गणेश मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
Om Gam Ganapataye Namah
अर्थ: ॐ, गं: गणों के स्वामी गणपति को नमस्कार। 'गं' गणेश जी का बीज अक्षर है।
कब और कैसे: पूजा की शुरुआत में, गणेश जी को दूर्वा और लड्डू अर्पित करते हुए 11 या 21 बार।
कृष्ण पक्ष · अमावस्या तिथि · कार्तिक (पूर्णिमांत) / आश्विन (अमांत)
रवि, 8 नवंबर
2026 में दिवाली रविवार, 8 नवंबर को है। नई दिल्ली में लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:54 से शाम 7:50 तक (वृषभ काल) है।
2027: शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027
लक्ष्मी पूजा (वृषभ काल)
शाम 5:54 – शाम 7:50
दिवाली कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि है। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यही तिथि कार्तिक कृष्ण अमावस्या कहलाती है — दिन वही है, केवल महीने का नाम अलग। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।
धनतेरस से भाई दूज तक · नई दिल्ली
प्रदोष काल में स्थिर वृषभ लग्न, जब तक अमावस्या चल रही हो — हर शहर के अपने सूर्यास्त और लग्न से गणना। पूर्व से पश्चिम भारत तक यह समय आधे घंटे से ज़्यादा खिसकता है, इसलिए अपने शहर की पंक्ति देखें।
| शहर | लक्ष्मी पूजा मुहूर्त |
|---|---|
| नई दिल्ली | शाम 5:54–7:50 |
| मुंबई | शाम 6:27–रात 8:27 |
| बेंगलुरु | शाम 6:18–रात 8:20 |
| कोलकाता | शाम 5:20–7:19 |
| चेन्नई | शाम 6:07–रात 8:09 |
| हैदराबाद | शाम 6:08–रात 8:08 |
| पुणे | शाम 6:24–रात 8:25 |
| अहमदाबाद | शाम 6:22–रात 8:21 |
| जयपुर | शाम 6:03–रात 8:00 |
| लखनऊ | शाम 5:43–7:39 |
| पटना | शाम 5:28–7:25 |
| इंदौर | शाम 6:10–रात 8:08 |
| भोपाल | शाम 6:03–रात 8:01 |
| चंडीगढ़ | शाम 5:52–7:47 |
| सूरत | शाम 6:24–रात 8:23 |
| नागपुर | शाम 5:59–7:58 |
| वाराणसी | शाम 5:37–7:34 |
| कानपुर | शाम 5:46–7:42 |
| नोएडा | शाम 5:54–7:49 |
| गुरुग्राम | शाम 5:55–7:51 |

स्वर्ण से पूछें
क्या यह मुहूर्त मेरी कुंडली के लिए शुभ है? स्वर्ण से मुफ़्त पूछें
रविवार, 8 नवंबर 2026
ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: दिवाली का निर्णय सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके प्रदोष काल पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।
दिवाली कार्तिक अमावस्या की रात है, जब घर-घर दीये जलते हैं और परिवार गणेश जी के साथ माँ लक्ष्मी की पूजा करते हैं, ताकि पूरा साल सुख-समृद्धि से भरा रहे। नई दिल्ली में दिवाली रविवार, 8 नवंबर 2026 को है, और घर की लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:54 से शाम 7:50 तक है: प्रदोष काल, जब स्थिर लग्न वृषभ उदित हो। दुकान और ऑफिस में पूजा अक्सर दोपहर के कुंभ लग्न (दोपहर 1:27 से दोपहर 2:54 तक) में होती है, और आधी रात की साधना सिंह लग्न (9 नवंबर, रात 12:25 से रात 2:42 तक) में।
| मुहूर्त | नई दिल्ली में समय | किसके लिए |
|---|---|---|
| लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (घर के लिए) | शाम 5:54 से शाम 7:50 तकप्रदोष काल में स्थिर वृषभ लग्न, जब तक अमावस्या रहे। | परिवार की पूजा का मुख्य समय: सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल, जब वृषभ लग्न उदित हो और अमावस्या चल रही हो। वृषभ स्थिर लग्न है, और परंपरा स्थिर लग्न को इसलिए चुनती है कि घर आई लक्ष्मी वहीं टिकें। गणेश पूजा मुहूर्त शुरू होने से थोड़ा पहले आरंभ करें, ताकि लक्ष्मी पूजा ठीक इसी समय में हो। |
