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शुक्ल पक्ष · एकादशी तिथि · वैशाख

मोहिनी एकादशी 2027 कब है?

मोहिनी एकादशी 2027

202 दिन बाद

रवि, 16 मई

2027 में मोहिनी एकादशी रविवार, 16 मई को है। नई दिल्ली में पारण 17 मई को सुबह 5:29 से सुबह 8:12 तक है; एकादशी तिथि 15 मई, शाम 6:18 से 16 मई, शाम 5:14 तक रहेगी।

2028: शुक्रवार, 5 मई 2028

पारण

सुबह 5:29 – सुबह 8:12

नई दिल्ली

मोहिनी एकादशी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

मोहिनी एकादशी 2027: तारीख और तिथि का समय

रविवार, 16 मई 2027

तिथि
एकादशी, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
वैशाख
तिथि आरंभ
15 मई, शाम 6:18
तिथि समाप्त
16 मई, शाम 5:14
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
16 मई, सुबह 5:29

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: मोहिनी एकादशी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

मोहिनी एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

मोहिनी एकादशी 2027 शुभ मुहूर्त

मोहिनी एकादशी वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जो भगवान विष्णु के लिए रखी जाती है और उनके मोहिनी रूप का नाम लिए है; इसकी कथा वही है जो वसिष्ठ मुनि ने श्रीराम को सुनाई थी। नई दिल्ली में यह रविवार, 16 मई 2027 को है: व्रत सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है, और पारण का समय 17 मई, सुबह 5:29 से सुबह 8:12 तक है। यह गर्मी में, अप्रैल के अंत से मई के अंत के बीच आती है।

मोहिनी एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
पारण का समय17 मई, सुबह 5:29 से सुबह 8:12 तकद्वादशी की सुबह (दिन का पहला पाँचवाँ भाग); हरि वासर रात में ही समाप्त हो चुका है।

द्वादशी का वह समय, जिसमें मोहिनी एकादशी का व्रत पूरा किया जाता है। यह हरि वासर बीतने के बाद शुरू होता है और सामान्यतः सुबह के पहले भाग तक रहता है; हरि वासर देर तक चले तो पारण दोपहर के बाद होता है, और द्वादशी समाप्त होने के बाद कभी नहीं। यहाँ दिया समय नई दिल्ली के लिए गणना करके दिया गया है।

हरि वासर समाप्तिरात 11:02द्वादशी के पहले चौथाई भाग का अंत; इसके भीतर व्रत नहीं खोला जाता।

हरि वासर द्वादशी का पहला चौथाई भाग है। इसमें व्रत नहीं खोला जाता, चाहे सुबह हो चुकी हो, इसलिए नई दिल्ली में इसकी समाप्ति ही पारण का सबसे पहला क्षण है।

ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:06 से सुबह 4:48 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।

एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले का समय: उठने, स्नान करने और व्रत का संकल्प लेने का पारंपरिक समय।

सूर्योदयसुबह 5:29क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक गिना जाता है, और सुबह की पूजा इसके बाद होती है।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • चर सुबह 7:11 से सुबह 8:53 तक
  • लाभ सुबह 8:53 से सुबह 10:35 तक
  • अमृत सुबह 10:35 से दोपहर 12:17 तक
  • शुभ दोपहर 1:59 से दोपहर 3:41 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। जो परिवार भोर में पूजा नहीं कर पाते, वे मुख्य पूजा के लिए इनमें से कोई समय चुनते हैं।

प्रदोष काल: संध्या दीपशाम 7:05 से रात 9:10 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)।

सूर्यास्त के बाद का समय, जब भगवान विष्णु के आगे और तुलसी के पास दीप जलाए जाते हैं और फिर से आरती होती है।

निशीथ काल: रात्रि जागरणरात 11:56 से रात 12:38 (17 मई) तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, आधी रात के आसपास।

आधी रात का समय, जागरण का केंद्र। जो रात भर जागते हैं, वे यह भाग कीर्तन और जप को देते हैं।

राहु काल (वर्जित समय)इस समय टाला जाता हैशाम 5:23 से शाम 7:05 तकदिन का वह आठवाँ भाग जो वार के अनुसार राहु का है: इसमें पूजा, खरीदारी या यात्रा शुरू नहीं की जाती।

नई दिल्ली में एकादशी के दिन का राहु काल। बहुत से परिवार संकल्प या मुख्य पूजा इसके भीतर शुरू नहीं करते; इससे व्रत या पारण का समय नहीं बदलता।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तसुबह 11:50 से दोपहर 12:44शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:06 से सुबह 4:48शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालशाम 5:23 से शाम 7:05
यमगण्ड कालदोपहर 12:17 से दोपहर 1:59
दुर्मुहूर्त (पहला)शाम 5:16 से शाम 6:11
वर्ज्यम्शाम 7:57 से रात 9:33

