmahe
Sa me kaman kamakamaya mahyam
Kameshvaro Vaishravano dadatu
Kuberaya Vaishravanaya
Maharajaya namah
अर्थ: राजाओं के राजा, अपने बल से विजयी वैश्रवण को हम नमस्कार करते हैं। कामनाओं के स्वामी वैश्रवण मुझ कामना करने वाले की कामनाएँ पूरी करें। कुबेर, वैश्रवण, महाराज को नमस्कार।
कब और कैसे: तैत्तिरीय आरण्यक से, मंत्रपुष्पांजलि में पढ़ा जाता है। तिजोरी और नई खरीदारी के सामने एक बार बोलें।
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा ॥
Om yakshaya Kuberaya Vaishravanaya dhanadhanyadhipataye dhanadhanyasamriddhim me dehi dapaya svaha
अर्थ: ॐ, यक्ष कुबेर, वैश्रवण, धन-धान्य के स्वामी: मुझे धन-धान्य की समृद्धि दें, दिलाएँ; स्वाहा।
कब और कैसे: अनुष्ठान-ग्रंथों का प्रचलित कुबेर मंत्र, कुबेर पूजा में 11 या 108 बार।
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
Om Shreem Mahalakshmyai Namah
अर्थ: ॐ, श्रीं: महालक्ष्मी को नमस्कार। 'श्रीं' लक्ष्मी जी का बीज अक्षर है।
कब और कैसे: पूजा के लक्ष्मी वाले भाग में 108 बार।
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ॥
Mrityuna pashadandabhyam kalena shyamaya saha
Trayodashyam deepadanat suryajah priyatam mama
अर्थ: त्रयोदशी के इस दीपदान से मृत्यु, पाश और दंड, काल और श्यामा के साथ सूर्यपुत्र यमराज मुझ पर प्रसन्न हों।
कब और कैसे: प्रदोष काल में यम का दीपक मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण की ओर रखते समय एक बार।
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
Om jai Lakshmi Mata, maiya jai Lakshmi Mata.
Tumko nishidin sevat, Hari Vishnu Vidhata.
Om jai Lakshmi Mata.
Uma, Rama, Brahmani, tum hi jag-mata.
Surya-Chandrama dhyavat, Narad rishi gata.
Om jai Lakshmi Mata.
Durga roop niranjani, sukh sampatti data.
Jo koi tumko dhyavat, riddhi-siddhi dhan pata.
Om jai Lakshmi Mata.
Tum patal-nivasini, tum hi shubhdata.
Karm-prabhav-prakashini, bhavnidhi ki trata.
Om jai Lakshmi Mata.
Jis ghar mein tum rahtin, sab sadgun aata.
Sab sambhav ho jata, man nahin ghabrata.
Om jai Lakshmi Mata.
Tum bin yagya na hote, vastra na koi pata.
Khan-paan ka vaibhav, sab tumse aata.
Om jai Lakshmi Mata.
Shubh-gun mandir sundar, kshirodadhi-jata.
Ratna chaturdash tum bin, koi nahin pata.
Om jai Lakshmi Mata.
Mahalakshmi ji ki aarti, jo koi jan gata.
Ur anand samata, paap utar jata.
Om jai Lakshmi Mata.
यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'हरि विष्णु विधाता' की जगह 'हर-विष्णू-धाता', 'जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता' की जगह 'जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता', 'वस्त्र न कोई पाता' की जगह 'वस्त्र न हो पाता' और 'जो कोई जन गाता' की जगह 'जो कोई नर गाता' छपा है। छपा पाठ
एक प्रचलित कथा राजा हिम की है, जिनके पुत्र के बारे में भविष्यवाणी थी कि विवाह की चौथी रात साँप के डसने से उसकी मृत्यु होगी। उस रात नवविवाहिता पत्नी ने पति को सोने नहीं दिया। उसने अपने सोने-चाँदी के सारे गहने कमरे के द्वार पर ढेर कर दिए, चारों ओर दीये जला दिए और पूरी रात कहानियाँ सुनाती और गीत गाती रही।
जब यमराज साँप के रूप में आए, तो दीयों की रोशनी और गहनों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे गहनों के ढेर पर बैठकर सुबह तक उसके गीत सुनते रहे और भोर होते ही राजकुमार को लिए बिना लौट गए। तभी से त्रयोदशी की संध्या यम के लिए दीया जलाया जाता है, और इस दिन सोना, चाँदी और नए बर्तन घर लाए जाते हैं।
यह दिन भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य का भी है। क्षीरसागर के मंथन में वे सबसे अंत में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए; भागवत पुराण उन्हें विष्णु का अंश और आयुर्वेद का प्रवर्तक बताता है। लोक-परंपरा उनका प्राकट्य इसी त्रयोदशी को मानती है, अमावस्या की लक्ष्मी पूजा से दो दिन पहले।
धनतेरस 'धन' और 'तेरस', यानी तेरहवीं तिथि, से मिलकर बना है। यह दो तरह के धन का पर्व है: स्वास्थ्य, देवताओं के वैद्य धन्वंतरि के रूप में, और समृद्धि, खजाने के रक्षक कुबेर और लक्ष्मी जी के रूप में। घर लाया गया नया बर्तन या सिक्का पूरे साल की समृद्धि का प्रतीक है, और दिवाली की रात फिर से पूजा जाता है।
शाम का यम दीपक इस दिन को परिवार की लंबी आयु की प्रार्थना से जोड़ता है, और यहीं से दिवाली के पाँच दिन शुरू होते हैं। जैन समाज इसी दिन को धन्य तेरस के रूप में मनाता है, जब भगवान महावीर दिवाली पर निर्वाण से पहले अंतिम ध्यान में लीन हुए।
संध्या को दक्षिण की ओर चौमुखा दीपक जलाएँ और यम दीपदान का श्लोक बोलें। परंपरा इसे घर की लंबी आयु और कुशलता के लिए यमराज से प्रार्थना मानती है।
साबुत धनिया खरीदें, लक्ष्मी जी को अर्पित करें, कुछ दाने तिजोरी में रखें और बाकी दिवाली के बाद गमले में बो दें। लोक-मान्यता हरे-भरे अंकुर को अच्छे साल का संकेत मानती है।
परंपरा झाड़ू को लक्ष्मी का रूप मानती है जो घर से दरिद्रता बुहार देती है। नई झाड़ू पर कुमकुम का तिलक लगाकर पूजें, उसे नज़रों से ओट में रखें और कभी पैर न लगाएँ।
खरीदा हुआ सिक्का धोकर लक्ष्मी और कुबेर जी के साथ पूजें, दिवाली पर फिर पूजा करें और साल भर तिजोरी में रखें।
तिजोरी या लॉकर के सामने कुबेर मंत्र बोलें और वहाँ कुबेर यंत्र या चित्र रखें, जैसा व्यापारी परिवार परंपरा से करते हैं।
त्रयोदशी पर तेरह दीये जलाकर द्वार, रसोई, पानी के स्थान, तुलसी और घर के कोनों में रखें; मान्यता है कि रोशन और साफ घर लक्ष्मी जी का स्वागत करता है।
किसी ज़रूरतमंद को भोजन दें या किसी बीमार की देखभाल में मदद करें। वैद्य-देवता के दिन परिवार धन के साथ स्वास्थ्य का भी ध्यान रखते हैं।
इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।
| वर्ष | तारीख | स्थिति |
