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कृष्ण पक्ष · अमावस्या तिथि · कार्तिक (पूर्णिमांत) / आश्विन (अमांत)

दिवाली 2026 कब है?

दिवाली 2026

13 दिन बाद

रवि, 8 नवंबर

2026 में दिवाली रविवार, 8 नवंबर को है। नई दिल्ली में लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:54 से शाम 7:50 तक (वृषभ काल) है।

2027: शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027

लक्ष्मी पूजा (वृषभ काल)

शाम 5:54 – शाम 7:50

नई दिल्ली

दिवाली कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि है। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यही तिथि कार्तिक कृष्ण अमावस्या कहलाती है — दिन वही है, केवल महीने का नाम अलग। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

दिवाली 2026 — दिन-ब-दिन

  1. धनतेरस पूजा मुहूर्त शाम 6:02 से शाम 7:58
  2. नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) अभ्यंग स्नान सुबह 5:36 से सुबह 6:37
  3. दिवाली (लक्ष्मी पूजा) लक्ष्मी पूजा शाम 5:54 से शाम 7:50
  4. काली पूजा
  5. मुहूर्त ट्रेडिंग सत्र का समय अभी घोषित नहीं
  6. गोवर्धन पूजा प्रातः मुहूर्त सुबह 6:39 से सुबह 8:49
  7. भाई दूज तिलक का समय दोपहर 1:09 से दोपहर 3:19

रविवार, 8 नवंबर · 20 शहर

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त 2026: शहर के अनुसार

प्रदोष काल में स्थिर वृषभ लग्न, जब तक अमावस्या चल रही हो — हर शहर के अपने सूर्यास्त और लग्न से गणना। पूर्व से पश्चिम भारत तक यह समय आधे घंटे से ज़्यादा खिसकता है, इसलिए अपने शहर की पंक्ति देखें।

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त 2026: शहर के अनुसार
शहरलक्ष्मी पूजा मुहूर्त
नई दिल्लीशाम 5:54–7:50
मुंबईशाम 6:27–रात 8:27
बेंगलुरुशाम 6:18–रात 8:20
कोलकाताशाम 5:20–7:19
चेन्नईशाम 6:07–रात 8:09
हैदराबादशाम 6:08–रात 8:08
पुणेशाम 6:24–रात 8:25
अहमदाबादशाम 6:22–रात 8:21
जयपुरशाम 6:03–रात 8:00
लखनऊशाम 5:43–7:39
पटनाशाम 5:28–7:25
इंदौरशाम 6:10–रात 8:08
भोपालशाम 6:03–रात 8:01
चंडीगढ़शाम 5:52–7:47
सूरतशाम 6:24–रात 8:23
नागपुरशाम 5:59–7:58
वाराणसीशाम 5:37–7:34
कानपुरशाम 5:46–7:42
नोएडाशाम 5:54–7:49
गुरुग्रामशाम 5:55–7:51

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नई दिल्ली के लिए गणना

दिवाली 2026: तारीख और तिथि का समय

रविवार, 8 नवंबर 2026

तिथि
अमावस्या, कृष्ण पक्ष
हिंदू मास
कार्तिक (पूर्णिमांत) / आश्विन (अमांत)
तिथि आरंभ
8 नवंबर, सुबह 11:29
तिथि समाप्त
9 नवंबर, दोपहर 12:32
दिन का निर्णय
प्रदोष काल
नई दिल्ली में प्रदोष काल
शाम 5:31 से रात 8:08

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: दिवाली का निर्णय सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके प्रदोष काल पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

दिवाली 2026 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

दिवाली 2026 लक्ष्मी पूजा मुहूर्त

दिवाली कार्तिक अमावस्या की रात है, जब घर-घर दीये जलते हैं और परिवार गणेश जी के साथ माँ लक्ष्मी की पूजा करते हैं, ताकि पूरा साल सुख-समृद्धि से भरा रहे। नई दिल्ली में दिवाली रविवार, 8 नवंबर 2026 को है, और घर की लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:54 से शाम 7:50 तक है: प्रदोष काल, जब स्थिर लग्न वृषभ उदित हो। दुकान और ऑफिस में पूजा अक्सर दोपहर के कुंभ लग्न (दोपहर 1:27 से दोपहर 2:54 तक) में होती है, और आधी रात की साधना सिंह लग्न (9 नवंबर, रात 12:25 से रात 2:42 तक) में।

दिवाली 2026 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (घर के लिए)शाम 5:54 से शाम 7:50 तकप्रदोष काल में स्थिर वृषभ लग्न, जब तक अमावस्या रहे।

परिवार की पूजा का मुख्य समय: सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल, जब वृषभ लग्न उदित हो और अमावस्या चल रही हो। वृषभ स्थिर लग्न है, और परंपरा स्थिर लग्न को इसलिए चुनती है कि घर आई लक्ष्मी वहीं टिकें। गणेश पूजा मुहूर्त शुरू होने से थोड़ा पहले आरंभ करें, ताकि लक्ष्मी पूजा ठीक इसी समय में हो।

प्रदोष कालशाम 5:31 से रात 8:08 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)।

सूर्यास्त के बाद रात के पहले तीन मुहूर्त, लगभग ढाई घंटे: वह समय जब दिवाली के दीये जलते हैं और पूजा होती है। वृषभ वाला समय छोटा हो या छूट जाए, तो अमावस्या रहते प्रदोष का कोई भी भाग अगला मान्य विकल्प है। जिस साल वृषभ लग्न अमावस्या के बाहर पड़े, उस साल पूजा प्रदोष काल में ही होती है, जब तक अमावस्या चल रही हो।

वृषभ काल (स्थिर लग्न)शाम 5:54 से शाम 7:50 तकशाम को उदित स्थिर (वृषभ) लग्न।

शाम को वृषभ लग्न के उदय का पूरा समय। इसका कुछ भाग प्रदोष के बाद तक चलता है, इसलिए देर से पूजा शुरू करने वाले परिवार और दुकान बंद करके पूजा करने वाले व्यापारी इसका बाकी भाग लेते हैं।