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए रविवार, 16 मई 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पारण · नई दिल्ली

मोहिनी एकादशी 2027 पारण का समय

सोमवार, 17 मई 2027, सुबह 5:29 से सुबह 8:12

पारण द्वादशी को होता है, और हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग, जो इस बार 16 मई, रात 11:02 पर समाप्त होता है — में व्रत नहीं खोला जाता। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।

व्रत के बारे में यहाँ दी गई बातें परंपरा का वर्णन हैं, चिकित्सा सलाह नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या दवाइयों की स्थिति में व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

शुक्ल पक्ष · वैशाख

मोहिनी एकादशी 2027: स्मार्त और वैष्णव तारीख

इस पेज की तारीख (स्मार्त, सूर्योदय का नियम)
रविवार, 16 मई 2027 — जिस दिन के सूर्योदय पर एकादशी तिथि है, व्रत उसी दिन का माना जाता है — यही दिन एस्ट्रोसेज और यह साइट देती है।
वैष्णव (इस्कॉन), अरुणोदय का नियम
रविवार, 16 मई 2027 — इस बार वही दिन। वैष्णव नियम तिथि सूर्योदय पर नहीं, अरुणोदय — सूर्योदय से पहले के 96 मिनट — पर देखता है; रविवार, 16 मई 2027 का अरुणोदय (16 मई, रात 3:53) एकादशी में है, दशमी में नहीं।

ऊपर का हर दिन नई दिल्ली के लिए उन्हीं तिथि-क्षणों से निकाला गया है। इस्कॉन मंदिर हर शहर के लिए अपना कैलेंडर छापते हैं और कुछ वर्षों में महाद्वादशी के नियम से व्रत द्वादशी पर भी ले जाते हैं — आपके मंदिर का कैलेंडर अलग हो तो उसी का पालन करें।

महत्व और व्रत कथा

मोहिनी एकादशी व्रत कथा और महत्व

मोहिनी एकादशी वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसका नाम मोहिनी से है — समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु का वह रूप, जिसने अमृत को असुरों से बचाया था — और इस दिन विष्णु की पूजा उसी कथा के स्मरण के साथ होती है। पुराण में वसिष्ठ मुनि यह व्रत भगवान राम को बताते हैं, इसलिए राम मंदिरों में भी इसकी कथा पढ़ी जाती है।

मोहिनी एकादशी की कथा

संक्षेप में, अपने शब्दों में — स्रोत: कूर्म पुराण, एकादशी माहात्म्य, जहाँ वसिष्ठ मुनि यह कथा श्रीराम को सुनाते हैं और श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को।

सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नगरी में धनपाल नाम का एक वैश्य रहता था, जो यात्रियों के लिए कुएँ, धर्मशालाएँ और बाग़ बनवाने के लिए जाना जाता था। उसके पाँच पुत्र थे, और सबसे छोटा धृष्टबुद्धि जुए, मद्य और दूसरों को सताने में सब कुछ गँवा देता था।

अंत में पिता और भाइयों ने उसे घर से निकाल दिया। कुछ न बचा तो वह चोरी करने लगा, पकड़ा गया, दंड मिला, और भूखा-अकेला वन में भटकने लगा।

एक आश्रम दिखा तो वह कौंडिन्य ऋषि के पास पहुँचा, जो अभी-अभी गंगा में स्नान करके लौटे थे; उनके वस्त्र से पानी की एक बूँद उस पर गिरी और उसके भीतर कुछ बदल गया। उसने प्रणाम करके पूछा कि क्या उस जैसा व्यक्ति भी सुधर सकता है। ऋषि ने उसे वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी और उसका विधान बताया।

धृष्टबुद्धि ने ठीक वैसा ही व्रत रखा। पुराण कहता है कि उससे उसके बीते कर्मों का भार मिट गया और जीवन के अंत में वह गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक गया। वसिष्ठ श्रीराम से कहते हैं कि संसार में इसके समान कोई व्रत नहीं, और इसकी कथा पढ़ना या सुनना भी पुण्य देता है।

