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शुक्ल पक्ष · एकादशी तिथि · आषाढ़

देवशयनी एकादशी 2027 कब है?

देवशयनी एकादशी 2027

261 दिन बाद

बुध, 14 जुलाई

2027 में देवशयनी एकादशी बुधवार, 14 जुलाई को है। नई दिल्ली में पारण 15 जुलाई को सुबह 5:32 से सुबह 8:18 तक है; एकादशी तिथि 13 जुलाई, दोपहर 12:09 से 14 जुलाई, दोपहर 1:10 तक रहेगी।

2028: रविवार, 2 जुलाई 2028

पारण

सुबह 5:32 – सुबह 8:18

नई दिल्ली

देवशयनी एकादशी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

देवशयनी एकादशी 2027: तारीख और तिथि का समय

बुधवार, 14 जुलाई 2027

तिथि
एकादशी, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
आषाढ़
तिथि आरंभ
13 जुलाई, दोपहर 12:09
तिथि समाप्त
14 जुलाई, दोपहर 1:10
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
14 जुलाई, सुबह 5:32

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: देवशयनी एकादशी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

देवशयनी एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

देवशयनी एकादशी 2027 शुभ मुहूर्त

देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी है, वह दिन जब भगवान विष्णु शेषनाग पर चार महीने की निद्रा में जाते माने जाते हैं, और जिस दिन चातुर्मास शुरू होता है; महाराष्ट्र में यह आषाढ़ी एकादशी है, जब पंढरपुर की वारी विट्ठल तक पहुँचती है। नई दिल्ली में यह बुधवार, 14 जुलाई 2027 को है: व्रत सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है, पारण का समय 15 जुलाई, सुबह 5:32 से सुबह 8:18 तक है, और शाम को भगवान को शयन कराया जाता है। इसे हरिशयनी या पद्मा एकादशी भी कहते हैं।

देवशयनी एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
पारण का समय15 जुलाई, सुबह 5:32 से सुबह 8:18 तकद्वादशी की सुबह (दिन का पहला पाँचवाँ भाग); हरि वासर रात में ही समाप्त हो चुका है।

द्वादशी का वह समय, जिसमें देवशयनी एकादशी का व्रत पूरा किया जाता है। यह हरि वासर बीतने के बाद शुरू होता है और सामान्यतः सुबह के पहले भाग तक रहता है; हरि वासर देर तक चले तो पारण दोपहर के बाद होता है, और द्वादशी समाप्त होने के बाद कभी नहीं। यहाँ दिया समय नई दिल्ली के लिए गणना करके दिया गया है।

हरि वासर समाप्तिशाम 7:33द्वादशी के पहले चौथाई भाग का अंत; इसके भीतर व्रत नहीं खोला जाता।

हरि वासर द्वादशी का पहला चौथाई भाग है। इसमें व्रत नहीं खोला जाता, चाहे सुबह हो चुकी हो, इसलिए नई दिल्ली में इसकी समाप्ति ही पारण का सबसे पहला क्षण है।

ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:10 से सुबह 4:51 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।

एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले का समय: उठने, स्नान करने और व्रत का संकल्प लेने का पारंपरिक समय।

सूर्योदयसुबह 5:32क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक गिना जाता है, और सुबह की पूजा इसके बाद होती है।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • लाभ सुबह 5:32 से सुबह 7:15 तक
  • अमृत सुबह 7:15 से सुबह 8:59 तक
  • शुभ सुबह 10:43 से दोपहर 12:26 तक
  • चर दोपहर 3:54 से शाम 5:37 तक
  • लाभ शाम 5:37 से शाम 7:21 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। जो परिवार भोर में पूजा नहीं कर पाते, वे मुख्य पूजा के लिए इनमें से कोई समय चुनते हैं।

प्रदोष काल: शयनशाम 7:21 से रात 9:23 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)।

सूर्यास्त के बाद का समय, जब भगवान विष्णु के आगे दीप जलाए जाते हैं और देवशयनी पर शयन मंत्र के साथ उन्हें शय्या पर सुलाया जाता है, उनकी चार महीने की निद्रा का आरंभ।

निशीथ काल: रात्रि जागरण15 जुलाई, रात 12:06 से रात 12:47 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, आधी रात के आसपास।

आधी रात का समय, जागरण का केंद्र। जो रात भर जागते हैं, वे यह भाग कीर्तन और जप को देते हैं।

राहु काल (वर्जित समय)इस समय टाला जाता हैदोपहर 12:26 से दोपहर 2:10 तकदिन का वह आठवाँ भाग जो वार के अनुसार राहु का है: इसमें पूजा, खरीदारी या यात्रा शुरू नहीं की जाती।

