2027 में आमलकी एकादशी गुरुवार, 18 मार्च को है। नई दिल्ली में पारण 19 मार्च को सुबह 7:13 से सुबह 8:51 तक है; एकादशी तिथि 18 मार्च, सुबह 4:21 से 19 मार्च, रात 1:52 तक रहेगी।
आमलकी एकादशी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।
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ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: आमलकी एकादशी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।
आमलकी एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली
आमलकी एकादशी 2027 शुभ मुहूर्त
आमलकी एकादशी फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी है, होली से कुछ दिन पहले, जो आंवले के वृक्ष की पूजा के साथ भगवान विष्णु के लिए रखी जाती है। नई दिल्ली में यह गुरुवार, 18 मार्च 2027 को है: व्रत सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है, और पारण का समय 19 मार्च, सुबह 7:13 से सुबह 8:51 तक है। वाराणसी में यही दिन रंगभरी एकादशी है, जब काशी विश्वनाथ में होली शुरू होती है।
आमलकी एकादशी 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्त
नई दिल्ली में समय
किसके लिए
पारण का समय
19 मार्च, सुबह 7:13 से सुबह 8:51 तकहरि वासर समाप्त होने से प्रातःकाल (दिन का पहला पाँचवाँ भाग) के अंत तक।
द्वादशी का वह समय, जिसमें आमलकी एकादशी का व्रत पूरा किया जाता है। यह हरि वासर बीतने के बाद शुरू होता है और सामान्यतः सुबह के पहले भाग तक रहता है; हरि वासर देर तक चले तो पारण दोपहर के बाद होता है, और द्वादशी समाप्त होने के बाद कभी नहीं। यहाँ दिया समय नई दिल्ली के लिए गणना करके दिया गया है।
हरि वासर समाप्ति
19 मार्च, सुबह 7:13द्वादशी के पहले चौथाई भाग का अंत; इसके भीतर व्रत नहीं खोला जाता।
हरि वासर द्वादशी का पहला चौथाई भाग है। इसमें व्रत नहीं खोला जाता, चाहे सुबह हो चुकी हो, इसलिए नई दिल्ली में इसकी समाप्ति ही पारण का सबसे पहला क्षण है।
ब्रह्म मुहूर्त
सुबह 4:52 से सुबह 5:40 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।
एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले का समय: उठने, स्नान करने और व्रत का संकल्प लेने का पारंपरिक समय।
सूर्योदय
सुबह 6:27क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।
व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक गिना जाता है, और सुबह की पूजा इसके बाद होती है।
शुभ चौघड़िया (दिन): आंवले की पूजा के लिए
शुभसुबह 6:27 से सुबह 7:58 तक
चरसुबह 10:59 से दोपहर 12:29 तक
लाभदोपहर 12:29 से दोपहर 1:59 तक
अमृतदोपहर 1:59 से दोपहर 3:30 तक
शुभशाम 5:00 से शाम 6:31 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया। आंवले के पेड़ की पूजा प्रायः सुबह होती है; जो भोर में पेड़ तक न पहुँच सकें, वे इनमें से कोई समय चुनते हैं।
प्रदोष काल: संध्या दीप
शाम 6:31 से रात 8:54 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)।
सूर्यास्त के बाद का समय, जब भगवान विष्णु के आगे और तुलसी के पास दीप जलाए जाते हैं और फिर से आरती होती है।
निशीथ काल: रात्रि जागरण
19 मार्च, रात 12:05 से रात 12:52 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, आधी रात के आसपास।
आधी रात का समय, जागरण का केंद्र। जो रात भर जागते हैं, वे यह भाग कीर्तन और जप को देते हैं।
राहु काल (वर्जित समय)इस समय टाला जाता है
दोपहर 1:59 से दोपहर 3:30 तकदिन का वह आठवाँ भाग जो वार के अनुसार राहु का है: इसमें पूजा, खरीदारी या यात्रा शुरू नहीं की जाती।