कुंभ लग्न (दुकान और ऑफिस के लिए)दोपहर 1:27 से दोपहर 2:54 तकदोपहर में उदित स्थिर कुंभ लग्न — दुकान या ऑफ़िस की पूजा के लिए।

दिवाली की दोपहर उदित होने वाला स्थिर लग्न। जो दुकानें, दफ़्तर और कारखाने घर जाने से पहले कार्यस्थल पर लक्ष्मी पूजा करते हैं, वे इसे चुनते हैं; शाम को घर पर न रह पाने वाले भी।

दिवाली चौघड़िया मुहूर्त
  • अमृत सुबह 11:28 से दोपहर 12:04 तक
  • शुभ दोपहर 1:26 से दोपहर 2:48 तक
  • शुभ शाम 5:31 से शाम 7:09 तक
  • अमृत शाम 7:09 से रात 8:48 तक
  • चर रात 8:48 से रात 10:26 तक
  • लाभ 9 नवंबर, रात 1:43 से रात 3:21 तक
  • शुभ 9 नवंबर, सुबह 5:00 से सुबह 6:38 तक
अमावस्या रहते दिवाली के दिन और रात के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिवाली की दोपहर से अगली सुबह तक के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। गुजराती और मारवाड़ी व्यापारी परिवार चोपड़ा (बही-खाता) पूजन के लिए परंपरा से लाभ या अमृत चौघड़िया चुनते हैं, और लग्न का समय अनुकूल न हो तो कई घर चौघड़िया देखकर पूजा करते हैं।

महानिशीथ कालरात 11:38 से रात 12:31 (9 नवंबर) तकअमावस्या की रात का निशीथ काल।

अमावस्या की आधी रात का समय। यह मंत्र साधना, तांत्रिक परंपरा की लक्ष्मी और काली उपासना और बंगाल की काली पूजा का समय है। घर की लक्ष्मी पूजा शाम की पूजा है, उसके लिए इसकी प्रतीक्षा ज़रूरी नहीं।

सिंह लग्न9 नवंबर, रात 12:25 से रात 2:42 तकआधी रात के आसपास उदित स्थिर सिंह लग्न — महानिशीथ पूजा के लिए।

आधी रात के आसपास और उसके बाद उदित होने वाला स्थिर लग्न। आधी रात को लक्ष्मी पूजा करने वाले, रात भर जागरण करने वाले और मंत्र साधक इसे चुनते हैं, क्योंकि सिंह भी वृषभ की तरह स्थिर लग्न है।

सूर्यास्तशाम 5:31सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज से ओझल होने का समय।

दीये गोधूलि बेला में जलाए जाते हैं। प्रदोष काल और लक्ष्मी पूजा मुहूर्त, दोनों की गिनती नई दिल्ली के सूर्यास्त से होती है।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तसुबह 11:42 से दोपहर 12:26शुभ
अमृत कालरात 10:02 से रात 11:44सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:53 से सुबह 5:45शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालशाम 4:09 से शाम 5:31
यमगण्ड कालदोपहर 12:04 से दोपहर 1:26
दुर्मुहूर्त (पहला)शाम 4:04 से शाम 4:47
वर्ज्यम्सुबह 11:50 से दोपहर 1:32

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए रविवार, 8 नवंबर 2026 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

दिवाली पूजा विधि

  1. दिन में घर की तैयारी

    घर की सफाई पूरी करें, खासकर पूजा स्थान और मुख्य द्वार की। दरवाज़े पर आम या अशोक के पत्तों और गेंदे का तोरण बाँधें, द्वार पर रंगोली बनाएँ और भीतर की ओर आते लक्ष्मी जी के छोटे-छोटे पदचिह्न बनाएँ। सूर्यास्त से पहले स्नान करके साफ या नए कपड़े पहनें।

  2. चौकी सजाएँ

    कमरे के उत्तर-पूर्व (ईशान) या उत्तर भाग में लकड़ी की चौकी रखें, ताकि पूजा करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर की ओर रहे, और उस पर लाल कपड़ा बिछाएँ। बीच में कमल पर विराजी लक्ष्मी जी और उनकी दाहिनी ओर, यानी आपकी बाईं ओर, गणेश जी को रखें। चौकी के एक कोने पर चावल की ढेरी पर जल भरा कलश रखें, उसमें आम के पत्ते और ऊपर मौली बँधा नारियल। पास में कुबेर जी, नए बही-खाते, कलम और तिजोरी या पैसों का डिब्बा रखें।

  3. दीपक जलाएँ

    मुहूर्त शुरू होते ही लक्ष्मी जी के सामने घी का बड़ा दीपक जलाएँ, जो रात भर जलेगा (अखंड दीप), और पास में तेल का एक दीपक। धूप-अगरबत्ती जलाएँ।

  4. पवित्रीकरण और संकल्प

    तीन बार आचमन करें और गंगाजल छिड़ककर स्वयं को, आसन को और सामग्री को पवित्र करें। दाहिने हाथ में जल, अक्षत, फूल और एक सिक्का लेकर अपना नाम, गोत्र और स्थान बोलें और संकल्प करें कि आप कार्तिक अमावस्या पर महालक्ष्मी पूजन कर रहे हैं, फिर जल धरती पर छोड़ दें।

  5. सबसे पहले गणेश पूजा

    'ॐ गं गणपतये नमः' बोलकर गणेश जी का आवाहन करें। जल, रोली का तिलक, अक्षत, दूर्वा, फूल, जनेऊ और लड्डू या मोदक अर्पित करें। गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएँ।

  6. कलश पूजन

    कलश के जल में वरुण देव का ध्यान करके रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएँ। जो परिवार नवग्रह के लिए चावल की नौ ढेरियाँ बनाते हैं, वे यहीं उनकी संक्षिप्त पूजा करें।

  7. लक्ष्मी जी का आवाहन और स्नान

    हाथ जोड़कर लक्ष्मी जी को चौकी पर पधारने का निवेदन करें, आसन दें और चरण, हाथ व आचमन के लिए जल अर्पित करें। धातु की मूर्ति हो तो पहले जल, फिर पंचामृत और फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर पोंछें; मिट्टी की मूर्ति या चित्र हो तो फूल से जल के छींटे दें।