नई दिल्ली में एकादशी के दिन का राहु काल। बहुत से परिवार संकल्प या मुख्य पूजा इसके भीतर शुरू नहीं करते; इससे व्रत या पारण का समय नहीं बदलता।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अमृत कालशाम 4:04 से शाम 5:47सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:10 से सुबह 4:51शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालदोपहर 12:26 से दोपहर 2:10
यमगण्ड कालसुबह 7:15 से सुबह 8:59
दुर्मुहूर्त (पहला)सुबह 11:59 से दोपहर 12:54
वर्ज्यम्सुबह 5:41 से सुबह 7:25

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए बुधवार, 14 जुलाई 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पारण · नई दिल्ली

देवशयनी एकादशी 2027 पारण का समय

गुरुवार, 15 जुलाई 2027, सुबह 5:32 से सुबह 8:18

पारण द्वादशी को होता है, और हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग, जो इस बार 14 जुलाई, शाम 7:33 पर समाप्त होता है — में व्रत नहीं खोला जाता। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।

व्रत के बारे में यहाँ दी गई बातें परंपरा का वर्णन हैं, चिकित्सा सलाह नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या दवाइयों की स्थिति में व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

शुक्ल पक्ष · आषाढ़

देवशयनी एकादशी 2027: स्मार्त और वैष्णव तारीख

इस पेज की तारीख (स्मार्त, सूर्योदय का नियम)
बुधवार, 14 जुलाई 2027 — जिस दिन के सूर्योदय पर एकादशी तिथि है, व्रत उसी दिन का माना जाता है — यही दिन एस्ट्रोसेज और यह साइट देती है।
वैष्णव (इस्कॉन), अरुणोदय का नियम
बुधवार, 14 जुलाई 2027 — इस बार वही दिन। वैष्णव नियम तिथि सूर्योदय पर नहीं, अरुणोदय — सूर्योदय से पहले के 96 मिनट — पर देखता है; बुधवार, 14 जुलाई 2027 का अरुणोदय (14 जुला, रात 3:56) एकादशी में है, दशमी में नहीं।

ऊपर का हर दिन नई दिल्ली के लिए उन्हीं तिथि-क्षणों से निकाला गया है। इस्कॉन मंदिर हर शहर के लिए अपना कैलेंडर छापते हैं और कुछ वर्षों में महाद्वादशी के नियम से व्रत द्वादशी पर भी ले जाते हैं — आपके मंदिर का कैलेंडर अलग हो तो उसी का पालन करें।

महत्व और व्रत कथा

देवशयनी एकादशी व्रत कथा और महत्व

अन्य नाम: हरिशयनी, आषाढ़ी, पद्मा एकादशी।

देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी है — वह दिन जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर चार महीने की योगनिद्रा में जाते हैं। इसी से चातुर्मास शुरू होता है, जिसमें विवाह और नए शुभ कार्य टाले जाते हैं, और जो देवउठनी एकादशी पर समाप्त होता है। महाराष्ट्र में यह आषाढ़ी एकादशी है, जब पंढरपुर की वारी विट्ठल के दर्शन को पहुँचती है; इसे हरिशयनी और पद्मा एकादशी भी कहते हैं।

देवशयनी एकादशी की कथा

संक्षेप में, अपने शब्दों में — स्रोत: भविष्योत्तर पुराण, श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया एकादशी माहात्म्य, जहाँ यह कथा पहले ब्रह्मा जी नारद को सुनाते हैं।

सतयुग में धर्मात्मा राजा मांधाता का राज्य सुखी और समृद्ध था। फिर लगातार तीन साल वर्षा नहीं हुई। फ़सलें सूख गईं, अन्न के भंडार खाली हो गए, और प्रजा महल में आकर पूछने लगी कि किस दोष से यह विपत्ति आई है।

मांधाता को अपने शासन में कोई दोष नहीं दिखा। कुछ साथियों को लेकर वे उत्तर खोजने वन में निकले और ब्रह्मा जी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुँचे।

राजा ने ऋषि को अकाल की बात बताई और उपाय पूछा। अंगिरा ने उस युग के नियमों से एक कारण बताया, पर उपाय ऐसा दिया जिसमें किसी को दंड न देना पड़े: राजा और प्रजा आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पद्मा एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से रखें।

मांधाता ने लौटकर पूरे राज्य में, हर घर में यह व्रत रखवाया। पुराण कहता है कि वर्षा हुई, खेत भर गए और प्रजा फिर सुखी हो गई। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि इसी एकादशी से भगवान विष्णु का शयन आरंभ होता है, और जो आने वाले चार महीनों में उनकी कृपा चाहता है, उसे यह व्रत रखना चाहिए।

व्रत कैसे रखा जाता है

  • व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है। बहुत से परिवार एक दिन पहले, दशमी की शाम, एक बार सादा भोजन करते हैं।
  • एकादशी को अन्न और चावल नहीं लिए जाते। जो पूरा उपवास नहीं रख पाते वे फल, दूध या फलाहार लेते हैं; निर्जल व्रत वही रखते हैं जिनकी परंपरा और स्वास्थ्य इसकी अनुमति दें।
  • भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल, दीप और उनके नामों से होती है; उस दिन की कथा पढ़ना या सुनना व्रत का अंग है, और कई लोग रात का कुछ भाग कीर्तन या जप में जागकर बिताते हैं।
  • पारण द्वादशी को होता है, हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग — बीतने के बाद। आपके शहर का पारण समय ऊपर गणना करके दिया गया है।