नई दिल्ली में एकादशी के दिन का राहु काल। बहुत से परिवार संकल्प या मुख्य पूजा इसके भीतर शुरू नहीं करते; इससे व्रत या पारण का समय नहीं बदलता।
उस दिन के शुभ समय
उस दिन के शुभ समय
मुहूर्त
नई दिल्ली में समय
प्रकृति
अभिजित मुहूर्त
दोपहर 12:05 से दोपहर 12:53
शुभ
अमृत काल
रात 9:25 से रात 10:54
सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्त
सुबह 4:52 से सुबह 5:40
शुभ
जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।
जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधि
नई दिल्ली में समय
राहु काल
दोपहर 1:59 से दोपहर 3:30
यमगण्ड काल
सुबह 6:27 से सुबह 7:58
दुर्मुहूर्त (पहला)
सुबह 10:28 से सुबह 11:17
दुर्मुहूर्त (दूसरा)
दोपहर 3:18 से शाम 4:06
वर्ज्यम्
दोपहर 12:32 से दोपहर 2:01
ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए गुरुवार, 18 मार्च 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।
पारण · नई दिल्ली
आमलकी एकादशी 2027 पारण का समय
शुक्रवार, 19 मार्च 2027, सुबह 7:13 से सुबह 8:51
पारण द्वादशी को होता है, और हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग, जो इस बार 19 मार्च, सुबह 7:13 पर समाप्त होता है — में व्रत नहीं खोला जाता। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) प्रातःकाल के भीतर समाप्त होता है, इसलिए पारण उसके ख़त्म होने के बाद से प्रातःकाल के अंत तक है।
व्रत के बारे में यहाँ दी गई बातें परंपरा का वर्णन हैं, चिकित्सा सलाह नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या दवाइयों की स्थिति में व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें।
शुक्ल पक्ष · फाल्गुन
आमलकी एकादशी 2027: स्मार्त और वैष्णव तारीख
इस पेज की तारीख (स्मार्त, सूर्योदय का नियम)
गुरुवार, 18 मार्च 2027 — जिस दिन के सूर्योदय पर एकादशी तिथि है, व्रत उसी दिन का माना जाता है — यही दिन एस्ट्रोसेज और यह साइट देती है।
वैष्णव (इस्कॉन), अरुणोदय का नियम
गुरुवार, 18 मार्च 2027 — इस बार वही दिन। वैष्णव नियम तिथि सूर्योदय पर नहीं, अरुणोदय — सूर्योदय से पहले के 96 मिनट — पर देखता है; गुरुवार, 18 मार्च 2027 का अरुणोदय (18 मार्च, सुबह 4:51) एकादशी में है, दशमी में नहीं।
ऊपर का हर दिन नई दिल्ली के लिए उन्हीं तिथि-क्षणों से निकाला गया है। इस्कॉन मंदिर हर शहर के लिए अपना कैलेंडर छापते हैं और कुछ वर्षों में महाद्वादशी के नियम से व्रत द्वादशी पर भी ले जाते हैं — आपके मंदिर का कैलेंडर अलग हो तो उसी का पालन करें।
महत्व और व्रत कथा
आमलकी एकादशी व्रत कथा और महत्व
अन्य नाम: रंगभरी एकादशी।
आमलकी एकादशी फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी है, होली से कुछ दिन पहले। इसकी विधि आंवले के वृक्ष की पूजा है, जिसमें भगवान विष्णु का वास माना जाता है: लोग वृक्ष को जल देते हैं, उस पर सूत लपेटते हैं, नीचे दीप जलाते हैं और उसके पास रात्रि जागरण करते हैं। वाराणसी में यही दिन रंगभरी एकादशी है — माना जाता है कि विवाह के बाद भगवान शिव इसी दिन माता पार्वती को काशी लाए थे — और काशी विश्वनाथ में रंग से नगर की होली शुरू होती है।
आमलकी एकादशी की कथा
संक्षेप में, अपने शब्दों में — स्रोत: ब्रह्मांड पुराण, श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया एकादशी माहात्म्य।
वैदिश नगर में राजा चैत्ररथ के राज्य में हर नागरिक विष्णु भक्त था और हर एकादशी रखी जाती थी। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को राजा और प्रजा नदी किनारे के मंदिर में एकत्र हुए, वहाँ आंवले के वृक्ष की पूजा की और रात भर भजन में जागते रहे।