व्रत कैसे रखा जाता है

  • व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है। बहुत से परिवार एक दिन पहले, दशमी की शाम, एक बार सादा भोजन करते हैं।
  • एकादशी को अन्न और चावल नहीं लिए जाते। जो पूरा उपवास नहीं रख पाते वे फल, दूध या फलाहार लेते हैं; निर्जल व्रत वही रखते हैं जिनकी परंपरा और स्वास्थ्य इसकी अनुमति दें।
  • भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल, दीप और उनके नामों से होती है; उस दिन की कथा पढ़ना या सुनना व्रत का अंग है, और कई लोग रात का कुछ भाग कीर्तन या जप में जागकर बिताते हैं।
  • पारण द्वादशी को होता है, हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग — बीतने के बाद। आपके शहर का पारण समय ऊपर गणना करके दिया गया है।

उपवास के नियम यहाँ परंपरा के रूप में बताए गए हैं, चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या किसी दवा के चलते उपवास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

सभी 26 · नई दिल्ली

सभी एकादशी और उनकी अगली तारीख

साधारण वर्ष में चौबीस, और अधिक मास वाले वर्ष में दो और। हर एकादशी का अपना पेज है — कथा, पारण और स्मार्त-वैष्णव तारीख के साथ।

अगली एकादशी और उसका पारण · 2027 की सभी एकादशी — तिथि और पारण के समय के साथ

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

मोहिनी एकादशी पूजा विधि

  1. एक दिन पहले: दशमी

    दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार सादा भोजन करें, जिसमें प्याज़, लहसुन और चावल न हों, और शाम हल्के और शांत मन से बिताएँ। पूजा का स्थान साफ कर लें और ज़रूरत के तुलसी दल आज ही तोड़ लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।

  2. जल्दी उठें और गंगाजल से स्नान करें

    जल्दी, हो सके तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें और पानी में गंगाजल की कुछ बूँदें डालकर स्नान करें: कथा में कौंडिन्य ऋषि के गंगा से भीगे वस्त्र की एक बूँद से ही धृष्टबुद्धि का बदलना शुरू हुआ था। साफ कपड़े पहनें; भगवान विष्णु की पूजा में पीले वस्त्र पारंपरिक हैं।

  3. व्रत का संकल्प

    पूजा स्थान के सामने बैठकर दाहिने हाथ में थोड़ा जल और एक फूल लें और व्रत का संकल्प करें: अपना नाम लें, कहें कि आप भगवान विष्णु के लिए मोहिनी एकादशी का व्रत रख रहे हैं, और यह भी कि व्रत कैसा होगा, निर्जल, केवल जल पर, फलाहार पर या एक समय के फलाहारी भोजन के साथ। फिर जल धरती पर छोड़ दें। मंत्र वाले भाग का एकादशी संकल्प श्लोक यहाँ बोला जा सकता है।

  4. चौकी सजाएँ

    साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र रखें (घर में शालिग्राम या लड्डू गोपाल हों तो उन्हें), साथ में घी का दीपक और जल से भरा छोटा कलश या लोटा। हर पूजा की तरह पहले एक फूल और 'ॐ गं गणपतये नमः' से गणेश जी का स्मरण करें।

  5. भगवान विष्णु का पूजन

    धातु की प्रतिमा या शालिग्राम को पहले जल, फिर पंचामृत और फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ (चित्र हो तो फूल से जल छिड़कें)। चंदन, पीले फूल, पीला वस्त्र या मौली, धूप, दीप और एक दिन पहले तोड़े गए तुलसी दल अर्पित करें, साथ में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें। बहुत से घरों में एकादशी की पूजा में चावल बिल्कुल नहीं लिया जाता; अक्षत की जगह फूल या थोड़े तिल चढ़ाए जाते हैं।

  6. भोग लगाएँ

    भोग में वही रखें जो आप स्वयं फलाहार में लेंगे: फल, बिना अन्न की मिठाई, मखाने, मेवे या पंचामृत, और हर भोग पर एक तुलसी दल। एकादशी को अन्न या दाल से बना कुछ भी न चढ़ाया जाता है, न खाया जाता है।

  7. कथा और आरती

    नीचे दी गई मोहिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और हो सके तो विष्णु सहस्रनाम या गीता का एक अध्याय भी। फिर घी के दीपक या कपूर से 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती गाएँ और पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें।

  8. श्रीराम का स्मरण, जिन्हें यह व्रत बताया गया

    वसिष्ठ मुनि ने यह व्रत श्रीराम को बताया था, इसलिए बहुत से घरों और राम मंदिरों में आज भगवान विष्णु के साथ श्रीराम और सीता जी की भी पूजा होती है। कथा के बाद 'राम रामेति' श्लोक तीन बार पढ़ें।

  9. दिन भर

    संकल्प के अनुसार व्रत निभाएँ, मन में भगवान का नाम रखें और दिन में सोने, क्रोध, निंदा और कटु वचन से बचें। किसी ज़रूरतमंद को जल, फल या भोजन दें; दान हर एकादशी का अंग है।

