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शुक्ल पक्ष · एकादशी तिथि · आश्विन

पापांकुशा एकादशी 2027 कब है?

पापांकुशा एकादशी 2027

350 दिन बाद

सोम, 11 अक्टूबर

2027 में पापांकुशा एकादशी सोमवार, 11 अक्टूबर को है। नई दिल्ली में पारण 12 अक्टूबर को सुबह 6:19 से सुबह 8:38 तक है; एकादशी तिथि 10 अक्टूबर, सुबह 11:41 से 11 अक्टूबर, दोपहर 2:09 तक रहेगी।

2028: शुक्रवार, 29 सितंबर 2028

पारण

सुबह 6:19 – सुबह 8:38

नई दिल्ली

पापांकुशा एकादशी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

पापांकुशा एकादशी 2027: तारीख और तिथि का समय

सोमवार, 11 अक्टूबर 2027

तिथि
एकादशी, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
आश्विन
तिथि आरंभ
10 अक्टूबर, सुबह 11:41
तिथि समाप्त
11 अक्टूबर, दोपहर 2:09
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
11 अक्टूबर, सुबह 6:19

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: पापांकुशा एकादशी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

पापांकुशा एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

पापांकुशा एकादशी 2027 शुभ मुहूर्त

पापांकुशा एकादशी, दशहरे के बाद की पहली एकादशी, आश्विन शुक्ल पक्ष में भगवान विष्णु के पद्मनाभ रूप के लिए रखी जाती है; इसके नाम का अर्थ है पाप पर रखा अंकुश। नई दिल्ली में यह सोमवार, 11 अक्टूबर 2027 को है: व्रत सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है, और पारण का समय 12 अक्टूबर, सुबह 6:19 से सुबह 8:38 तक है। यह दिन भगवान के नामों के जप और अन्न, वस्त्र, तिल या दीपक के दान में बीतता है।

पापांकुशा एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
पारण का समय12 अक्टूबर, सुबह 6:19 से सुबह 8:38 तकद्वादशी की सुबह (दिन का पहला पाँचवाँ भाग); हरि वासर रात में ही समाप्त हो चुका है।

द्वादशी का वह समय, जिसमें पापांकुशा एकादशी का व्रत पूरा किया जाता है। यह हरि वासर बीतने के बाद शुरू होता है और सामान्यतः सुबह के पहले भाग तक रहता है; हरि वासर देर तक चले तो पारण दोपहर के बाद होता है, और द्वादशी समाप्त होने के बाद कभी नहीं। यहाँ दिया समय नई दिल्ली के लिए गणना करके दिया गया है।

हरि वासर समाप्तिरात 8:40द्वादशी के पहले चौथाई भाग का अंत; इसके भीतर व्रत नहीं खोला जाता।

हरि वासर द्वादशी का पहला चौथाई भाग है। इसमें व्रत नहीं खोला जाता, चाहे सुबह हो चुकी हो, इसलिए नई दिल्ली में इसकी समाप्ति ही पारण का सबसे पहला क्षण है।

ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:40 से सुबह 5:29 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।

एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले का समय: उठने, स्नान करने और व्रत का संकल्प लेने का पारंपरिक समय।

सूर्योदयसुबह 6:19क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक गिना जाता है, और सुबह की पूजा इसके बाद होती है।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • अमृत सुबह 6:19 से सुबह 7:46 तक
  • शुभ सुबह 9:13 से सुबह 10:40 तक
  • चर दोपहर 1:34 से दोपहर 3:02 तक
  • लाभ दोपहर 3:02 से शाम 4:29 तक
  • अमृत शाम 4:29 से शाम 5:56 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। जो परिवार भोर में पूजा नहीं कर पाते, वे मुख्य पूजा के लिए इनमें से कोई समय चुनते हैं।

प्रदोष काल: संध्या दीपशाम 5:56 से रात 8:25 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)।

सूर्यास्त के बाद का समय, जब भगवान विष्णु के आगे और तुलसी के पास दीप जलाए जाते हैं और फिर से आरती होती है।

निशीथ काल: रात्रि जागरणरात 11:43 से रात 12:32 (12 अक्टूबर) तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, आधी रात के आसपास।

आधी रात का समय, जागरण का केंद्र। जो रात भर जागते हैं, वे यह भाग कीर्तन और जप को देते हैं।

राहु काल (वर्जित समय)इस समय टाला जाता हैसुबह 7:46 से सुबह 9:13 तकदिन का वह आठवाँ भाग जो वार के अनुसार राहु का है: इसमें पूजा, खरीदारी या यात्रा शुरू नहीं की जाती।

