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कृष्ण पक्ष · एकादशी तिथि · वैशाख (पूर्णिमांत) / चैत्र (अमांत)

वरूथिनी एकादशी 2027 कब है?

वरूथिनी एकादशी 2027

188 दिन बाद

रवि, 2 मई

2027 में वरूथिनी एकादशी रविवार, 2 मई को है। नई दिल्ली में पारण 3 मई को सुबह 5:39 से सुबह 8:18 तक है; एकादशी तिथि 1 मई, शाम 6:54 से 2 मई, शाम 7:52 तक रहेगी।

2028: गुरुवार, 20 अप्रैल 2028

पारण

सुबह 5:39 – सुबह 8:18

नई दिल्ली

वरूथिनी एकादशी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यही तिथि वैशाख कृष्ण एकादशी कहलाती है — दिन वही है, केवल महीने का नाम अलग। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

वरूथिनी एकादशी 2027: तारीख और तिथि का समय

रविवार, 2 मई 2027

तिथि
एकादशी, कृष्ण पक्ष
हिंदू मास
वैशाख (पूर्णिमांत) / चैत्र (अमांत)
तिथि आरंभ
1 मई, शाम 6:54
तिथि समाप्त
2 मई, शाम 7:52
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
2 मई, सुबह 5:39

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: वरूथिनी एकादशी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

वरूथिनी एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

वरूथिनी एकादशी 2027 शुभ मुहूर्त

वरूथिनी एकादशी, यानी रक्षा करने वाली एकादशी, भगवान विष्णु के वराह रूप के लिए रखी जाती है, और बहुत से लोग इसका व्रत बिना नमक के रखते हैं। नई दिल्ली में यह रविवार, 2 मई 2027 को है: व्रत सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है, और पारण का समय 3 मई, सुबह 5:39 से सुबह 8:18 तक है। उत्तर भारत में यह वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी है (अमांत गणना में चैत्र कृष्ण), गर्मी की पहली तपिश में।

वरूथिनी एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
पारण का समय3 मई, सुबह 5:39 से सुबह 8:18 तकद्वादशी की सुबह (दिन का पहला पाँचवाँ भाग); हरि वासर रात में ही समाप्त हो चुका है।

द्वादशी का वह समय, जिसमें वरूथिनी एकादशी का व्रत पूरा किया जाता है। यह हरि वासर बीतने के बाद शुरू होता है और सामान्यतः सुबह के पहले भाग तक रहता है; हरि वासर देर तक चले तो पारण दोपहर के बाद होता है, और द्वादशी समाप्त होने के बाद कभी नहीं। यहाँ दिया समय नई दिल्ली के लिए गणना करके दिया गया है।

हरि वासर समाप्ति3 मई, रात 1:55द्वादशी के पहले चौथाई भाग का अंत; इसके भीतर व्रत नहीं खोला जाता।

हरि वासर द्वादशी का पहला चौथाई भाग है। इसमें व्रत नहीं खोला जाता, चाहे सुबह हो चुकी हो, इसलिए नई दिल्ली में इसकी समाप्ति ही पारण का सबसे पहला क्षण है।

ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:14 से सुबह 4:56 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।

एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले का समय: उठने, स्नान करने और व्रत का संकल्प लेने का पारंपरिक समय।

सूर्योदयसुबह 5:39क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक गिना जाता है, और सुबह की पूजा इसके बाद होती है।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • चर सुबह 7:19 से सुबह 8:59 तक
  • लाभ सुबह 8:59 से सुबह 10:38 तक
  • अमृत सुबह 10:38 से दोपहर 12:18 तक
  • शुभ दोपहर 1:58 से दोपहर 3:37 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। जो परिवार भोर में पूजा नहीं कर पाते, वे मुख्य पूजा के लिए इनमें से कोई समय चुनते हैं।

प्रदोष काल: संध्या दीपशाम 6:56 से रात 9:05 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)।

सूर्यास्त के बाद का समय, जब भगवान विष्णु के आगे और तुलसी के पास दीप जलाए जाते हैं और फिर से आरती होती है।

निशीथ काल: रात्रि जागरणरात 11:56 से रात 12:39 (3 मई) तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, आधी रात के आसपास।

आधी रात का समय, जागरण का केंद्र। जो रात भर जागते हैं, वे यह भाग कीर्तन और जप को देते हैं।

राहु काल (वर्जित समय)इस समय टाला जाता हैशाम 5:17 से शाम 6:56 तकदिन का वह आठवाँ भाग जो वार के अनुसार राहु का है: इसमें पूजा, खरीदारी या यात्रा शुरू नहीं की जाती।

