महालक्ष्मी मंत्र
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
Om Shrim Mahalakshmyai Namah
अर्थ: ॐ, बीज अक्षर ‘श्रीं’ के साथ महालक्ष्मी को नमस्कार।
कब और कैसे: शाम और मध्यरात्रि की लक्ष्मी पूजा में: कमलगट्टे या स्फटिक की माला पर 108 बार, या हर अर्पण के साथ।
शुक्ल पक्ष · पूर्णिमा तिथि · आश्विन
गुरु, 14 अक्टूबर
2027 में शरद पूर्णिमा गुरुवार, 14 अक्टूबर को है। नई दिल्ली में शरद पूर्णिमा पूजा का शुभ मुहूर्त रात 11:42 से रात 12:32 तक है।
2028: सोमवार, 2 अक्टूबर 2028
शरद पूर्णिमा पूजा मुहूर्त
रात 11:42 – रात 12:32
शरद पूर्णिमा कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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गुरुवार, 14 अक्टूबर 2027
ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: शरद पूर्णिमा का निर्णय मध्य रात्रि के निशीथ काल में चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके निशीथ काल पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।
शरद पूर्णिमा, आश्विन मास की पूर्णिमा, वह रात है जब चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण माना जाता है: रात्रि जागरण (कोजागरी) के साथ माँ लक्ष्मी की पूजा होती है, चाँदनी में खीर रखी जाती है, और ब्रज में यह श्रीकृष्ण के महारास की रात है। शरद पूर्णिमा 2027 नई दिल्ली में गुरुवार, 14 अक्टूबर 2027 को है, और चंद्रोदय शाम 4:57 पर है। खीर चाँदनी में (शाम 4:57 से रात 12:32 (15 अक्टूबर) तक) रखें और कोजागरी लक्ष्मी पूजा मध्यरात्रि के समय (रात 11:42 से रात 12:32 (15 अक्टूबर) तक) में करें।
| मुहूर्त | नई दिल्ली में समय | किसके लिए |
|---|---|---|
| चाँदनी में खीर | शाम 4:57 से रात 12:32 (15 अक्टूबर) तकपूर्णिमा की रात चंद्रोदय से निशीथ काल के अंत तक। | चंद्रोदय से मध्यरात्रि (निशीथ) के मुहूर्त की समाप्ति तक। चाँद निकल आने पर ढकी हुई खीर खुली चाँदनी में रखें, और यह समय पूरा होने पर अंदर लाकर भोग लगाएँ और प्रसाद के रूप में खाएँ — आधी रात को, या ठंडी जगह रखकर अगली सुबह। |
| कोजागरी पूजा (निशीथ) | रात 11:42 से रात 12:32 (15 अक्टूबर) तकपूर्णिमा की रात निशीथ काल, जब तक पूर्णिमा रहे। | पूर्णिमा की रात का मध्यरात्रि मुहूर्त, जब एक पुराने श्लोक के अनुसार माँ लक्ष्मी ‘को जागर्ति?’ — ‘कौन जाग रहा है?’ — पूछती हुई घूमती हैं। यही कोजागरी लक्ष्मी पूजा का समय और रात के जागरण का शिखर है, और इसी से तय होता है कि शरद पूर्णिमा कौन-सी रात है। |
| चंद्रोदय | शाम 4:57इस सूर्योदय के बाद और अगले सूर्योदय से पहले का पहला चंद्रोदय। | पूर्णिमा का चाँद सूर्यास्त के आसपास निकलता है। चाँद निकलने के बाद उसे अर्घ्य दें और इसी समय से खीर बाहर रखें; व्रत रखने वाले चंद्र पूजा के बाद व्रत खोलते हैं। |
| प्रदोष काल | शाम 5:53 से रात 8:22 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)। | सूर्यास्त के बाद का संध्याकाल, जब बहुत से परिवार — ख़ासकर बंगाली घर — लक्ष्मी पूजा शुरू करते हैं, अल्पना बनाते हैं और जागरण से पहले दीप जलाते हैं। |
