कृष्ण पक्ष · एकादशी तिथि · आश्विन (पूर्णिमांत) / भाद्रपद (अमांत)
इंदिरा एकादशी 2027 कब है?
इंदिरा एकादशी 2027
334 दिन बाद
रवि, 26 सितंबर
2027 में इंदिरा एकादशी रविवार, 26 सितंबर को है। नई दिल्ली में पारण 27 सितंबर को सुबह 6:11 से सुबह 8:35 तक है; एकादशी तिथि 25 सितंबर, रात 10:31 से 26 सितंबर, शाम 7:50 तक रहेगी।
इंदिरा एकादशी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यही तिथि आश्विन कृष्ण एकादशी कहलाती है — दिन वही है, केवल महीने का नाम अलग। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।
स्वर्ण से पूछें
क्या यह मुहूर्त मेरी कुंडली के लिए शुभ है? स्वर्ण से मुफ़्त पूछें
ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: इंदिरा एकादशी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।
इंदिरा एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली
इंदिरा एकादशी 2027 शुभ मुहूर्त
इंदिरा एकादशी पितरों की एकादशी है: यह पितृ पक्ष के भीतर आती है और श्राद्ध व तर्पण के साथ रखी जाती है, इसका पुण्य दिवंगत पूर्वजों को समर्पित किया जाता है, और भगवान विष्णु की पूजा शालिग्राम रूप में होती है। नई दिल्ली में यह रविवार, 26 सितंबर 2027 को है: व्रत सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है, और पारण का समय 27 सितंबर, सुबह 6:11 से सुबह 8:35 तक है। उत्तर भारत में यह आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी है (अमांत गणना में भाद्रपद कृष्ण)।
इंदिरा एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्त
नई दिल्ली में समय
किसके लिए
पारण का समय
27 सितंबर, सुबह 6:11 से सुबह 8:35 तकद्वादशी की सुबह (दिन का पहला पाँचवाँ भाग); हरि वासर रात में ही समाप्त हो चुका है।
द्वादशी का वह समय, जिसमें इंदिरा एकादशी का व्रत पूरा किया जाता है। यह हरि वासर बीतने के बाद शुरू होता है और सामान्यतः सुबह के पहले भाग तक रहता है; हरि वासर देर तक चले तो पारण दोपहर के बाद होता है, और द्वादशी समाप्त होने के बाद कभी नहीं। यहाँ दिया समय नई दिल्ली के लिए गणना करके दिया गया है।
हरि वासर समाप्ति
27 सितंबर, रात 1:06द्वादशी के पहले चौथाई भाग का अंत; इसके भीतर व्रत नहीं खोला जाता।
हरि वासर द्वादशी का पहला चौथाई भाग है। इसमें व्रत नहीं खोला जाता, चाहे सुबह हो चुकी हो, इसलिए नई दिल्ली में इसकी समाप्ति ही पारण का सबसे पहला क्षण है।
कुतुप मुहूर्त: श्राद्ध का आरंभ
सुबह 11:48 से दोपहर 12:36 तकदिन के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, श्राद्ध का अपना मुहूर्त।
नई दिल्ली में एकादशी के दिन, दोपहर के पास, दिन के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ। नारद की बताई विधि में एकादशी का श्राद्ध और तिल वाला तर्पण दोपहर में होता है, और कुतुप वह मुहूर्त है जिसमें इन्हें शुरू किया जाता है। यदि आपके परिवार का एकादशी श्राद्ध दूसरे दिन पड़ता है, जैसा एकादशी तिथि वाली पंक्ति बताती है, तो उस दिन का कुतुप उसके पंचांग से लें।
रौहिण मुहूर्त
दोपहर 12:36 से दोपहर 1:24 तकदिन के पंद्रह मुहूर्तों में नौवाँ।
कुतुप के ठीक बाद वाला, नौवाँ मुहूर्त। कुतुप में शुरू हुए अर्पण इसमें चलते रहते हैं; यह श्राद्ध नए सिरे से शुरू करने का समय नहीं।
अपराह्न काल: श्राद्ध पूरा करें
दोपहर 1:24 से दोपहर 3:49 तकअपराह्न, दिन का चौथा पाँचवाँ भाग, जिससे हर श्राद्ध तय होता है।
दोपहर बाद का समय, दिन के पाँच भागों में चौथा। ब्राह्मणों या अतिथियों के भोजन और गायों के लिए अलग रखे पिंड सहित श्राद्ध इसके समाप्त होने से पहले पूरा किया जाता है। दिन के इसी भाग से तिथि का श्राद्ध तय होता है, इसीलिए वह श्राद्ध व्रत से एक दिन हटकर पड़ सकता है।