| प्रदोष काल | शाम 5:31 से रात 8:08 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)। | सूर्यास्त के बाद रात के पहले तीन मुहूर्त, लगभग ढाई घंटे: वह समय जब दिवाली के दीये जलते हैं और पूजा होती है। वृषभ वाला समय छोटा हो या छूट जाए, तो अमावस्या रहते प्रदोष का कोई भी भाग अगला मान्य विकल्प है। जिस साल वृषभ लग्न अमावस्या के बाहर पड़े, उस साल पूजा प्रदोष काल में ही होती है, जब तक अमावस्या चल रही हो। |
| वृषभ काल (स्थिर लग्न) | शाम 5:54 से शाम 7:50 तकशाम को उदित स्थिर (वृषभ) लग्न। | शाम को वृषभ लग्न के उदय का पूरा समय। इसका कुछ भाग प्रदोष के बाद तक चलता है, इसलिए देर से पूजा शुरू करने वाले परिवार और दुकान बंद करके पूजा करने वाले व्यापारी इसका बाकी भाग लेते हैं। |
| कुंभ लग्न (दुकान और ऑफिस के लिए) | दोपहर 1:27 से दोपहर 2:54 तकदोपहर में उदित स्थिर कुंभ लग्न — दुकान या ऑफ़िस की पूजा के लिए। | दिवाली की दोपहर उदित होने वाला स्थिर लग्न। जो दुकानें, दफ़्तर और कारखाने घर जाने से पहले कार्यस्थल पर लक्ष्मी पूजा करते हैं, वे इसे चुनते हैं; शाम को घर पर न रह पाने वाले भी। |
| दिवाली चौघड़िया मुहूर्त |
| दिवाली की दोपहर से अगली सुबह तक के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। गुजराती और मारवाड़ी व्यापारी परिवार चोपड़ा (बही-खाता) पूजन के लिए परंपरा से लाभ या अमृत चौघड़िया चुनते हैं, और लग्न का समय अनुकूल न हो तो कई घर चौघड़िया देखकर पूजा करते हैं। |
| महानिशीथ काल | रात 11:38 से रात 12:31 (9 नवंबर) तकअमावस्या की रात का निशीथ काल। | अमावस्या की आधी रात का समय। यह मंत्र साधना, तांत्रिक परंपरा की लक्ष्मी और काली उपासना और बंगाल की काली पूजा का समय है। घर की लक्ष्मी पूजा शाम की पूजा है, उसके लिए इसकी प्रतीक्षा ज़रूरी नहीं। |
| सिंह लग्न | 9 नवंबर, रात 12:25 से रात 2:42 तकआधी रात के आसपास उदित स्थिर सिंह लग्न — महानिशीथ पूजा के लिए। | आधी रात के आसपास और उसके बाद उदित होने वाला स्थिर लग्न। आधी रात को लक्ष्मी पूजा करने वाले, रात भर जागरण करने वाले और मंत्र साधक इसे चुनते हैं, क्योंकि सिंह भी वृषभ की तरह स्थिर लग्न है। |
| सूर्यास्त | शाम 5:31सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज से ओझल होने का समय। | दीये गोधूलि बेला में जलाए जाते हैं। प्रदोष काल और लक्ष्मी पूजा मुहूर्त, दोनों की गिनती नई दिल्ली के सूर्यास्त से होती है। |
| मुहूर्त | नई दिल्ली में समय | प्रकृति |
|---|---|---|
| अभिजित मुहूर्त | सुबह 11:42 से दोपहर 12:26 | शुभ |
| अमृत काल | रात 10:02 से रात 11:44 | सर्वाधिक शुभ |
| ब्रह्म मुहूर्त | सुबह 4:53 से सुबह 5:45 | शुभ |
मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।
| अवधि | नई दिल्ली में समय |
|---|---|
| राहु काल | शाम 4:09 से शाम 5:31 |
| यमगण्ड काल | दोपहर 12:04 से दोपहर 1:26 |
| दुर्मुहूर्त (पहला) | शाम 4:04 से शाम 4:47 |
| वर्ज्यम् | सुबह 11:50 से दोपहर 1:32 |
ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए रविवार, 8 नवंबर 2026 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।
घर की सफाई पूरी करें, खासकर पूजा स्थान और मुख्य द्वार की। दरवाज़े पर आम या अशोक के पत्तों और गेंदे का तोरण बाँधें, द्वार पर रंगोली बनाएँ और भीतर की ओर आते लक्ष्मी जी के छोटे-छोटे पदचिह्न बनाएँ। सूर्यास्त से पहले स्नान करके साफ या नए कपड़े पहनें।