| निशीथ काल | रात 11:42 से रात 12:32 (15 अक्टूबर) तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, आधी रात के आसपास। | रात का आठवाँ मुहूर्त, स्थानीय मध्यरात्रि के आसपास, कोजागरी समय का केंद्र; इसमें घी का दीपक जलता रहे और जागरण चलता रहे। |
| मुहूर्त | नई दिल्ली में समय | प्रकृति |
|---|---|---|
| अभिजित मुहूर्त | सुबह 11:43 से दोपहर 12:30 | शुभ |
| अमृत काल | शाम 5:24 से शाम 7:06 | सर्वाधिक शुभ |
| ब्रह्म मुहूर्त | सुबह 4:41 से सुबह 5:31 | शुभ |
मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।
| अवधि | नई दिल्ली में समय |
|---|---|
| राहु काल | दोपहर 1:33 से दोपहर 3:00 |
| यमगण्ड काल | सुबह 6:20 से सुबह 7:47 |
| दुर्मुहूर्त (पहला) | सुबह 10:11 से सुबह 10:57 |
| दुर्मुहूर्त (दूसरा) | दोपहर 2:48 से दोपहर 3:34 |
| वर्ज्यम् | सुबह 7:12 से सुबह 8:54 |
ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए गुरुवार, 14 अक्टूबर 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।
सुबह जल्दी स्नान करें — नदी के पास रहते हों तो पवित्र स्नान — घर और पूजा स्थान साफ़ करें, और व्रत रख रहे हों तो हाथ में जल और चावल लेकर शरद पूर्णिमा व्रत का संकल्प लें।
शाम को फुल क्रीम दूध में थोड़े चावल डालकर गाढ़ा होने तक पकाएँ, चीनी और इलायची डालें, और चाहें तो केसर और मेवे भी। ऐसा साफ़ स्टील, काँच, चाँदी या मिट्टी का बर्तन लें जिसे महीन कपड़े से ढका जा सके।
चौकी पर लाल या सफ़ेद कपड़ा बिछाकर माँ लक्ष्मी की तस्वीर (चाहें तो भगवान विष्णु के साथ), आम के पत्तों वाला कलश और घी का दीपक रखें। बंगाली घरों में चावल के घोल से अल्पना बनाई जाती है, जिसमें घर के अंदर आते लक्ष्मी जी के पदचिह्न होते हैं।
प्रदोष काल में माँ लक्ष्मी को कुमकुम, चावल, कमल या सफ़ेद और लाल फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें; ‘ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ का 108 बार जप करें या महालक्ष्मी अष्टकम पढ़ें, और आरती गाएँ।
चाँद निकल आने पर लोटे से थोड़ा कच्चा दूध, चावल और सफ़ेद फूल मिला जल, चंद्रमा की ओर देखते हुए, चंद्र श्लोक के साथ अर्पित करें; दीपक जलाकर मन की शांति और परिवार की कुशलता की प्रार्थना करें।
खीर को छत, बालकनी या आँगन में खुली चाँदनी में, ज़मीन से ऊपर रखें और कीड़ों-धूल से बचाने के लिए मलमल के कपड़े या जाली से ढकें, और खीर वाले पूरे समय वहीं रहने दें।
कोजागरी परंपरा के अनुसार भजन, लक्ष्मी स्तोत्र, व्रत कथा और परिवार के खेलों के साथ रात में जागें; घी का दीपक जलता रहे।
कोजागरी समय में माँ लक्ष्मी को फिर से फूल और दीपक अर्पित करें; बंगाली परिवार शंख बजाते हैं और लक्ष्मी पांचाली पढ़ते हैं। खीर का भोग माँ लक्ष्मी को, और कृष्ण भक्त घरों में राधा-कृष्ण को, लगाएँ।
व्रत रखने वाले चंद्र पूजा के बाद फल या खीर के प्रसाद से व्रत खोलें। समय पूरा होने पर खीर अंदर लाएँ; आधी रात को खाएँ, या फ्रिज में रखकर सुबह प्रसाद के रूप में बाँटें।