ब्रह्म मुहूर्त
सुबह 4:35 से सुबह 5:23 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।
एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले का समय: उठने, स्नान करने और व्रत का संकल्प लेने का पारंपरिक समय।
सूर्योदय
सुबह 6:11क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।
व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक गिना जाता है, और सुबह की पूजा इसके बाद होती है।
शुभ चौघड़िया (दिन)
चरसुबह 7:41 से सुबह 9:11 तक
लाभसुबह 9:11 से सुबह 10:42 तक
अमृतसुबह 10:42 से दोपहर 12:12 तक
शुभदोपहर 1:42 से दोपहर 3:13 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। जो परिवार भोर में पूजा नहीं कर पाते, वे मुख्य पूजा के लिए इनमें से कोई समय चुनते हैं।
प्रदोष काल: संध्या दीप
शाम 6:13 से रात 8:37 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)।
सूर्यास्त के बाद का समय, जब भगवान विष्णु के आगे और तुलसी के पास दीप जलाए जाते हैं और फिर से आरती होती है।
निशीथ काल: रात्रि जागरण
रात 11:48 से रात 12:36 (27 सितंबर) तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, आधी रात के आसपास।
आधी रात का समय, जागरण का केंद्र। जो रात भर जागते हैं, वे यह भाग कीर्तन और जप को देते हैं।
राहु काल (वर्जित समय)इस समय टाला जाता है
शाम 4:43 से शाम 6:13 तकदिन का वह आठवाँ भाग जो वार के अनुसार राहु का है: इसमें पूजा, खरीदारी या यात्रा शुरू नहीं की जाती।
नई दिल्ली में एकादशी के दिन का राहु काल। बहुत से परिवार संकल्प या मुख्य पूजा इसके भीतर शुरू नहीं करते; इससे व्रत या पारण का समय नहीं बदलता।
उस दिन के शुभ समय
उस दिन के शुभ समय
मुहूर्त
नई दिल्ली में समय
प्रकृति
अभिजित मुहूर्त
सुबह 11:48 से दोपहर 12:36
शुभ
अमृत काल
सुबह 6:43 से सुबह 8:12
सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्त
सुबह 4:35 से सुबह 5:23
शुभ
जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।
जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधि
नई दिल्ली में समय
राहु काल
शाम 4:43 से शाम 6:13
यमगण्ड काल
दोपहर 12:12 से दोपहर 1:42
दुर्मुहूर्त (पहला)
शाम 4:37 से शाम 5:25
वर्ज्यम्
रात 12:19 से रात 1:47
ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए रविवार, 26 सितंबर 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।
पारण · नई दिल्ली
इंदिरा एकादशी 2027 पारण का समय
सोमवार, 27 सितंबर 2027, सुबह 6:11 से सुबह 8:35
पारण द्वादशी को होता है, और हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग, जो इस बार 27 सितंबर, रात 1:06 पर समाप्त होता है — में व्रत नहीं खोला जाता। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।
व्रत के बारे में यहाँ दी गई बातें परंपरा का वर्णन हैं, चिकित्सा सलाह नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या दवाइयों की स्थिति में व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें।
कृष्ण पक्ष · आश्विन (पूर्णिमांत) · भाद्रपद (अमांत)
इंदिरा एकादशी 2027: स्मार्त और वैष्णव तारीख
उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में इंदिरा एकादशी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, और दक्षिण व पश्चिम भारत की अमांत गणना में भाद्रपद मास की। रात एक ही है — दोनों पद्धतियाँ कृष्ण पक्ष को अलग महीने के नाम से गिनती हैं।