|---|---|---|
| 2026इस वर्ष | शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 | आने वाली |
| 2027 | बुधवार, 27 अक्टूबर 2027 | आने वाली |
| 2028 | रविवार, 15 अक्टूबर 2028 | आने वाली |
दो पंचांग धनतेरस की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।
इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।
2026 में धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर को है। नई दिल्ली में धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6:02 से शाम 7:58 तक (वृषभ काल) है।
दो दिन पहले। धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर को और दिवाली की लक्ष्मी पूजा रविवार, 8 नवंबर को है। नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) भी इस बार रविवार, 8 नवंबर को ही है।
नई दिल्ली में शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6:02 से शाम 7:58 तक है: प्रदोष काल, जब स्थिर लग्न वृषभ उदित हो और त्रयोदशी चल रही हो। इसमें शुरू न कर पाएँ, तो त्रयोदशी रहते प्रदोष काल (शाम 5:32 से रात 8:09 तक) का कोई भी भाग अगला मान्य विकल्प है। यम का दीपक भी इसी शाम के समय में जलाएँ।
मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।
2027 में बुधवार, 27 अक्टूबर; 2028 में रविवार, 15 अक्टूबर।
पारंपरिक खरीदारी है पीतल, तांबे या चाँदी का बर्तन, चाँदी या सोने का सिक्का या कोई गहना, नई झाड़ू और साबुत धनिया। बहुत से परिवार रसोई या घर के लिए कोई नई चीज़ भी लेते हैं, और कुछ वाहन या गैजेट की खरीद इसी दिन रखते हैं। महत्व शुभ समय में खरीदे गए समृद्धि के प्रतीक का है, खर्च की रकम का नहीं।
परंपरा से परिवार लोहा, चाकू-कैंची जैसी धारदार चीज़ें, काँच, प्लास्टिक और काले रंग की वस्तुएँ नहीं खरीदते, और नया बर्तन कभी खाली घर नहीं लाते। स्टील पर राय बँटी है: परंपरा पीतल, तांबा और चाँदी पसंद करती है, पर आज बहुत से घर स्टील भी लेते हैं। ये मान्यताएँ हैं, शास्त्रीय नियम नहीं; अपनी ज़रूरत और सामर्थ्य से खरीदें।
त्रयोदशी रहते (सुबह 10:31 से सुबह 10:48 (7 नवंबर) तक) दिन के शुभ चौघड़िया में खरीदें: नई दिल्ली में ये अमृत: सुबह 10:31 से सुबह 10:42 तक; शुभ: दोपहर 12:04 से दोपहर 1:26 तक; चर: शाम 4:10 से शाम 5:32 तक; लाभ: रात 8:48 से रात 10:26 तक; शुभ: 7 नवंबर, रात 12:04 से रात 1:43 तक; अमृत: 7 नवंबर, रात 1:43 से रात 3:21 तक; चर: 7 नवंबर, रात 3:21 से सुबह 4:59 तक; शुभ: 7 नवंबर, सुबह 7:59 से सुबह 9:20 तक हैं। दोपहर के आसपास का अभिजीत मुहूर्त (सुबह 11:42 से दोपहर 12:26 तक) भी लिया जाता है, बुधवार को छोड़कर। दिन के राहुकाल से बचें, जो पंचांग में दिया होता है।
प्रदोष काल (शाम 5:32 से शाम 6:51 तक) में मिट्टी के चौमुखे दीपक में सरसों या तिल का तेल भरें, उसे मुख्य द्वार के बाहर थोड़े से गेहूँ या चावल पर रखें, लौ दक्षिण यानी यम की दिशा की ओर हो, और यम दीपदान का श्लोक एक बार बोलें। दीपक को वहीं सुरक्षित जलकर शांत होने दें। यह परिवार की लंबी आयु की प्रार्थना है।
दोनों परंपराएँ हैं। पंचांग जिस पौराणिक नियम को मानते हैं, वह यम दीपदान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी, यानी धनतेरस की संध्या को रखता है, और उत्तर भारत में मुख्य रूप से यही होता है। बहुत से परिवार अगले दिन नरक चतुर्दशी की शाम भी यम के लिए दीया जलाते हैं। धनतेरस पर जलाना कभी गलत नहीं; दूसरे दीपक के लिए अपनी पारिवारिक परंपरा मानें।