खीर परिवार और पड़ोसियों में बाँटें, और किसी ज़रूरतमंद को चावल, दूध, चीनी या सफ़ेद कपड़ा दें — यह पूर्णिमा का पारंपरिक दान है।
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
Om Shrim Mahalakshmyai Namah
अर्थ: ॐ, बीज अक्षर ‘श्रीं’ के साथ महालक्ष्मी को नमस्कार।
कब और कैसे: शाम और मध्यरात्रि की लक्ष्मी पूजा में: कमलगट्टे या स्फटिक की माला पर 108 बार, या हर अर्पण के साथ।
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥
Namastestu Mahamaye Shripithe Surapujite, Shankhachakragadahaste Mahalakshmi Namostu Te
अर्थ: हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजमान, देवताओं से पूजित, हाथों में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी — आपको नमस्कार है।
कब और कैसे: महालक्ष्मी अष्टकम का पहला श्लोक, जिसे परंपरा पद्म पुराण में इंद्र की स्तुति बताती है; जागरण में पूरा स्तोत्र, या यह श्लोक ग्यारह बार पढ़ें।
दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ॥
Dadhishankhatusharabham Kshirodarnavasambhavam, Namami Shashinam Somam Shambhormukutabhushanam
अर्थ: दही, शंख और हिम के समान श्वेत, क्षीर सागर से उत्पन्न, शिव के मुकुट के आभूषण चंद्रमा को मैं प्रणाम करता हूँ।
कब और कैसे: नवग्रह स्तोत्र का चंद्र श्लोक: उगते चाँद को अर्घ्य देते समय तीन बार बोलें।
ॐ सों सोमाय नमः
Om Som Somaya Namah
अर्थ: ॐ, सोम — चंद्रमा — को नमस्कार।
कब और कैसे: चंद्रमा का छोटा मंत्र: पूर्णिमा की रात अर्घ्य के बाद 108 बार।
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥
Krishnaya Vasudevaya Haraye Paramatmane, Pranataklesanashaya Govindaya Namo Namah
अर्थ: वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण को, परमात्मा हरि को, शरणागतों के क्लेश हरने वाले गोविंद को बार-बार नमस्कार।
कब और कैसे: श्रीमद्भागवत, दशम स्कंध, अध्याय 73, श्लोक 16। रास पूर्णिमा पर कृष्ण भक्त घरों में राधा-कृष्ण को खीर का भोग लगाते समय पढ़ें।
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
Om jai Lakshmi Mata, maiya jai Lakshmi Mata.
Tumko nishidin sevat, Hari Vishnu Vidhata.
Om jai Lakshmi Mata.
Uma, Rama, Brahmani, tum hi jag-mata.
Surya-Chandrama dhyavat, Narad rishi gata.
Om jai Lakshmi Mata.
Durga roop niranjani, sukh sampatti data.
Jo koi tumko dhyavat, riddhi-siddhi dhan pata.
Om jai Lakshmi Mata.
Tum patal-nivasini, tum hi shubhdata.
Karm-prabhav-prakashini, bhavnidhi ki trata.
Om jai Lakshmi Mata.
Jis ghar mein tum rahtin, sab sadgun aata.
Sab sambhav ho jata, man nahin ghabrata.
Om jai Lakshmi Mata.
Tum bin yagya na hote, vastra na koi pata.
Khan-paan ka vaibhav, sab tumse aata.
Om jai Lakshmi Mata.
Shubh-gun mandir sundar, kshirodadhi-jata.
Ratna chaturdash tum bin, koi nahin pata.
Om jai Lakshmi Mata.
Mahalakshmi ji ki aarti, jo koi jan gata.
Ur anand samata, paap utar jata.
Om jai Lakshmi Mata.
यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'हरि विष्णु विधाता' की जगह 'हर-विष्णू-धाता', 'जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता' की जगह 'जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता', 'वस्त्र न कोई पाता' की जगह 'वस्त्र न हो पाता' और 'जो कोई जन गाता' की जगह 'जो कोई नर गाता' छपा है। छपा पाठ
शरद पूर्णिमा पर कही जाने वाली व्रत कथा एक साहूकार की दो बेटियों की है, जो दोनों पूर्णिमा का व्रत रखती थीं — बड़ी बेटी पूरा, और छोटी हमेशा अधूरा छोड़ देती। विवाह के बाद छोटी बहन की संतानें जीवित नहीं रहती थीं। ज्ञानी लोगों ने बताया कि इसका कारण उसके अधूरे पूर्णिमा व्रत हैं, तो उसने पूरे विधि-विधान से शरद पूर्णिमा का व्रत रखा।
जब उसका अगला बच्चा भी जन्म के कुछ समय बाद चल बसा, तो उसने उसे एक पीढ़े पर लिटाकर कपड़े से ढक दिया और बड़ी बहन को वहीं बैठने को कहा। बड़ी बहन का वस्त्र छूते ही बच्चा रोने लगा। चौंककर बड़ी बहन ने उसे डाँटा, पर छोटी बहन ने बताया कि बच्चा उसकी बहन के पूरे व्रतों के पुण्य से जी उठा है — और तब से सब पूर्णिमा का पूरा व्रत रखने लगे।
कोजागरी नाम एक पुराने श्लोक से आया है: आश्विन की पूर्णिमा की रात माँ लक्ष्मी ‘को जागर्ति?’ — ‘कौन जाग रहा है?’ — पूछती हुई पृथ्वी पर घूमती हैं और उस घर को आशीर्वाद देती हैं जहाँ दीपक जल रहा हो और परिवार भक्ति में जाग रहा हो। और ब्रज में भागवत की वे शरद रातें, ‘जब मल्लिका के फूल खिले थे’, जब श्रीकृष्ण ने बाँसुरी बजाई और गोपियाँ रास के लिए आईं, इसी पूर्णिमा पर रास पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती हैं।
शरद पूर्णिमा वर्षा के बाद साफ़ शरद आकाश की पूर्णिमा है — वह रात जब परंपरा के अनुसार चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है। माना जाता है कि इसकी चाँदनी में अमृत होता है, इसीलिए खीर — दूध, चावल और शक्कर, चंद्रमा के अपने ‘श्वेत’ पदार्थ — उसके नीचे रखकर प्रसाद के रूप में खाई जाती है।
यह तीन भक्तियों की रात है: माँ लक्ष्मी, जिनकी जागरण (कोजागरी) के साथ पूजा होती है; चंद्रमा, जिन्हें अर्घ्य दिया जाता है; और ब्रज में श्रीकृष्ण, जिनके गोपियों के साथ महारास को याद किया जाता है। आश्विन पूर्णिमा रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि की जयंती के रूप में भी मनाई जाती है।
शरद पूर्णिमा की तारीख सूर्योदय से नहीं, मध्यरात्रि से तय होती है: यह वह रात है जब पूर्ण चंद्रमा आकाश में हो, जो कुछ कैलेंडरों में दिखाए गए पूर्णिमा व्रत से एक दिन पहले भी हो सकती है।
चाँदनी में रखी और माँ लक्ष्मी को अर्पित खीर परंपरा से खाने वालों को स्वास्थ्य और संतोष देने वाली मानी जाती है। इसे कृतज्ञता से प्रसाद के रूप में खाएँ; यह भक्ति की परंपरा है, दवा नहीं।
दीपक जलाकर, होठों पर लक्ष्मी जी का नाम लेकर कोजागरी जागरण करना इस रात की मुख्य परंपरा है; माना जाता है कि माँ लक्ष्मी उन घरों को आशीर्वाद देती हैं जिन्हें वे जागता और रोशन पाती हैं।