  8. वस्त्र, श्रृंगार और फूल

    लाल चुनरी या वस्त्र, चंदन, कुमकुम, सिंदूर, अक्षत, इत्र और सुहाग की सामग्री (चूड़ी, बिंदी) अर्पित करें। कमल, लाल गुलाब और गेंदे के फूल और माला चढ़ाएँ।

  9. धन, बही-खाते, कुबेर और सरस्वती की पूजा

    सिक्के, गहने, कुछ नोट, तिजोरी और नए बही-खाते लक्ष्मी जी के सामने रखकर रोली-अक्षत से पूजें। बही के पहले पन्ने पर रोली से स्वस्तिक बनाएँ और दोनों ओर 'शुभ' और 'लाभ' लिखें। तिजोरी के सामने कुबेर मंत्र बोलें और कलम-दवात को सरस्वती मानकर पूजें।

  10. धूप, दीप और नैवेद्य

    धूप और दीप दिखाएँ। खील-बताशे, मिठाई, खीर, मौसमी फल (गन्ना, सिंघाड़ा, अनार) और सुपारी, लौंग, इलायची वाला पान अर्पित करें, फिर आचमन के लिए जल दें।

  11. मंत्र जप और पाठ

    'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' की एक माला (108 बार) या लक्ष्मी गायत्री का जप करें। आता हो तो श्रीसूक्त या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें और लक्ष्मी जी की कथा पढ़ें।

  12. दीपदान: घर भर में दीये

    दीयों की थाली को रोली-अक्षत से पूजें, फिर दीये पूरे घर में रखें: मुख्य द्वार, हर कमरा, रसोई, पानी का नल या कुआँ, तुलसी और बालकनी या छत। अखंड दीप लक्ष्मी जी के सामने ही रहे।

  13. आरती और क्षमा प्रार्थना

    पहले गणेश जी की आरती और फिर 'ॐ जय लक्ष्मी माता' कपूर या घी के दीपक से गाएँ, घंटी या शंख बजाएँ। हाथ जोड़कर पुष्पांजलि दें, अपनी जगह पर तीन बार घूमकर परिक्रमा करें और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें।

  14. प्रसाद और रात

    प्रसाद बाँटें और बड़ों के पैर छुएँ। चौकी रात भर वैसे ही रहने दें और अखंड दीप सुरक्षित जलने दें; अगली सुबह छोटी-सी पूजा करके चौकी समेटें।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

दिवाली पूजा सामग्री सूची

  • लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति या चित्र हर साल मिट्टी की नई मूर्ति लेने की परंपरा है; घर के लिए कमल पर बैठी लक्ष्मी जी की मूर्ति शुभ मानी जाती है। फ्रेम वाला चित्र भी ठीक है।
  • लकड़ी की चौकी और लाल कपड़ा पूजा की वेदी; लाल न हो तो पीला कपड़ा।
  • कलश, आम के पत्ते और नारियल तांबे, पीतल या मिट्टी का कलश, जल से भरा, पाँच आम के पत्ते और ऊपर मौली बँधा नारियल।
  • रोली या कुमकुम, हल्दी और चंदन तिलक के लिए और कलश, बही-खाते व सिक्कों पर निशान के लिए।
  • अक्षत साबुत चावल, धोकर सुखाए हुए; चाहें तो चुटकी भर हल्दी या कुमकुम मिला लें।
  • मौली (कलावा) कलश, नारियल और कलाई पर बाँधने के लिए लाल-पीला धागा।
  • कमल और दूसरे फूल कमल लक्ष्मी जी का फूल है; न मिले तो लाल गुलाब और गेंदे की माला। गणेश जी के लिए दूर्वा।
  • मिट्टी के दीये, घी, तेल और रुई की बत्ती अखंड दीप के लिए घी का एक बड़ा दीपक, और घर के लिए सरसों या तिल के तेल के 11, 21 या अधिक छोटे दीये।
  • कपूर, आरती की थाली और घंटी आरती के लिए; कपूर न हो तो पाँच बत्तियों वाला घी का दीपक।
  • अगरबत्ती और धूप जो रोज़ इस्तेमाल करते हैं, वही।
  • पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर; धातु की मूर्ति के स्नान के लिए, बाद में प्रसाद के रूप में बाँटें।
  • गंगाजल पवित्रीकरण के लिए; साफ पानी में कुछ बूँदें गंगाजल की, या केवल साफ पानी भी चलेगा।
  • खील-बताशे उत्तर भारत में दिवाली का पारंपरिक प्रसाद।
  • मिठाई और खीर गणेश जी के लिए लड्डू या मोदक, लक्ष्मी जी के लिए खीर और बर्फी; घर की बनी हो तो सबसे अच्छा।
  • मौसमी फल गन्ना, सिंघाड़ा, अनार, केला या सेब।
  • पान, सुपारी, लौंग और इलायची नैवेद्य के अंत में अर्पित किए जाते हैं।
  • सिक्के, नोट और गहने चाँदी के या सामान्य सिक्के लक्ष्मी जी के सामने पूजे जाते हैं; पूजा के बाद एक सिक्का तिजोरी में रखा जाता है।
  • कमलगट्टा और साबुत धनिया लक्ष्मी जी की पारंपरिक भेंट; कमलगट्टे की माला से उनका मंत्र जपा जाता है।
  • हल्दी की गाँठ समृद्धि का प्रतीक; पूजा के बाद अनाज के साथ या तिजोरी में रखी जाती है।
  • लाल चुनरी और सुहाग की सामग्री चूड़ी, सिंदूर, बिंदी और मेहंदी, सुहागिन देवी के रूप में लक्ष्मी जी को।
  • जनेऊ गणेश जी को अर्पित करने के लिए।
  • इत्र फूल या रुई पर कुछ बूँदें।
  • नए बही-खाते, कलम और दवात बही-खाता या चोपड़ा पूजन के लिए; विद्यार्थी अपनी किताबें सरस्वती पूजा के लिए रख सकते हैं।
  • कुबेर जी का चित्र या श्रीयंत्र वैकल्पिक; व्यापारी परिवार लक्ष्मी जी के साथ कुबेर जी की पूजा करते हैं।
  • रंगोली के रंग, फूलों की पंखुड़ियाँ और तोरण द्वार के लिए; चावल का आटा या खड़िया भी रंगों जितनी ही अच्छी है।
  • शंख वैकल्पिक, आरती के समय बजाने के लिए।
  • कौड़ियाँ या गोमती चक्र वैकल्पिक लोक-परंपरा; अक्सर लाल कपड़े की छोटी पोटली में बाँधकर तिजोरी में रखे जाते हैं।
  • थाली, कटोरियाँ, लोटा और चम्मच भेंट सजाने के लिए पीतल या स्टील की थाली और आचमन के लिए जल का छोटा लोटा।
  • पानी या रेत से भरी बाल्टी सुरक्षा के लिए, जब इतने दीये जल रहे हों और बाहर पटाखे चल रहे हों।