उपवास के नियम यहाँ परंपरा के रूप में बताए गए हैं, चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या किसी दवा के चलते उपवास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

सभी 26 · नई दिल्ली

सभी एकादशी और उनकी अगली तारीख

साधारण वर्ष में चौबीस, और अधिक मास वाले वर्ष में दो और। हर एकादशी का अपना पेज है — कथा, पारण और स्मार्त-वैष्णव तारीख के साथ।

अगली एकादशी और उसका पारण · 2027 की सभी एकादशी — तिथि और पारण के समय के साथ

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

देवशयनी एकादशी पूजा विधि

  1. एक दिन पहले: दशमी

    दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार सादा भोजन करें, जिसमें प्याज़, लहसुन और चावल न हों, और शाम हल्के और शांत मन से बिताएँ। पूजा का स्थान साफ कर लें और ज़रूरत के तुलसी दल आज ही तोड़ लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।

  2. जल्दी उठें और स्नान करें

    एकादशी की सुबह जल्दी, हो सके तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें (पानी में गंगाजल की कुछ बूँदें हों तो अच्छा) और साफ कपड़े पहनें; भगवान विष्णु की पूजा में पीले वस्त्र पारंपरिक हैं।

  3. व्रत का संकल्प

    पूजा स्थान के सामने बैठकर दाहिने हाथ में थोड़ा जल और एक फूल लें और व्रत का संकल्प करें: अपना नाम लें, कहें कि आप भगवान विष्णु के लिए देवशयनी एकादशी का व्रत रख रहे हैं, और यह भी कि व्रत कैसा होगा, निर्जल, केवल जल पर, फलाहार पर या एक समय के फलाहारी भोजन के साथ। फिर जल धरती पर छोड़ दें। मंत्र वाले भाग का एकादशी संकल्प श्लोक यहाँ बोला जा सकता है।

  4. चौकी सजाएँ

    साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र रखें (घर में शालिग्राम या लड्डू गोपाल हों तो उन्हें), साथ में घी का दीपक और जल से भरा छोटा कलश या लोटा। हर पूजा की तरह पहले एक फूल और 'ॐ गं गणपतये नमः' से गणेश जी का स्मरण करें।

  5. भगवान विष्णु का पूजन

    धातु की प्रतिमा या शालिग्राम को पहले जल, फिर पंचामृत और फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ (चित्र हो तो फूल से जल छिड़कें)। चंदन, पीले फूल, पीला वस्त्र या मौली, धूप, दीप और एक दिन पहले तोड़े गए तुलसी दल अर्पित करें, साथ में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें। बहुत से घरों में एकादशी की पूजा में चावल बिल्कुल नहीं लिया जाता; अक्षत की जगह फूल या थोड़े तिल चढ़ाए जाते हैं।

  6. भोग लगाएँ

    भोग में वही रखें जो आप स्वयं फलाहार में लेंगे: फल, बिना अन्न की मिठाई, मखाने, मेवे या पंचामृत, और हर भोग पर एक तुलसी दल। एकादशी को अन्न या दाल से बना कुछ भी न चढ़ाया जाता है, न खाया जाता है।

  7. कथा और आरती

    नीचे दी गई देवशयनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और हो सके तो विष्णु सहस्रनाम या गीता का एक अध्याय भी। फिर घी के दीपक या कपूर से 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती गाएँ और पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें।

  8. चाहें तो चातुर्मास का व्रत लें

    आज से चातुर्मास शुरू होता है। बहुत से लोग चार महीनों का कोई व्रत लेते हैं, किसी खाद्य वस्तु का त्याग, रोज़ का जप या देवउठनी तक हर दिन किसी ग्रंथ का पाठ, और कथा के बाद संकल्प में उसका नाम लेते हैं।

  9. दिन भर

    संकल्प के अनुसार व्रत निभाएँ, मन में भगवान का नाम रखें और दिन में सोने, क्रोध, निंदा और कटु वचन से बचें। किसी ज़रूरतमंद को जल, फल या भोजन दें; दान हर एकादशी का अंग है।

  10. संध्या दीप

    सूर्यास्त पर भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक और तुलसी के पास एक दीपक जलाएँ, उसके पत्ते तोड़े बिना, और फिर से आरती गाएँ।

  11. भगवान का शयन

    शाम की आरती के बाद प्रतिमा के लिए छोटी शय्या तैयार करें: साफ कपड़ा या छोटा पलंग, सफेद या पीली चादर और तकिया। भगवान विष्णु, शालिग्राम या लड्डू गोपाल को उस पर लिटाएँ, धीरे से पंखा झलें, दीपक और फूल अर्पित करें और शयन मंत्र बोलें; बहुत से लोग भजन गाकर उन्हें सुलाते हैं।