नई दिल्ली में एकादशी के दिन का राहु काल। बहुत से परिवार संकल्प या मुख्य पूजा इसके भीतर शुरू नहीं करते; इससे व्रत या पारण का समय नहीं बदलता।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तसुबह 11:44 से दोपहर 12:31शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:40 से सुबह 5:29शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालसुबह 7:46 से सुबह 9:13
यमगण्ड कालसुबह 10:40 से दोपहर 12:07
दुर्मुहूर्त (पहला)दोपहर 12:31 से दोपहर 1:17
दुर्मुहूर्त (दूसरा)दोपहर 2:50 से दोपहर 3:37
वर्ज्यम्रात 12:20 से रात 2:06

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए सोमवार, 11 अक्टूबर 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पारण · नई दिल्ली

पापांकुशा एकादशी 2027 पारण का समय

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2027, सुबह 6:19 से सुबह 8:38

पारण द्वादशी को होता है, और हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग, जो इस बार 11 अक्टूबर, रात 8:40 पर समाप्त होता है — में व्रत नहीं खोला जाता। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।

व्रत के बारे में यहाँ दी गई बातें परंपरा का वर्णन हैं, चिकित्सा सलाह नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या दवाइयों की स्थिति में व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

शुक्ल पक्ष · आश्विन

पापांकुशा एकादशी 2027: स्मार्त और वैष्णव तारीख

इस पेज की तारीख (स्मार्त, सूर्योदय का नियम)
सोमवार, 11 अक्टूबर 2027 — जिस दिन के सूर्योदय पर एकादशी तिथि है, व्रत उसी दिन का माना जाता है — यही दिन एस्ट्रोसेज और यह साइट देती है।
वैष्णव (इस्कॉन), अरुणोदय का नियम
सोमवार, 11 अक्टूबर 2027 — इस बार वही दिन। वैष्णव नियम तिथि सूर्योदय पर नहीं, अरुणोदय — सूर्योदय से पहले के 96 मिनट — पर देखता है; सोमवार, 11 अक्टूबर 2027 का अरुणोदय (11 अक्टू, सुबह 4:43) एकादशी में है, दशमी में नहीं।

ऊपर का हर दिन नई दिल्ली के लिए उन्हीं तिथि-क्षणों से निकाला गया है। इस्कॉन मंदिर हर शहर के लिए अपना कैलेंडर छापते हैं और कुछ वर्षों में महाद्वादशी के नियम से व्रत द्वादशी पर भी ले जाते हैं — आपके मंदिर का कैलेंडर अलग हो तो उसी का पालन करें।

महत्व और व्रत कथा

पापांकुशा एकादशी व्रत कथा और महत्व

पापांकुशा आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी है — नवरात्रि और दशहरे के बाद आने वाली पहली एकादशी। इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा होती है, जिनकी नाभि से कमल निकला है। नाम में पाप और अंकुश दोनों हैं — वही अंकुश जिससे महावत हाथी को मोड़ता है; इसलिए यह दिन अपने आचरण पर अंकुश का दिन माना जाता है। व्रत के साथ लोग विष्णु के नामों का जप करते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, तिल या दीप का दान करते हैं।

पापांकुशा एकादशी की कथा

संक्षेप में, अपने शब्दों में — स्रोत: ब्रह्मवैवर्त पुराण, एकादशी माहात्म्य का वह भाग जिसमें श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को हर एकादशी की कथा सुनाते हैं (कुछ हिंदी व्रत-कथा पुस्तकें इसे पद्म पुराण से बताती हैं)।

विंध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था, और जैसा नाम था वैसा ही जीवन — शिकार, पहाड़ी रास्तों पर राहगीरों को लूटना और दूसरों को दुख देना। उसने कभी नहीं सोचा कि आगे क्या होगा। बुढ़ापा आया तो एक रात सपने में उसे यमदूत अपनी प्रतीक्षा करते दिखे, और उसी डर से वह पहाड़ पर अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुँचा।

ऋषि के चरणों में गिरकर उसने पूछा कि क्या उस जैसे व्यक्ति के लिए भी कोई रास्ता बचा है। अंगिरा ने उसे लौटाया नहीं। उन्होंने कहा — आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी निकट है। दिन भर उपवास रखो, रात भर जागकर भगवान पद्मनाभ का स्मरण करो, और द्वादशी को दूसरों को भोजन कराकर पारण करो। जैसे अंकुश हाथी को मोड़ देता है, वैसे ही यह व्रत तुम्हारे बीते कर्मों का भार मोड़ देगा।