नई दिल्ली में एकादशी के दिन का राहु काल। बहुत से परिवार संकल्प या मुख्य पूजा इसके भीतर शुरू नहीं करते; इससे व्रत या पारण का समय नहीं बदलता।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तसुबह 11:51 से दोपहर 12:44शुभ
अमृत कालशाम 6:12 से शाम 7:54सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:14 से सुबह 4:56शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालशाम 5:17 से शाम 6:56
यमगण्ड कालदोपहर 12:18 से दोपहर 1:58
दुर्मुहूर्त (पहला)शाम 5:10 से शाम 6:03
वर्ज्यम्सुबह 8:02 से सुबह 9:44

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए रविवार, 2 मई 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पारण · नई दिल्ली

वरूथिनी एकादशी 2027 पारण का समय

सोमवार, 3 मई 2027, सुबह 5:39 से सुबह 8:18

पारण द्वादशी को होता है, और हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग, जो इस बार 3 मई, रात 1:55 पर समाप्त होता है — में व्रत नहीं खोला जाता। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।

व्रत के बारे में यहाँ दी गई बातें परंपरा का वर्णन हैं, चिकित्सा सलाह नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या दवाइयों की स्थिति में व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

कृष्ण पक्ष · वैशाख (पूर्णिमांत) · चैत्र (अमांत)

वरूथिनी एकादशी 2027: स्मार्त और वैष्णव तारीख

उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में वरूथिनी एकादशी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, और दक्षिण व पश्चिम भारत की अमांत गणना में चैत्र मास की। रात एक ही है — दोनों पद्धतियाँ कृष्ण पक्ष को अलग महीने के नाम से गिनती हैं।

इस पेज की तारीख (स्मार्त, सूर्योदय का नियम)
रविवार, 2 मई 2027 — जिस दिन के सूर्योदय पर एकादशी तिथि है, व्रत उसी दिन का माना जाता है — यही दिन एस्ट्रोसेज और यह साइट देती है।
वैष्णव (इस्कॉन), अरुणोदय का नियम
रविवार, 2 मई 2027 — इस बार वही दिन। वैष्णव नियम तिथि सूर्योदय पर नहीं, अरुणोदय — सूर्योदय से पहले के 96 मिनट — पर देखता है; रविवार, 2 मई 2027 का अरुणोदय (2 मई, सुबह 4:03) एकादशी में है, दशमी में नहीं।

ऊपर का हर दिन नई दिल्ली के लिए उन्हीं तिथि-क्षणों से निकाला गया है। इस्कॉन मंदिर हर शहर के लिए अपना कैलेंडर छापते हैं और कुछ वर्षों में महाद्वादशी के नियम से व्रत द्वादशी पर भी ले जाते हैं — आपके मंदिर का कैलेंडर अलग हो तो उसी का पालन करें।

महत्व और व्रत कथा

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा और महत्व

वरूथिनी एकादशी उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी है — अमांत गणना में चैत्र कृष्ण। वरूथिनी का अर्थ है रक्षा करने वाली, कवच जैसी। इस दिन भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा होती है। इसके नियमों में संयम पर ज़ोर है: कई लोग बिना नमक का व्रत रखते हैं, दूसरे के घर का भोजन नहीं करते, और ज़रूरतमंदों को अन्न, तिल या जल का दान करते हैं।

वरूथिनी एकादशी की कथा

संक्षेप में, अपने शब्दों में — स्रोत: भविष्योत्तर पुराण, श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया एकादशी माहात्म्य।

राजा मांधाता नर्मदा के तट पर राज करते थे और अपने दान और तप के लिए जाने जाते थे। एक बार वे वन में गहरे ध्यान में खड़े थे, तभी पेड़ों के बीच से एक भालू निकला और उनका पैर चबाते हुए उन्हें घसीटने लगा।

मांधाता ने क्रोध में आकर अपना तप नहीं तोड़ा। उन्होंने भगवान विष्णु को पुकारा, और विष्णु ने प्रकट होकर सुदर्शन चक्र से भालू को मार गिराया। पर तब तक राजा का पैर बुरी तरह घायल हो चुका था, और वे इस हानि से दुखी थे।

भगवान ने कहा कि यह चोट उनके अपने किसी पुराने कर्म का फल है, और इससे उबरने का उपाय भी है: मथुरा जाकर वैशाख की वरूथिनी एकादशी का व्रत रखो और वहाँ मेरे वराह स्वरूप की पूजा करो।

