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कृष्ण पक्ष · एकादशी तिथि · ज्येष्ठ (पूर्णिमांत) / वैशाख (अमांत)

अपरा एकादशी 2027 कब है?

अपरा एकादशी 2027

218 दिन बाद

मंगल, 1 जून

2027 में अपरा एकादशी मंगलवार, 1 जून को है। नई दिल्ली में पारण 2 जून को सुबह 5:23 से सुबह 8:09 तक है; एकादशी तिथि 31 मई, सुबह 10:03 से 1 जून, सुबह 9:40 तक रहेगी।

2028: शनिवार, 20 मई 2028

पारण

सुबह 5:23 – सुबह 8:09

नई दिल्ली

अपरा एकादशी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यही तिथि ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी कहलाती है — दिन वही है, केवल महीने का नाम अलग। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

अपरा एकादशी 2027: तारीख और तिथि का समय

मंगलवार, 1 जून 2027

तिथि
एकादशी, कृष्ण पक्ष
हिंदू मास
ज्येष्ठ (पूर्णिमांत) / वैशाख (अमांत)
तिथि आरंभ
31 मई, सुबह 10:03
तिथि समाप्त
1 जून, सुबह 9:40
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
1 जून, सुबह 5:23

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: अपरा एकादशी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

अपरा एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

अपरा एकादशी 2027 शुभ मुहूर्त

अपरा एकादशी, यानी अपार पुण्य वाली एकादशी, ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष में भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप के लिए रखी जाती है; इसे अचला एकादशी भी कहते हैं। नई दिल्ली में यह मंगलवार, 1 जून 2027 को है: व्रत सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है, और पारण का समय 2 जून, सुबह 5:23 से सुबह 8:09 तक है। पंजाब, हरियाणा और जम्मू में यही दिन भद्रकाली एकादशी है, और ओडिशा में जलक्रीड़ा एकादशी।

अपरा एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
पारण का समय2 जून, सुबह 5:23 से सुबह 8:09 तकद्वादशी की सुबह (दिन का पहला पाँचवाँ भाग); हरि वासर रात में ही समाप्त हो चुका है।

द्वादशी का वह समय, जिसमें अपरा एकादशी का व्रत पूरा किया जाता है। यह हरि वासर बीतने के बाद शुरू होता है और सामान्यतः सुबह के पहले भाग तक रहता है; हरि वासर देर तक चले तो पारण दोपहर के बाद होता है, और द्वादशी समाप्त होने के बाद कभी नहीं। यहाँ दिया समय नई दिल्ली के लिए गणना करके दिया गया है।

हरि वासर समाप्तिदोपहर 3:22द्वादशी के पहले चौथाई भाग का अंत; इसके भीतर व्रत नहीं खोला जाता।

हरि वासर द्वादशी का पहला चौथाई भाग है। इसमें व्रत नहीं खोला जाता, चाहे सुबह हो चुकी हो, इसलिए नई दिल्ली में इसकी समाप्ति ही पारण का सबसे पहला क्षण है।

ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:02 से सुबह 4:42 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।

एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले का समय: उठने, स्नान करने और व्रत का संकल्प लेने का पारंपरिक समय।

सूर्योदयसुबह 5:23क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक गिना जाता है, और सुबह की पूजा इसके बाद होती है।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • चर सुबह 8:51 से सुबह 10:35 तक
  • लाभ सुबह 10:35 से दोपहर 12:19 तक
  • अमृत दोपहर 12:19 से दोपहर 2:02 तक
  • शुभ दोपहर 3:46 से शाम 5:30 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। जो परिवार भोर में पूजा नहीं कर पाते, वे मुख्य पूजा के लिए इनमें से कोई समय चुनते हैं।

प्रदोष काल: संध्या दीपशाम 7:14 से रात 9:16 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)।

सूर्यास्त के बाद का समय, जब भगवान विष्णु के आगे और तुलसी के पास दीप जलाए जाते हैं और फिर से आरती होती है।

निशीथ काल: रात्रि जागरणरात 11:58 से रात 12:39 (2 जून) तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, आधी रात के आसपास।

आधी रात का समय, जागरण का केंद्र। जो रात भर जागते हैं, वे यह भाग कीर्तन और जप को देते हैं।

राहु काल (वर्जित समय)इस समय टाला जाता हैदोपहर 3:46 से शाम 5:30 तकदिन का वह आठवाँ भाग जो वार के अनुसार राहु का है: इसमें पूजा, खरीदारी या यात्रा शुरू नहीं की जाती।