मंत्र · अर्थ के साथ

दिवाली के मंत्र और आरती

गणेश मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः

Om Gam Ganapataye Namah

अर्थ: ॐ, गं: गणों के स्वामी गणपति को नमस्कार। 'गं' गणेश जी का बीज अक्षर है।

कब और कैसे: पूजा की शुरुआत में, गणेश जी को दूर्वा और लड्डू अर्पित करते हुए 11 या 21 बार।

महालक्ष्मी मंत्र

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

Om Shreem Mahalakshmyai Namah

अर्थ: ॐ, श्रीं: महालक्ष्मी को नमस्कार। 'श्रीं' लक्ष्मी जी का बीज अक्षर है; 'श्री' का अर्थ ही तेज और सौभाग्य है।

कब और कैसे: लक्ष्मी पूजा मुहूर्त में कमलगट्टे या स्फटिक की माला पर 108 बार।

लक्ष्मी गायत्री मंत्र

ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥

Om Mahalakshmyai cha vidmahe Vishnupatnyai cha dhimahi
Tanno Lakshmih prachodayat

अर्थ: हम महालक्ष्मी को जानें, विष्णु-पत्नी का ध्यान करें; लक्ष्मी हमें प्रेरणा दें।

कब और कैसे: भेंट अर्पित करने के बाद 11, 21 या 108 बार; साल भर शुक्रवार को भी।

श्रीसूक्त का पहला मंत्र

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥

Om hiranyavarnam harinim suvarnarajatasrajam
Chandram hiranmayim Lakshmim jatavedo ma avaha

अर्थ: हे जातवेद (अग्निदेव), मेरे लिए उन लक्ष्मी को बुलाइए जो सुनहरे वर्ण की हैं, हिरणी जैसी सुंदर हैं, सोने-चाँदी की मालाएँ पहने हैं, चंद्रमा जैसी उज्ज्वल और स्वर्णमयी हैं।

कब और कैसे: श्रीसूक्त, ऋग्वेद के खिल (परिशिष्ट) सूक्तों में लक्ष्मी जी का सूक्त, इसी मंत्र से शुरू होता है। हो सके तो मुहूर्त में पूरा सूक्त एक बार पढ़ें; नहीं तो कमल या फूल अर्पित करते हुए यही मंत्र।

महालक्ष्म्यष्टक का पहला श्लोक

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

Namaste'stu mahamaye shripithe surapujite
Shankha-chakra-gada-haste Mahalakshmi namo'stu te

अर्थ: हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजमान, देवताओं से पूजित, शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।

कब और कैसे: महालक्ष्म्यष्टक का पहला श्लोक, जिसे परंपरा पद्म पुराण में इंद्र द्वारा की गई स्तुति मानती है। पुष्पांजलि के समय हाथ जोड़कर बोलें, या पूरे आठ श्लोक पढ़ें।

कुबेर मंत्र

ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा ॥

Om yakshaya Kuberaya Vaishravanaya dhanadhanyadhipataye dhanadhanyasamriddhim me dehi dapaya svaha

अर्थ: ॐ, यक्ष कुबेर, वैश्रवण, धन-धान्य के स्वामी: मुझे धन-धान्य की समृद्धि दें, दिलाएँ; स्वाहा। अर्पण के रूप में की गई प्रार्थना।

कब और कैसे: पूजा के लक्ष्मी-कुबेर भाग में, तिजोरी और बही-खातों के सामने 11 या 108 बार। यह अनुष्ठान-ग्रंथों का पारंपरिक मंत्र है, वेदों का नहीं।

आरती लक्ष्मी जी की आरती: ॐ जय लक्ष्मी माता पूरी आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

Om jai Lakshmi Mata, maiya jai Lakshmi Mata.
Tumko nishidin sevat, Hari Vishnu Vidhata.
Om jai Lakshmi Mata.

Uma, Rama, Brahmani, tum hi jag-mata.
Surya-Chandrama dhyavat, Narad rishi gata.
Om jai Lakshmi Mata.

Durga roop niranjani, sukh sampatti data.
Jo koi tumko dhyavat, riddhi-siddhi dhan pata.
Om jai Lakshmi Mata.

Tum patal-nivasini, tum hi shubhdata.
Karm-prabhav-prakashini, bhavnidhi ki trata.
Om jai Lakshmi Mata.

Jis ghar mein tum rahtin, sab sadgun aata.
Sab sambhav ho jata, man nahin ghabrata.
Om jai Lakshmi Mata.

Tum bin yagya na hote, vastra na koi pata.
Khan-paan ka vaibhav, sab tumse aata.
Om jai Lakshmi Mata.

Shubh-gun mandir sundar, kshirodadhi-jata.
Ratna chaturdash tum bin, koi nahin pata.
Om jai Lakshmi Mata.