मांधाता ने मथुरा जाकर वैसा ही व्रत रखा। पुराण कहता है कि उसके पुण्य से उनका शरीर फिर पूरा हो गया और अंत में वे विष्णुलोक गए। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि इस व्रत का पुण्य लंबे तप के बराबर है, और यह रखने वाले की रक्षा करता है — इसके नाम का अर्थ भी यही है।

व्रत कैसे रखा जाता है

  • व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है। बहुत से परिवार एक दिन पहले, दशमी की शाम, एक बार सादा भोजन करते हैं।
  • एकादशी को अन्न और चावल नहीं लिए जाते। जो पूरा उपवास नहीं रख पाते वे फल, दूध या फलाहार लेते हैं; निर्जल व्रत वही रखते हैं जिनकी परंपरा और स्वास्थ्य इसकी अनुमति दें।
  • भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल, दीप और उनके नामों से होती है; उस दिन की कथा पढ़ना या सुनना व्रत का अंग है, और कई लोग रात का कुछ भाग कीर्तन या जप में जागकर बिताते हैं।
  • पारण द्वादशी को होता है, हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग — बीतने के बाद। आपके शहर का पारण समय ऊपर गणना करके दिया गया है।

उपवास के नियम यहाँ परंपरा के रूप में बताए गए हैं, चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या किसी दवा के चलते उपवास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

सभी 26 · नई दिल्ली

सभी एकादशी और उनकी अगली तारीख

साधारण वर्ष में चौबीस, और अधिक मास वाले वर्ष में दो और। हर एकादशी का अपना पेज है — कथा, पारण और स्मार्त-वैष्णव तारीख के साथ।

अगली एकादशी और उसका पारण · 2027 की सभी एकादशी — तिथि और पारण के समय के साथ

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

वरूथिनी एकादशी पूजा विधि

  1. एक दिन पहले: दशमी

    दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार सादा भोजन करें, जिसमें प्याज़, लहसुन और चावल न हों, और शाम हल्के और शांत मन से बिताएँ। पूजा का स्थान साफ कर लें और ज़रूरत के तुलसी दल आज ही तोड़ लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।

  2. जल्दी उठें और स्नान करें

    एकादशी की सुबह जल्दी, हो सके तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें (पानी में गंगाजल की कुछ बूँदें हों तो अच्छा) और साफ कपड़े पहनें; भगवान विष्णु की पूजा में पीले वस्त्र पारंपरिक हैं।

  3. व्रत का संकल्प

    पूजा स्थान के सामने बैठकर दाहिने हाथ में थोड़ा जल और एक फूल लें और व्रत का संकल्प करें: अपना नाम लें, कहें कि आप भगवान विष्णु के लिए वरूथिनी एकादशी का व्रत रख रहे हैं, और यह भी कि व्रत कैसा होगा, निर्जल, केवल जल पर, फलाहार पर या एक समय के फलाहारी भोजन के साथ। फिर जल धरती पर छोड़ दें। मंत्र वाले भाग का एकादशी संकल्प श्लोक यहाँ बोला जा सकता है।

  4. चौकी सजाएँ

    साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र रखें (घर में शालिग्राम या लड्डू गोपाल हों तो उन्हें), साथ में घी का दीपक और जल से भरा छोटा कलश या लोटा। हर पूजा की तरह पहले एक फूल और 'ॐ गं गणपतये नमः' से गणेश जी का स्मरण करें।

  5. वराह रूप भगवान विष्णु का पूजन

    धातु की प्रतिमा या शालिग्राम को जल, पंचामृत और फिर जल से स्नान कराएँ (चित्र हो तो फूल से जल छिड़कें), और भगवान विष्णु की उनके वराह रूप में पूजा करें, जिन्होंने पृथ्वी को जल से ऊपर उठाया था और जिनका नाम कथा में आता है; विष्णु का कोई भी चित्र चलता है। चंदन, पीले फूल, एक दिन पहले तोड़े तुलसी दल, धूप और दीपक अर्पित करें, साथ में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें।

  6. भोग लगाएँ

    भोग में वही रखें जो आप स्वयं फलाहार में लेंगे: फल, बिना अन्न की मिठाई, मखाने, मेवे या पंचामृत, और हर भोग पर एक तुलसी दल। एकादशी को अन्न या दाल से बना कुछ भी न चढ़ाया जाता है, न खाया जाता है।

  7. कथा और आरती

    नीचे दी गई वरूथिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और हो सके तो विष्णु सहस्रनाम या गीता का एक अध्याय भी। फिर घी के दीपक या कपूर से 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती गाएँ और पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें।