नई दिल्ली में एकादशी के दिन का राहु काल। बहुत से परिवार संकल्प या मुख्य पूजा इसके भीतर शुरू नहीं करते; इससे व्रत या पारण का समय नहीं बदलता।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तसुबह 11:51 से दोपहर 12:46शुभ
अमृत कालसुबह 10:24 से दोपहर 12:01सर्वाधिक शुभ
अमृत काल (दूसरा)सुबह 5:14 से सुबह 6:48सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:02 से सुबह 4:42शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालदोपहर 3:46 से शाम 5:30
यमगण्ड कालसुबह 8:51 से सुबह 10:35
दुर्मुहूर्त (पहला)सुबह 8:09 से सुबह 9:05

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए मंगलवार, 1 जून 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पारण · नई दिल्ली

अपरा एकादशी 2027 पारण का समय

बुधवार, 2 जून 2027, सुबह 5:23 से सुबह 8:09

पारण द्वादशी को होता है, और हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग, जो इस बार 1 जून, दोपहर 3:22 पर समाप्त होता है — में व्रत नहीं खोला जाता। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।

व्रत के बारे में यहाँ दी गई बातें परंपरा का वर्णन हैं, चिकित्सा सलाह नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या दवाइयों की स्थिति में व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

कृष्ण पक्ष · ज्येष्ठ (पूर्णिमांत) · वैशाख (अमांत)

अपरा एकादशी 2027: स्मार्त और वैष्णव तारीख

उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में अपरा एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, और दक्षिण व पश्चिम भारत की अमांत गणना में वैशाख मास की। रात एक ही है — दोनों पद्धतियाँ कृष्ण पक्ष को अलग महीने के नाम से गिनती हैं।

इस पेज की तारीख (स्मार्त, सूर्योदय का नियम)
मंगलवार, 1 जून 2027 — जिस दिन के सूर्योदय पर एकादशी तिथि है, व्रत उसी दिन का माना जाता है — यही दिन एस्ट्रोसेज और यह साइट देती है।
वैष्णव (इस्कॉन), अरुणोदय का नियम
मंगलवार, 1 जून 2027 — इस बार वही दिन। वैष्णव नियम तिथि सूर्योदय पर नहीं, अरुणोदय — सूर्योदय से पहले के 96 मिनट — पर देखता है; मंगलवार, 1 जून 2027 का अरुणोदय (1 जून, रात 3:47) एकादशी में है, दशमी में नहीं।

ऊपर का हर दिन नई दिल्ली के लिए उन्हीं तिथि-क्षणों से निकाला गया है। इस्कॉन मंदिर हर शहर के लिए अपना कैलेंडर छापते हैं और कुछ वर्षों में महाद्वादशी के नियम से व्रत द्वादशी पर भी ले जाते हैं — आपके मंदिर का कैलेंडर अलग हो तो उसी का पालन करें।

महत्व और व्रत कथा

अपरा एकादशी व्रत कथा और महत्व

अन्य नाम: अचला एकादशी।

अपरा एकादशी पूर्णिमांत गणना में ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी है — अमांत गणना में वैशाख कृष्ण। अपरा का अर्थ है अपार, क्योंकि पुराण इसका पुण्य असीम बताता है। इसे अचला एकादशी भी कहते हैं; पंजाब, हरियाणा और जम्मू में यह भद्रकाली एकादशी और ओडिशा में जलक्रीड़ा एकादशी के रूप में मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के त्रिविक्रम (वामन) स्वरूप की पूजा होती है।

अपरा एकादशी की कथा

संक्षेप में, अपने शब्दों में — स्रोत: ब्रह्मांड पुराण, श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया एकादशी माहात्म्य।

महीध्वज एक धर्मात्मा और उदार राजा थे, पर उनका छोटा भाई वज्रध्वज उनसे द्वेष रखता था और सिंहासन चाहता था। एक रात उसने राजा की हत्या कर दी और शव को वन में एक पीपल के पेड़ के नीचे चुपचाप गाड़ दिया।

हिंसा से और बिना अंतिम संस्कार के मृत्यु होने के कारण महीध्वज की आत्मा आगे नहीं जा सकी। वह उसी पीपल पर प्रेत बनकर रहने लगी और नीचे के रास्ते से गुज़रने वालों को सताने लगी।

एक दिन धौम्य ऋषि उधर से निकले। अपने तप के बल से उन्होंने जान लिया कि यह प्रेत कौन है और कैसे यहाँ पहुँचा। उसे भगाने के बजाय उन्हें उस पर दया आई। उन्होंने प्रेत को पेड़ से उतारा, उपदेश दिया, और स्वयं ज्येष्ठ की अपरा एकादशी का व्रत रखकर उसका पूरा पुण्य राजा को दे दिया।