क्रोधन ने ठीक वैसा ही किया। पुराण कहता है कि इस व्रत से उसका भार उतर गया और जीवन के अंत में वह यमलोक नहीं, विष्णुलोक गया। कथा के अंत में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि इसी कारण यह एकादशी पापांकुशा कहलाती है — पाप पर रखा गया अंकुश।

व्रत कैसे रखा जाता है

  • व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है। बहुत से परिवार एक दिन पहले, दशमी की शाम, एक बार सादा भोजन करते हैं।
  • एकादशी को अन्न और चावल नहीं लिए जाते। जो पूरा उपवास नहीं रख पाते वे फल, दूध या फलाहार लेते हैं; निर्जल व्रत वही रखते हैं जिनकी परंपरा और स्वास्थ्य इसकी अनुमति दें।
  • भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल, दीप और उनके नामों से होती है; उस दिन की कथा पढ़ना या सुनना व्रत का अंग है, और कई लोग रात का कुछ भाग कीर्तन या जप में जागकर बिताते हैं।
  • पारण द्वादशी को होता है, हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग — बीतने के बाद। आपके शहर का पारण समय ऊपर गणना करके दिया गया है।

उपवास के नियम यहाँ परंपरा के रूप में बताए गए हैं, चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या किसी दवा के चलते उपवास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

सभी 26 · नई दिल्ली

सभी एकादशी और उनकी अगली तारीख

साधारण वर्ष में चौबीस, और अधिक मास वाले वर्ष में दो और। हर एकादशी का अपना पेज है — कथा, पारण और स्मार्त-वैष्णव तारीख के साथ।

अगली एकादशी और उसका पारण · 2027 की सभी एकादशी — तिथि और पारण के समय के साथ

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

पापांकुशा एकादशी पूजा विधि

  1. एक दिन पहले: दशमी

    दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार सादा भोजन करें, जिसमें प्याज़, लहसुन और चावल न हों, और शाम हल्के और शांत मन से बिताएँ। पूजा का स्थान साफ कर लें और ज़रूरत के तुलसी दल आज ही तोड़ लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।

  2. जल्दी उठें और स्नान करें

    एकादशी की सुबह जल्दी, हो सके तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें (पानी में गंगाजल की कुछ बूँदें हों तो अच्छा) और साफ कपड़े पहनें; भगवान विष्णु की पूजा में पीले वस्त्र पारंपरिक हैं।

  3. व्रत का संकल्प

    पूजा स्थान के सामने बैठकर दाहिने हाथ में थोड़ा जल और एक फूल लें और व्रत का संकल्प करें: अपना नाम लें, कहें कि आप भगवान विष्णु के लिए पापांकुशा एकादशी का व्रत रख रहे हैं, और यह भी कि व्रत कैसा होगा, निर्जल, केवल जल पर, फलाहार पर या एक समय के फलाहारी भोजन के साथ। फिर जल धरती पर छोड़ दें। मंत्र वाले भाग का एकादशी संकल्प श्लोक यहाँ बोला जा सकता है।

  4. चौकी सजाएँ

    साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र रखें (घर में शालिग्राम या लड्डू गोपाल हों तो उन्हें), साथ में घी का दीपक और जल से भरा छोटा कलश या लोटा। हर पूजा की तरह पहले एक फूल और 'ॐ गं गणपतये नमः' से गणेश जी का स्मरण करें।

  5. पद्मनाभ रूप भगवान विष्णु का पूजन

    धातु की प्रतिमा या शालिग्राम को जल, पंचामृत और फिर जल से स्नान कराएँ (चित्र हो तो फूल से जल छिड़कें), और पद्मनाभ रूप में, यानी जिनकी नाभि से कमल निकला है, भगवान विष्णु की चंदन, कमल या पीले फूलों, एक दिन पहले तोड़े तुलसी दल, धूप और दीपक से पूजा करें, साथ में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें।

  6. भोग लगाएँ

    भोग में वही रखें जो आप स्वयं फलाहार में लेंगे: फल, बिना अन्न की मिठाई, मखाने, मेवे या पंचामृत, और हर भोग पर एक तुलसी दल। एकादशी को अन्न या दाल से बना कुछ भी न चढ़ाया जाता है, न खाया जाता है।

  7. कथा और आरती

    नीचे दी गई पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और हो सके तो विष्णु सहस्रनाम या गीता का एक अध्याय भी। फिर घी के दीपक या कपूर से 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती गाएँ और पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें।

  8. भगवान के नामों का दिन

    परिवार पापांकुशा भगवान विष्णु के नामों के जप में बिताते हैं: हो सके तो 'शुक्लाम्बरधरं' श्लोक से शुरू करके विष्णु सहस्रनाम, या दिन की हर पूजा में तुलसी की माला पर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' की एक माला।