  12. रात्रि जागरण

    रात का जितना भाग हो सके, कीर्तन, जप या पाठ में जागकर बिताएँ; आधी रात का समय जागरण का केंद्र है। जो पूरी रात न जाग सकें, वे उसका कुछ भाग जागें।

  13. द्वादशी: दान के बाद पारण

    अगली सुबह स्नान करके संक्षेप में भगवान का पूजन करें और किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या दान दें। फिर पारण के समय के भीतर व्रत खोलें: पहले पारण का श्लोक बोलकर जल के साथ तुलसी दल या कोई फल, और उसके बाद सादा सात्विक भोजन।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

देवशयनी एकादशी पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र चित्र भी काफी है; धातु की प्रतिमा, शालिग्राम या लड्डू गोपाल को पूजा में स्नान कराया जाता है।
  • चौकी और पीला कपड़ा पीला भगवान विष्णु का रंग है; साफ लाल कपड़ा भी चलता है।
  • तुलसी दल दशमी को तोड़े हुए, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती; हर भोग पर एक रखा जाता है।
  • घी का दीपक और रुई की बत्ती एक पूजा के लिए और एक शाम को तुलसी के पास; तिल का तेल भी ले सकते हैं।
  • पीले फूल और माला गेंदा, चंपा या कोई भी ताज़े पीले फूल; मिल सके तो कमल।
  • चंदन भगवान के तिलक के लिए; हल्दी का लेप भी चलता है।
  • रोली और हल्दी तिलक और कलश पर निशान के लिए।
  • पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर; प्रतिमा के स्नान और प्रसाद के लिए।
  • गंगाजल स्नान के जल में कुछ बूँदें और पूजा स्थान की शुद्धि के लिए; न हो तो शुद्ध जल।
  • कलश या जल भरा लोटा स्नान, आचमन और संकल्प के लिए।
  • धूप और अगरबत्ती जो आप रोज़ लेते हैं।
  • कपूर, आरती की थाली और घंटी आरती के लिए; घर में शंख हो तो वह भी।
  • मौली (कलावा) भगवान के वस्त्र के रूप में चढ़ाने या कलाई पर बाँधने के लिए।
  • भगवान के लिए पीला वस्त्र ज़रूरी नहीं; मौली से भी काम चलता है।
  • मौसमी फल केला, सेब, अमरूद, अनार या जो ताज़ा मिले; भोग के बाद फलाहार में भी।
  • बिना अन्न की मिठाई मखाने की खीर, मिश्री, पेड़ा या मेवे; आटे या चावल से बनी कोई चीज़ नहीं।
  • थोड़े तिल जिन घरों में एकादशी की पूजा में चावल नहीं लिया जाता, वहाँ अक्षत की जगह चढ़ाने के लिए।
  • तुलसी की माला मंत्र के 108 जप के लिए।
  • व्रत कथा, विष्णु सहस्रनाम या गीता पुस्तक या फ़ोन; कथा पढ़ना व्रत का अंग है।
  • द्वादशी का दान पारण से पहले देने के लिए अन्न, फल, वस्त्र या दक्षिणा।
  • शयन के लिए छोटी शय्या साफ कपड़ा या छोटा पलंग, सफेद या पीली चादर और तकिया, जिस पर प्रतिमा को सुलाया जाता है।
  • हाथ का पंखा भगवान को लिटाते समय पंखा झलने के लिए।

मंत्र · अर्थ के साथ

देवशयनी एकादशी के मंत्र और आरती

शान्ताकारं: विष्णु ध्यान श्लोक

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

Shantakaram bhujagashayanam padmanabham suresham vishvadharam gaganasadrisham meghavarnam shubhangam
Lakshmikantam kamalanayanam yogibhir dhyanagamyam vande Vishnum bhavabhayaharam sarvalokaikanatham

अर्थ: मैं विष्णु को नमन करता हूँ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, देवताओं के स्वामी, संसार के आधार, आकाश जैसे व्यापक, मेघ जैसे श्याम, शुभ अंगों वाले, लक्ष्मी के प्रिय, कमल-नयन, योगियों के ध्यान से प्राप्त, संसार का भय हरने वाले और सभी लोकों के एकमात्र स्वामी।

कब और कैसे: पूजा शुरू करने से पहले हाथ जोड़कर एक बार, भगवान के उसी रूप का ध्यान करते हुए जो श्लोक बताता है।

एकादशी संकल्प श्लोक

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि ।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

Ekadashyam niraharah sthitvaham apare'hani
Bhokshyami pundarikaksha sharanam me bhavachyuta

अर्थ: हे कमलनयन, मैं एकादशी को निराहार रहकर अगले दिन भोजन करूँगा। हे अच्युत, आप मेरी शरण बनें।

कब और कैसे: सुबह व्रत का संकल्प लेते समय, दाहिने हाथ में जल लेकर एक बार।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (द्वादशाक्षर मंत्र)