  8. दिन भर

    संकल्प के अनुसार व्रत निभाएँ, मन में भगवान का नाम रखें और दिन में सोने, क्रोध, निंदा और कटु वचन से बचें। किसी ज़रूरतमंद को जल, फल या भोजन दें; दान हर एकादशी का अंग है।

  9. वरूथिनी का संयम

    बहुत से लोग यह व्रत बिल्कुल बिना नमक के रखते हैं, और दशमी से पारण तक किसी दूसरे के घर का कुछ नहीं खाते। दिन भर ज़रूरतमंदों को अन्न, तिल या जल दें, जैसा इस दिन की परंपरा कहती है।

  10. संध्या दीप

    सूर्यास्त पर भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक और तुलसी के पास एक दीपक जलाएँ, उसके पत्ते तोड़े बिना, और फिर से आरती गाएँ।

  11. रात्रि जागरण

    रात का जितना भाग हो सके, कीर्तन, जप या पाठ में जागकर बिताएँ; आधी रात का समय जागरण का केंद्र है। जो पूरी रात न जाग सकें, वे उसका कुछ भाग जागें।

  12. द्वादशी: दान के बाद पारण

    अगली सुबह स्नान करके संक्षेप में भगवान का पूजन करें और किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या दान दें। फिर पारण के समय के भीतर व्रत खोलें: पहले पारण का श्लोक बोलकर जल के साथ तुलसी दल या कोई फल, और उसके बाद सादा सात्विक भोजन।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

वरूथिनी एकादशी पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र चित्र भी काफी है; धातु की प्रतिमा, शालिग्राम या लड्डू गोपाल को पूजा में स्नान कराया जाता है।
  • चौकी और पीला कपड़ा पीला भगवान विष्णु का रंग है; साफ लाल कपड़ा भी चलता है।
  • तुलसी दल दशमी को तोड़े हुए, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती; हर भोग पर एक रखा जाता है।
  • घी का दीपक और रुई की बत्ती एक पूजा के लिए और एक शाम को तुलसी के पास; तिल का तेल भी ले सकते हैं।
  • पीले फूल और माला गेंदा, चंपा या कोई भी ताज़े पीले फूल; मिल सके तो कमल।
  • चंदन भगवान के तिलक के लिए; हल्दी का लेप भी चलता है।
  • रोली और हल्दी तिलक और कलश पर निशान के लिए।
  • पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर; प्रतिमा के स्नान और प्रसाद के लिए।
  • गंगाजल स्नान के जल में कुछ बूँदें और पूजा स्थान की शुद्धि के लिए; न हो तो शुद्ध जल।
  • कलश या जल भरा लोटा स्नान, आचमन और संकल्प के लिए।
  • धूप और अगरबत्ती जो आप रोज़ लेते हैं।
  • कपूर, आरती की थाली और घंटी आरती के लिए; घर में शंख हो तो वह भी।
  • मौली (कलावा) भगवान के वस्त्र के रूप में चढ़ाने या कलाई पर बाँधने के लिए।
  • भगवान के लिए पीला वस्त्र ज़रूरी नहीं; मौली से भी काम चलता है।
  • मौसमी फल केला, सेब, अमरूद, अनार या जो ताज़ा मिले; भोग के बाद फलाहार में भी।
  • बिना अन्न की मिठाई मखाने की खीर, मिश्री, पेड़ा या मेवे; आटे या चावल से बनी कोई चीज़ नहीं।
  • थोड़े तिल जिन घरों में एकादशी की पूजा में चावल नहीं लिया जाता, वहाँ अक्षत की जगह चढ़ाने के लिए।
  • तुलसी की माला मंत्र के 108 जप के लिए।
  • व्रत कथा, विष्णु सहस्रनाम या गीता पुस्तक या फ़ोन; कथा पढ़ना व्रत का अंग है।
  • द्वादशी का दान पारण से पहले देने के लिए अन्न, फल, वस्त्र या दक्षिणा।
  • वराह भगवान का चित्र, यदि हो भगवान विष्णु का कोई भी चित्र चलता है; कथा वराह रूप का नाम लेती है।
  • दान के लिए तिल और जल का घड़ा अन्न, तिल और जल इस दिन के दान हैं।

मंत्र · अर्थ के साथ

वरूथिनी एकादशी के मंत्र और आरती

शान्ताकारं: विष्णु ध्यान श्लोक

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

Shantakaram bhujagashayanam padmanabham suresham vishvadharam gaganasadrisham meghavarnam shubhangam
Lakshmikantam kamalanayanam yogibhir dhyanagamyam vande Vishnum bhavabhayaharam sarvalokaikanatham