  10. संध्या दीप

    सूर्यास्त पर भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक और तुलसी के पास एक दीपक जलाएँ, उसके पत्ते तोड़े बिना, और फिर से आरती गाएँ।

  11. रात्रि जागरण

    रात का जितना भाग हो सके, कीर्तन, जप या पाठ में जागकर बिताएँ; आधी रात का समय जागरण का केंद्र है। जो पूरी रात न जाग सकें, वे उसका कुछ भाग जागें।

  12. द्वादशी: दान के बाद पारण

    अगली सुबह स्नान करके संक्षेप में भगवान का पूजन करें और किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या दान दें। फिर पारण के समय के भीतर व्रत खोलें: पहले पारण का श्लोक बोलकर जल के साथ तुलसी दल या कोई फल, और उसके बाद सादा सात्विक भोजन।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

मोहिनी एकादशी पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र चित्र भी काफी है; धातु की प्रतिमा, शालिग्राम या लड्डू गोपाल को पूजा में स्नान कराया जाता है।
  • चौकी और पीला कपड़ा पीला भगवान विष्णु का रंग है; साफ लाल कपड़ा भी चलता है।
  • तुलसी दल दशमी को तोड़े हुए, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती; हर भोग पर एक रखा जाता है।
  • घी का दीपक और रुई की बत्ती एक पूजा के लिए और एक शाम को तुलसी के पास; तिल का तेल भी ले सकते हैं।
  • पीले फूल और माला गेंदा, चंपा या कोई भी ताज़े पीले फूल; मिल सके तो कमल।
  • चंदन भगवान के तिलक के लिए; हल्दी का लेप भी चलता है।
  • रोली और हल्दी तिलक और कलश पर निशान के लिए।
  • पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर; प्रतिमा के स्नान और प्रसाद के लिए।
  • गंगाजल स्नान के जल में कुछ बूँदें और पूजा स्थान की शुद्धि के लिए; न हो तो शुद्ध जल।
  • कलश या जल भरा लोटा स्नान, आचमन और संकल्प के लिए।
  • धूप और अगरबत्ती जो आप रोज़ लेते हैं।
  • कपूर, आरती की थाली और घंटी आरती के लिए; घर में शंख हो तो वह भी।
  • मौली (कलावा) भगवान के वस्त्र के रूप में चढ़ाने या कलाई पर बाँधने के लिए।
  • भगवान के लिए पीला वस्त्र ज़रूरी नहीं; मौली से भी काम चलता है।
  • मौसमी फल केला, सेब, अमरूद, अनार या जो ताज़ा मिले; भोग के बाद फलाहार में भी।
  • बिना अन्न की मिठाई मखाने की खीर, मिश्री, पेड़ा या मेवे; आटे या चावल से बनी कोई चीज़ नहीं।
  • थोड़े तिल जिन घरों में एकादशी की पूजा में चावल नहीं लिया जाता, वहाँ अक्षत की जगह चढ़ाने के लिए।
  • तुलसी की माला मंत्र के 108 जप के लिए।
  • व्रत कथा, विष्णु सहस्रनाम या गीता पुस्तक या फ़ोन; कथा पढ़ना व्रत का अंग है।
  • द्वादशी का दान पारण से पहले देने के लिए अन्न, फल, वस्त्र या दक्षिणा।
  • श्रीराम-सीता का चित्र, यदि हो बहुत से घरों में भगवान विष्णु के साथ पूजा जाता है, क्योंकि वसिष्ठ ने यह व्रत श्रीराम को बताया था।

मंत्र · अर्थ के साथ

मोहिनी एकादशी के मंत्र और आरती

शान्ताकारं: विष्णु ध्यान श्लोक

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

Shantakaram bhujagashayanam padmanabham suresham vishvadharam gaganasadrisham meghavarnam shubhangam
Lakshmikantam kamalanayanam yogibhir dhyanagamyam vande Vishnum bhavabhayaharam sarvalokaikanatham

अर्थ: मैं विष्णु को नमन करता हूँ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, देवताओं के स्वामी, संसार के आधार, आकाश जैसे व्यापक, मेघ जैसे श्याम, शुभ अंगों वाले, लक्ष्मी के प्रिय, कमल-नयन, योगियों के ध्यान से प्राप्त, संसार का भय हरने वाले और सभी लोकों के एकमात्र स्वामी।

कब और कैसे: पूजा शुरू करने से पहले हाथ जोड़कर एक बार, भगवान के उसी रूप का ध्यान करते हुए जो श्लोक बताता है।