पुराण कहता है कि उस पुण्य से महीध्वज उसी क्षण मुक्त हो गए; दिव्य रूप धारण कर उन्होंने ऋषि को धन्यवाद दिया और स्वर्ग चले गए। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह व्रत बड़े से बड़े पाप को भी मिटाता है, और इसका पुण्य पवित्र तीर्थों में शुभ समय पर स्नान के बराबर है।

व्रत कैसे रखा जाता है

  • व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है। बहुत से परिवार एक दिन पहले, दशमी की शाम, एक बार सादा भोजन करते हैं।
  • एकादशी को अन्न और चावल नहीं लिए जाते। जो पूरा उपवास नहीं रख पाते वे फल, दूध या फलाहार लेते हैं; निर्जल व्रत वही रखते हैं जिनकी परंपरा और स्वास्थ्य इसकी अनुमति दें।
  • भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल, दीप और उनके नामों से होती है; उस दिन की कथा पढ़ना या सुनना व्रत का अंग है, और कई लोग रात का कुछ भाग कीर्तन या जप में जागकर बिताते हैं।
  • पारण द्वादशी को होता है, हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग — बीतने के बाद। आपके शहर का पारण समय ऊपर गणना करके दिया गया है।

उपवास के नियम यहाँ परंपरा के रूप में बताए गए हैं, चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या किसी दवा के चलते उपवास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

सभी 26 · नई दिल्ली

सभी एकादशी और उनकी अगली तारीख

साधारण वर्ष में चौबीस, और अधिक मास वाले वर्ष में दो और। हर एकादशी का अपना पेज है — कथा, पारण और स्मार्त-वैष्णव तारीख के साथ।

अगली एकादशी और उसका पारण · 2027 की सभी एकादशी — तिथि और पारण के समय के साथ

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

अपरा एकादशी पूजा विधि

  1. एक दिन पहले: दशमी

    दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार सादा भोजन करें, जिसमें प्याज़, लहसुन और चावल न हों, और शाम हल्के और शांत मन से बिताएँ। पूजा का स्थान साफ कर लें और ज़रूरत के तुलसी दल आज ही तोड़ लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।

  2. जल्दी उठें और स्नान करें

    एकादशी की सुबह जल्दी, हो सके तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें (पानी में गंगाजल की कुछ बूँदें हों तो अच्छा) और साफ कपड़े पहनें; भगवान विष्णु की पूजा में पीले वस्त्र पारंपरिक हैं।

  3. व्रत का संकल्प

    पूजा स्थान के सामने बैठकर दाहिने हाथ में थोड़ा जल और एक फूल लें और व्रत का संकल्प करें: अपना नाम लें, कहें कि आप भगवान विष्णु के लिए अपरा एकादशी का व्रत रख रहे हैं, और यह भी कि व्रत कैसा होगा, निर्जल, केवल जल पर, फलाहार पर या एक समय के फलाहारी भोजन के साथ। फिर जल धरती पर छोड़ दें। मंत्र वाले भाग का एकादशी संकल्प श्लोक यहाँ बोला जा सकता है।

  4. चौकी सजाएँ

    साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र रखें (घर में शालिग्राम या लड्डू गोपाल हों तो उन्हें), साथ में घी का दीपक और जल से भरा छोटा कलश या लोटा। हर पूजा की तरह पहले एक फूल और 'ॐ गं गणपतये नमः' से गणेश जी का स्मरण करें।

  5. त्रिविक्रम रूप भगवान विष्णु का पूजन

    धातु की प्रतिमा या शालिग्राम को जल, पंचामृत और फिर जल से स्नान कराएँ (चित्र हो तो फूल से जल छिड़कें), और भगवान विष्णु की त्रिविक्रम रूप में पूजा करें, उस वामन रूप में जिन्होंने तीन पग में तीनों लोक नाप लिए थे। चंदन, पीले फूल, एक दिन पहले तोड़े तुलसी दल, धूप और दीपक अर्पित करें, साथ में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें।

  6. भोग लगाएँ

    भोग में वही रखें जो आप स्वयं फलाहार में लेंगे: फल, बिना अन्न की मिठाई, मखाने, मेवे या पंचामृत, और हर भोग पर एक तुलसी दल। एकादशी को अन्न या दाल से बना कुछ भी न चढ़ाया जाता है, न खाया जाता है।

  7. कथा और आरती

    नीचे दी गई अपरा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और हो सके तो विष्णु सहस्रनाम या गीता का एक अध्याय भी। फिर घी के दीपक या कपूर से 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती गाएँ और पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें।

  8. दिन भर

    संकल्प के अनुसार व्रत निभाएँ, मन में भगवान का नाम रखें और दिन में सोने, क्रोध, निंदा और कटु वचन से बचें। किसी ज़रूरतमंद को जल, फल या भोजन दें; दान हर एकादशी का अंग है।