अर्थ: मैं विष्णु को नमन करता हूँ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, देवताओं के स्वामी, संसार के आधार, आकाश जैसे व्यापक, मेघ जैसे श्याम, शुभ अंगों वाले, लक्ष्मी के प्रिय, कमल-नयन, योगियों के ध्यान से प्राप्त, संसार का भय हरने वाले और सभी लोकों के एकमात्र स्वामी।

कब और कैसे: पूजा शुरू करने से पहले हाथ जोड़कर एक बार, भगवान के उसी रूप का ध्यान करते हुए जो श्लोक बताता है।

एकादशी संकल्प श्लोक

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि ।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

Ekadashyam niraharah sthitvaham apare'hani
Bhokshyami pundarikaksha sharanam me bhavachyuta

अर्थ: हे कमलनयन, मैं एकादशी को निराहार रहकर अगले दिन भोजन करूँगा। हे अच्युत, आप मेरी शरण बनें।

कब और कैसे: सुबह व्रत का संकल्प लेते समय, दाहिने हाथ में जल लेकर एक बार।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (द्वादशाक्षर मंत्र)

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

Om Namo Bhagavate Vasudevaya

अर्थ: ॐ, भगवान वासुदेव को नमस्कार, यानी सब प्राणियों में बसने वाले विष्णु को। यही मंत्र भागवत पुराण में नारद जी ने बालक ध्रुव को दिया था।

कब और कैसे: एकादशी का मुख्य जप: पूजा में तुलसी की माला पर 108 बार, और दिन भर व रात्रि जागरण में जितनी बार चाहें।

कृष्णाय वासुदेवाय

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥

Krishnaya Vasudevaya haraye paramatmane
Pranata-klesha-nashaya Govindaya namo namah

अर्थ: वसुदेव-पुत्र कृष्ण को, हरि को, परमात्मा को, शरण आए हुओं का क्लेश मिटाने वाले गोविंद को बार-बार नमस्कार। यह भागवत पुराण की प्रार्थना है।

कब और कैसे: आरती के बाद, यह याद करते हुए कि कथा राजा मांधाता को यह व्रत रखने श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा भेजती है।

पारण का श्लोक

अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव ।
प्रसीद सुमुखो नाथ ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥

Ajnana-timirandhasya vratenanena Keshava
Prasida sumukho natha jnana-drishti-prado bhava

अर्थ: हे केशव, अज्ञान के अंधकार से अंधे हुए मुझ पर इस व्रत से प्रसन्न हों। हे नाथ, कृपा करें और ज्ञान की दृष्टि दें।

कब और कैसे: द्वादशी को पारण के समय के भीतर, पहला घूँट जल या पहला फल लेने से पहले एक बार।

आरती विष्णु जी की आरती: ॐ जय जगदीश हरे पूरी आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.
Om jai Jagdish hare.

Jo dhyave phal pave, dukh binse man ka, swami dukh binse man ka.
Sukh sampati ghar aave, sukh sampati ghar aave, kasht mite tan ka.
Om jai Jagdish hare.

Maat pita tum mere, sharan gahoon kiski, swami sharan gahoon main kiski.
Tum bin aur na dooja, tum bin aur na dooja, aas karoon main jiski.
Om jai Jagdish hare.

Tum pooran Parmatma, tum antaryami, swami tum antaryami.
Parabrahm Parmeshwar, Parabrahm Parmeshwar, tum sab ke swami.
Om jai Jagdish hare.

Tum karuna ke sagar, tum palankarta, swami tum palankarta.
Main moorakh phalkami, main sevak tum swami, kripa karo bharta.
Om jai Jagdish hare.

Tum ho ek agochar, sabke pranpati, swami sabke pranpati.
Kis vidhi miloon dayamay, kis vidhi miloon dayamay, tumko main kumati.
Om jai Jagdish hare.

Deen-bandhu dukh-harta, thakur tum mere, swami rakshak tum mere.
Apne haath uthao, apne sharan lagao, dwar pada tere.
Om jai Jagdish hare.

Vishay-vikar mitao, paap haro deva, swami paap haro deva.
Shraddha bhakti badhao, shraddha bhakti badhao, santan ki seva.