उस रात दिन भर के बिना शिकार भूखा एक बहेलिया भोजन की आशा में मंदिर आया। भोजन नहीं मिला — सब उपवास पर थे — तो वह भीड़ के किनारे बैठ गया और, कुछ और न सूझने पर, रात भर भगवान की कथाएँ और उस दिन का महत्व सुनता रहा। भोर में घर जाकर उसने भोजन किया।
समय पर बहेलिये की मृत्यु हुई, और उस एक रात के कारण — अनचाहे उपवास और संयोग से किए जागरण के कारण — वह जयंती नगर का राजा वसुरथ बनकर जन्मा। एक दिन वन में अकेले सोते समय शत्रुओं ने उसे घेर लिया। उनके शस्त्र उसे छू भी न सके, और उसके शरीर से एक तेजस्वी देवी प्रकट होकर उनका नाश कर गई।
आकाशवाणी ने बताया कि वह पिछले जन्म में रखी आमलकी एकादशी की शक्ति है। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि जब अनजाने का व्रत भी ऐसी रक्षा करता है, तो जानकर रखे व्रत का पुण्य अपार है।
व्रत कैसे रखा जाता है
व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक चलता है। बहुत से परिवार एक दिन पहले, दशमी की शाम, एक बार सादा भोजन करते हैं।
एकादशी को अन्न और चावल नहीं लिए जाते। जो पूरा उपवास नहीं रख पाते वे फल, दूध या फलाहार लेते हैं; निर्जल व्रत वही रखते हैं जिनकी परंपरा और स्वास्थ्य इसकी अनुमति दें।
भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल, दीप और उनके नामों से होती है; उस दिन की कथा पढ़ना या सुनना व्रत का अंग है, और कई लोग रात का कुछ भाग कीर्तन या जप में जागकर बिताते हैं।
पारण द्वादशी को होता है, हरि वासर — द्वादशी का पहला चौथाई भाग — बीतने के बाद। आपके शहर का पारण समय ऊपर गणना करके दिया गया है।
उपवास के नियम यहाँ परंपरा के रूप में बताए गए हैं, चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं। गर्भावस्था, मधुमेह, बढ़ती उम्र या किसी दवा के चलते उपवास से पहले डॉक्टर से सलाह लें।
सभी 26 · नई दिल्ली
सभी एकादशी और उनकी अगली तारीख
साधारण वर्ष में चौबीस, और अधिक मास वाले वर्ष में दो और। हर एकादशी का अपना पेज है — कथा, पारण और स्मार्त-वैष्णव तारीख के साथ।
हर एकादशी का व्रत एक ही ढंग से रखा जाता है: दशमी को एक समय सात्विक भोजन, सुबह संकल्प, तुलसी के साथ विष्णु पूजा, कथा और आरती, शाम को दीप, रात्रि जागरण और द्वादशी को पारण। ये चरण एकादशी व्रत विधि में हैं। नीचे वे चरण हैं जो आमलकी एकादशी में जुड़ते हैं या अलग ढंग से किए जाते हैं।
व्रत का संकल्प
पूजा स्थान के सामने बैठकर दाहिने हाथ में थोड़ा जल और एक फूल लें और व्रत का संकल्प करें: अपना नाम लें, कहें कि आप भगवान विष्णु के लिए आमलकी एकादशी का व्रत रख रहे हैं, और यह भी कि व्रत कैसा होगा, निर्जल, केवल जल पर, फलाहार पर या एक समय के फलाहारी भोजन के साथ। फिर जल धरती पर छोड़ दें। मंत्र वाले भाग का एकादशी संकल्प श्लोक यहाँ बोला जा सकता है।
आंवले के वृक्ष की पूजा
किसी बगीचे, मंदिर या अपने आँगन के आंवले के पेड़ के पास जाएँ। जड़ में जल चढ़ाएँ, रोली, हल्दी, फूल और दीपक अर्पित करें, और परिक्रमा करते हुए तने पर कच्चा सूत लपेटें, उसमें वास करने वाले माने गए भगवान विष्णु की प्रार्थना करते हुए। पास में पेड़ न हो, तो चौकी पर आंवले का पौधा या आंवले के फल की पूजा करें।
कथा और आरती
नीचे दी गई आमलकी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और हो सके तो विष्णु सहस्रनाम या गीता का एक अध्याय भी। फिर घी के दीपक या कपूर से 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती गाएँ और पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें।