  9. संध्या दीप

    सूर्यास्त पर भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक और तुलसी के पास एक दीपक जलाएँ, उसके पत्ते तोड़े बिना, और फिर से आरती गाएँ।

  10. रात्रि जागरण

    रात का जितना भाग हो सके, कीर्तन, जप या पाठ में जागकर बिताएँ; आधी रात का समय जागरण का केंद्र है। जो पूरी रात न जाग सकें, वे उसका कुछ भाग जागें।

  11. बिना संस्कार दिवंगत हुए लोगों के लिए पुण्य

    कथा में धौम्य ऋषि ने इस व्रत का पुण्य उस राजा को दिया जिसकी मृत्यु हिंसा से और बिना अंतिम संस्कार के हुई थी। परिवार चाहे तो द्वादशी की सुबह पारण से पहले जल, एक फूल और थोड़े तिल के साथ व्रत का पुण्य किसी ऐसे स्वजन को अर्पित करें जो अचानक या घर से दूर दिवंगत हुए हों।

  12. द्वादशी: दान के बाद पारण

    अगली सुबह स्नान करके संक्षेप में भगवान का पूजन करें और किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या दान दें। फिर पारण के समय के भीतर व्रत खोलें: पहले पारण का श्लोक बोलकर जल के साथ तुलसी दल या कोई फल, और उसके बाद सादा सात्विक भोजन।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

अपरा एकादशी पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र चित्र भी काफी है; धातु की प्रतिमा, शालिग्राम या लड्डू गोपाल को पूजा में स्नान कराया जाता है।
  • चौकी और पीला कपड़ा पीला भगवान विष्णु का रंग है; साफ लाल कपड़ा भी चलता है।
  • तुलसी दल दशमी को तोड़े हुए, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती; हर भोग पर एक रखा जाता है।
  • घी का दीपक और रुई की बत्ती एक पूजा के लिए और एक शाम को तुलसी के पास; तिल का तेल भी ले सकते हैं।
  • पीले फूल और माला गेंदा, चंपा या कोई भी ताज़े पीले फूल; मिल सके तो कमल।
  • चंदन भगवान के तिलक के लिए; हल्दी का लेप भी चलता है।
  • रोली और हल्दी तिलक और कलश पर निशान के लिए।
  • पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर; प्रतिमा के स्नान और प्रसाद के लिए।
  • गंगाजल स्नान के जल में कुछ बूँदें और पूजा स्थान की शुद्धि के लिए; न हो तो शुद्ध जल।
  • कलश या जल भरा लोटा स्नान, आचमन और संकल्प के लिए।
  • धूप और अगरबत्ती जो आप रोज़ लेते हैं।
  • कपूर, आरती की थाली और घंटी आरती के लिए; घर में शंख हो तो वह भी।
  • मौली (कलावा) भगवान के वस्त्र के रूप में चढ़ाने या कलाई पर बाँधने के लिए।
  • भगवान के लिए पीला वस्त्र ज़रूरी नहीं; मौली से भी काम चलता है।
  • मौसमी फल केला, सेब, अमरूद, अनार या जो ताज़ा मिले; भोग के बाद फलाहार में भी।
  • बिना अन्न की मिठाई मखाने की खीर, मिश्री, पेड़ा या मेवे; आटे या चावल से बनी कोई चीज़ नहीं।
  • थोड़े तिल जिन घरों में एकादशी की पूजा में चावल नहीं लिया जाता, वहाँ अक्षत की जगह चढ़ाने के लिए।
  • तुलसी की माला मंत्र के 108 जप के लिए।
  • व्रत कथा, विष्णु सहस्रनाम या गीता पुस्तक या फ़ोन; कथा पढ़ना व्रत का अंग है।
  • द्वादशी का दान पारण से पहले देने के लिए अन्न, फल, वस्त्र या दक्षिणा।
  • अर्पण के लिए तिल और जल परिवार में यह परंपरा हो, तो द्वादशी को व्रत का पुण्य दिवंगतों को अर्पित करने के लिए।

मंत्र · अर्थ के साथ

अपरा एकादशी के मंत्र और आरती

शान्ताकारं: विष्णु ध्यान श्लोक

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

Shantakaram bhujagashayanam padmanabham suresham vishvadharam gaganasadrisham meghavarnam shubhangam
Lakshmikantam kamalanayanam yogibhir dhyanagamyam vande Vishnum bhavabhayaharam sarvalokaikanatham

अर्थ: मैं विष्णु को नमन करता हूँ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, देवताओं के स्वामी, संसार के आधार, आकाश जैसे व्यापक, मेघ जैसे श्याम, शुभ अंगों वाले, लक्ष्मी के प्रिय, कमल-नयन, योगियों के ध्यान से प्राप्त, संसार का भय हरने वाले और सभी लोकों के एकमात्र स्वामी।