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'स्वामी' की जगह 'प्रभु', 'क्षण में' की जगह 'छिनमें' और 'फलकामी' की जगह 'खल कामी' छपा है; उसमें आधी पंक्तियाँ दोहराई नहीं गई हैं, 'दास जनों के संकट', 'मैं सेवक तुम स्वामी' और 'अपने शरण लगाओ' नहीं हैं, और 'ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे' की जगह 'तुम ठाकुर मेरे' है। छपा पाठ

महत्व

वरूथिनी एकादशी का महत्व

भविष्योत्तर पुराण की इसकी कथा राजा मांधाता की है, जिन्हें ध्यान में लीन रहते एक भालू ने पकड़ लिया, और जिन्होंने पलटवार की जगह प्रभु को पुकारा; यह जानकर कि घाव उनके ही किसी पुराने कर्म का फल है, उन्होंने मथुरा में यह उपवास रखा और फिर स्वस्थ हुए। आराधना उस रूप की होती है जिसने धरती को प्रलय के जल से उठाया, और बहुत से लोग आज अपने आश्रितों की सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं।

यह तब आती है जब गर्मी बढ़ रही होती है, अक्षय तृतीया से लगभग एक सप्ताह पहले, और ऐसा संयम माँगती है जो दिन के बाद भी टिके: सादी थाली, संयत वाणी और उकसाए जाने पर धैर्य। राहगीरों और पक्षियों के लिए रखा पानी इस मौसम का स्वाभाविक दान है। कथा में श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस एक दिन का फल बरसों की तपस्या के बराबर है।

उपाय · परंपरा

वरूथिनी एकादशी के पारंपरिक उपाय

बिना नमक का व्रत

बहुत से परिवारों की तरह वरूथिनी बिना नमक, सेंधा नमक भी नहीं, रखें; फल, दूध, दही और मखाने से बिना नमक के भी पूरा फलाहार हो जाता है।

केवल अपने घर का भोजन

दशमी से पारण तक केवल अपने घर में बना भोजन लें; यह संयम इस दिन की पहचान है।

गर्मी में जल

वरूथिनी पहली गर्मी के साथ आती है। राहगीरों के लिए दरवाज़े पर ठंडे पानी का घड़ा, या पक्षियों के लिए पानी का बर्तन, इस दिन का सबसे सरल दान है।

ज़रूरतमंद को अन्न और तिल

एकादशी को या द्वादशी की सुबह, अपने पारण से पहले, किसी ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या तिल दें।

उकसावे में भी धैर्य

घायल होने पर भी मांधाता ने क्रोध में पलटवार नहीं किया; उन्होंने भगवान को पुकारा। कुछ भी उकसाए, यह दिन क्रोध से मुक्त रखें।

रक्षा की प्रार्थना

वरूथिनी कवच है। वराह रूप भगवान विष्णु से अपने घर-परिवार की रक्षा की प्रार्थना करें, और दूसरों की रक्षा करने वालों, सैनिकों, नर्सों और पहरेदारों, को भी प्रार्थना में याद करें।

परंपरा, संक्षेप में

वरूथिनी एकादशी पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार हल्का सात्विक भोजन करें।
  • सुबह संकल्प लें और जैसा व्रत तय किया, वैसा ही निभाएँ।
  • हर भोग पर एक दिन पहले तोड़ा गया तुलसी दल रखें।
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें और कथा पढ़ें या सुनें।
  • शाम को भगवान विष्णु के सामने और तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
  • रात का कम से कम कुछ भाग कीर्तन या जप में जागें।
  • ज़रूरतमंद को भोजन या जल दें, और द्वादशी को पारण से पहले दान करें।
  • द्वादशी को पारण के समय के भीतर ही व्रत खोलें।
  • ज़रूरतमंदों को अन्न, तिल या जल दें।

क्या न करें

  • एकादशी को चावल, गेहूँ, दाल या कोई भी अन्न न खाएँ।
  • एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें।
  • दशमी से द्वादशी तक प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और मदिरा से दूर रहें।
  • दिन में न सोएँ।
  • झगड़ा, झूठ और कटु वचन से बचें।
  • हरि वासर में व्रत न खोलें, और द्वादशी बीतने से पहले पारण कर लें।
  • बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं और बच्चों पर कठोर व्रत का दबाव न डालें; डायबिटीज़ या किसी और बीमारी वाले, या रोज़ दवा लेने वाले लोग व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।
  • बहुत से लोग दशमी से पारण तक नमक, और किसी दूसरे के घर का भोजन, नहीं लेते।