कमरे के उत्तर-पूर्व (ईशान) या उत्तर भाग में लकड़ी की चौकी रखें, ताकि पूजा करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर की ओर रहे, और उस पर लाल कपड़ा बिछाएँ। बीच में कमल पर विराजी लक्ष्मी जी और उनकी दाहिनी ओर, यानी आपकी बाईं ओर, गणेश जी को रखें। चौकी के एक कोने पर चावल की ढेरी पर जल भरा कलश रखें, उसमें आम के पत्ते और ऊपर मौली बँधा नारियल। पास में कुबेर जी, नए बही-खाते, कलम और तिजोरी या पैसों का डिब्बा रखें।
मुहूर्त शुरू होते ही लक्ष्मी जी के सामने घी का बड़ा दीपक जलाएँ, जो रात भर जलेगा (अखंड दीप), और पास में तेल का एक दीपक। धूप-अगरबत्ती जलाएँ।
तीन बार आचमन करें और गंगाजल छिड़ककर स्वयं को, आसन को और सामग्री को पवित्र करें। दाहिने हाथ में जल, अक्षत, फूल और एक सिक्का लेकर अपना नाम, गोत्र और स्थान बोलें और संकल्प करें कि आप कार्तिक अमावस्या पर महालक्ष्मी पूजन कर रहे हैं, फिर जल धरती पर छोड़ दें।
'ॐ गं गणपतये नमः' बोलकर गणेश जी का आवाहन करें। जल, रोली का तिलक, अक्षत, दूर्वा, फूल, जनेऊ और लड्डू या मोदक अर्पित करें। गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएँ।
कलश के जल में वरुण देव का ध्यान करके रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएँ। जो परिवार नवग्रह के लिए चावल की नौ ढेरियाँ बनाते हैं, वे यहीं उनकी संक्षिप्त पूजा करें।
हाथ जोड़कर लक्ष्मी जी को चौकी पर पधारने का निवेदन करें, आसन दें और चरण, हाथ व आचमन के लिए जल अर्पित करें। धातु की मूर्ति हो तो पहले जल, फिर पंचामृत और फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर पोंछें; मिट्टी की मूर्ति या चित्र हो तो फूल से जल के छींटे दें।
लाल चुनरी या वस्त्र, चंदन, कुमकुम, सिंदूर, अक्षत, इत्र और सुहाग की सामग्री (चूड़ी, बिंदी) अर्पित करें। कमल, लाल गुलाब और गेंदे के फूल और माला चढ़ाएँ।
सिक्के, गहने, कुछ नोट, तिजोरी और नए बही-खाते लक्ष्मी जी के सामने रखकर रोली-अक्षत से पूजें। बही के पहले पन्ने पर रोली से स्वस्तिक बनाएँ और दोनों ओर 'शुभ' और 'लाभ' लिखें। तिजोरी के सामने कुबेर मंत्र बोलें और कलम-दवात को सरस्वती मानकर पूजें।
धूप और दीप दिखाएँ। खील-बताशे, मिठाई, खीर, मौसमी फल (गन्ना, सिंघाड़ा, अनार) और सुपारी, लौंग, इलायची वाला पान अर्पित करें, फिर आचमन के लिए जल दें।
'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' की एक माला (108 बार) या लक्ष्मी गायत्री का जप करें। आता हो तो श्रीसूक्त या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें और लक्ष्मी जी की कथा पढ़ें।
दीयों की थाली को रोली-अक्षत से पूजें, फिर दीये पूरे घर में रखें: मुख्य द्वार, हर कमरा, रसोई, पानी का नल या कुआँ, तुलसी और बालकनी या छत। अखंड दीप लक्ष्मी जी के सामने ही रहे।
पहले गणेश जी की आरती और फिर 'ॐ जय लक्ष्मी माता' कपूर या घी के दीपक से गाएँ, घंटी या शंख बजाएँ। हाथ जोड़कर पुष्पांजलि दें, अपनी जगह पर तीन बार घूमकर परिक्रमा करें और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें।
प्रसाद बाँटें और बड़ों के पैर छुएँ। चौकी रात भर वैसे ही रहने दें और अखंड दीप सुरक्षित जलने दें; अगली सुबह छोटी-सी पूजा करके चौकी समेटें।
ॐ गं गणपतये नमः
Om Gam Ganapataye Namah
अर्थ: ॐ, गं: गणों के स्वामी गणपति को नमस्कार। 'गं' गणेश जी का बीज अक्षर है।
