वर
- चंद्र राशि
- नक्षत्र
- लग्न
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वर-वधू की जन्म कुंडली से अष्टकूट मिलान। आठों कूट का अलग-अलग स्कोर, नाड़ी और भकूट दोष की स्थिति, और हर अंक का अर्थ — सरल हिंदी में, बिना किसी अनुमान के।
पारंपरिक गुण मिलान
वर
वधू
एक अंक से आगे
ये पारंपरिक कूटों को दोनों कुंडलियों के आपसी योगों के साथ जोड़कर बनते हैं।
आठ पारंपरिक कसौटियाँ
केवल अंक देखने के बजाय पढ़िए कि हर कूट किस बात को तौलता है।
| कूट | अंक | क्या देखा जाता है | व्याख्या |
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महत्वपूर्ण जाँच
किसी दोष के साथ उसका परिहार भी हो सकता है। निष्कर्ष निकालने से पहले व्याख्या पढ़िए।
वैदिक ज्योतिष में विवाह मिलान दोनों की चंद्र राशि और जन्म नक्षत्र की तुलना से होता है। आठ कसौटियाँ — वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी — मिलकर 36 अंक बनाती हैं।
परंपरा में 18 से ऊपर को व्यवहार्य और 24 से ऊपर को उत्तम माना जाता है। पर अनुभवी ज्योतिषी कुल अंक से ज़्यादा यह देखते हैं कि कौन-सा कूट शून्य आया — विशेषकर नाड़ी, जो अकेले 8 अंक की है।
दोनों की नाड़ी एक होने पर नाड़ी दोष बनता है और भकूट दोष राशि की दूरी से। दोनों के लिए शास्त्रों में परिहार भी दिए गए हैं — जैसे एक ही राशि होने पर या राशि स्वामी एक होने पर भकूट दोष निष्प्रभावी माना जाता है। केवल दोष बता देना और परिहार छोड़ देना अधूरी बात है।
तब नाम से गुण मिलान किया जा सकता है। नामकरण परंपरा में बच्चे का नाम उसी अक्षर से रखा जाता है जो जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र चरण का होता है — इसलिए नाम में जन्म नक्षत्र छिपा रहता है।
परंपरा में 18 से ऊपर व्यवहार्य और 24 से ऊपर उत्तम माना जाता है। पर कुल अंक से ज़्यादा यह देखा जाता है कि कौन-सा कूट शून्य आया।
दोनों की नाड़ी एक होने पर नाड़ी दोष बनता है। यह अकेले 8 अंक का है, इसलिए सबसे पहले यही देखा जाता है।
तब नाम से गुण मिलान किया जा सकता है, क्योंकि नामकरण परंपरा में नाम का पहला अक्षर जन्म नक्षत्र से आता है।