इस पेज की तारीख (स्मार्त, सूर्योदय का नियम)
रविवार, 26 सितंबर 2027 — जिस दिन के सूर्योदय पर एकादशी तिथि है, व्रत उसी दिन का माना जाता है — यही दिन एस्ट्रोसेज और यह साइट देती है।
वैष्णव (इस्कॉन), अरुणोदय का नियम
रविवार, 26 सितंबर 2027 — इस बार वही दिन। वैष्णव नियम तिथि सूर्योदय पर नहीं, अरुणोदय — सूर्योदय से पहले के 96 मिनट — पर देखता है; रविवार, 26 सितंबर 2027 का अरुणोदय (26 सित, सुबह 4:35) एकादशी में है, दशमी में नहीं।
ऊपर का हर दिन नई दिल्ली के लिए उन्हीं तिथि-क्षणों से निकाला गया है। इस्कॉन मंदिर हर शहर के लिए अपना कैलेंडर छापते हैं और कुछ वर्षों में महाद्वादशी के नियम से व्रत द्वादशी पर भी ले जाते हैं — आपके मंदिर का कैलेंडर अलग हो तो उसी का पालन करें।
महत्व और व्रत कथा
इंदिरा एकादशी व्रत कथा और महत्व
इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष के भीतर आती है — पूर्णिमांत गणना में आश्विन कृष्ण पक्ष, अमांत गणना में भाद्रपद कृष्ण — और यह पितरों के लिए रखी जाने वाली एकादशी है। परिवार व्रत के साथ श्राद्ध करते हैं: पितरों और ब्राह्मणों को भोजन अर्पित होता है, और व्रत का पुण्य दिवंगत पूर्वजों को समर्पित किया जाता है। इस दिन शालिग्राम रूप में विष्णु की पूजा होती है।
इंदिरा एकादशी की कथा
संक्षेप में, अपने शब्दों में — स्रोत: ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया एकादशी माहात्म्य।
माहिष्मती के राजा इंद्रसेन भगवान विष्णु के भक्त थे। एक दिन नारद मुनि उनके दरबार में एक संदेश लेकर आए: यमलोक जाने पर उन्हें राजा के पिता मिले थे, जो अपने जीवन की एक चूक — एक टूटे हुए एकादशी व्रत — के कारण अब भी वहीं रुके थे।
पिता ने नारद से कहलवाया था कि उन्हें छुड़ाने का एक उपाय है: यदि इंद्रसेन आश्विन कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत रखकर उसका पुण्य उन्हें दें, तो वे मुक्त हो जाएँगे।
फिर नारद ने विधि बताई। दशमी को स्नान करके दोपहर में पितरों का श्राद्ध करें, एक बार भोजन करें और रात संयम से बिताएँ। एकादशी को उपवास रखें, शालिग्राम की पूजा के साथ फिर श्राद्ध करें, पिंड गायों को दें और रात भर जागरण करें। द्वादशी को ब्राह्मणों और परिवार को भोजन कराकर स्वयं पारण करें।
इंद्रसेन ने परिवार के साथ ठीक वैसे ही व्रत रखा। पुराण कहता है कि व्रत पूरा होते ही आकाश से फूल बरसे और उनके पिता गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक गए। इंद्रसेन ने भी लंबे समय तक राज किया और अंत में उसी लोक को प्राप्त हुए।
व्रत कैसे रखा जाता है
व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है। बहुत से परिवार एक दिन पहले, दशमी की शाम, एक बार सादा भोजन करते हैं।
एकादशी को अन्न और चावल नहीं लिए जाते। जो पूरा उपवास नहीं रख पाते वे फल, दूध या फलाहार लेते हैं; निर्जल व्रत वही रखते हैं जिनकी परंपरा और स्वास्थ्य इसकी अनुमति दें।
भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल, दीप और उनके नामों से होती है; उस दिन की कथा पढ़ना या सुनना व्रत का अंग है, और कई लोग रात का कुछ भाग कीर्तन या जप में जागकर बिताते हैं।
पारण द्वादशी को होता है, हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग — बीतने के बाद। आपके शहर का पारण समय ऊपर गणना करके दिया गया है।
उपवास के नियम यहाँ परंपरा के रूप में बताए गए हैं, चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या किसी दवा के चलते उपवास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।
सभी 26 · नई दिल्ली
सभी एकादशी और उनकी अगली तारीख