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

Om Namo Bhagavate Vasudevaya

अर्थ: ॐ, भगवान वासुदेव को नमस्कार, यानी सब प्राणियों में बसने वाले विष्णु को। यही मंत्र भागवत पुराण में नारद जी ने बालक ध्रुव को दिया था।

कब और कैसे: एकादशी का मुख्य जप: पूजा में तुलसी की माला पर 108 बार, और दिन भर व रात्रि जागरण में जितनी बार चाहें।

शयन मंत्र: सुप्ते त्वयि जगन्नाथ

सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम् ।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम् ॥

Supte tvayi Jagannatha jagat suptam bhaved idam
Vibuddhe tvayi budhyeta jagat sarvam characharam

अर्थ: हे जगन्नाथ, आपके सोने पर यह सारा जगत सो जाता है, और आपके जागने पर सारा चर-अचर जगत जाग उठता है।

कब और कैसे: देवशयनी एकादशी की शाम भगवान विष्णु को शयन कराते समय।

राम कृष्ण हरि: वारकरी जप

राम कृष्ण हरि

Rama Krishna Hari

अर्थ: राम, कृष्ण, हरि: भगवान विष्णु के तीन नाम, जिन्हें महाराष्ट्र के वारकरी पंढरपुर में विट्ठल तक की यात्रा में साथ जपते हैं।

कब और कैसे: महाराष्ट्र में दिन भर और मंदिर जाते हुए; कीर्तन में इसे झाँझ की ताल पर दोहराया जाता है।

पारण का श्लोक

अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव ।
प्रसीद सुमुखो नाथ ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥

Ajnana-timirandhasya vratenanena Keshava
Prasida sumukho natha jnana-drishti-prado bhava

अर्थ: हे केशव, अज्ञान के अंधकार से अंधे हुए मुझ पर इस व्रत से प्रसन्न हों। हे नाथ, कृपा करें और ज्ञान की दृष्टि दें।

कब और कैसे: द्वादशी को पारण के समय के भीतर, पहला घूँट जल या पहला फल लेने से पहले एक बार।

आरती विष्णु जी की आरती: ॐ जय जगदीश हरे पूरी आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.
Om jai Jagdish hare.

Jo dhyave phal pave, dukh binse man ka, swami dukh binse man ka.
Sukh sampati ghar aave, sukh sampati ghar aave, kasht mite tan ka.
Om jai Jagdish hare.

Maat pita tum mere, sharan gahoon kiski, swami sharan gahoon main kiski.
Tum bin aur na dooja, tum bin aur na dooja, aas karoon main jiski.
Om jai Jagdish hare.

Tum pooran Parmatma, tum antaryami, swami tum antaryami.
Parabrahm Parmeshwar, Parabrahm Parmeshwar, tum sab ke swami.
Om jai Jagdish hare.

Tum karuna ke sagar, tum palankarta, swami tum palankarta.
Main moorakh phalkami, main sevak tum swami, kripa karo bharta.
Om jai Jagdish hare.

Tum ho ek agochar, sabke pranpati, swami sabke pranpati.
Kis vidhi miloon dayamay, kis vidhi miloon dayamay, tumko main kumati.
Om jai Jagdish hare.

Deen-bandhu dukh-harta, thakur tum mere, swami rakshak tum mere.
Apne haath uthao, apne sharan lagao, dwar pada tere.
Om jai Jagdish hare.

Vishay-vikar mitao, paap haro deva, swami paap haro deva.
Shraddha bhakti badhao, shraddha bhakti badhao, santan ki seva.

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'स्वामी' की जगह 'प्रभु', 'क्षण में' की जगह 'छिनमें' और 'फलकामी' की जगह 'खल कामी' छपा है; उसमें आधी पंक्तियाँ दोहराई नहीं गई हैं, 'दास जनों के संकट', 'मैं सेवक तुम स्वामी' और 'अपने शरण लगाओ' नहीं हैं, और 'ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे' की जगह 'तुम ठाकुर मेरे' है। छपा पाठ

महत्व

देवशयनी एकादशी का महत्व

यह दिन एक संकल्प माँगता है। आज शाम से कार्तिक में भगवान के जगाए जाने तक बहुत से लोग किसी एक खाद्य का त्याग करते हैं, रोज़ जप करते हैं या हर दिन किसी ग्रंथ का पाठ, और कथा के बाद संकल्प में उसका नाम लेते हैं। संध्या की विधि भव्य नहीं, कोमल है: प्रतिमा के लिए छोटी शय्या, दीप, पंखा और लोरी जैसा भजन। कुछ दिन बाद गुरु पूर्णिमा आती है, और कथा श्रीकृष्ण के इस वचन पर पूरी होती है कि आने वाले चार महीनों में जिसे उनकी कृपा चाहिए, वह यह उपवास रखे।