Mahalakshmi ji ki aarti, jo koi jan gata.
Ur anand samata, paap utar jata.
Om jai Lakshmi Mata.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'हरि विष्णु विधाता' की जगह 'हर-विष्णू-धाता', 'जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता' की जगह 'जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता', 'वस्त्र न कोई पाता' की जगह 'वस्त्र न हो पाता' और 'जो कोई जन गाता' की जगह 'जो कोई नर गाता' छपा है। छपा पाठ

कथा · कहानी और उसका अर्थ

दिवाली की कथा और महत्व

कथा

जब देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए क्षीरसागर का मंथन किया, मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर, तो समुद्र से एक के बाद एक रत्न निकले। उन्हीं में कमल पर विराजी, हाथों में कमल लिए लक्ष्मी जी प्रकट हुईं, इतनी तेजस्वी कि देवता और ऋषि उनकी स्तुति करने लगे। विष्णु पुराण और भागवत पुराण बताते हैं कि उन्होंने वहाँ खड़े सब पर दृष्टि डाली और भगवान विष्णु को चुना, उनके गले में माला डाली, और तब से वे सदा उन्हीं के साथ हैं।

लोक-परंपरा इस मंथन को दिवाली के दिनों से जोड़ती है: धनतेरस को धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, और उसके बाद की अमावस्या की रात हर घर में लक्ष्मी जी का स्वागत होता है। इसीलिए घर साफ किया जाता है, द्वार पर दीया जलता है और भीतर आते उनके पदचिह्न बनाए जाते हैं, क्योंकि देवी को बुलाया नहीं, आदर से आमंत्रित किया जाता है।

दूसरी कथा जो हर बच्चा सुनता है, वह श्रीराम के घर लौटने की है। चौदह वर्ष के वनवास और रावण पर विजय के बाद श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या लौटे, तो अयोध्यावासियों ने अँधेरी रात में उनके स्वागत के लिए दीयों की पंक्तियाँ जलाईं। दीपावली का अर्थ यही है: दीपों की पंक्ति।

महत्व

दिवाली कार्तिक अमावस्या (दक्षिण और पश्चिम भारत की अमांत गणना में आश्विन अमावस्या) को आती है, चाँद-रहित रात, जिसका उत्तर दीयों की रोशनी है। लक्ष्मी जी समृद्धि, कल्याण और सौभाग्य की देवी हैं; उनकी पूजा गणेश जी के साथ होती है, ताकि जो भी आए, बुद्धि के साथ और बिना विघ्न के आए; धन के रक्षक कुबेर जी के साथ; और घर की किताबों और कलम में बसी सरस्वती जी के साथ। परंपरा लक्ष्मी जी को चंचला कहती है, इसीलिए पूजा स्थिर लग्न में की जाती है: यह प्रार्थना कि वे घर में टिकें।

यह धनतेरस से भाई दूज तक चलने वाले पाँच दिनों के पर्व का तीसरा और मुख्य दिन है, और कई व्यापारी परिवारों के लिए नए वित्त वर्ष की शुरुआत, जब नए बही-खाते पूजे जाते हैं। जैन समाज इसी रात भगवान महावीर का पावापुरी में निर्वाण मनाता है, सिख समाज बंदी छोड़ दिवस, गुरु हरगोबिंद साहिब के अमृतसर लौटने का दिन, और बंगाल काली पूजा।

उपाय · परंपरा

दिवाली के पारंपरिक उपाय

रात भर अखंड दीप

मुहूर्त की शुरुआत में लक्ष्मी जी के सामने घी का बड़ा दीपक जलाएँ और सुबह तक जलने दें। मान्यता है कि स्थिर लौ से स्वागत का द्वार खुला रहता है; दीपक को धातु की थाली में, पर्दों से दूर रखें और सोने से पहले देख लें।

हर देहरी पर दीया

मुख्य द्वार, हर कमरे, रसोई, पानी के नल या कुएँ और तुलसी के पास दीया रखें। परंपरा कहती है कि लक्ष्मी जी साफ और रोशन घरों में आती हैं और अँधेरे, अव्यवस्थित घरों से आगे बढ़ जाती हैं।

कमल और कमलगट्टा

कमल का फूल या कमलगट्टा अर्पित करें और कमलगट्टे की माला पर उनका मंत्र जपें; हर चित्र में लक्ष्मी जी कमल पर ही विराजती हैं।

श्रीसूक्त या कनकधारा स्तोत्र

मुहूर्त में श्रीसूक्त या आदि शंकराचार्य का कनकधारा स्तोत्र पढ़ें; संस्कृत न पढ़ पाएँ तो ध्यान से सुनें। परिवार इसे कृतज्ञता की प्रार्थना के रूप में करते हैं।

पूजा का सिक्का

सिक्के, तिजोरी और नए बही-खाते लक्ष्मी जी के साथ पूजें, और पूजा का एक सिक्का साल भर तिजोरी या पर्स में रखें, जैसा बहुत से परिवार करते हैं।

धन की पोटली

कुछ परिवार लाल कपड़े की छोटी पोटली में एक सिक्का, हल्दी की गाँठ, कुछ कौड़ियाँ या गोमती चक्र, चावल और एक लौंग बाँधकर लक्ष्मी जी के साथ पूजते हैं और तिजोरी में रखते हैं। यह लोक-परंपरा है, जिसे उसके भाव के लिए निभाया जाता है।

पहले दें, फिर पाएँ

शाम की पूजा से पहले घर में काम करने वालों और ज़रूरतमंदों को मिठाई, कपड़े या भोजन दें। परंपरा मानती है कि लक्ष्मी वहीं टिकती हैं जहाँ धन उदारता के साथ बहता है।

घर में सौहार्द

इस दिन मीठा बोलें और घर की महिलाओं और बड़ों का आदर करें; परंपरा कहती है कि लक्ष्मी जी वहीं बसती हैं जहाँ सम्मान और शांति हो।

परंपरा, संक्षेप में

दिवाली पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • शाम से पहले घर की सफाई पूरी करें, खासकर पूजा स्थान और द्वार की; टूटी-फूटी चीज़ें हटा दें।
  • अमावस्या रहते मुहूर्त में पूजा करें, पहले गणेश जी की, फिर लक्ष्मी जी की।
  • मुख्य द्वार, हर कमरे, रसोई, पानी के स्थान और तुलसी के पास दीये जलाएँ।
  • द्वार पर रंगोली बनाएँ और भीतर आते लक्ष्मी जी के पदचिह्न बनाएँ।
  • साफ या नए कपड़े पहनें; लाल, पीले और गुलाबी जैसे चटक रंग पारंपरिक हैं।
  • बही-खाते, तिजोरी और घर की कलम की पूजा लक्ष्मी जी के साथ करें।
  • प्रसाद और मिठाई पड़ोसियों, घर के कर्मचारियों और ज़रूरतमंदों के साथ बाँटें।
  • अखंड दीप धातु की थाली में, पर्दों से दूर रखें और पास में पानी या रेत रखें।
  • पटाखे वहीं और तभी चलाएँ जहाँ स्थानीय नियम अनुमति दें, दीयों, बच्चों और पशुओं से दूर।