साधारण वर्ष में चौबीस, और अधिक मास वाले वर्ष में दो और। हर एकादशी का अपना पेज है — कथा, पारण और स्मार्त-वैष्णव तारीख के साथ।
हर एकादशी का व्रत एक ही ढंग से रखा जाता है: दशमी को एक समय सात्विक भोजन, सुबह संकल्प, तुलसी के साथ विष्णु पूजा, कथा और आरती, शाम को दीप, रात्रि जागरण और द्वादशी को पारण। ये चरण एकादशी व्रत विधि में हैं। नीचे वे चरण हैं जो इंदिरा एकादशी में जुड़ते हैं या अलग ढंग से किए जाते हैं।
दशमी: दोपहर में तर्पण, एक बार भोजन
जैसा नारद ने राजा इंद्रसेन को बताया, दशमी को स्नान करके दोपहर में अपने पितरों को काले तिल मिला जल (तर्पण) दें, या परिवार की परंपरा हो तो श्राद्ध करें; एक बार भोजन करें और रात शांति और संयम से बिताएँ। ज़रूरत के तुलसी दल तोड़ लें।
व्रत का संकल्प
पूजा स्थान के सामने बैठकर दाहिने हाथ में थोड़ा जल और एक फूल लें और व्रत का संकल्प करें: अपना नाम लें, कहें कि आप भगवान विष्णु के लिए इंदिरा एकादशी का व्रत रख रहे हैं, और यह भी कि व्रत कैसा होगा, निर्जल, केवल जल पर, फलाहार पर या एक समय के फलाहारी भोजन के साथ। फिर जल धरती पर छोड़ दें। मंत्र वाले भाग का एकादशी संकल्प श्लोक यहाँ बोला जा सकता है।
शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु का पूजन
शालिग्राम, या भगवान विष्णु की धातु की प्रतिमा, को जल, पंचामृत और फिर जल से स्नान कराएँ (चित्र हो तो फूल से जल छिड़कें), और चंदन, पीले फूल, एक दिन पहले तोड़े तुलसी दल, धूप और दीपक अर्पित करें, साथ में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें।
एकादशी पर श्राद्ध या तर्पण
दोपहर में दक्षिण की ओर मुख करके, पितरों के श्लोक के साथ, पितरों को काले तिल और कुश वाला जल दें; जो परिवार पूरा श्राद्ध करते हैं, वे इसी समय शालिग्राम की पूजा के साथ करते हैं। कथा पिंड गायों को देती है: पितरों के लिए अलग रखा भोजन व्रती स्वयं नहीं खाता।
कथा और आरती
नीचे दी गई इंदिरा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और हो सके तो विष्णु सहस्रनाम या गीता का एक अध्याय भी। फिर घी के दीपक या कपूर से 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती गाएँ और पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें।
द्वादशी: पहले दूसरों को भोजन, फिर पारण
द्वादशी को स्नान करके भगवान की पूजा करें, और कथा के अनुसार पहले किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद और परिवार को भोजन कराएँ। फिर पारण के समय के भीतर, व्रत का पुण्य पितरों को अर्पित करते हुए, जल के साथ तुलसी दल से अपना व्रत खोलें।
सामग्री · पहले से तैयार रखें
इंदिरा एकादशी पूजा सामग्री सूची
हर एकादशी की पूजा सामग्री (विष्णु की प्रतिमा, दशमी को तोड़े तुलसी के पत्ते, घी का दीपक, पीले फूल, पंचामृत, गंगाजल आदि) एकादशी पूजा सामग्री सूची में है। इंदिरा एकादशी के लिए इसके साथ:
शालिग्राम, या भगवान विष्णु की प्रतिमाकथा की पूजा शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु की है।
काले तिल और कुशतर्पण और श्राद्ध के लिए।
ताँबे का लोटादक्षिण की ओर मुख करके पितरों को तिल जल देने के लिए।
पिंड और पितरों का भोजनपरिवार की श्राद्ध परंपरा के अनुसार बनाया, और गायों को दिया जाता है, व्रती स्वयं नहीं खाता।
मंत्र · अर्थ के साथ
इंदिरा एकादशी के मंत्र और आरती
हर एकादशी में पढ़े जाने वाले श्लोक — ध्यान और संकल्प से लेकर पारण के श्लोक तक — और ॐ जय जगदीश हरे आरती एकादशी गाइड के एकादशी के मंत्र और आरती वाले हिस्से में हैं। इंदिरा एकादशी के अपने:
Devatabhyah pitribhyash cha mahayogibhya eva cha Namah svadhayai svahayai nityam eva namo namah
अर्थ: देवताओं, पितरों और महायोगियों को नमस्कार; स्वधा और स्वाहा को सदा, बार-बार नमस्कार। श्राद्ध में व्यापक रूप से पढ़ा जाने वाला श्लोक।
कब और कैसे: श्राद्ध के समय जल और काले तिल के साथ तीन बार, व्रत का पुण्य पितरों को अर्पित करने से पहले।
महत्व
इंदिरा एकादशी का महत्व
यह परिवार से अपने दिवंगतों को नाम लेकर याद करने को कहता है, ख़ासकर उन्हें जिनका कोई व्रत अधूरा रह गया; उनकी ओर से वह व्रत निभाना इस दिन का अंग है। श्राद्ध दोपहर बाद के समय से तय होता है और दोपहर के आसपास कुतुप मुहूर्त में शुरू किया जाता है, जबकि उपवास सूर्योदय से, इसलिए दोनों में एक दिन का अंतर हो सकता है; यह पेज दोनों समय देता है। कुछ दिन बाद सर्व पितृ अमावस्या पखवाड़े को पूरा करती है, और उसके अगले दिन नवरात्रि शुरू होती है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण की इसकी कथा में सबसे विस्तृत विधि है: नारद मुनि राजा इंद्रसेन को बताते हैं कि उनके पिता एक टूटे एकादशी व्रत के कारण यमलोक में रुके हैं, और उन्हें दशमी व एकादशी के श्राद्ध और द्वादशी को दूसरों को भोजन के साथ यह व्रत रखना सिखाते हैं। पुराण कहता है कि ऐसा करने पर उनके पिता गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक गए।
उपाय · परंपरा
इंदिरा एकादशी के पारंपरिक उपाय
काले तिल से तर्पण
दशमी और एकादशी को दोपहर में दक्षिण की ओर मुख करके, माता-पिता और पूर्वजों का नाम लेते हुए, पितरों के श्लोक के साथ अंजलि से काले तिल मिला जल दें।
दिवंगतों के लिए पुण्य
पारण के समय व्रत का पुण्य अपने पितरों को अर्पित करें, जैसे इंद्रसेन ने अपने पिता को किया; परिवार विशेष रूप से उन्हें याद करते हैं जो अपने व्रत पूरे न कर पाए।
गायों के लिए पिंड
कथा में पिंड गायों को दिया जाता है। पितरों के लिए अलग रखा भोजन किसी गाय को खिलाएँ, या गौशाला में हरा चारा दें।
खुद खाने से पहले दूसरों को
नारद की विधि में राजा के व्रत खोलने से पहले ब्राह्मणों और परिवार को भोजन कराया जाता है। द्वादशी की सुबह पहले किसी पुरोहित, अतिथि या भूखे को भोजन कराएँ।
किसी का अधूरा व्रत निभाएँ
राजा के पिता एक टूटे एकादशी व्रत के कारण रुके थे। माता-पिता या किसी बुज़ुर्ग की कोई साधना अधूरी रह गई हो, तो उनकी ओर से उसे निभाना इस दिन की भावना में है।
कृतज्ञता से स्मरण
आज बच्चों को उनके दादा-दादी और परदादा-परदादी के नाम और कहानियाँ सुनाएँ; स्मरण ही पितृ पक्ष का मर्म है।
परंपरा, संक्षेप में
इंदिरा एकादशी पर क्या करें, क्या न करें
क्या करें
दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार हल्का सात्विक भोजन करें।
सुबह संकल्प लें और जैसा व्रत तय किया, वैसा ही निभाएँ।
हर भोग पर एक दिन पहले तोड़ा गया तुलसी दल रखें।
'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें और कथा पढ़ें या सुनें।
शाम को भगवान विष्णु के सामने और तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
रात का कम से कम कुछ भाग कीर्तन या जप में जागें।
ज़रूरतमंद को भोजन या जल दें, और द्वादशी को पारण से पहले दान करें।
द्वादशी को पारण के समय के भीतर ही व्रत खोलें।
कथा के अनुसार दशमी और एकादशी को दोपहर में पितरों का तर्पण या श्राद्ध करें।
अपने पारण से पहले किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद और परिवार को भोजन कराएँ।
क्या न करें
एकादशी को चावल, गेहूँ, दाल या कोई भी अन्न न खाएँ।
एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें।