एकादशी संकल्प श्लोक

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि ।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

Ekadashyam niraharah sthitvaham apare'hani
Bhokshyami pundarikaksha sharanam me bhavachyuta

अर्थ: हे कमलनयन, मैं एकादशी को निराहार रहकर अगले दिन भोजन करूँगा। हे अच्युत, आप मेरी शरण बनें।

कब और कैसे: सुबह व्रत का संकल्प लेते समय, दाहिने हाथ में जल लेकर एक बार।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (द्वादशाक्षर मंत्र)

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

Om Namo Bhagavate Vasudevaya

अर्थ: ॐ, भगवान वासुदेव को नमस्कार, यानी सब प्राणियों में बसने वाले विष्णु को। यही मंत्र भागवत पुराण में नारद जी ने बालक ध्रुव को दिया था।

कब और कैसे: एकादशी का मुख्य जप: पूजा में तुलसी की माला पर 108 बार, और दिन भर व रात्रि जागरण में जितनी बार चाहें।

श्रीराम राम रामेति: राम-नाम का श्लोक

श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥

Shri Rama Rama Rameti rame Rame manorame
Sahasranama tattulyam Ramanama varanane

अर्थ: राम, राम, राम कहते हुए मैं मन को आनंद देने वाले राम में रमता हूँ। हे सुमुखी, राम-नाम सहस्र नामों के बराबर है। विष्णु सहस्रनाम के अंत में पार्वती से शिव के वचन।

कब और कैसे: तीन बार; परंपरा में समय कम हो तो पूरे विष्णु सहस्रनाम की जगह।

पारण का श्लोक

अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव ।
प्रसीद सुमुखो नाथ ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥

Ajnana-timirandhasya vratenanena Keshava
Prasida sumukho natha jnana-drishti-prado bhava

अर्थ: हे केशव, अज्ञान के अंधकार से अंधे हुए मुझ पर इस व्रत से प्रसन्न हों। हे नाथ, कृपा करें और ज्ञान की दृष्टि दें।

कब और कैसे: द्वादशी को पारण के समय के भीतर, पहला घूँट जल या पहला फल लेने से पहले एक बार।

आरती विष्णु जी की आरती: ॐ जय जगदीश हरे पूरी आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.
Om jai Jagdish hare.

Jo dhyave phal pave, dukh binse man ka, swami dukh binse man ka.
Sukh sampati ghar aave, sukh sampati ghar aave, kasht mite tan ka.
Om jai Jagdish hare.

Maat pita tum mere, sharan gahoon kiski, swami sharan gahoon main kiski.
Tum bin aur na dooja, tum bin aur na dooja, aas karoon main jiski.
Om jai Jagdish hare.

Tum pooran Parmatma, tum antaryami, swami tum antaryami.
Parabrahm Parmeshwar, Parabrahm Parmeshwar, tum sab ke swami.
Om jai Jagdish hare.

Tum karuna ke sagar, tum palankarta, swami tum palankarta.
Main moorakh phalkami, main sevak tum swami, kripa karo bharta.
Om jai Jagdish hare.

Tum ho ek agochar, sabke pranpati, swami sabke pranpati.
Kis vidhi miloon dayamay, kis vidhi miloon dayamay, tumko main kumati.
Om jai Jagdish hare.

Deen-bandhu dukh-harta, thakur tum mere, swami rakshak tum mere.
Apne haath uthao, apne sharan lagao, dwar pada tere.
Om jai Jagdish hare.

Vishay-vikar mitao, paap haro deva, swami paap haro deva.
Shraddha bhakti badhao, shraddha bhakti badhao, santan ki seva.

Om jai Jagdish hare, swami jai Jagdish hare.
Bhakt janon ke sankat, das janon ke sankat, kshan mein door kare.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'स्वामी' की जगह 'प्रभु', 'क्षण में' की जगह 'छिनमें' और 'फलकामी' की जगह 'खल कामी' छपा है; उसमें आधी पंक्तियाँ दोहराई नहीं गई हैं, 'दास जनों के संकट', 'मैं सेवक तुम स्वामी' और 'अपने शरण लगाओ' नहीं हैं, और 'ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे' की जगह 'तुम ठाकुर मेरे' है। छपा पाठ