क्या न करें

  • अमावस्या समाप्त होने के बाद लक्ष्मी पूजा शुरू न करें।
  • चौकी पर टूटी मूर्ति, फटा चित्र या टूटा दीया न रखें।
  • गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएँ।
  • शाम की पूजा के बाद झाड़ू न लगाएँ और कूड़ा बाहर न फेंकें; परंपरा से यह सुबह तक रुकता है।
  • दिवाली की रात पूजा स्थान या मुख्य द्वार को अँधेरा न छोड़ें।
  • त्योहार के नाम पर जुआ या नशा न करें।
  • लक्ष्मी जी की रात घर में झगड़ा या कटु वचन न बोलें।
  • दीये या अखंड दीप को कपड़े या कागज़ के पास बिना देखरेख न छोड़ें।

देश भर में

दिवाली की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

उत्तर भारत
शाम के मुहूर्त में लक्ष्मी-गणेश पूजा, खील-बताशे और दीयों की कतारें। अयोध्या में दीपोत्सव पर सरयू के घाट श्रीराम के लौटने की याद में जगमगाते हैं।
गुजरात और मारवाड़ी व्यापारी
दिवाली पर लाभ या अमृत चौघड़िया में नए बही-खातों का चोपड़ा (शारदा) पूजन; अगली सुबह गुजराती नववर्ष शुरू होता है और लाभ पंचम को दुकानें फिर खुलती हैं।
महाराष्ट्र
अमावस्या पर लक्ष्मी पूजन, जब नई झाड़ू को भी लक्ष्मी का रूप मानकर पूजा जाता है। पर्व वसु बारस से भाऊबीज तक चलता है, घर का बना फराळ और बच्चों के बनाए मिट्टी के किले इसकी पहचान हैं।
पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा
अमावस्या की रात आधी रात को काली पूजा होती है; बंगाली घरों में साल की मुख्य लक्ष्मी पूजा, कोजागरी, शरद पूर्णिमा को होती है। ओडिशा में परिवार दिवाली की शाम पूर्वजों का रास्ता रोशन करने के लिए जूट की डंडियाँ (कौंरिया काठी) जलाते हैं।
दक्षिण भारत
दीपावली मुख्य रूप से नरक चतुर्दशी की भोर में मनाई जाती है: तेल स्नान, नए कपड़े और मिठाई; बहुत से परिवार अमावस्या पर लक्ष्मी या कुबेर-लक्ष्मी पूजा भी करते हैं।
जैन और सिख समाज
जैन समाज दीपों और प्रार्थना से भगवान महावीर का निर्वाण मनाता है और अगले दिन उनका नया वर्ष शुरू होता है; सिख समाज बंदी छोड़ दिवस मनाता है, जब स्वर्ण मंदिर जगमगाता है।
नेपाल
तिहार की लक्ष्मी पूजा इसी अमावस्या को होती है, दीयों, रंगोली और देउसी-भैलो के गीतों के साथ।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • खील-बताशे उत्तर भारत में लक्ष्मी पूजा का पहचान वाला प्रसाद, पूजा के बाद सबको बाँटा जाता है।
  • खीर दूध और शक्कर में पके चावल; लक्ष्मी जी को सफेद भोग पारंपरिक रूप से प्रिय है।
  • लड्डू या मोदक गणेश जी के प्रिय: बेसन, मोतीचूर या नारियल के लड्डू।
  • मौसमी फल गन्ना, सिंघाड़ा, अनार, केला और सीताफल।
  • पान सुपारी, लौंग और इलायची के साथ, नैवेद्य के अंत में।
  • सूरन (जिमीकंद) उत्तर प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में दिवाली पर सूरन की सब्ज़ी बनाने की परंपरा है।
  • फराळ (महाराष्ट्र) चकली, करंजी, शंकरपाली, चिवड़ा और बेसन लड्डू, जो दिवाली से पहले के हफ्ते में घर पर बनते हैं।
  • गुजराती नाश्ता मठिया, चोराफली, घुघरा और मोहनथाल, जो पूरे पर्व में मेहमानों को परोसे जाते हैं।

आने वाले वर्षों में दिवाली की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में दिवाली की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षरविवार, 8 नवंबर 2026आने वाली
2027शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027आने वाली
2028मंगलवार, 17 अक्टूबर 2028आने वाली

पंचांगों में दिवाली की तारीख अलग क्यों होती है

2026 में, नई दिल्ली के लिए: कुछ पंचांग सिंह लग्न दो-तीन मिनट बाद देते हैं: उनकी लग्न सारणी पूरी रात एक ही नाक्षत्र समय से चलती है और देर रात तक खिसक जाती है। यहाँ समय उदित राशि से ही निकाला गया है।

दो पंचांग दिवाली की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: दिवाली का निर्णय प्रदोष काल से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

दिवाली से जुड़े सामान्य प्रश्न

2026 में दिवाली कब है?

2026 में दिवाली रविवार, 8 नवंबर को है। नई दिल्ली में लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:54 से शाम 7:50 तक (वृषभ काल) है।

2026 में दिवाली के पाँच दिन कौन-से हैं?

धनतेरस — शुक्रवार, 6 नवंबर; नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) — रविवार, 8 नवंबर; दिवाली (लक्ष्मी पूजा) — रविवार, 8 नवंबर; गोवर्धन पूजा — मंगलवार, 10 नवंबर; भाई दूज — बुधवार, 11 नवंबर। हर दिन अपनी तिथि और अपने निर्णायक क्षण से तय होता है, नई दिल्ली के लिए निकाला गया।

नई दिल्ली में लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली में रविवार, 8 नवंबर 2026 को लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:54 से शाम 7:50 तक है। यह सूर्यास्त के बाद के प्रदोष काल का वह भाग है जिसमें अमावस्या रहते स्थिर लग्न वृषभ उदित होता है। इसमें शुरू न कर पाएँ, तो अमावस्या रहते प्रदोष काल (शाम 5:31 से रात 8:08 तक) का कोई भी भाग अगला मान्य विकल्प है। समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए इस पेज पर अपना शहर चुनें।

दूसरे कैलेंडर में दिवाली की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल दिवाली कब है?