कब और कैसे: पूजा की शुरुआत में, गणेश जी को दूर्वा और लड्डू अर्पित करते हुए 11 या 21 बार।
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
Om Shreem Mahalakshmyai Namah
अर्थ: ॐ, श्रीं: महालक्ष्मी को नमस्कार। 'श्रीं' लक्ष्मी जी का बीज अक्षर है; 'श्री' का अर्थ ही तेज और सौभाग्य है।
कब और कैसे: लक्ष्मी पूजा मुहूर्त में कमलगट्टे या स्फटिक की माला पर 108 बार।
ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
Om Mahalakshmyai cha vidmahe Vishnupatnyai cha dhimahi
Tanno Lakshmih prachodayat
अर्थ: हम महालक्ष्मी को जानें, विष्णु-पत्नी का ध्यान करें; लक्ष्मी हमें प्रेरणा दें।
कब और कैसे: भेंट अर्पित करने के बाद 11, 21 या 108 बार; साल भर शुक्रवार को भी।
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥
Om hiranyavarnam harinim suvarnarajatasrajam
Chandram hiranmayim Lakshmim jatavedo ma avaha
अर्थ: हे जातवेद (अग्निदेव), मेरे लिए उन लक्ष्मी को बुलाइए जो सुनहरे वर्ण की हैं, हिरणी जैसी सुंदर हैं, सोने-चाँदी की मालाएँ पहने हैं, चंद्रमा जैसी उज्ज्वल और स्वर्णमयी हैं।
कब और कैसे: श्रीसूक्त, ऋग्वेद के खिल (परिशिष्ट) सूक्तों में लक्ष्मी जी का सूक्त, इसी मंत्र से शुरू होता है। हो सके तो मुहूर्त में पूरा सूक्त एक बार पढ़ें; नहीं तो कमल या फूल अर्पित करते हुए यही मंत्र।
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥
Namaste'stu mahamaye shripithe surapujite
Shankha-chakra-gada-haste Mahalakshmi namo'stu te
अर्थ: हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजमान, देवताओं से पूजित, शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।
कब और कैसे: महालक्ष्म्यष्टक का पहला श्लोक, जिसे परंपरा पद्म पुराण में इंद्र द्वारा की गई स्तुति मानती है। पुष्पांजलि के समय हाथ जोड़कर बोलें, या पूरे आठ श्लोक पढ़ें।
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा ॥
Om yakshaya Kuberaya Vaishravanaya dhanadhanyadhipataye dhanadhanyasamriddhim me dehi dapaya svaha
अर्थ: ॐ, यक्ष कुबेर, वैश्रवण, धन-धान्य के स्वामी: मुझे धन-धान्य की समृद्धि दें, दिलाएँ; स्वाहा। अर्पण के रूप में की गई प्रार्थना।
कब और कैसे: पूजा के लक्ष्मी-कुबेर भाग में, तिजोरी और बही-खातों के सामने 11 या 108 बार। यह अनुष्ठान-ग्रंथों का पारंपरिक मंत्र है, वेदों का नहीं।
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
Om jai Lakshmi Mata, maiya jai Lakshmi Mata.
Tumko nishidin sevat, Hari Vishnu Vidhata.
Om jai Lakshmi Mata.
Uma, Rama, Brahmani, tum hi jag-mata.
Surya-Chandrama dhyavat, Narad rishi gata.
Om jai Lakshmi Mata.
Durga roop niranjani, sukh sampatti data.
Jo koi tumko dhyavat, riddhi-siddhi dhan pata.
Om jai Lakshmi Mata.
Tum patal-nivasini, tum hi shubhdata.
Karm-prabhav-prakashini, bhavnidhi ki trata.
Om jai Lakshmi Mata.
Jis ghar mein tum rahtin, sab sadgun aata.
Sab sambhav ho jata, man nahin ghabrata.
Om jai Lakshmi Mata.
Tum bin yagya na hote, vastra na koi pata.
Khan-paan ka vaibhav, sab tumse aata.
Om jai Lakshmi Mata.
Shubh-gun mandir sundar, kshirodadhi-jata.
Ratna chaturdash tum bin, koi nahin pata.
Om jai Lakshmi Mata.
Mahalakshmi ji ki aarti, jo koi jan gata.
Ur anand samata, paap utar jata.
Om jai Lakshmi Mata.
यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'हरि विष्णु विधाता' की जगह 'हर-विष्णू-धाता', 'जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता' की जगह 'जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता', 'वस्त्र न कोई पाता' की जगह 'वस्त्र न हो पाता' और 'जो कोई जन गाता' की जगह 'जो कोई नर गाता' छपा है। छपा पाठ
जब देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए क्षीरसागर का मंथन किया, मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर, तो समुद्र से एक के बाद एक रत्न निकले। उन्हीं में कमल पर विराजी, हाथों में कमल लिए लक्ष्मी जी प्रकट हुईं, इतनी तेजस्वी कि देवता और ऋषि उनकी स्तुति करने लगे। विष्णु पुराण और भागवत पुराण बताते हैं कि उन्होंने वहाँ खड़े सब पर दृष्टि डाली और भगवान विष्णु को चुना, उनके गले में माला डाली, और तब से वे सदा उन्हीं के साथ हैं।
लोक-परंपरा इस मंथन को दिवाली के दिनों से जोड़ती है: धनतेरस को धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, और उसके बाद की अमावस्या की रात हर घर में लक्ष्मी जी का स्वागत होता है। इसीलिए घर साफ किया जाता है, द्वार पर दीया जलता है और भीतर आते उनके पदचिह्न बनाए जाते हैं, क्योंकि देवी को बुलाया नहीं, आदर से आमंत्रित किया जाता है।
दूसरी कथा जो हर बच्चा सुनता है, वह श्रीराम के घर लौटने की है। चौदह वर्ष के वनवास और रावण पर विजय के बाद श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या लौटे, तो अयोध्यावासियों ने अँधेरी रात में उनके स्वागत के लिए दीयों की पंक्तियाँ जलाईं। दीपावली का अर्थ यही है: दीपों की पंक्ति।
दिवाली कार्तिक अमावस्या (दक्षिण और पश्चिम भारत की अमांत गणना में आश्विन अमावस्या) को आती है, चाँद-रहित रात, जिसका उत्तर दीयों की रोशनी है। लक्ष्मी जी समृद्धि, कल्याण और सौभाग्य की देवी हैं; उनकी पूजा गणेश जी के साथ होती है, ताकि जो भी आए, बुद्धि के साथ और बिना विघ्न के आए; धन के रक्षक कुबेर जी के साथ; और घर की किताबों और कलम में बसी सरस्वती जी के साथ। परंपरा लक्ष्मी जी को चंचला कहती है, इसीलिए पूजा स्थिर लग्न में की जाती है: यह प्रार्थना कि वे घर में टिकें।
यह धनतेरस से भाई दूज तक चलने वाले पाँच दिनों के पर्व का तीसरा और मुख्य दिन है, और कई व्यापारी परिवारों के लिए नए वित्त वर्ष की शुरुआत, जब नए बही-खाते पूजे जाते हैं। जैन समाज इसी रात भगवान महावीर का पावापुरी में निर्वाण मनाता है, सिख समाज बंदी छोड़ दिवस, गुरु हरगोबिंद साहिब के अमृतसर लौटने का दिन, और बंगाल काली पूजा।
मुहूर्त की शुरुआत में लक्ष्मी जी के सामने घी का बड़ा दीपक जलाएँ और सुबह तक जलने दें। मान्यता है कि स्थिर लौ से स्वागत का द्वार खुला रहता है; दीपक को धातु की थाली में, पर्दों से दूर रखें और सोने से पहले देख लें।
मुख्य द्वार, हर कमरे, रसोई, पानी के नल या कुएँ और तुलसी के पास दीया रखें। परंपरा कहती है कि लक्ष्मी जी साफ और रोशन घरों में आती हैं और अँधेरे, अव्यवस्थित घरों से आगे बढ़ जाती हैं।
कमल का फूल या कमलगट्टा अर्पित करें और कमलगट्टे की माला पर उनका मंत्र जपें; हर चित्र में लक्ष्मी जी कमल पर ही विराजती हैं।
मुहूर्त में श्रीसूक्त या आदि शंकराचार्य का कनकधारा स्तोत्र पढ़ें; संस्कृत न पढ़ पाएँ तो ध्यान से सुनें। परिवार इसे कृतज्ञता की प्रार्थना के रूप में करते हैं।