आंवले के पास रात्रि जागरण
कथा में वैदिश के लोग मंदिर के आंवले के पेड़ के पास रात भर भजन में जागे थे। रात का जितना भाग हो सके, कीर्तन में बिताएँ, सुरक्षित हो तो पेड़ के पास, नहीं तो चौकी पर रखे आंवले के पास।
सामग्री · पहले से तैयार रखें
आमलकी एकादशी पूजा सामग्री सूची
हर एकादशी की पूजा सामग्री (विष्णु की प्रतिमा, दशमी को तोड़े तुलसी के पत्ते, घी का दीपक, पीले फूल, पंचामृत, गंगाजल आदि) एकादशी पूजा सामग्री सूची में है। आमलकी एकादशी के लिए इसके साथ:
आंवले का वृक्ष, या आंवले के फलदिन की विधि आंवले के पेड़ की पूजा है; पेड़ न हो तो चौकी पर पौधा या आंवले के फल।
कच्चा सूतपरिक्रमा करते हुए आंवले के पेड़ पर लपेटने के लिए।
गुलाल (वाराणसी में)रंगभरी एकादशी के लिए, जब काशी विश्वनाथ में शिव-पार्वती को रंग अर्पित होता है।
मंत्र · अर्थ के साथ
आमलकी एकादशी के मंत्र और आरती
हर एकादशी में पढ़े जाने वाले श्लोक — ध्यान और संकल्प से लेकर पारण के श्लोक तक — और ॐ जय जगदीश हरे आरती एकादशी गाइड के एकादशी के मंत्र और आरती वाले हिस्से में हैं। आमलकी एकादशी के अपने:
ॐ नमः शिवाय (काशी की रंगभरी के लिए)
ॐ नमः शिवाय
Om Namah Shivaya
अर्थ: ॐ, भगवान शिव को नमस्कार। ये पाँच अक्षर यजुर्वेद के श्री रुद्रम से आते हैं।
कब और कैसे: वाराणसी में, जहाँ यही दिन रंगभरी एकादशी है, काशी विश्वनाथ में और शिव-पार्वती को गुलाल अर्पित करने से पहले।
महत्व
आमलकी एकादशी का महत्व
ब्रह्मांड पुराण की इसकी कथा एक भूखे बहेलिये की है, जो इस रात भोजन की आशा में एक मंदिर आया, सबको उपवास पर पाया, और भीड़ के किनारे बैठकर भोर तक भगवान की कथाएँ सुनता रहा। अगले जन्म में राजा बनकर वह उसी एक संयोग के जागरण की शक्ति से शत्रुओं से बचा, और पुराण का निष्कर्ष है कि ऐसा उपवास भी इस तरह रक्षा करे, तो जानकर रखे व्रत के पुण्य की कोई सीमा नहीं। इसलिए यह दिन उनके लिए भी उदार है जो सब कुछ नहीं कर सकते: जो उपवास न कर सकें, वे भी कथा सुन सकते हैं और रात का कुछ भाग जाग सकते हैं।
यह होली से पहले की आख़िरी एकादशी है, इसलिए उपवास त्योहार की तैयारी के बीच पड़ता है: घरों की सफ़ाई, गुझिया बनना और कुछ दिन बाद के होलिका दहन के लिए लकड़ी जुटना। आंवला अभी भी मिलता है, और बहुत से लोग इस दिन की पूजा को रसोई और बगीचे तक ले जाते हैं: फलाहार में आंवला, उसका दान, और एक पौधा जो उनके बाद भी बरसों फल दे। काशी में इस दिन का अपना नाम और अपने रंग हैं; वह नीचे क्षेत्रीय परंपराओं में दिया है।
उपाय · परंपरा
आमलकी एकादशी के पारंपरिक उपाय
आंवले को जल और सूत
आंवले के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाएँ, परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेटें और नीचे दीपक जलाएँ; जिस विधि के नाम पर यह दिन है, वह यही है।
आंवले का पौधा लगाएँ
आंवले का पौधा लगाना और उसकी देखभाल करना इस दिन को निभाने का स्थायी ढंग है; परंपरा के अनुसार वह जीवन भर भगवान विष्णु का वृक्ष रहता है।
भोग और दान में आंवला
भगवान विष्णु को आंवले का भोग लगाएँ, और द्वादशी को दूसरे फलों के साथ आंवला किसी मंदिर या ज़रूरतमंद को दें।
पेड़ के पास रात
कथा के बहेलिये का भाग्य आंवले के पास रात भर सुनते रहने से बदला। रात का कुछ भाग कीर्तन में या भगवान की कथाएँ सुनने में बिताएँ।
काशी में शिव-पार्वती को गुलाल