महत्व

मोहिनी एकादशी का महत्व

इसका पालन गर्मी के साथ चलता है। कथा के वणिक पिता कुएँ, धर्मशालाएँ और राहगीरों के लिए बगीचे बनवाने के लिए जाने जाते थे, और बहुत से लोग इस दिन को उसी तरह मनाते हैं: रास्ते के लोगों के लिए पानी, छाया और विश्राम की जगह। यह अक्षय तृतीया के लगभग एक सप्ताह बाद आती है, और कुछ दिन बाद नृसिंह जयंती और बुद्ध पूर्णिमा। बहुत से लोग इसे किसी एक आदत की पकड़ तोड़ने के लिए भी रखते हैं, संकल्प में उसका नाम लेकर।

यह कथा बदलाव की है: धृष्टबुद्धि, एक वैश्य का बेटा जिसने सब कुछ गँवा दिया था, एक ऋषि के वस्त्र से गिरी जल की बूँद और इस व्रत से बदल गया, और पुराण कहता है कि वह विष्णुलोक गया। वसिष्ठ श्रीराम से कहते हैं कि संसार में इसके समान कोई व्रत नहीं। यह अप्रैल के अंत से मई के अंत के बीच आती है।

उपाय · परंपरा

मोहिनी एकादशी के पारंपरिक उपाय

गंगाजल की एक बूँद

गंगाजल की कुछ बूँदों से स्नान करें, और घर में भी थोड़ा छिड़कें; कथा में ऋषि के वस्त्र की एक बूँद से ही एक बिगड़ा जीवन बदलना शुरू हुआ था।

नई शुरुआत का संकल्प

धृष्टबुद्धि ने पूछा था कि क्या उस जैसा व्यक्ति भी सुधर सकता है। कोई आदत छोड़ना चाहते हों, तो संकल्प में उसका नाम लें और उसे छोड़ने की शक्ति के लिए व्रत भगवान विष्णु को अर्पित करें।

कुएँ, छाँव और पानी

कथा के पिता धनपाल यात्रियों के लिए कुएँ, धर्मशालाएँ और बाग़ बनवाने के लिए जाने जाते थे। वैशाख की गर्मी में यात्रियों और बाहर काम करने वालों को पानी, छाँव या भोजन दें।

राम-नाम

कथा के बाद 'राम रामेति' श्लोक तीन बार पढ़ें, क्योंकि वसिष्ठ ने यह व्रत श्रीराम को बताया था, और पास में राम मंदिर हो तो दर्शन करें।

कथा सुनें

वसिष्ठ श्रीराम से कहते हैं कि यह कथा पढ़ना या सुनना भी पुण्य देता है। इसे घर में सबको पढ़कर सुनाएँ, या मंदिर में सुनें।

जिसने उसे बर्बाद किया, उससे दूर

जुए, मद्य और क्रूरता ने धृष्टबुद्धि को बर्बाद किया। यह दिन, और हो सके तो पूरा मौसम, इन तीनों से दूर रखें।

परंपरा, संक्षेप में

मोहिनी एकादशी पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार हल्का सात्विक भोजन करें।
  • सुबह संकल्प लें और जैसा व्रत तय किया, वैसा ही निभाएँ।
  • हर भोग पर एक दिन पहले तोड़ा गया तुलसी दल रखें।
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें और कथा पढ़ें या सुनें।
  • शाम को भगवान विष्णु के सामने और तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
  • रात का कम से कम कुछ भाग कीर्तन या जप में जागें।
  • ज़रूरतमंद को भोजन या जल दें, और द्वादशी को पारण से पहले दान करें।
  • द्वादशी को पारण के समय के भीतर ही व्रत खोलें।
  • गंगाजल की कुछ बूँदों से स्नान करें; कथा में बदलाव एक ही बूँद से शुरू हुआ था।

क्या न करें

  • एकादशी को चावल, गेहूँ, दाल या कोई भी अन्न न खाएँ।
  • एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें।
  • दशमी से द्वादशी तक प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और मदिरा से दूर रहें।
  • दिन में न सोएँ।
  • झगड़ा, झूठ और कटु वचन से बचें।
  • हरि वासर में व्रत न खोलें, और द्वादशी बीतने से पहले पारण कर लें।
  • बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं और बच्चों पर कठोर व्रत का दबाव न डालें; डायबिटीज़ या किसी और बीमारी वाले, या रोज़ दवा लेने वाले लोग व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।
  • खेल में भी जुआ न खेलें; कथा का धृष्टबुद्धि इसी में सब कुछ गँवा बैठा था।