सिक्के, तिजोरी और नए बही-खाते लक्ष्मी जी के साथ पूजें, और पूजा का एक सिक्का साल भर तिजोरी या पर्स में रखें, जैसा बहुत से परिवार करते हैं।
कुछ परिवार लाल कपड़े की छोटी पोटली में एक सिक्का, हल्दी की गाँठ, कुछ कौड़ियाँ या गोमती चक्र, चावल और एक लौंग बाँधकर लक्ष्मी जी के साथ पूजते हैं और तिजोरी में रखते हैं। यह लोक-परंपरा है, जिसे उसके भाव के लिए निभाया जाता है।
शाम की पूजा से पहले घर में काम करने वालों और ज़रूरतमंदों को मिठाई, कपड़े या भोजन दें। परंपरा मानती है कि लक्ष्मी वहीं टिकती हैं जहाँ धन उदारता के साथ बहता है।
इस दिन मीठा बोलें और घर की महिलाओं और बड़ों का आदर करें; परंपरा कहती है कि लक्ष्मी जी वहीं बसती हैं जहाँ सम्मान और शांति हो।
इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।
| वर्ष | तारीख | स्थिति |
|---|---|---|
| 2026इस वर्ष | रविवार, 8 नवंबर 2026 | आने वाली |
| 2027 | शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027 | आने वाली |
| 2028 | मंगलवार, 17 अक्टूबर 2028 | आने वाली |
2026 में, नई दिल्ली के लिए: कुछ पंचांग सिंह लग्न दो-तीन मिनट बाद देते हैं: उनकी लग्न सारणी पूरी रात एक ही नाक्षत्र समय से चलती है और देर रात तक खिसक जाती है। यहाँ समय उदित राशि से ही निकाला गया है।
दो पंचांग दिवाली की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।
इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।
2026 में दिवाली रविवार, 8 नवंबर को है। नई दिल्ली में लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:54 से शाम 7:50 तक (वृषभ काल) है।
धनतेरस — शुक्रवार, 6 नवंबर; नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) — रविवार, 8 नवंबर; दिवाली (लक्ष्मी पूजा) — रविवार, 8 नवंबर; गोवर्धन पूजा — मंगलवार, 10 नवंबर; भाई दूज — बुधवार, 11 नवंबर। हर दिन अपनी तिथि और अपने निर्णायक क्षण से तय होता है, नई दिल्ली के लिए निकाला गया।
नई दिल्ली में रविवार, 8 नवंबर 2026 को लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:54 से शाम 7:50 तक है। यह सूर्यास्त के बाद के प्रदोष काल का वह भाग है जिसमें अमावस्या रहते स्थिर लग्न वृषभ उदित होता है। इसमें शुरू न कर पाएँ, तो अमावस्या रहते प्रदोष काल (शाम 5:31 से रात 8:08 तक) का कोई भी भाग अगला मान्य विकल्प है। समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए इस पेज पर अपना शहर चुनें।
मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।
2027 में शुक्रवार, 29 अक्टूबर; 2028 में मंगलवार, 17 अक्टूबर।
घर के लिए शाम का लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (शाम 5:54 से शाम 7:50 तक), यानी वृषभ लग्न वाला प्रदोष काल। कार्यस्थल पर पूजा करने वाली दुकानें, दफ़्तर और कारखाने दोपहर का कुंभ लग्न (दोपहर 1:27 से दोपहर 2:54 तक) या लाभ, अमृत या शुभ चौघड़िया (अमृत: सुबह 11:28 से दोपहर 12:04 तक; शुभ: दोपहर 1:26 से दोपहर 2:48 तक; शुभ: शाम 5:31 से शाम 7:09 तक; अमृत: शाम 7:09 से रात 8:48 तक; चर: रात 8:48 से रात 10:26 तक; लाभ: 9 नवंबर, रात 1:43 से रात 3:21 तक; शुभ: 9 नवंबर, सुबह 5:00 से सुबह 6:38 तक) लेते हैं। रात भर की मंत्र साधना महानिशीथ (रात 11:38 से रात 12:31 (9 नवंबर) तक) और सिंह लग्न (9 नवंबर, रात 12:25 से रात 2:42 तक) में होती है। कुंभ, वृषभ और सिंह स्थिर लग्न हैं, जिन्हें परंपरा इसलिए चुनती है कि लक्ष्मी टिकें।