महाराष्ट्र में यह आषाढ़ी एकादशी है, वारकरी वर्ष का सबसे बड़ा दिन, जब पंढरपुर की वारी के तीर्थयात्री हफ़्तों पैदल चलकर विट्ठल तक पहुँचते हैं। भविष्योत्तर पुराण की इसकी कथा राजा मांधाता के राज्य की है, जो तीन साल के अकाल से तब बचा जब हर घर ने यह एकादशी रखी। यह जून के अंत से जुलाई के अंत के बीच, लगभग हमेशा जुलाई में, आती है।

उपाय · परंपरा

देवशयनी एकादशी के पारंपरिक उपाय

भगवान का शयन प्रेम से

शयन की तैयारी अपने हाथों से करें, साफ शय्या, नई चादर, दीपक और भजन; भगवान के विश्राम की यह देखभाल ही इस दिन का मर्म है।

चातुर्मास का व्रत

चार महीनों का कोई छोटा व्रत लें, किसी खाद्य का त्याग, रोज़ का जप या हर दिन एक अध्याय का पाठ, और उसे देवउठनी तक निभाएँ; परंपरा टूटे बड़े व्रत से अधिक निभाए गए छोटे व्रत को महत्व देती है।

वर्षा का स्मरण

मांधाता का राज्य इसी व्रत से अकाल से बचा था। इस मौसम के दान के रूप में एक पेड़ लगाएँ, कोई जलाशय साफ करें या वर्षा जल संचयन में मदद करें।

विट्ठल का नाम

महाराष्ट्र में दिन भर 'राम कृष्ण हरि' जपें, किसी विट्ठल मंदिर जाएँ, या वारी के रास्ते पर कुछ दूर तीर्थयात्रियों के साथ चलें।

तीर्थयात्रियों को भोजन

वारी के रास्ते के परिवार वारकरियों को भोजन, पानी और विश्राम देते हैं; कहीं भी, इस दिन किसी तीर्थयात्री या यात्री को भोजन कराना उसी भाव में है।

चातुर्मास भर दीपक

बहुत से लोग देवशयनी से देवउठनी तक चातुर्मास की हर शाम भगवान विष्णु के आगे दीपक जलाते हैं, सोए हुए प्रभु की एक शांत रखवाली की तरह।

परंपरा, संक्षेप में

देवशयनी एकादशी पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार हल्का सात्विक भोजन करें।
  • सुबह संकल्प लें और जैसा व्रत तय किया, वैसा ही निभाएँ।
  • हर भोग पर एक दिन पहले तोड़ा गया तुलसी दल रखें।
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें और कथा पढ़ें या सुनें।
  • शाम को भगवान विष्णु के सामने और तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
  • रात का कम से कम कुछ भाग कीर्तन या जप में जागें।
  • ज़रूरतमंद को भोजन या जल दें, और द्वादशी को पारण से पहले दान करें।
  • द्वादशी को पारण के समय के भीतर ही व्रत खोलें।
  • शाम को शयन मंत्र के साथ भगवान को सुलाएँ।
  • चाहें तो चातुर्मास का व्रत लें, और देवउठनी तक निभाएँ।

क्या न करें

  • एकादशी को चावल, गेहूँ, दाल या कोई भी अन्न न खाएँ।
  • एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें।
  • दशमी से द्वादशी तक प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और मदिरा से दूर रहें।
  • दिन में न सोएँ।
  • झगड़ा, झूठ और कटु वचन से बचें।
  • हरि वासर में व्रत न खोलें, और द्वादशी बीतने से पहले पारण कर लें।
  • बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं और बच्चों पर कठोर व्रत का दबाव न डालें; डायबिटीज़ या किसी और बीमारी वाले, या रोज़ दवा लेने वाले लोग व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।
  • चातुर्मास की परंपरा के अनुसार आज से शुरू होने वाले चार महीनों में विवाह, गृह प्रवेश या मुंडन तय न करें।

देश भर में

देवशयनी एकादशी की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

महाराष्ट्र (पंढरपुर)
आषाढ़ी एकादशी: संतों की पालकियों के साथ वारकरी हफ़्तों पैदल चलकर पंढरपुर पहुँचते हैं, लाखों लोग विट्ठल-रुक्मिणी के दर्शन करते हैं, और मंदिर में राज्य की ओर से शासकीय महापूजा होती है।
उत्तर भारत
देवशयनी या हरिशयनी एकादशी: शाम को भगवान विष्णु को छोटी शय्या पर सुलाया जाता है, और चातुर्मास के व्रत शुरू होते हैं।
वैष्णव समुदाय
भोजन और साधना के चातुर्मास व्रत शुरू होते हैं, जो कार्तिक की देवउठनी तक निभाए जाते हैं।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • फल और दूध सबसे सरल फलाहार: दिन भर मौसमी फल, दूध, दही या छाछ।
  • साबूदाना खिचड़ी आलू और सेंधा नमक के साथ साबूदाना, अक्सर मूँगफली डालकर; कई घरों का पारंपरिक व्रत भोजन।
  • कुट्टू या सिंघाड़े की पूरी आलू की सब्ज़ी के साथ, उन परिवारों में जहाँ यह आटा व्रत में लिया जाता है।
  • समा के चावल उत्तर भारत में व्रत के चावल के रूप में बनते हैं; कुछ परंपराएँ इन्हें भी अन्न मानकर नहीं लेतीं।
  • आलू, शकरकंद और अरबी उबले हुए, या घी में सेंधा नमक, जीरा और हरी मिर्च के साथ हल्के भुने।
  • मखाने भुने हुए या खीर के रूप में, भोग और व्रत दोनों के लिए।
  • सेंधा नमक व्रत रखने वाले ज़्यादातर लोग साधारण नमक की जगह यही लेते हैं; कुछ लोग इस दिन नमक बिल्कुल नहीं लेते।
  • पारण का भोजन द्वादशी को पहले जल के साथ तुलसी दल या कोई फल, फिर घर का बना सादा भोजन; अन्न पारण के साथ फिर शुरू होता है।