  9. दिन भर

    संकल्प के अनुसार व्रत निभाएँ, मन में भगवान का नाम रखें और दिन में सोने, क्रोध, निंदा और कटु वचन से बचें। किसी ज़रूरतमंद को जल, फल या भोजन दें; दान हर एकादशी का अंग है।

  10. अंकुश: एक संयम

    पापांकुशा पाप पर रखा अंकुश है। अपनी कोई एक आदत चुनें जिस पर संयम रखना है, जैसे महावत का अंकुश हाथी को मोड़ता है, और दिवाली तक के हफ़्तों में उसे निभाएँ; अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, तिल या दीपक का दान करें।

  11. संध्या दीप

    सूर्यास्त पर भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक और तुलसी के पास एक दीपक जलाएँ, उसके पत्ते तोड़े बिना, और फिर से आरती गाएँ।

  12. रात्रि जागरण

    रात का जितना भाग हो सके, कीर्तन, जप या पाठ में जागकर बिताएँ; आधी रात का समय जागरण का केंद्र है। जो पूरी रात न जाग सकें, वे उसका कुछ भाग जागें।

  13. द्वादशी: दान के बाद पारण

    अगली सुबह स्नान करके संक्षेप में भगवान का पूजन करें और किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या दान दें। फिर पारण के समय के भीतर व्रत खोलें: पहले पारण का श्लोक बोलकर जल के साथ तुलसी दल या कोई फल, और उसके बाद सादा सात्विक भोजन।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

पापांकुशा एकादशी पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र चित्र भी काफी है; धातु की प्रतिमा, शालिग्राम या लड्डू गोपाल को पूजा में स्नान कराया जाता है।
  • चौकी और पीला कपड़ा पीला भगवान विष्णु का रंग है; साफ लाल कपड़ा भी चलता है।
  • तुलसी दल दशमी को तोड़े हुए, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती; हर भोग पर एक रखा जाता है।
  • घी का दीपक और रुई की बत्ती एक पूजा के लिए और एक शाम को तुलसी के पास; तिल का तेल भी ले सकते हैं।
  • पीले फूल और माला गेंदा, चंपा या कोई भी ताज़े पीले फूल; मिल सके तो कमल।
  • चंदन भगवान के तिलक के लिए; हल्दी का लेप भी चलता है।
  • रोली और हल्दी तिलक और कलश पर निशान के लिए।
  • पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर; प्रतिमा के स्नान और प्रसाद के लिए।
  • गंगाजल स्नान के जल में कुछ बूँदें और पूजा स्थान की शुद्धि के लिए; न हो तो शुद्ध जल।
  • कलश या जल भरा लोटा स्नान, आचमन और संकल्प के लिए।
  • धूप और अगरबत्ती जो आप रोज़ लेते हैं।
  • कपूर, आरती की थाली और घंटी आरती के लिए; घर में शंख हो तो वह भी।
  • मौली (कलावा) भगवान के वस्त्र के रूप में चढ़ाने या कलाई पर बाँधने के लिए।
  • भगवान के लिए पीला वस्त्र ज़रूरी नहीं; मौली से भी काम चलता है।
  • मौसमी फल केला, सेब, अमरूद, अनार या जो ताज़ा मिले; भोग के बाद फलाहार में भी।
  • बिना अन्न की मिठाई मखाने की खीर, मिश्री, पेड़ा या मेवे; आटे या चावल से बनी कोई चीज़ नहीं।
  • थोड़े तिल जिन घरों में एकादशी की पूजा में चावल नहीं लिया जाता, वहाँ अक्षत की जगह चढ़ाने के लिए।
  • तुलसी की माला मंत्र के 108 जप के लिए।
  • व्रत कथा, विष्णु सहस्रनाम या गीता पुस्तक या फ़ोन; कथा पढ़ना व्रत का अंग है।
  • द्वादशी का दान पारण से पहले देने के लिए अन्न, फल, वस्त्र या दक्षिणा।
  • कमल, मिल सके तो पद्मनाभ, यानी कमलनाभ भगवान के लिए; न मिले तो पीले फूल।
  • विष्णु सहस्रनाम भगवान के नामों के उस जप के लिए जिसमें यह दिन बिताया जाता है।
  • दान के लिए अन्न, वस्त्र, तिल या दीपक अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस दिन के पारंपरिक दान।