ज़्यादातर व्यापारी घर जाने से पहले दुकान या दफ़्तर में पूजा करते हैं। पारंपरिक विकल्प हैं दोपहर का स्थिर कुंभ लग्न (दोपहर 1:27 से दोपहर 2:54 तक) और दोपहर-शाम के शुभ चौघड़िया (अमृत: सुबह 11:28 से दोपहर 12:04 तक; शुभ: दोपहर 1:26 से दोपहर 2:48 तक; शुभ: शाम 5:31 से शाम 7:09 तक; अमृत: शाम 7:09 से रात 8:48 तक; चर: रात 8:48 से रात 10:26 तक; लाभ: 9 नवंबर, रात 1:43 से रात 3:21 तक; शुभ: 9 नवंबर, सुबह 5:00 से सुबह 6:38 तक); गुजराती और मारवाड़ी परिवार चोपड़ा पूजन के लिए लाभ या अमृत चौघड़िया चुनते हैं। देर तक खुला रहने वाला कारोबार शाम के वृषभ काल (शाम 5:54 से शाम 7:50 तक) में पूजा कर सकता है।
नई दिल्ली में दिवाली की रात सिंह लग्न 9 नवंबर, रात 12:25 से रात 2:42 तक रहेगा, यानी आधी रात के आसपास और उसके बाद। सिंह स्थिर लग्न है, इसलिए आधी रात को लक्ष्मी पूजा करने वाले, रात भर जागरण करने वाले और मंत्र साधक इसे चुनते हैं, अक्सर महानिशीथ काल (रात 11:38 से रात 12:31 (9 नवंबर) तक) के साथ। शाम को सामान्य पूजा करने वाले परिवार को इसकी प्रतीक्षा की ज़रूरत नहीं।
परिवार पूरी पूजा खुद कर सकता है। घर साफ करके सजाएँ, मुहूर्त से पहले लाल कपड़े पर लक्ष्मी-गणेश स्थापित करें, संकल्प लें, पहले गणेश जी और फिर लक्ष्मी जी को जल, कुमकुम, अक्षत, फूल, मिठाई और दीप अर्पित करें, उनका मंत्र जपें, घर भर में दीये रखें और आरती से पूजा पूरी करें। ऊपर दी गई पूजा विधि इसी क्रम में है; भाव पूर्ण अनुष्ठान से बड़ा है।
मुख्य सामग्री: लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति या चित्र, लाल कपड़े वाली चौकी, आम के पत्ते और नारियल वाला कलश, रोली, हल्दी, अक्षत, मौली, फूल (कमल और गेंदा), घी और तेल के दीये, कपूर, धूप, खील-बताशे, मिठाई, फल, पान-सुपारी, सिक्के और बही-खाते। ऊपर दी गई पूरी सूची में जो न मिले उसका विकल्प भी लिखा है।
शुरुआत गणेश जी के 'ॐ गं गणपतये नमः' से करें। लक्ष्मी जी के लिए 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' की एक माला (108 बार) या लक्ष्मी गायत्री का जप करें; हो सके तो श्रीसूक्त पढ़ें, जिसका पहला मंत्र लक्ष्मी जी को घर बुलाता है। तिजोरी और बही-खातों के सामने कुबेर मंत्र बोला जाता है। सभी मंत्र अर्थ सहित मंत्र वाले भाग में हैं।
चौकी कमरे के उत्तर-पूर्व (ईशान) कोने या उत्तर भाग में रखें, ताकि पूजा करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर की ओर रहे। बीच में कमल पर लक्ष्मी जी और उनकी दाहिनी ओर, यानी आपकी बाईं ओर, गणेश जी, जैसा दिवाली के जाने-पहचाने चित्र में दिखता है। कुबेर जी, बही-खाते और तिजोरी पास में रखें; उत्तर दिशा कुबेर जी की ही दिशा है।
रंगोली मुख्य द्वार पर बनाएँ: कमल, स्वस्तिक, दीये या कोई सरल गोल डिज़ाइन, चावल के आटे, रंगों या फूलों की पंखुड़ियों से, और साथ में भीतर आते लक्ष्मी जी के छोटे पदचिह्न। बंगाल में चावल के घोल से अल्पना और ओडिशा में झोटी बनती है। दीयों की कोई तय संख्या नहीं; परिवार 11, 21 या अधिक जलाते हैं, पर एक मुख्य द्वार पर, एक हर कमरे, रसोई और पानी के स्थान पर, और अखंड दीप लक्ष्मी जी के सामने ज़रूर।