वाराणसी में रंगभरी एकादशी पर काशी विश्वनाथ में या घर पर शिव-पार्वती को गुलाल अर्पित करें, जिससे नगर की होली खुलती है।
व्रत न कर सकें तो सुनें
कथा के बहेलिये ने व्रत चुना नहीं था; वह बस बैठा और सुनता रहा। सेहत के कारण उपवास न कर सकें, तो कथा और भगवान विष्णु के नाम सुनकर भी यह दिन निभाया जा सकता है।
परंपरा, संक्षेप में
आमलकी एकादशी पर क्या करें, क्या न करें
क्या करें
दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार हल्का सात्विक भोजन करें।
सुबह संकल्प लें और जैसा व्रत तय किया, वैसा ही निभाएँ।
हर भोग पर एक दिन पहले तोड़ा गया तुलसी दल रखें।
'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें और कथा पढ़ें या सुनें।
शाम को भगवान विष्णु के सामने और तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
रात का कम से कम कुछ भाग कीर्तन या जप में जागें।
ज़रूरतमंद को भोजन या जल दें, और द्वादशी को पारण से पहले दान करें।
द्वादशी को पारण के समय के भीतर ही व्रत खोलें।
आंवले के पेड़ को जल दें, उसकी पूजा करें, कच्चा सूत लपेटें और नीचे दीपक जलाएँ।
जगह हो तो आंवले का एक पौधा लगाएँ।
क्या न करें
एकादशी को चावल, गेहूँ, दाल या कोई भी अन्न न खाएँ।
एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें।
दशमी से द्वादशी तक प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और मदिरा से दूर रहें।
दिन में न सोएँ।
झगड़ा, झूठ और कटु वचन से बचें।
हरि वासर में व्रत न खोलें, और द्वादशी बीतने से पहले पारण कर लें।
बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं और बच्चों पर कठोर व्रत का दबाव न डालें; डायबिटीज़ या किसी और बीमारी वाले, या रोज़ दवा लेने वाले लोग व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।
जिस आंवले के पेड़ की पूजा करें, उसकी डालियाँ न तोड़ें और फल न नोचें।
देश भर में
आमलकी एकादशी की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग
क्षेत्र के अनुसार
वाराणसी (काशी)
रंगभरी एकादशी: माना जाता है कि विवाह के बाद भगवान शिव माता पार्वती को काशी लाए; काशी विश्वनाथ में प्रतिमाओं की शोभायात्रा निकलती है और गुलाल से नगर की होली शुरू होती है।
उत्तर भारत
जल, कच्चे सूत, रोली और दीपक से आंवले के पेड़ की पूजा, प्रायः घर की महिलाएँ सुबह करती हैं, और पेड़ के नीचे कथा पढ़ी जाती है।
भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन
किसी भी एकादशी पर क्या खाया जा सकता है — फल और साबूदाने से लेकर समा के चावल और पारण के भोजन तक — यह एकादशी व्रत के भोजन की सूची में है। आमलकी एकादशी में ख़ास:
आंवलादूसरे फलों के साथ भगवान को अर्पित; थोड़ा प्रसाद के रूप में लिया जाता है।
आने वाले वर्षों में आमलकी एकादशी की तारीख
इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।
आने वाले वर्षों में आमलकी एकादशी की तारीख
वर्ष
तारीख
स्थिति
2026इस वर्ष
शुक्रवार, 27 फरवरी 2026
बीत गई
2027
गुरुवार, 18 मार्च 2027
आने वाली
2028
मंगलवार, 7 मार्च 2028
आने वाली
पंचांगों में आमलकी एकादशी की तारीख अलग क्यों होती है
दो पंचांग आमलकी एकादशी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।
तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: आमलकी एकादशी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।
2027 में आमलकी एकादशी गुरुवार, 18 मार्च को है। नई दिल्ली में पारण 19 मार्च को सुबह 7:13 से सुबह 8:51 तक है; एकादशी तिथि 18 मार्च, सुबह 4:21 से 19 मार्च, रात 1:52 तक रहेगी।
आमलकी एकादशी की तिथि क्या है?
फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 18 मार्च, सुबह 4:21 से 19 मार्च, रात 1:52 तक है, और आमलकी एकादशी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।
आमलकी एकादशी का पारण कब करें?
शुक्रवार, 19 मार्च 2027 को सुबह 7:13 से सुबह 8:51 तक। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) प्रातःकाल के भीतर समाप्त होता है, इसलिए पारण उसके ख़त्म होने के बाद से प्रातःकाल के अंत तक है।
दूसरे कैलेंडर में आमलकी एकादशी की तारीख अलग क्यों है?
मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।
अगले साल आमलकी एकादशी कब है?
2028 में मंगलवार, 7 मार्च।
आमलकी एकादशी क्यों रखी जाती है?
आमलकी एकादशी फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी है, होली से कुछ दिन पहले। इसकी विधि आंवले के वृक्ष की पूजा है, जिसमें भगवान विष्णु का वास माना जाता है: लोग वृक्ष को जल देते हैं, उस पर सूत लपेटते हैं, नीचे दीप जलाते हैं और उसके पास रात्रि जागरण करते हैं। वाराणसी में यही दिन रंगभरी एकादशी है — माना जाता है कि विवाह के बाद भगवान शिव इसी दिन माता पार्वती को काशी लाए थे — और काशी विश्वनाथ में रंग से नगर की होली शुरू होती है।
आमलकी एकादशी की व्रत कथा किस ग्रंथ में है?
कथा ब्रह्मांड पुराण, श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया एकादशी माहात्म्य में है। पूरी कथा ऊपर दी गई है।
क्या स्मार्त और वैष्णव आमलकी एकादशी अलग दिन है?
नहीं, इस बार दोनों गुरुवार, 18 मार्च 2027 को हैं। वैष्णव नियम एकादशी को अरुणोदय पर देखता है, और उस दिन अरुणोदय पर भी एकादशी है।
आमलकी (आंवला) एकादशी कब है?
नई दिल्ली में आमलकी एकादशी, जिसे आंवला एकादशी भी कहते हैं, गुरुवार, 18 मार्च 2027 को है। यह फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसका महीना हर पंचांग में एक ही है, होली से कुछ दिन पहले।
रंगभरी एकादशी कब है, क्या यह इसी दिन है?
हाँ: रंगभरी एकादशी इसी दिन, फाल्गुन शुक्ल एकादशी, का वाराणसी वाला नाम है, इसलिए नई दिल्ली में यह भी गुरुवार, 18 मार्च 2027 को है। काशी इसे काशी विश्वनाथ में रंग के साथ शिव-पार्वती के लिए मनाती है, जबकि बाकी उत्तर भारत भगवान विष्णु के लिए आमलकी व्रत रखता है; वाराणसी में बहुत से लोग दोनों निभाते हैं।
आमलकी एकादशी का पारण कब है?
पारण द्वादशी को होता है: नई दिल्ली में 19 मार्च, सुबह 7:13 से सुबह 8:51 तक, हरि वासर समाप्त होने (19 मार्च, सुबह 7:13) के बाद। बहुत से लोग थोड़े आंवले के प्रसाद और जल के साथ तुलसी दल से शुरू करते हैं, फिर सादा भोजन।
आंवला एकादशी की व्रत कथा क्या है?