देश भर में

मोहिनी एकादशी का भोग और प्रसाद

  • फल और दूध सबसे सरल फलाहार: दिन भर मौसमी फल, दूध, दही या छाछ।
  • साबूदाना खिचड़ी आलू और सेंधा नमक के साथ साबूदाना, अक्सर मूँगफली डालकर; कई घरों का पारंपरिक व्रत भोजन।
  • कुट्टू या सिंघाड़े की पूरी आलू की सब्ज़ी के साथ, उन परिवारों में जहाँ यह आटा व्रत में लिया जाता है।
  • समा के चावल उत्तर भारत में व्रत के चावल के रूप में बनते हैं; कुछ परंपराएँ इन्हें भी अन्न मानकर नहीं लेतीं।
  • आलू, शकरकंद और अरबी उबले हुए, या घी में सेंधा नमक, जीरा और हरी मिर्च के साथ हल्के भुने।
  • मखाने भुने हुए या खीर के रूप में, भोग और व्रत दोनों के लिए।
  • सेंधा नमक व्रत रखने वाले ज़्यादातर लोग साधारण नमक की जगह यही लेते हैं; कुछ लोग इस दिन नमक बिल्कुल नहीं लेते।
  • पारण का भोजन द्वादशी को पहले जल के साथ तुलसी दल या कोई फल, फिर घर का बना सादा भोजन; अन्न पारण के साथ फिर शुरू होता है।

आने वाले वर्षों में मोहिनी एकादशी की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में मोहिनी एकादशी की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षसोमवार, 27 अप्रैल 2026बीत गई
2027रविवार, 16 मई 2027आने वाली
2028शुक्रवार, 5 मई 2028आने वाली

पंचांगों में मोहिनी एकादशी की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग मोहिनी एकादशी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: मोहिनी एकादशी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

मोहिनी एकादशी से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में मोहिनी एकादशी कब है?

नई दिल्ली में मोहिनी एकादशी रविवार, 16 मई 2027 को है। एकादशी तिथि शाम 6:18 (15 मई) से शाम 5:13 तक रहेगी, और व्रत उस दिन होता है जिसके सूर्योदय पर एकादशी हो। यह वैशाख शुक्ल पक्ष में, अक्षय तृतीया के लगभग एक हफ़्ते बाद, गर्मी के चरम दिनों में आती है, इसलिए व्रत रखने वाले पानी और छाँव का ध्यान रखते हैं।

मोहिनी एकादशी की तिथि क्या है?

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 15 मई, शाम 6:18 से 16 मई, शाम 5:14 तक है, और मोहिनी एकादशी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

मोहिनी एकादशी का पारण कब करें?

सोमवार, 17 मई 2027 को सुबह 5:29 से सुबह 8:12 तक। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) सूर्योदय से पहले समाप्त हो चुका है, इसलिए पारण प्रातःकाल — दिन के उजाले के पहले पाँचवें भाग — में है।

दूसरे कैलेंडर में मोहिनी एकादशी की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल मोहिनी एकादशी कब है?

2028 में शुक्रवार, 5 मई।

मोहिनी एकादशी क्यों रखी जाती है?

मोहिनी एकादशी वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसका नाम मोहिनी से है — समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु का वह रूप, जिसने अमृत को असुरों से बचाया था — और इस दिन विष्णु की पूजा उसी कथा के स्मरण के साथ होती है। पुराण में वसिष्ठ मुनि यह व्रत भगवान राम को बताते हैं, इसलिए राम मंदिरों में भी इसकी कथा पढ़ी जाती है।

मोहिनी एकादशी की व्रत कथा किस ग्रंथ में है?

कथा कूर्म पुराण, एकादशी माहात्म्य, जहाँ वसिष्ठ मुनि यह कथा श्रीराम को सुनाते हैं और श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को में है। पूरी कथा ऊपर दी गई है।

क्या स्मार्त और वैष्णव मोहिनी एकादशी अलग दिन है?

नहीं, इस बार दोनों रविवार, 16 मई 2027 को हैं। वैष्णव नियम एकादशी को अरुणोदय पर देखता है, और उस दिन अरुणोदय पर भी एकादशी है।

मोहिनी एकादशी अप्रैल में है या मई में?

किसी में भी: यह अप्रैल के आख़िरी हफ़्ते से मई के आख़िरी हफ़्ते के बीच पड़ती है। नई दिल्ली के लिए तारीख रविवार, 16 मई 2027 है, और बाकी वर्ष इस पेज की तालिका में हैं।

मोहिनी एकादशी का पारण कब है?

अगली सुबह, द्वादशी को: नई दिल्ली में 17 मई, सुबह 5:29 से सुबह 8:12 तक, हरि वासर समाप्त होने (रात 11:02) के बाद। गर्मी में व्रत धीरे खोलें, पहले भोजन से पहले जल, तुलसी दल और फल के साथ।

मोहिनी एकादशी की व्रत कथा क्या है?