मंत्र · अर्थ के साथ

पापांकुशा एकादशी के मंत्र और आरती

शान्ताकारं: विष्णु ध्यान श्लोक

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

Shantakaram bhujagashayanam padmanabham suresham vishvadharam gaganasadrisham meghavarnam shubhangam
Lakshmikantam kamalanayanam yogibhir dhyanagamyam vande Vishnum bhavabhayaharam sarvalokaikanatham

अर्थ: मैं विष्णु को नमन करता हूँ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, देवताओं के स्वामी, संसार के आधार, आकाश जैसे व्यापक, मेघ जैसे श्याम, शुभ अंगों वाले, लक्ष्मी के प्रिय, कमल-नयन, योगियों के ध्यान से प्राप्त, संसार का भय हरने वाले और सभी लोकों के एकमात्र स्वामी।

कब और कैसे: पूजा से पहले एक बार; यह श्लोक भगवान को 'पद्मनाभं' कहता है, ठीक वही रूप जिसके लिए पापांकुशा रखी जाती है।

एकादशी संकल्प श्लोक

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि ।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

Ekadashyam niraharah sthitvaham apare'hani
Bhokshyami pundarikaksha sharanam me bhavachyuta

अर्थ: हे कमलनयन, मैं एकादशी को निराहार रहकर अगले दिन भोजन करूँगा। हे अच्युत, आप मेरी शरण बनें।

कब और कैसे: सुबह व्रत का संकल्प लेते समय, दाहिने हाथ में जल लेकर एक बार।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (द्वादशाक्षर मंत्र)

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

Om Namo Bhagavate Vasudevaya

अर्थ: ॐ, भगवान वासुदेव को नमस्कार, यानी सब प्राणियों में बसने वाले विष्णु को। यही मंत्र भागवत पुराण में नारद जी ने बालक ध्रुव को दिया था।

कब और कैसे: एकादशी का मुख्य जप: पूजा में तुलसी की माला पर 108 बार, और दिन भर व रात्रि जागरण में जितनी बार चाहें।

शुक्लाम्बरधरं: विष्णु सहस्रनाम का आरंभिक श्लोक

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

Shuklambaradharam Vishnum shashivarnam chaturbhujam
Prasanna-vadanam dhyayet sarva-vighnopashantaye

अर्थ: श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा जैसे उज्ज्वल, चार भुजाओं वाले, प्रसन्न मुख वाले विष्णु का ध्यान करें, ताकि हर विघ्न शांत हो।

कब और कैसे: विष्णु सहस्रनाम पढ़ने या पूजा का कोई भी भाग शुरू करने से पहले एक बार।

पारण का श्लोक

अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव ।
प्रसीद सुमुखो नाथ ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥

Ajnana-timirandhasya vratenanena Keshava
Prasida sumukho natha jnana-drishti-prado bhava

अर्थ: हे केशव, अज्ञान के अंधकार से अंधे हुए मुझ पर इस व्रत से प्रसन्न हों। हे नाथ, कृपा करें और ज्ञान की दृष्टि दें।

कब और कैसे: द्वादशी को पारण के समय के भीतर, पहला घूँट जल या पहला फल लेने से पहले एक बार।

आरती विष्णु जी की आरती: ॐ जय जगदीश हरे पूरी आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.
Om jai Jagdish hare.

Jo dhyave phal pave, dukh binse man ka, swami dukh binse man ka.
Sukh sampati ghar aave, sukh sampati ghar aave, kasht mite tan ka.
Om jai Jagdish hare.

Maat pita tum mere, sharan gahoon kiski, swami sharan gahoon main kiski.
Tum bin aur na dooja, tum bin aur na dooja, aas karoon main jiski.
Om jai Jagdish hare.

Tum pooran Parmatma, tum antaryami, swami tum antaryami.
Parabrahm Parmeshwar, Parabrahm Parmeshwar, tum sab ke swami.
Om jai Jagdish hare.

Tum karuna ke sagar, tum palankarta, swami tum palankarta.
Main moorakh phalkami, main sevak tum swami, kripa karo bharta.
Om jai Jagdish hare.

Tum ho ek agochar, sabke pranpati, swami sabke pranpati.
Kis vidhi miloon dayamay, kis vidhi miloon dayamay, tumko main kumati.
Om jai Jagdish hare.

Deen-bandhu dukh-harta, thakur tum mere, swami rakshak tum mere.
Apne haath uthao, apne sharan lagao, dwar pada tere.
Om jai Jagdish hare.

Vishay-vikar mitao, paap haro deva, swami paap haro deva.
Shraddha bhakti badhao, shraddha bhakti badhao, santan ki seva.