वैदिश नगर में राजा चैत्ररथ और प्रजा ने मंदिर के आंवले के पेड़ की पूजा और रात भर भजन से यह एकादशी निभाई। एक भूखा बहेलिया भोजन ढूँढता आया, कुछ न मिला, और भोर तक बैठकर सुनता रहा। अगले जन्म में राजा वसुरथ बनकर जब वह सोते समय शत्रुओं से घिरा, तो उसके शरीर से एक तेजस्वी देवी प्रकट हुई और शत्रुओं का नाश कर दिया: यह अनजाने में रखी आमलकी एकादशी की शक्ति थी। पूरी कथा ऊपर है।
आमलकी एकादशी पर आंवले के पेड़ की पूजा कैसे करें?
सुबह की पूजा के बाद आंवले के पेड़ के पास जाएँ, जड़ में जल चढ़ाएँ, रोली, हल्दी, फूल और दीपक अर्पित करें, और भगवान विष्णु की प्रार्थना करते हुए परिक्रमा के साथ तने पर कच्चा सूत लपेटें। हो सके तो कथा वहीं पढ़ें, और रात का कुछ भाग उसके पास कीर्तन में बिताएँ।
इस एकादशी पर आंवले के पेड़ की पूजा क्यों होती है?
परंपरा मानती है कि आंवले में भगवान विष्णु का वास है, और उसी के नाम वाली यह एकादशी पेड़ को उनका रूप मानकर पूजने से निभाई जाती है। इसकी कथा मंदिर के आंवले के पास बिताई एक रात पर टिकी है, जिसके पुण्य ने सुनने वाले की अगले जन्म तक रक्षा की।
वाराणसी में रंगभरी एकादशी कैसे मनाई जाती है?
काशी भगवान शिव के विवाह के बाद माता पार्वती को घर लाने की याद मनाती है। काशी विश्वनाथ में गुलाल उड़ाते हुए प्रतिमाओं की शोभायात्रा निकलती है, और नगर की होली उसी दिन, होली से कुछ दिन पहले, शुरू हो जाती है। भक्त 'ॐ नमः शिवाय' जपते हैं और शिव-पार्वती को रंग अर्पित करते हैं।
रंगभरी एकादशी क्यों मनाई जाती है?
रंगभरी यानी रंगों से भरी। काशी में यह विवाह के बाद माता पार्वती के साथ भगवान शिव के घर लौटने का दिन है, और उनकी नगरी के लोग रंग से उनका स्वागत करते हैं; इसीलिए वाराणसी की होली होली के दिन नहीं, इसी एकादशी से शुरू होती है।
पास में आंवले का पेड़ न हो तो क्या करें?
गमले में लगे आंवले के पौधे की, या चौकी पर भगवान विष्णु के पास रखे कुछ आंवलों की, उसी जल, सूत, रोली और दीपक से पूजा करें। बहुत से परिवार इसी दिन आंवले का पौधा लगाते हैं, ताकि आने वाले वर्षों के लिए उनके पास अपना पेड़ हो।
क्या आमलकी एकादशी के व्रत में आंवला खा सकते हैं?
आंवला फल है, इसलिए फलाहार वाला व्रत रखने वाले इसे ले सकते हैं; ज़्यादातर लोग पहले भगवान को अर्पित करते हैं और थोड़ा प्रसाद के रूप में, प्रायः पारण के समय, लेते हैं। जल का व्रत रखने वाले इसे द्वादशी के लिए रखते हैं।
आमलकी एकादशी की तिथि कब से कब तक है?
नई दिल्ली में एकादशी तिथि सुबह 4:21 से रात 1:51 (19 मार्च) तक रहेगी। व्रत और आंवले की पूजा उस दिन की है जिसके सूर्योदय पर एकादशी हो, यानी गुरुवार, 18 मार्च 2027।
आमलकी एकादशी का व्रत कैसे रखें?
दशमी को एक बार सात्विक भोजन करें। एकादशी को स्नान करके संकल्प लें और भगवान विष्णु की पूजा करें, फिर जल, सूत और दीपक से आंवले के पेड़ की पूजा करें। जल या फल का व्रत रखें, कथा पढ़ें, रात का कुछ भाग कीर्तन में जागें, और द्वादशी को फल या भोजन का दान करके पारण के समय में व्रत खोलें।