कब और कैसे: पूजा शुरू करने से पहले हाथ जोड़कर एक बार, भगवान के उसी रूप का ध्यान करते हुए जो श्लोक बताता है।

एकादशी संकल्प श्लोक

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि ।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

Ekadashyam niraharah sthitvaham apare'hani
Bhokshyami pundarikaksha sharanam me bhavachyuta

अर्थ: हे कमलनयन, मैं एकादशी को निराहार रहकर अगले दिन भोजन करूँगा। हे अच्युत, आप मेरी शरण बनें।

कब और कैसे: सुबह व्रत का संकल्प लेते समय, दाहिने हाथ में जल लेकर एक बार।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (द्वादशाक्षर मंत्र)

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

Om Namo Bhagavate Vasudevaya

अर्थ: ॐ, भगवान वासुदेव को नमस्कार, यानी सब प्राणियों में बसने वाले विष्णु को। यही मंत्र भागवत पुराण में नारद जी ने बालक ध्रुव को दिया था।

कब और कैसे: एकादशी का मुख्य जप: पूजा में तुलसी की माला पर 108 बार, और दिन भर व रात्रि जागरण में जितनी बार चाहें।

पितरों का स्मरण श्लोक

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च ।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः ॥

Devatabhyah pitribhyash cha mahayogibhya eva cha
Namah svadhayai svahayai nityam eva namo namah

अर्थ: देवताओं, पितरों और महायोगियों को नमस्कार; स्वधा और स्वाहा को सदा, बार-बार नमस्कार। श्राद्ध में व्यापक रूप से पढ़ा जाने वाला श्लोक।

कब और कैसे: द्वादशी की सुबह जल और तिल के साथ तीन बार, व्रत का पुण्य दिवंगतों को अर्पित करने से पहले, जैसे धौम्य ऋषि ने अपना पुण्य राजा महीध्वज को दिया।

पारण का श्लोक

अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव ।
प्रसीद सुमुखो नाथ ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥

Ajnana-timirandhasya vratenanena Keshava
Prasida sumukho natha jnana-drishti-prado bhava

अर्थ: हे केशव, अज्ञान के अंधकार से अंधे हुए मुझ पर इस व्रत से प्रसन्न हों। हे नाथ, कृपा करें और ज्ञान की दृष्टि दें।

कब और कैसे: द्वादशी को पारण के समय के भीतर, पहला घूँट जल या पहला फल लेने से पहले एक बार।

आरती विष्णु जी की आरती: ॐ जय जगदीश हरे पूरी आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.
Om jai Jagdish hare.

Jo dhyave phal pave, dukh binse man ka, swami dukh binse man ka.
Sukh sampati ghar aave, sukh sampati ghar aave, kasht mite tan ka.
Om jai Jagdish hare.

Maat pita tum mere, sharan gahoon kiski, swami sharan gahoon main kiski.
Tum bin aur na dooja, tum bin aur na dooja, aas karoon main jiski.
Om jai Jagdish hare.

Tum pooran Parmatma, tum antaryami, swami tum antaryami.
Parabrahm Parmeshwar, Parabrahm Parmeshwar, tum sab ke swami.
Om jai Jagdish hare.

Tum karuna ke sagar, tum palankarta, swami tum palankarta.
Main moorakh phalkami, main sevak tum swami, kripa karo bharta.
Om jai Jagdish hare.

Tum ho ek agochar, sabke pranpati, swami sabke pranpati.
Kis vidhi miloon dayamay, kis vidhi miloon dayamay, tumko main kumati.
Om jai Jagdish hare.

Deen-bandhu dukh-harta, thakur tum mere, swami rakshak tum mere.
Apne haath uthao, apne sharan lagao, dwar pada tere.
Om jai Jagdish hare.

Vishay-vikar mitao, paap haro deva, swami paap haro deva.
Shraddha bhakti badhao, shraddha bhakti badhao, santan ki seva.