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'स्वामी' की जगह 'प्रभु', 'क्षण में' की जगह 'छिनमें' और 'फलकामी' की जगह 'खल कामी' छपा है; उसमें आधी पंक्तियाँ दोहराई नहीं गई हैं, 'दास जनों के संकट', 'मैं सेवक तुम स्वामी' और 'अपने शरण लगाओ' नहीं हैं, और 'ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे' की जगह 'तुम ठाकुर मेरे' है। छपा पाठ

महत्व

पापांकुशा एकादशी का महत्व

यह उन लोगों की एकादशी है जो मानते हैं कि अब बहुत देर हो चुकी। इसकी कथा एक बूढ़े बहेलिये की है, जिसने शिकार और लूट से जीवन बिताया था, और जो यमदूतों के सपने से डरकर एक ऋषि के आश्रम तक चढ़ा और पूछा कि क्या कोई राह बची है। उसे लौटाया नहीं गया: एक उपवास, भगवान के स्मरण की एक रात और द्वादशी को दूसरों को भोजन, इतने से उसके जीवन का अंत बदल गया। इसलिए यह दिन कोई एक संयम चुनकर उसे निभाने का है, चाहे जीवन में कितनी भी देर हो चुकी हो।

यह दशहरे के बाद के पहले ठंडे दिनों में आती है। कुछ दिन बाद शरद पूर्णिमा आती है, जब पूरे चाँद के नीचे खीर रखी जाती है, और उसी के साथ कार्तिक शुरू होता है, भोर के स्नान और दीपों का महीना, इसलिए यह उपवास अक्सर साधना के एक पूरे महीने की पहली सीढ़ी बनता है। कथा के अंत में बहेलिया यमपुरी नहीं, विष्णुलोक जाता है।

उपाय · परंपरा

पापांकुशा एकादशी के पारंपरिक उपाय

भगवान के सहस्र नाम

दिन में एक बार विष्णु सहस्रनाम पढ़ें, या दिन भर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' जपें; भगवान के नामों का जप ही इस दिन की अपनी साधना है।

अंकुश की तरह एक संयम

कोई एक आदत चुनें, कटु वाणी, क्रोध या कोई भोग, और आज से दिवाली तक उस पर अंकुश रखें, जैसे अंकुश हाथी को मोड़ता है।

अन्न, वस्त्र, तिल या दीपक

अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस दिन का कोई एक पारंपरिक दान दें; आश्विन में मंदिर को दिया दीपक उस दीपों के मौसम की शुरुआत है जो दिवाली पर पूरा होता है।

पद्मनाभ के लिए कमल

पद्मनाभ रूप भगवान को कमल या कमलगट्टे अर्पित करें; कमल न मिले तो पीले फूल।

पारण से पहले भोजन

अंगिरा ने क्रोधन से द्वादशी को व्रत खोलने से पहले दूसरों को भोजन कराने को कहा था। अपने पारण से पहले किसी ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ।

देर कभी नहीं होती

क्रोधन जीवन भर दुख देने के बाद बुढ़ापे में ही ऋषि के पास आया, और लौटाया नहीं गया। कोई बदलाव बरसों से टल रहा हो, तो आज शुरू करें।

परंपरा, संक्षेप में

पापांकुशा एकादशी पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार हल्का सात्विक भोजन करें।
  • सुबह संकल्प लें और जैसा व्रत तय किया, वैसा ही निभाएँ।
  • हर भोग पर एक दिन पहले तोड़ा गया तुलसी दल रखें।
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें और कथा पढ़ें या सुनें।
  • शाम को भगवान विष्णु के सामने और तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
  • रात का कम से कम कुछ भाग कीर्तन या जप में जागें।
  • ज़रूरतमंद को भोजन या जल दें, और द्वादशी को पारण से पहले दान करें।
  • द्वादशी को पारण के समय के भीतर ही व्रत खोलें।
  • दिन भगवान विष्णु के नामों के जप में बिताएँ।
  • अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, तिल या दीपक का दान करें।

क्या न करें

  • एकादशी को चावल, गेहूँ, दाल या कोई भी अन्न न खाएँ।
  • एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें।
  • दशमी से द्वादशी तक प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और मदिरा से दूर रहें।
  • दिन में न सोएँ।
  • झगड़ा, झूठ और कटु वचन से बचें।
  • हरि वासर में व्रत न खोलें, और द्वादशी बीतने से पहले पारण कर लें।
  • बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं और बच्चों पर कठोर व्रत का दबाव न डालें; डायबिटीज़ या किसी और बीमारी वाले, या रोज़ दवा लेने वाले लोग व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।
  • क्रोध में भी किसी जीव को हानि न पहुँचाएँ; कथा का बहेलिया दूसरों को दुख देकर ही जीता था।