ज्योतिष में चंद्रमा मन का कारक है, और पूर्णिमा पर दूध और सफ़ेद फूल मिला जल अर्पित करना मन की शांति और भावनात्मक संतुलन की पारंपरिक साधना है।
पूर्णिमा पर किसी ज़रूरतमंद को चावल, दूध, चीनी, दही या सफ़ेद कपड़ा देना चंद्रमा के दिन का पारंपरिक दान है।
शरद पूर्णिमा की रात तुलसी के पौधे और घर के द्वार पर घी का दीपक जलाना साफ़, रोशन घर में माँ लक्ष्मी के स्वागत का पुराना तरीका है।
बहुत से परिवार जागरण में आदि शंकराचार्य का कनकधारा स्तोत्र या श्री सूक्त पढ़ते हैं — घर की समृद्धि के लिए लक्ष्मी जी के पारंपरिक स्तोत्र।
इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।
| वर्ष | तारीख | स्थिति |
|---|---|---|
| 2026इस वर्ष | रविवार, 25 अक्टूबर 2026 | बीत गई |
| 2027 | गुरुवार, 14 अक्टूबर 2027 | आने वाली |
| 2028 | सोमवार, 2 अक्टूबर 2028 | आने वाली |
2027 में, नई दिल्ली के लिए: कुछ पंचांग चंद्रोदय लगभग 4 मिनट बाद, शाम 5:01 पर, बताते हैं: जब चंद्रमा का केंद्र क्षितिज पर आता है, वायुमंडलीय अपवर्तन जोड़े बिना। यहाँ समय वह है जब उसका ऊपरी किनारा पहली बार दिखता है, यानी जब चाँद दिखाई देने लगता है।
दो पंचांग शरद पूर्णिमा की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।
इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।
शरद पूर्णिमा 2027 नई दिल्ली में गुरुवार, 14 अक्टूबर 2027 को है। पूर्णिमा तिथि शाम 6:49 से शाम 7:17 (15 अक्टूबर) तक है; चंद्रोदय शाम 4:57 पर है, और कोजागरी मध्यरात्रि का समय रात 11:42 से रात 12:32 (15 अक्टूबर) तक है।
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 14 अक्टूबर, शाम 6:50 से 15 अक्टूबर, शाम 7:17 तक है, और शरद पूर्णिमा का दिन मध्य रात्रि के निशीथ काल में चल रही तिथि से तय होता है।
चाँदनी में खीर: नई दिल्ली में गुरुवार, 14 अक्टूबर 2027 को शाम 4:57 से रात 12:32 (15 अक्टूबर) तक। चंद्रोदय से मध्यरात्रि (निशीथ) के मुहूर्त की समाप्ति तक। चाँद निकल आने पर ढकी हुई खीर खुली चाँदनी में रखें, और यह समय पूरा होने पर अंदर लाकर भोग लगाएँ और प्रसाद के रूप में खाएँ — आधी रात को, या ठंडी जगह रखकर अगली सुबह।
मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।
2028 में सोमवार, 2 अक्टूबर।
चाँद निकलने के बाद खीर बाहर रखें और नई दिल्ली में शाम 4:57 से रात 12:32 (15 अक्टूबर) तक — यानी चंद्रोदय से मध्यरात्रि के मुहूर्त की समाप्ति तक — वहीं रहने दें। महीन कपड़े से ढकें, फिर अंदर लाकर आधी रात को भोग लगाकर खाएँ, या फ्रिज में रखकर सुबह खाएँ।
नई दिल्ली में गुरुवार, 14 अक्टूबर 2027 को चंद्रोदय शाम 4:57 पर है — पूर्णिमा के चाँद की तरह सूर्यास्त के आसपास। देश के अलग-अलग हिस्सों में चंद्रोदय में एक घंटे से ज़्यादा का अंतर होता है, इसलिए अपने शहर का समय देखें; चाँद क्षितिज से ऊपर साफ़ दिखने पर अर्घ्य दें।
यह एक साहूकार की दो बेटियों की कथा है: बड़ी बेटी पूर्णिमा का पूरा व्रत रखती थी, छोटी अधूरा छोड़ती थी और उसकी संतानें नहीं बचती थीं। जब उसने शरद पूर्णिमा का पूरा व्रत रखा, तो पूरे व्रतों के पुण्य से उसका मृत शिशु बड़ी बहन के वस्त्र के स्पर्श से जी उठा। पूरी कथा ऊपर दी गई है।