दिवाली कार्तिक अमावस्या को आती है, और परंपरा मानती है कि उस अँधेरी रात लक्ष्मी जी उन घरों में आती हैं जो साफ, रोशन और स्वागत के लिए खुले हों। उनकी पूजा गणेश जी के साथ होती है, ताकि समृद्धि बुद्धि के साथ और बिना विघ्न के आए, और धन के रक्षक कुबेर जी के साथ। व्यापारियों के लिए यही रात नए वित्त वर्ष की शुरुआत भी है, जब बही-खाते पूजे जाते हैं।
नहीं। बंगाली और असमिया घरों की मुख्य लक्ष्मी पूजा, कोजागरी लक्ष्मी पूजा, शरद पूर्णिमा को होती है, दिवाली से लगभग दो हफ्ते पहले, और ओडिशा के कुछ हिस्सों में उसी रात गज लक्ष्मी पूजा। दिवाली की अमावस्या पर बंगाल आधी रात को काली पूजा करता है। यहाँ बताई गई लक्ष्मी-गणेश पूजा उत्तर और पश्चिम भारत की परंपरा है।
चोपड़ा पूजन, जिसे शारदा पूजन भी कहते हैं, गुजराती, मारवाड़ी और दूसरे व्यापारी परिवारों द्वारा दिवाली पर नए बही-खातों की पूजा है, आम तौर पर लाभ या अमृत चौघड़िया (अमृत: सुबह 11:28 से दोपहर 12:04 तक; शुभ: दोपहर 1:26 से दोपहर 2:48 तक; शुभ: शाम 5:31 से शाम 7:09 तक; अमृत: शाम 7:09 से रात 8:48 तक; चर: रात 8:48 से रात 10:26 तक; लाभ: 9 नवंबर, रात 1:43 से रात 3:21 तक; शुभ: 9 नवंबर, सुबह 5:00 से सुबह 6:38 तक) या स्थिर लग्न में। पहले पन्ने पर कुमकुम से स्वस्तिक, उसके दोनों ओर 'शुभ' और 'लाभ' और ऊपर 'श्री गणेशाय नमः' लिखा जाता है।
उत्तर भारत में दिवाली का पारंपरिक प्रसाद खील-बताशे हैं, साथ में खीर, लड्डू या दूसरी मिठाई, गन्ना, सिंघाड़ा और अनार जैसे मौसमी फल, और सुपारी, लौंग व इलायची वाला पान। गणेश जी को लड्डू या मोदक चढ़ता है। साफ रसोई में घर का बना भोग किसी भी महँगे पकवान से बढ़कर है।
धनतेरस: नया बर्तन, सिक्का या झाड़ू खरीदें, धन्वंतरि और कुबेर की पूजा करें और शाम को दक्षिण की ओर यम का दीया जलाएँ। नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली): सूर्योदय से पहले तेल लगाकर स्नान और शाम को यम के लिए दीया। दिवाली: शाम के मुहूर्त में लक्ष्मी-गणेश पूजा और हर जगह दीये। गोवर्धन पूजा: गोवर्धन की आकृति और श्रीकृष्ण के लिए अन्नकूट, और गुजराती नववर्ष। भाई दूज: बहनें दोपहर में भाइयों को तिलक करती हैं।
मान्यता है कि अमावस्या की रात लक्ष्मी जी घर-घर जाती हैं और वहाँ प्रवेश करती हैं जहाँ घर साफ, रोशन और खुला हो, इसलिए शाम की पूजा के समय मुख्य द्वार या कोई खिड़की खुली रखते हैं और देहरी पर दीया जलाते हैं। बहुत से परिवार दीपक, भजन या मंत्र के साथ रात भर जागते हैं, पर सोना मना नहीं है। परंपरा से झाड़ू पूजा से पहले लगती है, उसके बाद सुबह तक नहीं। रात को घर सुरक्षित बंद करें।
चौकी और अखंड दीप रात भर वैसे ही रहने दें। अगली सुबह स्नान के बाद छोटी-सी प्रार्थना और आरती करें, फिर चौकी समेटें: नई लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति घर के मंदिर में, पूजे हुए सिक्के और गहने वापस तिजोरी में, और खील-बताशे प्रसाद के रूप में बाँट दें। कुछ परिवार भाई दूज तक चौकी रखते हैं; अपनी पारिवारिक परंपरा मानें।
किसी भी उपाय के साथ धन की गारंटी नहीं जुड़ी है। इस गाइड के उपाय, हर द्वार पर दीये से लेकर श्रीसूक्त तक, कृतज्ञता, स्वच्छता और उदारता के पारंपरिक काम हैं जिन्हें परिवार पीढ़ियों से निभाते आए हैं। समृद्धि मेहनत, बचत और सही सलाह से ही आती है; परंपराओं को उनके भाव के लिए निभाएँ।