भद्रावती के दानी वैश्य धनपाल का सबसे छोटा बेटा धृष्टबुद्धि जुए, मद्य और क्रूरता में सब गँवा बैठा, घर से निकाला गया, चोरी करने लगा और दंड पाया। वन में भटकते हुए वह गंगा स्नान करके लौटे कौंडिन्य ऋषि के पास पहुँचा, और ऋषि के वस्त्र से जल की एक बूँद उस पर गिरी; उसके भीतर कुछ बदल गया। ऋषि ने उसे वैशाख की मोहिनी एकादशी बताई, और व्रत ने उसके बीते कर्मों का भार मिटा दिया। पूरी कथा ऊपर है।

मोहिनी एकादशी क्या है, और इसे मोहिनी क्यों कहते हैं?

यह वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जो भगवान विष्णु के लिए रखी जाती है। इसका नाम मोहिनी से है, वह मनमोहक रूप जो भगवान ने समुद्र मंथन के समय धारण किया, जब असुरों ने अमृत कलश छीन लिया था और मोहिनी ने उसे देवताओं के लिए वापस पाया। यह दिन उसी कथा के स्मरण के साथ रखा जाता है; इसकी अपनी व्रत कथा धृष्टबुद्धि की है।

मोहिनी एकादशी का महत्व क्या है?

कूर्म पुराण में वसिष्ठ श्रीराम से कहते हैं कि संसार में इसके समान कोई व्रत नहीं, और इसकी कथा एक बिगड़े जीवन को इसी से बदलते दिखाती है। इसलिए यह नई शुरुआत की, बीते गलत कामों के भार से मुक्ति की एकादशी के रूप में रखी जाती है, और राम मंदिरों में पढ़ी जाती है क्योंकि स्वयं श्रीराम को यह बताई गई थी।

मोहिनी एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?

मुख्य जप 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' है, तुलसी की माला पर 108 बार। वसिष्ठ ने यह व्रत श्रीराम को बताया था, इसलिए बहुत से लोग 'राम रामेति' श्लोक भी तीन बार पढ़ते हैं, जिसे परंपरा पूरे विष्णु सहस्रनाम के बराबर मानती है। दोनों अर्थ सहित मंत्र वाले भाग में हैं।

मोहिनी एकादशी का श्रीराम से क्या संबंध है?

कथा कौन सुनाता है, इससे। कूर्म पुराण में श्रीराम के गुरु वसिष्ठ मुनि यह एकादशी श्रीराम को बताते हैं, और बाद में श्रीकृष्ण इसे युधिष्ठिर को दोहराते हैं। इसलिए राम मंदिरों में मोहिनी की कथा पढ़ी जाती है, और बहुत से घरों में इस दिन भगवान विष्णु के साथ श्रीराम-सीता की पूजा होती है।

मोहिनी एकादशी पर क्या करें?

थोड़े गंगाजल से स्नान करें, संकल्प लें, तुलसी, पीले फूल और घी के दीपक से भगवान विष्णु की पूजा करें, धृष्टबुद्धि की कथा और 'राम रामेति' श्लोक पढ़ें, व्रत रखें और रात का कुछ भाग कीर्तन में बिताएँ, और गर्मी में किसी को पानी या भोजन दें। द्वादशी को पारण के समय में व्रत खोलें।

मोहिनी एकादशी के व्रत में क्या खाएँ?

भारत के बड़े भाग में यह साल का सबसे गरम समय होता है, इसलिए फलाहार हल्का और रसीला रखें: तरबूज़, खरबूज़ा, खीरा, आम, दही, सेंधा नमक वाली छाछ और नारियल पानी, और ज़रूरत हो तो साबूदाना या मखाने। पारण तक अन्न, दाल, प्याज़-लहसुन नहीं।

मोहिनी एकादशी के उपाय क्या हैं?

पारंपरिक उपाय कथा से आते हैं: गंगाजल से स्नान, नई शुरुआत के लिए अर्पित व्रत, गर्मी में यात्रियों के लिए पानी और छाँव, राम-नाम, कथा सुनना, और जुए व मद्य से दूरी। ये भक्ति और अनुशासन के काम हैं, कोई गारंटी नहीं।

मोहिनी एकादशी व्रत का क्या फल है?

पुराण कहता है कि इसने धृष्टबुद्धि के बीते कर्मों का भार मिटाया और उसे विष्णुलोक पहुँचाया, और कथा सुनना भी पुण्य देता है; ये परंपरा के वचन हैं, जो श्रद्धा से माने जाते हैं। इसका सबसे सीधा फल वही है जो कथा दिखाती है: रुककर, मुड़कर, फिर से शुरू करने का एक दिन।