आने वाले वर्षों में देवशयनी एकादशी की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में देवशयनी एकादशी की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षशनिवार, 25 जुलाई 2026बीत गई
2027बुधवार, 14 जुलाई 2027आने वाली
2028रविवार, 2 जुलाई 2028आने वाली

पंचांगों में देवशयनी एकादशी की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग देवशयनी एकादशी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: देवशयनी एकादशी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

देवशयनी एकादशी से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में देवशयनी एकादशी कब है?

नई दिल्ली में देवशयनी एकादशी बुधवार, 14 जुलाई 2027 को है, और एकादशी तिथि दोपहर 12:09 (13 जुलाई) से दोपहर 1:10 तक रहेगी। यह आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जो हर पंचांग में एक ही है, और जून के अंत से जुलाई के अंत के बीच, लगभग हर साल जुलाई में, आती है।

देवशयनी एकादशी की तिथि क्या है?

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 13 जुलाई, दोपहर 12:09 से 14 जुलाई, दोपहर 1:10 तक है, और देवशयनी एकादशी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

देवशयनी एकादशी का पारण कब करें?

गुरुवार, 15 जुलाई 2027 को सुबह 5:32 से सुबह 8:18 तक। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।

दूसरे कैलेंडर में देवशयनी एकादशी की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल देवशयनी एकादशी कब है?

2028 में रविवार, 2 जुलाई।

देवशयनी एकादशी क्यों रखी जाती है?

देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी है — वह दिन जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर चार महीने की योगनिद्रा में जाते हैं। इसी से चातुर्मास शुरू होता है, जिसमें विवाह और नए शुभ कार्य टाले जाते हैं, और जो देवउठनी एकादशी पर समाप्त होता है। महाराष्ट्र में यह आषाढ़ी एकादशी है, जब पंढरपुर की वारी विट्ठल के दर्शन को पहुँचती है; इसे हरिशयनी और पद्मा एकादशी भी कहते हैं।

देवशयनी एकादशी की व्रत कथा किस ग्रंथ में है?

कथा भविष्योत्तर पुराण, श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया एकादशी माहात्म्य, जहाँ यह कथा पहले ब्रह्मा जी नारद को सुनाते हैं में है। पूरी कथा ऊपर दी गई है।

क्या स्मार्त और वैष्णव देवशयनी एकादशी अलग दिन है?

नहीं, इस बार दोनों बुधवार, 14 जुलाई 2027 को हैं। वैष्णव नियम एकादशी को अरुणोदय पर देखता है, और उस दिन अरुणोदय पर भी एकादशी है।

क्या आषाढ़ी एकादशी और देवशयनी एकादशी एक ही हैं?

हाँ। आषाढ़ी एकादशी इसी दिन, आषाढ़ शुक्ल एकादशी, का महाराष्ट्र वाला नाम है, इसलिए नई दिल्ली में यह भी बुधवार, 14 जुलाई 2027 को है। इस दिन पंढरपुर की वारी विट्ठल तक पहुँचती है, जबकि उत्तर भारत इसे देवशयनी के रूप में, भगवान विष्णु के सोने के दिन के रूप में, मनाता है।

देवशयनी एकादशी का पारण कब है?

पारण द्वादशी को होता है: नई दिल्ली में 15 जुलाई, सुबह 5:32 से सुबह 8:18 तक, हरि वासर समाप्त होने (शाम 7:33) के बाद। जो चातुर्मास का व्रत लेते हैं, वे अक्सर इसी पारण से उसे निभाना शुरू करते हैं।

देवशयनी एकादशी की व्रत कथा क्या है?

सतयुग में राजा मांधाता के राज्य में तीन साल वर्षा नहीं हुई। अपने शासन में कोई दोष न पाकर वे वन में अंगिरा ऋषि के पास पहुँचे, जिन्होंने ऐसा उपाय बताया जिसमें किसी को दंड न देना पड़े: राजा और हर घर आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पद्मा एकादशी रखे। मांधाता ने पूरे राज्य में यह व्रत रखवाया, और पुराण कहता है कि वर्षा हुई और खेत फिर भर गए। पूरी कथा ऊपर है।

देवशयनी एकादशी पर क्या होता है?

परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर लेटकर चार महीने की योगनिद्रा में जाते हैं; देवशयनी का अर्थ ही है देव का शयन। परिवार व्रत रखते हैं, भगवान की पूजा करते हैं, शाम को उनकी प्रतिमा को छोटी शय्या पर सुलाते हैं, और चातुर्मास शुरू करते हैं, जो देवउठनी एकादशी पर उनके जागने तक चलता है।

चातुर्मास कब से कब तक है?

चातुर्मास इसी दिन, देवशयनी एकादशी से शुरू होता है और लगभग चार चंद्र मास बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर समाप्त होता है; कुछ परंपराएँ इसे द्वादशी या आषाढ़ पूर्णिमा से गिनती हैं। चातुर्मास का पेज नई दिल्ली के लिए दोनों तारीखें देता है।

चातुर्मास के नियम क्या हैं?

देवउठनी तक विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और दूसरे नए शुभ कार्य टाले जाते हैं। बहुत से लोग चार महीनों का कोई व्रत रखते हैं, और पद्म पुराण में बताया गया आहार-नियम श्रावण में हरी पत्तेदार सब्ज़ी (शाक), भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में दालें (द्विदल) छोड़ने को कहता है। एक समय भोजन, रोज़ का जप या पाठ जैसे सरल व्रत भी उतने ही आम हैं।

पंढरपुर में आषाढ़ी एकादशी क्यों मनाई जाती है?

पंढरपुर विट्ठल का धाम है, यानी वह श्रीकृष्ण जिन्हें वारकरी ईंट पर कमर पर हाथ रखे खड़े रूप में पूजते हैं। सदियों से वारकरी ज्ञानेश्वर और तुकाराम जैसे संतों की पालकियाँ लेकर वारी में पैदल उन तक जाते हैं, ताकि अपने साल के सबसे बड़े दिन, आषाढ़ी एकादशी, पर पहुँचें।

इसे पद्मा या हरिशयनी एकादशी क्यों कहते हैं?

पद्मा एकादशी वह नाम है जो इसकी कथा लेती है: अंगिरा ऋषि राजा मांधाता से आषाढ़ की पद्मा एकादशी रखने को कहते हैं। हरिशयनी का अर्थ है हरि का शयन, देवशयनी जैसा ही भाव। आषाढ़ी महाराष्ट्र का नाम है। चारों एक ही दिन हैं।

देवशयनी पर घर में शयन पूजा कैसे करें?

सुबह की पूजा और दिन के व्रत के बाद शाम को छोटी शय्या तैयार करें: साफ कपड़ा या छोटा पलंग, सफेद या पीली चादर और तकिया। भगवान विष्णु की प्रतिमा, शालिग्राम या लड्डू गोपाल को उस पर लिटाएँ, धीरे से पंखा झलें, फूल और दीपक अर्पित करें, शयन मंत्र बोलें और भजन गाएँ। देवउठनी पर उन्हें इसी तरह जगाया जाता है।

देवशयनी एकादशी पर कौन सा मंत्र बोलें?

भगवान को सुलाते समय शयन मंत्र 'सुप्ते त्वयि जगन्नाथ' बोला जाता है: आपके सोने पर जगत सोता है, आपके जागने पर जागता है। साथ में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय', शेषनाग पर विश्राम करते भगवान का ध्यान कराने वाला 'शान्ताकारं' श्लोक, और महाराष्ट्र में 'राम कृष्ण हरि'। सभी मंत्र वाले भाग में हैं।

देवशयनी एकादशी का महत्व क्या है?

यह चातुर्मास के चार पवित्र महीनों और भगवान विष्णु की निद्रा का आरंभ है, और श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि जो उन महीनों में भगवान की कृपा चाहता है, उसे यह व्रत रखना चाहिए। महाराष्ट्र में यह वारकरी वर्ष का सबसे बड़ा दिन है, और इसकी कथा इसे वर्षा के आगमन से जोड़ती है।

देवशयनी और आषाढ़ी एकादशी पर कौन सी आरती गाएँ?

सुबह की पूजा के बाद और शाम को शयन से पहले 'ॐ जय जगदीश हरे', जो ऊपर पूरी दी गई है। महाराष्ट्र में घरों में और पंढरपुर में विट्ठल की आरती 'युगे अठ्ठावीस' गाई जाती है, और वारकरी संतों के अभंग गाते हैं।

देवशयनी के व्रत में और चातुर्मास भर क्या खाएँ?

उस दिन बिना अन्न का फलाहार: फल, दूध, मखाने, साबूदाना, आलू, और परंपरा हो तो कुट्टू या राजगिरा। चातुर्मास भर बहुत से लोग भोजन सादा और सात्विक रखते हैं, और कुछ लोग चार महीनों में बारी-बारी से हरी पत्तेदार सब्ज़ी, दही, दूध और दालें छोड़ने का नियम निभाते हैं।