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'स्वामी' की जगह 'प्रभु', 'क्षण में' की जगह 'छिनमें' और 'फलकामी' की जगह 'खल कामी' छपा है; उसमें आधी पंक्तियाँ दोहराई नहीं गई हैं, 'दास जनों के संकट', 'मैं सेवक तुम स्वामी' और 'अपने शरण लगाओ' नहीं हैं, और 'ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे' की जगह 'तुम ठाकुर मेरे' है। छपा पाठ

महत्व

अपरा एकादशी का महत्व

इसकी कथा इसे किसी और के लिए रखा जाने वाला उपवास बनाती है, ऐसे व्यक्ति के लिए जो स्वयं कुछ नहीं कर सकता: एक ऋषि ने इसका पूरा फल एक मारे गए राजा को दे दिया, जिसकी आत्मा को शांति नहीं मिल रही थी, और राजा तुरंत मुक्त हो गया। इसलिए परिवार इसे अचानक या हिंसा से गुज़रे किसी स्वजन के लिए रखते हैं, उसके नाम से पीपल को जल देते हैं, और मृत्यु का कारण बने व्यक्ति के प्रति क्रोध छोड़ने का प्रयास करते हैं, जैसे ऋषि ने आत्मा को भगाने की जगह दया चुनी।

यह निर्जला से पंद्रह दिन पहले आती है, और बहुत से लोग इसे उस कठिन उपवास की तैयारी बनाते हैं: द्वार पर राहगीरों के लिए पानी, भोर में पीपल को जल, नदी में डुबकी या नहाने के पानी में गंगाजल की कुछ बूँदें। कुछ दिन बाद अमावस्या को वट सावित्री और शनि जयंती आती हैं। कथा श्रीकृष्ण के इस वचन पर पूरी होती है कि यह उपवास बड़े से बड़े दोष भी धो देता है, और इसका फल सबसे पवित्र तीर्थों में सबसे शुभ घड़ी के स्नान जैसा है।

उपाय · परंपरा

अपरा एकादशी के पारंपरिक उपाय

भटकती आत्माओं के लिए पुण्य

जैसे धौम्य ने राजा महीध्वज के लिए किया, परिवार चाहे तो द्वादशी को व्रत का पुण्य किसी ऐसे स्वजन को अर्पित करें जो अचानक, हिंसा से या घर से दूर दिवंगत हुए; यह उनकी शांति की प्रार्थना है।

पीपल को जल

कथा की आत्मा पीपल पर रहती थी। इस कथा की याद में पीपल को जल चढ़ाना और वहाँ दीपक जलाना इस दिन के अनुरूप है।

त्रिविक्रम का स्मरण

तीन पग में लोक नापने वाले त्रिविक्रम रूप में भगवान की पूजा करें, और पारण से पहले तीन चीज़ें दें: जल, भोजन और एक मीठा बोल।

निर्जला से पहले जल

अपरा सबसे गरम हफ़्तों में, निर्जला एकादशी से ठीक पहले आती है। मज़दूरों और राहगीरों के लिए पानी और छाछ रखें; इस दिन का पुण्य अपार माना गया है, और मई की प्यास भी।

स्नान, या गंगाजल

पुराण इस व्रत के पुण्य की तुलना पवित्र तीर्थों में शुभ समय के स्नान से करता है; जो पवित्र नदी में स्नान कर सकें वे करें, और बाकी सुबह के स्नान में गंगाजल मिलाएँ।

बुरा करने वाले पर भी दया

धौम्य ने राहगीरों को सताने वाले प्रेत पर भी क्रोध नहीं, दया की। आज किसी कटु बात का उत्तर धैर्य से दें।

परंपरा, संक्षेप में

अपरा एकादशी पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार हल्का सात्विक भोजन करें।
  • सुबह संकल्प लें और जैसा व्रत तय किया, वैसा ही निभाएँ।
  • हर भोग पर एक दिन पहले तोड़ा गया तुलसी दल रखें।
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें और कथा पढ़ें या सुनें।
  • शाम को भगवान विष्णु के सामने और तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
  • रात का कम से कम कुछ भाग कीर्तन या जप में जागें।
  • ज़रूरतमंद को भोजन या जल दें, और द्वादशी को पारण से पहले दान करें।
  • द्वादशी को पारण के समय के भीतर ही व्रत खोलें।
  • परिवार चाहे, तो व्रत का पुण्य किसी ऐसे स्वजन को अर्पित करें जो अचानक या बिना संस्कार के दिवंगत हुए।

क्या न करें

  • एकादशी को चावल, गेहूँ, दाल या कोई भी अन्न न खाएँ।
  • एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें।
  • दशमी से द्वादशी तक प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और मदिरा से दूर रहें।
  • दिन में न सोएँ।
  • झगड़ा, झूठ और कटु वचन से बचें।
  • हरि वासर में व्रत न खोलें, और द्वादशी बीतने से पहले पारण कर लें।
  • बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं और बच्चों पर कठोर व्रत का दबाव न डालें; डायबिटीज़ या किसी और बीमारी वाले, या रोज़ दवा लेने वाले लोग व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।
  • दिवंगतों के बारे में बुरा न कहें; कथा के ऋषि ने एक भटकती आत्मा पर भी करुणा की।