घर साफ करें, शुभ समय में कुछ नया खरीदें और संध्या को चौकी पर गणेश, लक्ष्मी, कुबेर और धन्वंतरि जी को स्थापित करें। पहले गणेश जी, फिर स्वास्थ्य के लिए धन्वंतरि और समृद्धि के लिए कुबेर और लक्ष्मी जी की रोली, अक्षत, फूल, सिक्कों और मिठाई से पूजा करें, आरती गाएँ, दक्षिण की ओर यम का दीपक रखें और घर भर में तेरह दीये जलाएँ। ऊपर की विधि इसी क्रम में है।
गणेश, लक्ष्मी, कुबेर और धन्वंतरि की मूर्ति या चित्र, कपड़े वाली चौकी, रोली, हल्दी, अक्षत, मौली, फूल और तुलसी, तेल के साथ मिट्टी के तेरह दीये, घी का दीपक, यम के लिए चौमुखा दीपक, धूप, कपूर, साबुत धनिया, गुड़, मिठाई, फल, पान-सुपारी, सिक्के और दिन में खरीदा नया बर्तन। ऊपर की पूरी सूची में विकल्प भी दिए हैं।
धन्वंतरि देवताओं के वैद्य हैं, विष्णु का वह रूप जो समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुआ, और आयुर्वेद के अधिष्ठाता। धनतेरस की शाम उन्हें चंदन, पीले फूल, तुलसी और दीपक अर्पित करें और परिवार के स्वास्थ्य के लिए उनका मंत्र 11 या 108 बार जपें; यह इलाज के साथ भक्ति है, उसकी जगह नहीं।
हर पूजा की तरह सबसे पहले गणेश जी की; फिर स्वास्थ्य के लिए धन्वंतरि जी, धन के रक्षक कुबेर जी और समृद्धि के लिए लक्ष्मी जी की; और यमराज की, जिन्हें संध्या को दक्षिणमुखी दीपक अर्पित होता है। बहुत से घरों में शाम की पूजा लक्ष्मी-कुबेर पूजा होती है, दिवाली पूजा का छोटा रूप।
गणेश जी के लिए 'ॐ गं गणपतये नमः', स्वास्थ्य के लिए धन्वंतरि मंत्र, कुबेर जी के लिए वैदिक 'राजाधिराजाय' मंत्र या 'ॐ यक्षाय कुबेराय', लक्ष्मी जी के लिए 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः', और यम का दीपक रखते समय यम दीपदान का श्लोक। सभी मंत्र अर्थ सहित मंत्र वाले भाग में हैं।
लोक-परंपरा झाड़ू को लक्ष्मी का रूप मानती है, क्योंकि वह घर से गंदगी और दरिद्रता बुहार देती है। धनतेरस पर खरीदी नई झाड़ू पर थोड़ा कुमकुम लगाकर पूजा की जाती है, उसे आदर से नज़रों की ओट में रखा जाता है और कभी पैर नहीं लगाया जाता; पुरानी झाड़ू उसी दिन फेंकने के बजाय त्योहार के बाद हटाई जाती है।
बहुत से परिवार तेरह दीये जलाते हैं, त्रयोदशी तक की हर तिथि का एक, और उन्हें द्वार, रसोई, पानी के स्थान, तुलसी और घर के कोनों में रखते हैं। यम का दीपक अलग है: मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण की ओर एक चौमुखा दीपक। घर के दीयों की कोई शास्त्रीय संख्या नहीं, इसलिए उतने जलाएँ जितने सुरक्षित संभाल सकें।
कोई शास्त्रीय ग्रंथ धनतेरस की खरीदारी को चंद्र राशि से नहीं जोड़ता। हर राशि के लिए धातु या रंग बताने वाली सूचियाँ आधुनिक सुझाव हैं। पारंपरिक विकल्प सबके लिए एक ही है: शुभ समय में खरीदा बर्तन, सिक्का, झाड़ू या धनिया। बड़ी खरीदारी के लिए किसी त्योहार-सूची से ज़्यादा आपकी अपनी कुंडली की दशा मायने रखती है।
धनिया 'धन' जैसा सुनाई देता है और उसका बीज आसानी से अंकुरित होता है, इसलिए वह बढ़ती समृद्धि का लोक-प्रतीक बन गया। परिवार साबुत धनिया खरीदकर लक्ष्मी जी को अर्पित करते हैं, कुछ दाने तिजोरी में रखते हैं और बाकी दिवाली के बाद गमले में बोते हैं; महाराष्ट्र के बहुत से घरों में इस दिन गुड़ और धनिये का नैवेद्य चढ़ता है।