देश भर में

पापांकुशा एकादशी का भोग और प्रसाद

  • फल और दूध सबसे सरल फलाहार: दिन भर मौसमी फल, दूध, दही या छाछ।
  • साबूदाना खिचड़ी आलू और सेंधा नमक के साथ साबूदाना, अक्सर मूँगफली डालकर; कई घरों का पारंपरिक व्रत भोजन।
  • कुट्टू या सिंघाड़े की पूरी आलू की सब्ज़ी के साथ, उन परिवारों में जहाँ यह आटा व्रत में लिया जाता है।
  • समा के चावल उत्तर भारत में व्रत के चावल के रूप में बनते हैं; कुछ परंपराएँ इन्हें भी अन्न मानकर नहीं लेतीं।
  • आलू, शकरकंद और अरबी उबले हुए, या घी में सेंधा नमक, जीरा और हरी मिर्च के साथ हल्के भुने।
  • मखाने भुने हुए या खीर के रूप में, भोग और व्रत दोनों के लिए।
  • सेंधा नमक व्रत रखने वाले ज़्यादातर लोग साधारण नमक की जगह यही लेते हैं; कुछ लोग इस दिन नमक बिल्कुल नहीं लेते।
  • पारण का भोजन द्वादशी को पहले जल के साथ तुलसी दल या कोई फल, फिर घर का बना सादा भोजन; अन्न पारण के साथ फिर शुरू होता है।

आने वाले वर्षों में पापांकुशा एकादशी की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में पापांकुशा एकादशी की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षगुरुवार, 22 अक्टूबर 2026बीत गई
2027सोमवार, 11 अक्टूबर 2027आने वाली
2028शुक्रवार, 29 सितंबर 2028आने वाली

पंचांगों में पापांकुशा एकादशी की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग पापांकुशा एकादशी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: पापांकुशा एकादशी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

पापांकुशा एकादशी से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में पापांकुशा एकादशी कब है?

नई दिल्ली में पापांकुशा एकादशी सोमवार, 11 अक्टूबर 2027 को है। एकादशी तिथि सुबह 11:41 (10 अक्टूबर) से दोपहर 2:09 तक रहेगी, और व्रत उस दिन होता है जिसके सूर्योदय पर एकादशी हो। दशहरे के बाद आने वाली यह पहली एकादशी आश्विन के शुक्ल पक्ष में पड़ती है, और इसके चार दिन बाद शरद पूर्णिमा की रात चाँदनी में खीर रखी जाती है।

पापांकुशा एकादशी की तिथि क्या है?

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 10 अक्टूबर, सुबह 11:41 से 11 अक्टूबर, दोपहर 2:09 तक है, और पापांकुशा एकादशी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

पापांकुशा एकादशी का पारण कब करें?

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2027 को सुबह 6:19 से सुबह 8:38 तक। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।

दूसरे कैलेंडर में पापांकुशा एकादशी की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल पापांकुशा एकादशी कब है?

2028 में शुक्रवार, 29 सितंबर।

पापांकुशा एकादशी क्यों रखी जाती है?

पापांकुशा आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी है — नवरात्रि और दशहरे के बाद आने वाली पहली एकादशी। इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा होती है, जिनकी नाभि से कमल निकला है। नाम में पाप और अंकुश दोनों हैं — वही अंकुश जिससे महावत हाथी को मोड़ता है; इसलिए यह दिन अपने आचरण पर अंकुश का दिन माना जाता है। व्रत के साथ लोग विष्णु के नामों का जप करते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, तिल या दीप का दान करते हैं।

पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा किस ग्रंथ में है?

कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण, एकादशी माहात्म्य का वह भाग जिसमें श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को हर एकादशी की कथा सुनाते हैं (कुछ हिंदी व्रत-कथा पुस्तकें इसे पद्म पुराण से बताती हैं) में है। पूरी कथा ऊपर दी गई है।

क्या स्मार्त और वैष्णव पापांकुशा एकादशी अलग दिन है?

नहीं, इस बार दोनों सोमवार, 11 अक्टूबर 2027 को हैं। वैष्णव नियम एकादशी को अरुणोदय पर देखता है, और उस दिन अरुणोदय पर भी एकादशी है।

पापांकुशा एकादशी का पारण कब है?

पापांकुशा का व्रत द्वादशी को पूरा होता है: नई दिल्ली में पारण का समय 12 अक्टूबर, सुबह 6:19 से सुबह 8:38 तक है, जो हरि वासर बीतने (रात 8:40) के बाद शुरू होता है। जैसा अंगिरा ने क्रोधन से कहा, पहले किसी को भोजन कराएँ, फिर जल के साथ तुलसी दल से व्रत खोलें।

पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा क्या है?