दशमी से द्वादशी तक प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और मदिरा से दूर रहें।
दिन में न सोएँ।
झगड़ा, झूठ और कटु वचन से बचें।
हरि वासर में व्रत न खोलें, और द्वादशी बीतने से पहले पारण कर लें।
बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं और बच्चों पर कठोर व्रत का दबाव न डालें; डायबिटीज़ या किसी और बीमारी वाले, या रोज़ दवा लेने वाले लोग व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।
पिंड या पितरों के लिए अलग रखा भोजन न खाएँ; कथा पिंड गायों को देती है।
देश भर में
इंदिरा एकादशी का भोग और प्रसाद
किसी भी एकादशी पर क्या खाया जा सकता है — फल और साबूदाने से लेकर समा के चावल और पारण के भोजन तक — यह एकादशी व्रत के भोजन की सूची में है।
आने वाले वर्षों में इंदिरा एकादशी की तारीख
इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।
आने वाले वर्षों में इंदिरा एकादशी की तारीख
वर्ष
तारीख
स्थिति
2026इस वर्ष
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026
बीत गई
2027
रविवार, 26 सितंबर 2027
आने वाली
2028
शुक्रवार, 15 सितंबर 2028
आने वाली
पंचांगों में इंदिरा एकादशी की तारीख अलग क्यों होती है
दो पंचांग इंदिरा एकादशी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।
तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: इंदिरा एकादशी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।
नई दिल्ली में इंदिरा एकादशी रविवार, 26 सितंबर 2027 को है, और एकादशी तिथि रात 10:31 (25 सितंबर) से शाम 7:49 तक रहेगी। यह पितृ पक्ष की एकादशी है: उत्तर भारत में आश्विन कृष्ण, अमांत गणना में भाद्रपद कृष्ण, सितंबर के मध्य से अक्टूबर के शुरू के बीच।
इंदिरा एकादशी की तिथि क्या है?
आश्विन (पूर्णिमांत) / भाद्रपद (अमांत) मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 25 सितंबर, रात 10:31 से 26 सितंबर, शाम 7:50 तक है, और इंदिरा एकादशी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।
इंदिरा एकादशी का पारण कब करें?
सोमवार, 27 सितंबर 2027 को सुबह 6:11 से सुबह 8:35 तक। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।
दूसरे कैलेंडर में इंदिरा एकादशी की तारीख अलग क्यों है?
मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।
अगले साल इंदिरा एकादशी कब है?
2028 में शुक्रवार, 15 सितंबर।
इंदिरा एकादशी क्यों रखी जाती है?
पितरों के लिए। यह पितृ पक्ष में आती है, और इसकी कथा एक पुत्र के व्रत की है जिसने पिता को मुक्त किया, इसलिए परिवार इसे अपने पूर्वजों की शांति के लिए रखते हैं: व्रत, श्राद्ध या तर्पण, दूसरों को भोजन, और व्रत का पुण्य दिवंगतों को समर्पित।
इंदिरा एकादशी की व्रत कथा किस ग्रंथ में है?
कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया एकादशी माहात्म्य में है। पूरी कथा ऊपर दी गई है।
क्या स्मार्त और वैष्णव इंदिरा एकादशी अलग दिन है?
नहीं, इस बार दोनों रविवार, 26 सितंबर 2027 को हैं। वैष्णव नियम एकादशी को अरुणोदय पर देखता है, और उस दिन अरुणोदय पर भी एकादशी है।
क्या एकादशी का श्राद्ध और इंदिरा एकादशी एक ही दिन हैं?
दोनों पितृ पक्ष की एक ही एकादशी के हैं, पर अलग नियम मानते हैं। व्रत उस दिन रखा जाता है जिसके सूर्योदय पर एकादशी हो; एकादशी तिथि पर दिवंगत हुए पूर्वजों का श्राद्ध दोपहर की तिथि देखता है, इसलिए पंचांग कभी दोनों को एक दिन के अंतर पर रखते हैं। यह पेज नई दिल्ली के लिए व्रत का दिन देता है; श्राद्ध का दिन पितृ पक्ष की सूची में अलग से देखें।
इंदिरा एकादशी का पारण कब है?