यह शरद पूर्णिमा की रात जागरण के साथ होने वाली माँ लक्ष्मी की पूजा है, क्योंकि एक पुराने श्लोक के अनुसार वे ‘कौन जाग रहा है?’ पूछती हुई घूमती हैं। बंगाली घर इसे संध्या में अल्पना और लक्ष्मी पांचाली से शुरू करते हैं; मुख्य पूजा मध्यरात्रि के समय, नई दिल्ली में रात 11:42 से रात 12:32 (15 अक्टूबर) तक, होती है।
परंपरा मानती है कि इस रात चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों में अमृत होता है; दूध, चावल और शक्कर — चंद्रमा के अपने श्वेत पदार्थ — से बनी खीर उसका आशीर्वाद पाने के लिए उसके नीचे रखी जाती है और फिर प्रसाद के रूप में खाई जाती है।
कोई वैज्ञानिक अध्ययन यह नहीं दिखाता कि चाँदनी खीर को बदल देती है या उसे औषधि बना देती है; यह परंपरा भक्ति और ऋतु की है — ठंडी शरद रात में बाँटा जाने वाला हल्का दूध का व्यंजन। इसे प्रसाद के रूप में आनंद से खाएँ, ढका और साफ़ रखें, और किसी दवा की जगह न लें।
सुबह स्नान करके संकल्प लें, संध्या में लक्ष्मी पूजा करें, उगते चाँद को अर्घ्य दें, खीर चाँदनी में रखें, दीपक जलाकर लक्ष्मी नाम के साथ रात का जागरण करें, मध्यरात्रि की पूजा करें, और अगली सुबह खीर का प्रसाद बाँटकर ज़रूरतमंद को दान दें।
माँ लक्ष्मी के लिए ‘ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ 108 बार, या महालक्ष्मी अष्टकम; चंद्रमा के लिए अर्घ्य के समय चंद्र श्लोक ‘दधिशङ्खतुषाराभं’, या ‘ॐ सों सोमाय नमः’। सभी ऊपर अर्थ सहित दिए गए हैं।
परंपरा में यह सोलह कलाओं से पूर्ण चंद्रमा की रात है, जब माँ लक्ष्मी जागने वालों को आशीर्वाद देती हैं, और ब्रज में श्रीकृष्ण के महारास की रात; यह महर्षि वाल्मीकि की जयंती भी है। परिवार इसे लक्ष्मी पूजा, चंद्र अर्घ्य, खीर और जागरण के साथ मनाते हैं।
सुबह संकल्प लेकर दिन भर फल, दूध और पानी पर, या एक बार भोजन पर रहें। शाम को माँ लक्ष्मी की पूजा करें, चाँद निकलने पर अर्घ्य दें, और चंद्र पूजा के बाद फल या खीर के प्रसाद से व्रत खोलें। व्रत उतना ही रखें जितना स्वास्थ्य अनुमति दे।
कोजागिरी, ‘को जागर्ति’ (कौन जाग रहा है?) से, शरद पूर्णिमा का मराठी नाम है, जो लक्ष्मी जी के रात्रि जागरण से आया है; बंगाल में इसे कोजागोरी और मिथिला में कोजागरा कहते हैं। महाराष्ट्र में इसे चाँद के नीचे मसाला दूध के साथ मनाया जाता है, और बहुत से परिवार सबसे बड़ी संतान का औक्षण भी करते हैं।
क्योंकि पूर्णिमा दो दिनों में फैल सकती है। शरद पूर्णिमा वह रात है जिसकी मध्यरात्रि पर पूर्णिमा हो — तभी चाँद देखा जाता है और खीर रखी जाती है — जबकि कुछ कैलेंडर पूर्णिमा का व्रत अगले दिन दिखाते हैं, जिसके सूर्योदय पर पूर्णिमा हो। नई दिल्ली में पूर्णिमा शाम 6:49 से शाम 7:17 (15 अक्टूबर) तक है।
नहीं। गुरु पूर्णिमा आषाढ़ की पूर्णिमा है, जून या जुलाई में, जो महर्षि व्यास और अपने गुरुओं को समर्पित है; शरद पूर्णिमा आश्विन की पूर्णिमा है, सितंबर या अक्टूबर में, जो माँ लक्ष्मी, चंद्रमा और ब्रज में श्रीकृष्ण के रास को समर्पित है।