विंध्य पर्वत का बहेलिया क्रोधन शिकार, राहगीरों को लूटने और दूसरों को दुख देने से जीता था। बुढ़ापे में उसे सपने में यमदूत दिखे, और डर से वह अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुँचा। ऋषि ने उसे लौटाया नहीं, बल्कि आश्विन शुक्ल एकादशी रखने को कहा: उपवास, पद्मनाभ के स्मरण में रात भर जागरण, और द्वादशी को दूसरों को भोजन। उसने ऐसा किया, और पुराण कहता है कि वह विष्णुलोक गया। पूरी कथा ऊपर है।

पापांकुशा का अर्थ क्या है?

इसमें पाप और अंकुश दोनों हैं, यानी वह मुड़ा हुआ अंकुश जिससे महावत हाथी को मोड़ता है। यह एकादशी पाप पर रखा अंकुश है: अपने आचरण को परखने और मोड़ने का दिन, जैसे कथा का बहेलिया मुड़ा।

पापांकुशा एकादशी का महत्व क्या है?

यह नवरात्रि और दशहरे के बाद की पहली एकादशी है, और इसकी कथा में अंगिरा ऋषि कहते हैं कि यह बीते कर्मों के भार को वैसे ही मोड़ देती है जैसे अंकुश हाथी को। परिवार इसे भगवान के नामों के जप और अन्न, वस्त्र, तिल या दीपक के दान के साथ रखते हैं, और बहुत से लोग इससे लिया कोई संयम दिवाली के मौसम तक ले जाते हैं।

पापांकुशा पर पूजे जाने वाले पद्मनाभ कौन हैं?

पद्मनाभ, यानी कमलनाभ, शेषनाग पर लेटे वे भगवान विष्णु हैं जिनकी नाभि से निकले कमल पर बैठकर ब्रह्मा सृष्टि रचते हैं। 'शान्ताकारं' श्लोक उन्हें 'पद्मनाभं' कहता है, और तिरुवनंतपुरम का प्रसिद्ध मंदिर उन्हीं का है।

पापांकुशा एकादशी का व्रत कैसे करें?

दशमी को एक बार भोजन करें। एकादशी को स्नान करके संकल्प लें, कमल या पीले फूल, तुलसी और दीपक से पद्मनाभ रूप भगवान विष्णु की पूजा करें, क्रोधन की कथा पढ़ें और दिन भगवान के नामों के जप में बिताएँ। अन्न, वस्त्र, तिल या दीपक का दान करें, रात का कुछ भाग जागें, और द्वादशी को किसी को भोजन कराकर पारण के समय में व्रत खोलें।

पापांकुशा एकादशी पर क्या दान करें?

इस दिन के पारंपरिक दान अन्न, वस्त्र, तिल या दीपक हैं, अपनी सामर्थ्य के अनुसार, और द्वादशी को पारण से पहले किसी ज़रूरतमंद को भोजन। आश्विन में मंदिर को दिया दीपक उस दीपों के मौसम की उपयुक्त शुरुआत है जो दिवाली पर पूरा होता है।

पापांकुशा एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?

दिन का जप तुलसी की माला पर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' है, और जो पढ़ सकें वे 'शुक्लाम्बरधरं' श्लोक से शुरू करके विष्णु सहस्रनाम पढ़ते हैं। भगवान को 'पद्मनाभं' कहने वाला 'शान्ताकारं' श्लोक पूजा खोलता है। सभी मंत्र वाले भाग में हैं।

पापांकुशा एकादशी पर क्या खाएँ?

बरसात के बाद के सुहाने मौसम में फलाहार कुछ भरपूर हो सकता है: फल, दूध, मखाने की खीर, साबूदाना, शकरकंद, और परिवार की अनुमति हो तो सिंघाड़े या कुट्टू का आटा, सेंधा नमक के साथ। बहुत से लोग इसे हल्का रखते हैं, क्योंकि आगे दिवाली की मिठाइयों के हफ़्ते हैं। पारण तक अन्न, दाल, प्याज़-लहसुन नहीं।

पापांकुशा एकादशी पर कौन सी आरती गाएँ?

सुबह की पूजा के बाद और शाम के दीपों के साथ 'ॐ जय जगदीश हरे', जो ऊपर पूरी दी गई है; नवरात्रि अभी बीती होने से बहुत से घरों में दीप पहले से सजे होते हैं, और आज रात भगवान विष्णु के लिए कुछ और दीप जलाए जाते हैं। कुछ लोग व्रत पुस्तक से एकादशी माता की आरती भी जोड़ते हैं।