2027 में शुक्रवार, 29 अक्टूबर; 2028 में मंगलवार, 17 अक्टूबर।

घर, दुकान और आधी रात की पूजा के लिए कौन सा मुहूर्त लें?

घर के लिए शाम का लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (शाम 5:54 से शाम 7:50 तक), यानी वृषभ लग्न वाला प्रदोष काल। कार्यस्थल पर पूजा करने वाली दुकानें, दफ़्तर और कारखाने दोपहर का कुंभ लग्न (दोपहर 1:27 से दोपहर 2:54 तक) या लाभ, अमृत या शुभ चौघड़िया (अमृत: सुबह 11:28 से दोपहर 12:04 तक; शुभ: दोपहर 1:26 से दोपहर 2:48 तक; शुभ: शाम 5:31 से शाम 7:09 तक; अमृत: शाम 7:09 से रात 8:48 तक; चर: रात 8:48 से रात 10:26 तक; लाभ: 9 नवंबर, रात 1:43 से रात 3:21 तक; शुभ: 9 नवंबर, सुबह 5:00 से सुबह 6:38 तक) लेते हैं। रात भर की मंत्र साधना महानिशीथ (रात 11:38 से रात 12:31 (9 नवंबर) तक) और सिंह लग्न (9 नवंबर, रात 12:25 से रात 2:42 तक) में होती है। कुंभ, वृषभ और सिंह स्थिर लग्न हैं, जिन्हें परंपरा इसलिए चुनती है कि लक्ष्मी टिकें।

दुकान और ऑफिस में दिवाली पूजा कब करें?

ज़्यादातर व्यापारी घर जाने से पहले दुकान या दफ़्तर में पूजा करते हैं। पारंपरिक विकल्प हैं दोपहर का स्थिर कुंभ लग्न (दोपहर 1:27 से दोपहर 2:54 तक) और दोपहर-शाम के शुभ चौघड़िया (अमृत: सुबह 11:28 से दोपहर 12:04 तक; शुभ: दोपहर 1:26 से दोपहर 2:48 तक; शुभ: शाम 5:31 से शाम 7:09 तक; अमृत: शाम 7:09 से रात 8:48 तक; चर: रात 8:48 से रात 10:26 तक; लाभ: 9 नवंबर, रात 1:43 से रात 3:21 तक; शुभ: 9 नवंबर, सुबह 5:00 से सुबह 6:38 तक); गुजराती और मारवाड़ी परिवार चोपड़ा पूजन के लिए लाभ या अमृत चौघड़िया चुनते हैं। देर तक खुला रहने वाला कारोबार शाम के वृषभ काल (शाम 5:54 से शाम 7:50 तक) में पूजा कर सकता है।

दिवाली की रात सिंह लग्न कब है और इसमें कौन पूजा करता है?

नई दिल्ली में दिवाली की रात सिंह लग्न 9 नवंबर, रात 12:25 से रात 2:42 तक रहेगा, यानी आधी रात के आसपास और उसके बाद। सिंह स्थिर लग्न है, इसलिए आधी रात को लक्ष्मी पूजा करने वाले, रात भर जागरण करने वाले और मंत्र साधक इसे चुनते हैं, अक्सर महानिशीथ काल (रात 11:38 से रात 12:31 (9 नवंबर) तक) के साथ। शाम को सामान्य पूजा करने वाले परिवार को इसकी प्रतीक्षा की ज़रूरत नहीं।

घर पर लक्ष्मी पूजा कैसे करें, पंडित के बिना?

परिवार पूरी पूजा खुद कर सकता है। घर साफ करके सजाएँ, मुहूर्त से पहले लाल कपड़े पर लक्ष्मी-गणेश स्थापित करें, संकल्प लें, पहले गणेश जी और फिर लक्ष्मी जी को जल, कुमकुम, अक्षत, फूल, मिठाई और दीप अर्पित करें, उनका मंत्र जपें, घर भर में दीये रखें और आरती से पूजा पूरी करें। ऊपर दी गई पूजा विधि इसी क्रम में है; भाव पूर्ण अनुष्ठान से बड़ा है।

दिवाली पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट क्या है?

मुख्य सामग्री: लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति या चित्र, लाल कपड़े वाली चौकी, आम के पत्ते और नारियल वाला कलश, रोली, हल्दी, अक्षत, मौली, फूल (कमल और गेंदा), घी और तेल के दीये, कपूर, धूप, खील-बताशे, मिठाई, फल, पान-सुपारी, सिक्के और बही-खाते। ऊपर दी गई पूरी सूची में जो न मिले उसका विकल्प भी लिखा है।

लक्ष्मी पूजा में कौन सा मंत्र बोलें?

शुरुआत गणेश जी के 'ॐ गं गणपतये नमः' से करें। लक्ष्मी जी के लिए 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' की एक माला (108 बार) या लक्ष्मी गायत्री का जप करें; हो सके तो श्रीसूक्त पढ़ें, जिसका पहला मंत्र लक्ष्मी जी को घर बुलाता है। तिजोरी और बही-खातों के सामने कुबेर मंत्र बोला जाता है। सभी मंत्र अर्थ सहित मंत्र वाले भाग में हैं।

लक्ष्मी-गणेश किस दिशा में रखें और पूजा किस ओर मुख करके करें?

चौकी कमरे के उत्तर-पूर्व (ईशान) कोने या उत्तर भाग में रखें, ताकि पूजा करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर की ओर रहे। बीच में कमल पर लक्ष्मी जी और उनकी दाहिनी ओर, यानी आपकी बाईं ओर, गणेश जी, जैसा दिवाली के जाने-पहचाने चित्र में दिखता है। कुबेर जी, बही-खाते और तिजोरी पास में रखें; उत्तर दिशा कुबेर जी की ही दिशा है।

लक्ष्मी पूजा के लिए कैसी रंगोली बनाएँ और कितने दीये जलाएँ?