देश भर में

वरूथिनी एकादशी का भोग और प्रसाद

  • फल और दूध सबसे सरल फलाहार: दिन भर मौसमी फल, दूध, दही या छाछ।
  • साबूदाना खिचड़ी आलू और सेंधा नमक के साथ साबूदाना, अक्सर मूँगफली डालकर; कई घरों का पारंपरिक व्रत भोजन।
  • कुट्टू या सिंघाड़े की पूरी आलू की सब्ज़ी के साथ, उन परिवारों में जहाँ यह आटा व्रत में लिया जाता है।
  • समा के चावल उत्तर भारत में व्रत के चावल के रूप में बनते हैं; कुछ परंपराएँ इन्हें भी अन्न मानकर नहीं लेतीं।
  • आलू, शकरकंद और अरबी उबले हुए, या घी में सेंधा नमक, जीरा और हरी मिर्च के साथ हल्के भुने।
  • मखाने भुने हुए या खीर के रूप में, भोग और व्रत दोनों के लिए।
  • कई लोगों के लिए बिना नमक वरूथिनी अक्सर बिल्कुल बिना नमक के, सेंधा नमक भी नहीं, रखी जाती है; फल, दूध और मखाने को नमक की ज़रूरत नहीं।
  • पारण का भोजन द्वादशी को पहले जल के साथ तुलसी दल या कोई फल, फिर घर का बना सादा भोजन; अन्न पारण के साथ फिर शुरू होता है।

आने वाले वर्षों में वरूथिनी एकादशी की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में वरूथिनी एकादशी की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षसोमवार, 13 अप्रैल 2026बीत गई
2027रविवार, 2 मई 2027आने वाली
2028गुरुवार, 20 अप्रैल 2028आने वाली

पंचांगों में वरूथिनी एकादशी की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग वरूथिनी एकादशी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: वरूथिनी एकादशी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

वरूथिनी एकादशी से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में वरूथिनी एकादशी कब है?

नई दिल्ली में वरूथिनी एकादशी रविवार, 2 मई 2027 को है। एकादशी तिथि शाम 6:54 (1 मई) से शाम 7:52 तक रहेगी, और व्रत उस दिन होता है जिसके सूर्योदय पर एकादशी हो। उत्तर भारत इसे वैशाख कृष्ण पक्ष में गिनता है और अमांत पंचांग चैत्र कृष्ण में; गर्मी की शुरुआत में आने वाली इस एकादशी पर बहुत से लोग बिना नमक का व्रत रखते हैं।

वरूथिनी एकादशी की तिथि क्या है?

वैशाख (पूर्णिमांत) / चैत्र (अमांत) मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 1 मई, शाम 6:54 से 2 मई, शाम 7:52 तक है, और वरूथिनी एकादशी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

वरूथिनी एकादशी का पारण कब करें?

सोमवार, 3 मई 2027 को सुबह 5:39 से सुबह 8:18 तक। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।

दूसरे कैलेंडर में वरूथिनी एकादशी की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल वरूथिनी एकादशी कब है?

2028 में गुरुवार, 20 अप्रैल।

वरूथिनी एकादशी क्यों रखी जाती है?

वरूथिनी एकादशी उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी है — अमांत गणना में चैत्र कृष्ण। वरूथिनी का अर्थ है रक्षा करने वाली, कवच जैसी। इस दिन भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा होती है। इसके नियमों में संयम पर ज़ोर है: कई लोग बिना नमक का व्रत रखते हैं, दूसरे के घर का भोजन नहीं करते, और ज़रूरतमंदों को अन्न, तिल या जल का दान करते हैं।

वरूथिनी एकादशी की व्रत कथा किस ग्रंथ में है?

कथा भविष्योत्तर पुराण, श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया एकादशी माहात्म्य में है। पूरी कथा ऊपर दी गई है।

क्या स्मार्त और वैष्णव वरूथिनी एकादशी अलग दिन है?

नहीं, इस बार दोनों रविवार, 2 मई 2027 को हैं। वैष्णव नियम एकादशी को अरुणोदय पर देखता है, और उस दिन अरुणोदय पर भी एकादशी है।

वरूथिनी एकादशी अप्रैल में है या मई में?

यह अप्रैल के मध्य से मई के शुरू के बीच पड़ती है, इसलिए ज़्यादातर वर्षों में अप्रैल में और कुछ में मई के पहले दिनों में। नई दिल्ली के लिए तारीख रविवार, 2 मई 2027 है, और बाकी वर्ष इस पेज की तालिका में हैं।

वरूथिनी एकादशी का पारण कब है?

पारण द्वादशी को होता है: नई दिल्ली में 3 मई, सुबह 5:39 से सुबह 8:18 तक, हरि वासर समाप्त होने (3 मई, रात 1:55) के बाद। जिन्होंने बिना नमक का व्रत रखा, वे प्रायः सादे भोजन से पहले जल, तुलसी दल और फल से व्रत खोलते हैं।

वरूथिनी एकादशी की व्रत कथा क्या है?