देश भर में

अपरा एकादशी की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

पंजाब, हरियाणा और जम्मू
यह दिन भद्रकाली एकादशी के रूप में मनाया जाता है।
ओडिशा
जलक्रीड़ा एकादशी, जब भगवान जगन्नाथ की उत्सव प्रतिमाएँ जल तक ले जाई जाती हैं।
उत्तर भारत
अपरा या अचला एकादशी, भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप के लिए, अक्सर पीपल को जल देकर।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • फल और दूध सबसे सरल फलाहार: दिन भर मौसमी फल, दूध, दही या छाछ।
  • साबूदाना खिचड़ी आलू और सेंधा नमक के साथ साबूदाना, अक्सर मूँगफली डालकर; कई घरों का पारंपरिक व्रत भोजन।
  • कुट्टू या सिंघाड़े की पूरी आलू की सब्ज़ी के साथ, उन परिवारों में जहाँ यह आटा व्रत में लिया जाता है।
  • समा के चावल उत्तर भारत में व्रत के चावल के रूप में बनते हैं; कुछ परंपराएँ इन्हें भी अन्न मानकर नहीं लेतीं।
  • आलू, शकरकंद और अरबी उबले हुए, या घी में सेंधा नमक, जीरा और हरी मिर्च के साथ हल्के भुने।
  • मखाने भुने हुए या खीर के रूप में, भोग और व्रत दोनों के लिए।
  • सेंधा नमक व्रत रखने वाले ज़्यादातर लोग साधारण नमक की जगह यही लेते हैं; कुछ लोग इस दिन नमक बिल्कुल नहीं लेते।
  • पारण का भोजन द्वादशी को पहले जल के साथ तुलसी दल या कोई फल, फिर घर का बना सादा भोजन; अन्न पारण के साथ फिर शुरू होता है।

आने वाले वर्षों में अपरा एकादशी की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में अपरा एकादशी की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षबुधवार, 13 मई 2026बीत गई
2027मंगलवार, 1 जून 2027आने वाली
2028शनिवार, 20 मई 2028आने वाली

पंचांगों में अपरा एकादशी की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग अपरा एकादशी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: अपरा एकादशी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

अपरा एकादशी से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में अपरा एकादशी कब है?

नई दिल्ली में अपरा एकादशी मंगलवार, 1 जून 2027 को है, और एकादशी तिथि सुबह 10:02 (31 मई) से सुबह 9:40 तक रहेगी। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यह ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी है (अमांत गणना में वैशाख कृष्ण), निर्जला से ठीक पहले वाली एकादशी, साल के सबसे गरम हफ़्तों में।

अपरा एकादशी की तिथि क्या है?

ज्येष्ठ (पूर्णिमांत) / वैशाख (अमांत) मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 31 मई, सुबह 10:03 से 1 जून, सुबह 9:40 तक है, और अपरा एकादशी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

अपरा एकादशी का पारण कब करें?

बुधवार, 2 जून 2027 को सुबह 5:23 से सुबह 8:09 तक। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।

दूसरे कैलेंडर में अपरा एकादशी की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल अपरा एकादशी कब है?

2028 में शनिवार, 20 मई।

अपरा एकादशी क्यों रखी जाती है?

अपरा एकादशी पूर्णिमांत गणना में ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी है — अमांत गणना में वैशाख कृष्ण। अपरा का अर्थ है अपार, क्योंकि पुराण इसका पुण्य असीम बताता है। इसे अचला एकादशी भी कहते हैं; पंजाब, हरियाणा और जम्मू में यह भद्रकाली एकादशी और ओडिशा में जलक्रीड़ा एकादशी के रूप में मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के त्रिविक्रम (वामन) स्वरूप की पूजा होती है।

अपरा एकादशी की व्रत कथा किस ग्रंथ में है?

कथा ब्रह्मांड पुराण, श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया एकादशी माहात्म्य में है। पूरी कथा ऊपर दी गई है।

क्या स्मार्त और वैष्णव अपरा एकादशी अलग दिन है?

नहीं, इस बार दोनों मंगलवार, 1 जून 2027 को हैं। वैष्णव नियम एकादशी को अरुणोदय पर देखता है, और उस दिन अरुणोदय पर भी एकादशी है।

अपरा एकादशी का पारण कितने बजे है?

पारण द्वादशी को होता है: नई दिल्ली में 2 जून, सुबह 5:23 से सुबह 8:09 तक, हरि वासर समाप्त होने (दोपहर 3:22) के बाद। गर्मी में पहले पानी पिएँ और हल्का खाएँ; जो व्रत का पुण्य दिवंगतों को अर्पित करते हैं, वे यह पारण से ठीक पहले करते हैं।

अपरा एकादशी की व्रत कथा क्या है?