इंदिरा का पारण द्वादशी को होता है: नई दिल्ली में 27 सितंबर, सुबह 6:11 से सुबह 8:35 तक, हरि वासर समाप्त होने (27 सितंबर, रात 1:06) के बाद। अपना व्रत खोलने से पहले किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद और परिवार को भोजन कराएँ, और व्रत खोलते समय उसका पुण्य पितरों को अर्पित करें।
इंदिरा एकादशी की व्रत कथा क्या है?
माहिष्मती के विष्णु भक्त राजा इंद्रसेन के पास नारद मुनि आए, जो यमलोक में राजा के पिता से मिले थे, जो एक टूटे एकादशी व्रत के कारण वहाँ रुके थे। नारद ने कहा कि यदि इंद्रसेन इंदिरा एकादशी रखकर उसका पुण्य उन्हें दें, तो वे मुक्त होंगे, और विधि बताई: दशमी और एकादशी को श्राद्ध, उपवास और रात्रि जागरण, और द्वादशी को ब्राह्मणों व परिवार को भोजन। इंद्रसेन ने ऐसा किया, और उनके पिता विष्णुलोक गए। पूरी कथा ऊपर है।
इंदिरा एकादशी पर श्राद्ध कैसे करें?
नारद की विधि के अनुसार: दशमी को स्नान, दोपहर में श्राद्ध या तर्पण और एक बार भोजन; एकादशी को व्रत, शालिग्राम पूजा, दोपहर में दूसरा श्राद्ध जिसमें पिंड गायों को दिया जाता है, और रात्रि जागरण; द्वादशी को पारण से पहले ब्राह्मणों और परिवार को भोजन। जो पूरा श्राद्ध नहीं करते, वे दोपहर में पितरों को तिल जल देते हैं।
पितृ पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है?
पितृ पक्ष पूर्वजों को समर्पित पखवाड़ा है, और इंदिरा उसकी एकादशी है: इसमें वह एक दिन जब एकादशी व्रत और पितरों के कर्म साथ निभाए जाते हैं। पुराण कहता है कि इस व्रत का पुण्य किसी पूर्वज को देने से वह विष्णुलोक तक पहुँच सकता है।
क्या व्रत का पुण्य दिवंगत माता-पिता को दिया जा सकता है?
इंदिरा एकादशी का मर्म यही है: इंद्रसेन ने व्रत रखकर उसका पुण्य अपने पिता को दिया। पारण के समय जल, एक फूल और थोड़े तिल के साथ अपने माता-पिता या पूर्वज का नाम लें और उनकी शांति के लिए व्रत अर्पित करें। परंपरा मानती है कि श्रद्धा से दिया हुआ उन तक पहुँचता है।
इंदिरा एकादशी पर भगवान विष्णु के किस रूप की पूजा होती है?
शालिग्राम रूप की, यानी गंडकी नदी के पवित्र काले पत्थर की, जिसकी पूजा कथा की विधि में श्राद्ध के साथ होती है। जिस घर में शालिग्राम न हो, वहाँ भगवान विष्णु की कोई भी प्रतिमा या चित्र पूजा जाता है।
इंदिरा एकादशी व्रत के नियम क्या हैं?
दशमी को दोपहर के तर्पण के बाद एक बार भोजन; तब से पारण तक अन्न, प्याज़ या लहसुन नहीं; एकादशी को दोपहर में श्राद्ध या तर्पण, पिंड गायों को, स्वयं कभी नहीं; रात का कम से कम कुछ भाग जागरण; और द्वादशी को पहले दूसरों को भोजन, फिर पारण के समय में अपना व्रत।
इंदिरा एकादशी पर क्या खाएँ?
केवल फलाहार: फल, दूध, मखाने, साबूदाना, सेंधा नमक के साथ आलू और शकरकंद, और परंपरा हो तो कुट्टू या सिंघाड़ा। इस दिन पितरों के लिए बना भोजन उनके, गायों और अतिथियों के लिए है; व्रती उसे नहीं खाता।
क्या इंदिरा एकादशी हमेशा सितंबर में होती है?
अधिकतर, पर हमेशा नहीं: यह पितृ पक्ष के भीतर, सितंबर के मध्य से अक्टूबर के शुरू के बीच पड़ती है, इसलिए कुछ वर्षों में अक्टूबर के पहले दिनों में आती है। नई दिल्ली के लिए तारीख रविवार, 26 सितंबर 2027 है।