नर्मदा तट पर राज करने वाले राजा मांधाता वन में गहरे ध्यान में थे, तभी एक भालू उनका पैर पकड़कर घसीटने लगा। उन्होंने क्रोध में लड़ने के लिए अपना तप नहीं तोड़ा, बल्कि भगवान विष्णु को पुकारा, जिन्होंने सुदर्शन चक्र से भालू को मार दिया। पैर बुरी तरह घायल था; भगवान ने बताया कि यह पुराने कर्म का फल है, और उन्हें मथुरा जाकर वरूथिनी एकादशी रखने और वराह रूप की पूजा करने भेजा। उन्होंने ऐसा किया और स्वस्थ हो गए। पूरी कथा ऊपर है।

वरूथिनी एकादशी क्या है?

यह वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जो भगवान विष्णु के वराह रूप के लिए रखी जाती है। वरूथिनी का अर्थ है रक्षा करने वाली, कवच जैसी: पुराण कहता है कि इसका पुण्य लंबे तप के बराबर है और यह रखने वाले की रक्षा करती है। इसकी परंपराएँ संयम और दान की हैं, अक्सर बिना नमक का व्रत और अन्न, तिल व जल का दान।

वरूथिनी एकादशी बिना नमक के क्यों रखते हैं?

यह संयम की परंपरा है जो बहुत से परिवार खासकर इसी एकादशी पर निभाते हैं, सेंधा नमक तक छोड़कर; फलाहार के फल, दूध और मखाने को नमक की ज़रूरत नहीं होती। यह हर किसी के लिए अनिवार्य नहीं है, और जिन्हें सेहत के कारण नमक चाहिए, वे लें।

वरूथिनी पर दूसरे के घर का भोजन क्यों नहीं करते?

वरूथिनी संयम से रखी जाती है, और इसकी एक परंपरा है कि दशमी से पारण तक केवल अपने घर में बना भोजन लिया जाए, ताकि व्रत अपना ही रहे। जो परिवार इसे मानते हैं, वे इन दिनों कहीं और दिया गया भोजन विनम्रता से मना कर देते हैं।

वरूथिनी एकादशी का व्रत कैसे करें?

दशमी को अपने घर का एक बार भोजन करें। एकादशी को जल्दी स्नान करके संकल्प लें, तुलसी, पीले फूल, फल और दीपक से वराह रूप भगवान विष्णु की पूजा करें, और मांधाता की कथा पढ़ें। परंपरा हो तो बिना नमक का व्रत रखें, किसी को अन्न, तिल या जल दें, रात का कुछ भाग जागें और पारण के समय में व्रत खोलें।

वरूथिनी एकादशी पर विष्णु के किस रूप की पूजा होती है?

वराह, यानी वह अवतार जिन्होंने पृथ्वी को जल से ऊपर उठाया; कथा में भगवान मांधाता से मथुरा में इसी रूप की पूजा करने को कहते हैं। भगवान विष्णु का कोई भी चित्र या शालिग्राम लिया जा सकता है, प्रार्थना में वराह को याद करते हुए।

वरूथिनी एकादशी पर कौन सी आरती गाएँ?

सुबह की पूजा के बाद और शाम के दीपों के साथ भगवान विष्णु की आरती 'ॐ जय जगदीश हरे', जो ऊपर पूरी दी गई है। कुछ परिवार मांधाता की कथा के बाद व्रत पुस्तक से एकादशी माता की आरती भी गाते हैं।

वरूथिनी एकादशी पर क्या खाएँ?

फल, दूध, दही, मखाने, नारियल पानी, और परंपरा हो तो साबूदाना या सिंघाड़ा; बहुत से लोग यह दिन बिना नमक के रखते हैं, इसलिए वे चीज़ें सबसे ठीक हैं जिनमें नमक न चाहिए। तरबूज़ और खरबूज़ा इस मौसम के फल हैं। अन्न, दाल, प्याज़-लहसुन नहीं, और दूसरे के घर का बना कुछ भी नहीं।

वरूथिनी एकादशी पर क्या दान करें?

इस दिन के अपने दान अन्न, तिल और जल हैं: किसी ज़रूरतमंद को भोजन या अनाज, तिल, और गर्मी में राहगीरों के लिए रखा पानी। परंपरा दान के आकार से अधिक देने के भाव को महत्व देती है; अपने पारण से पहले दें।