राजा महीध्वज की उनके ईर्ष्यालु छोटे भाई वज्रध्वज ने हत्या कर दी और शव चुपचाप एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। हिंसा से और बिना अंतिम संस्कार के मृत्यु होने से वे आगे न जा सके और भटकती आत्मा बनकर उस पेड़ पर रहने लगे। धौम्य ऋषि ने पहचानकर उन पर दया की, उपदेश दिया, स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और उसका पूरा पुण्य उन्हें दे दिया, और राजा उसी क्षण मुक्त हो गए। पूरी कथा ऊपर है।

अपरा का अर्थ क्या है?

अपरा का अर्थ है अपार, यानी जिसकी कोई सीमा न हो, उस पुण्य के कारण जो ब्रह्मांड पुराण इस व्रत को देता है: वह कहता है कि यह सबसे पवित्र तीर्थों में सबसे शुभ समय पर स्नान के बराबर है। इसका दूसरा नाम अचला है, जिसका अर्थ है स्थिर, अडिग।

इसे अचला एकादशी भी क्यों कहते हैं?

अचला इसी दिन का दूसरा नाम है, जो उत्तर भारत के बहुत से पंचांगों और व्रत पुस्तकों में मिलता है; इसका अर्थ है स्थिर, अडिग। अपरा और अचला एक ही एकादशी हैं, ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की, एक ही कथा और एक ही विधि के साथ।

भद्रकाली एकादशी क्या है?

पंजाब, हरियाणा और जम्मू में अपरा एकादशी का दिन भद्रकाली एकादशी के रूप में मनाया जाता है। तारीख वही है; वहाँ के परिवार एकादशी व्रत के साथ इसे अपनी क्षेत्रीय परंपरा से निभाते हैं।

अपरा एकादशी का महत्व क्या है?

पुराण कहता है कि इसका पुण्य अपार है और यह बड़े से बड़े पाप को भी मिटाती है, और इसकी कथा बताती है कि बिना संस्कार दिवंगत हुए एक राजा को दिया गया पुण्य उसे शांति दे गया। इसलिए यह दिन अपनी मुक्ति के लिए भी रखा जाता है और दिवंगतों के प्रति करुणा के काम के रूप में भी।

अपरा एकादशी का व्रत कैसे करें?

दशमी को एक बार हल्का भोजन करें। एकादशी को स्नान करके संकल्प लें, तुलसी, पीले फूल और दीपक से त्रिविक्रम रूप भगवान विष्णु की पूजा करें, महीध्वज की कथा पढ़ें और व्रत रखें, निर्जल न हो तो पानी पीते रहें। पीपल को जल दें, रात का कुछ भाग जागें, और द्वादशी को दान करके, चाहें तो पुण्य अर्पित करके, पारण के समय में व्रत खोलें।

अपरा एकादशी व्रत का क्या फल है?

ब्रह्मांड पुराण अपार पुण्य और बड़े पापों से मुक्ति का वचन देता है, और ये परंपरा के शब्द हैं, जो गारंटी नहीं, श्रद्धा से माने जाते हैं। कथा का अपना उदाहरण उदार है: ऋषि ने व्रत किसी और के लिए रखा, एक ऐसे व्यक्ति के लिए जिसे वे जानते तक नहीं थे।

अपरा एकादशी पर पूजे जाने वाले त्रिविक्रम कौन हैं?

त्रिविक्रम, यानी तीन पग वाले, वामन रूप भगवान विष्णु हैं जो विराट हो गए: राजा बलि से तीन पग भूमि माँगकर उन्होंने एक पग में पृथ्वी, दूसरे में स्वर्ग नापा, और तीसरा बलि के झुके सिर पर रखा। अपरा इसी रूप के लिए रखी जाती है।

क्या अपरा व्रत का पुण्य किसी दिवंगत को दिया जा सकता है?

कथा यही दिखाती है: धौम्य ने अपने व्रत का पुण्य एक मृत राजा को देकर उसे मुक्त किया। द्वादशी की सुबह पारण से पहले जल, एक फूल और थोड़े तिल के साथ उस व्यक्ति का नाम लें और उसकी शांति की प्रार्थना के साथ पुण्य अर्पित करें। यह परिवार का अपना निर्णय है, और इसके लिए पुरोहित ज़रूरी नहीं।

गर्मी में अपरा एकादशी पर क्या खाएँ?

फलाहार हल्का और पानी से भरपूर रखें: तरबूज़, खरबूज़ा, खीरा, आम और नारियल पानी, साथ में दही, सेंधा नमक वाली छाछ और थोड़ा साबूदाना या मखाने। निर्जल व्रत न हो तो भरपूर पानी पिएँ, और अन्न, दाल, प्याज़-लहसुन पारण के लिए छोड़ दें।