रंगोली मुख्य द्वार पर बनाएँ: कमल, स्वस्तिक, दीये या कोई सरल गोल डिज़ाइन, चावल के आटे, रंगों या फूलों की पंखुड़ियों से, और साथ में भीतर आते लक्ष्मी जी के छोटे पदचिह्न। बंगाल में चावल के घोल से अल्पना और ओडिशा में झोटी बनती है। दीयों की कोई तय संख्या नहीं; परिवार 11, 21 या अधिक जलाते हैं, पर एक मुख्य द्वार पर, एक हर कमरे, रसोई और पानी के स्थान पर, और अखंड दीप लक्ष्मी जी के सामने ज़रूर।

दिवाली पर लक्ष्मी पूजा क्यों होती है?

दिवाली कार्तिक अमावस्या को आती है, और परंपरा मानती है कि उस अँधेरी रात लक्ष्मी जी उन घरों में आती हैं जो साफ, रोशन और स्वागत के लिए खुले हों। उनकी पूजा गणेश जी के साथ होती है, ताकि समृद्धि बुद्धि के साथ और बिना विघ्न के आए, और धन के रक्षक कुबेर जी के साथ। व्यापारियों के लिए यही रात नए वित्त वर्ष की शुरुआत भी है, जब बही-खाते पूजे जाते हैं।

क्या बंगाल की लक्ष्मी पूजा और दिवाली की लक्ष्मी पूजा एक ही है?

नहीं। बंगाली और असमिया घरों की मुख्य लक्ष्मी पूजा, कोजागरी लक्ष्मी पूजा, शरद पूर्णिमा को होती है, दिवाली से लगभग दो हफ्ते पहले, और ओडिशा के कुछ हिस्सों में उसी रात गज लक्ष्मी पूजा। दिवाली की अमावस्या पर बंगाल आधी रात को काली पूजा करता है। यहाँ बताई गई लक्ष्मी-गणेश पूजा उत्तर और पश्चिम भारत की परंपरा है।

चोपड़ा पूजन क्या है और नए बही-खाते में क्या लिखते हैं?

चोपड़ा पूजन, जिसे शारदा पूजन भी कहते हैं, गुजराती, मारवाड़ी और दूसरे व्यापारी परिवारों द्वारा दिवाली पर नए बही-खातों की पूजा है, आम तौर पर लाभ या अमृत चौघड़िया (अमृत: सुबह 11:28 से दोपहर 12:04 तक; शुभ: दोपहर 1:26 से दोपहर 2:48 तक; शुभ: शाम 5:31 से शाम 7:09 तक; अमृत: शाम 7:09 से रात 8:48 तक; चर: रात 8:48 से रात 10:26 तक; लाभ: 9 नवंबर, रात 1:43 से रात 3:21 तक; शुभ: 9 नवंबर, सुबह 5:00 से सुबह 6:38 तक) या स्थिर लग्न में। पहले पन्ने पर कुमकुम से स्वस्तिक, उसके दोनों ओर 'शुभ' और 'लाभ' और ऊपर 'श्री गणेशाय नमः' लिखा जाता है।

लक्ष्मी पूजा में भोग में क्या चढ़ाएँ?

उत्तर भारत में दिवाली का पारंपरिक प्रसाद खील-बताशे हैं, साथ में खीर, लड्डू या दूसरी मिठाई, गन्ना, सिंघाड़ा और अनार जैसे मौसमी फल, और सुपारी, लौंग व इलायची वाला पान। गणेश जी को लड्डू या मोदक चढ़ता है। साफ रसोई में घर का बना भोग किसी भी महँगे पकवान से बढ़कर है।

दिवाली के पाँचों दिन क्या करें?

धनतेरस: नया बर्तन, सिक्का या झाड़ू खरीदें, धन्वंतरि और कुबेर की पूजा करें और शाम को दक्षिण की ओर यम का दीया जलाएँ। नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली): सूर्योदय से पहले तेल लगाकर स्नान और शाम को यम के लिए दीया। दिवाली: शाम के मुहूर्त में लक्ष्मी-गणेश पूजा और हर जगह दीये। गोवर्धन पूजा: गोवर्धन की आकृति और श्रीकृष्ण के लिए अन्नकूट, और गुजराती नववर्ष। भाई दूज: बहनें दोपहर में भाइयों को तिलक करती हैं।

दिवाली की रात दरवाज़ा खुला क्यों रखते हैं, और क्या सोना या झाड़ू लगाना मना है?

मान्यता है कि अमावस्या की रात लक्ष्मी जी घर-घर जाती हैं और वहाँ प्रवेश करती हैं जहाँ घर साफ, रोशन और खुला हो, इसलिए शाम की पूजा के समय मुख्य द्वार या कोई खिड़की खुली रखते हैं और देहरी पर दीया जलाते हैं। बहुत से परिवार दीपक, भजन या मंत्र के साथ रात भर जागते हैं, पर सोना मना नहीं है। परंपरा से झाड़ू पूजा से पहले लगती है, उसके बाद सुबह तक नहीं। रात को घर सुरक्षित बंद करें।

दिवाली पूजा की चौकी कब हटाएँ?

चौकी और अखंड दीप रात भर वैसे ही रहने दें। अगली सुबह स्नान के बाद छोटी-सी प्रार्थना और आरती करें, फिर चौकी समेटें: नई लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति घर के मंदिर में, पूजे हुए सिक्के और गहने वापस तिजोरी में, और खील-बताशे प्रसाद के रूप में बाँट दें। कुछ परिवार भाई दूज तक चौकी रखते हैं; अपनी पारिवारिक परंपरा मानें।

क्या दिवाली के उपाय से धन आता है?

किसी भी उपाय के साथ धन की गारंटी नहीं जुड़ी है। इस गाइड के उपाय, हर द्वार पर दीये से लेकर श्रीसूक्त तक, कृतज्ञता, स्वच्छता और उदारता के पारंपरिक काम हैं जिन्हें परिवार पीढ़ियों से निभाते आए हैं। समृद्धि मेहनत, बचत और सही सलाह से ही आती है; परंपराओं को उनके भाव के लिए निभाएँ।