गणेश मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
Om Gam Ganapataye Namah
अर्थ: ॐ, गं: गणों के स्वामी गणपति को नमस्कार; 'गं' उनका बीज अक्षर है, जिसकी व्याख्या गणपति अथर्वशीर्ष में है।
कब और कैसे: हर गुरुवार की पूजा की शुरुआत में 11 बार।
शुक्ल पक्ष · प्रतिपदा तिथि · मार्गशीर्ष
बुध, 9 दिसंबर – गुरु, 7 जनवरी
2026 में मार्गशीर्ष गुरुवार बुधवार, 9 दिसंबर से गुरुवार, 7 जनवरी 2027 तक है — 30 दिन। इस महीने के 5 गुरुवार: 10, 17, 24 और 31 दिसंबर तथा 7 जनवरी।
2027: सोमवार, 29 नवंबर से सोमवार, 27 दिसंबर 2027 तक
मार्गशीर्ष गुरुवार कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।
हर वह गुरुवार जिसके सूर्योदय पर मार्गशीर्ष मास चल रहा हो, बुधवार, 9 दिसंबर 2026 से गुरुवार, 7 जनवरी 2027 तक। महीना और उसके दोनों छोर चंद्रमा और सूर्य से निकाले जाते हैं, इसलिए गुरुवारों की संख्या भी गणना का नतीजा है — किसी साल चार, किसी साल पाँच।
| गुरुवार | तारीख | स्थिति |
|---|---|---|
| 1 | गुरुवार, 10 दिसंबर 2026 | आने वाला |
| 2 | गुरुवार, 17 दिसंबर 2026 | आने वाला |
| 3 | गुरुवार, 24 दिसंबर 2026 | आने वाला |
| 4 | गुरुवार, 31 दिसंबर 2026 | आने वाला |
| 5 | गुरुवार, 7 जनवरी 2027 | आने वाला |

स्वर्ण से पूछें
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बुधवार, 9 दिसंबर 2026 से गुरुवार, 7 जनवरी 2027 तक
पहला और अंतिम दिन दोनों नई दिल्ली के लिए चंद्रमा और सूर्य की स्थिति से निकाले गए हैं, इसलिए अवधि की लंबाई भी गणना का नतीजा है, कोई तय संख्या नहीं।
महाराष्ट्र और मराठी परिवारों में मार्गशीर्ष मास का हर गुरुवार महालक्ष्मी व्रत के रूप में रखा जाता है: देवी के रूप में कलश स्थापित होता है, महालक्ष्मी व्रत कथा पढ़ी जाती है और शाम की पूजा तक व्रत रहता है।
मार्गशीर्ष गुरुवार महाराष्ट्र का महालक्ष्मी व्रत है, जो मार्गशीर्ष मास के हर गुरुवार को रखा जाता है: देवी के लिए घट स्थापित होता है, व्रत कथा पढ़ी जाती है, दिन भर व्रत रहता है, और अंतिम गुरुवार को सुहागिनों को हल्दी-कुमकुम के लिए बुलाकर उद्यापन होता है। नई दिल्ली में यह मास बुधवार, 9 दिसंबर 2026 से शुरू होता है, और व्रत मास की अमावस्या तक हर गुरुवार चलता है; इस पेज पर सभी गुरुवार दिए गए हैं।
| मुहूर्त | नई दिल्ली में समय | किसके लिए |
|---|---|---|
| मार्गशीर्ष का आरंभ: शुक्ल प्रतिपदा | सुबह 6:21 से सुबह 8:46 (10 दिसंबर) तकत्योहार की तिथि, प्रतिपदा, कब शुरू होती है और कब ख़त्म। | महाराष्ट्र जिस अमांत पंचांग को मानता है, उसमें मार्गशीर्ष मास इसी प्रतिपदा से, कार्तिक अमावस्या के अगले दिन शुरू होता है, और व्रत तब से मास की अपनी अमावस्या तक हर गुरुवार रखा जाता है। समय नई दिल्ली के लिए है। |
| सूर्योदय (मास का पहला दिन) | सुबह 7:01क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय। | मास के पहले दिन का सूर्योदय। हर गुरुवार की सुबह की पूजा सूर्योदय पर स्नान के बाद होती है; गुरुवारों का अपना सूर्योदय इससे कुछ ही मिनट अलग होता है, और रोज़ का पंचांग हर एक का समय बताता है। |
| सूर्यास्त (मास का पहला दिन) | शाम 5:24सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज से ओझल होने का समय। | मास के पहले दिन का सूर्यास्त। हर गुरुवार शाम की आरती और नैवेद्य गोधूलि में होते हैं, जिसके बाद व्रत रखने वाले भोजन करते हैं; हर गुरुवार का सूर्यास्त इससे कुछ ही मिनट अलग होता है। |
| प्रदोष काल (मास का पहला दिन) | शाम 5:24 से रात 8:08 तकसूर्यास्त से रात के तीन मुहूर्त (रात का पाँचवाँ भाग)। | मास के पहले दिन सूर्यास्त के बाद का शाम का समय, गुरुवार की शाम की आरती के समय का अनुमान; हर गुरुवार यह लगभग इसी समय होता है। |
ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए बुधवार, 9 दिसंबर 2026 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।
बुधवार शाम या गुरुवार सुबह जल्दी घर और पूजा स्थान साफ करें, और द्वार व पूजा के सामने रंगोली बनाएँ, साथ में भीतर आते लक्ष्मी जी के छोटे पदचिह्न।
सुबह स्नान करें और पहले गुरुवार को दाहिने हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर पूरे मास के व्रत का संकल्प लें; बाद के गुरुवारों को संक्षेप में संकल्प दोहराएँ।
चौरंग या पाट पर लाल कपड़ा बिछाएँ, उस पर चावल या गेहूँ की छोटी ढेरी, और उस पर जल भरा कलश रखें जिसमें सिक्का, सुपारी, दूर्वा और हल्दी-कुमकुम हो, मुँह पर आम या पान के पाँच पत्ते और ऊपर नारियल।
कलश पर महालक्ष्मी का मुखवटा, यानी देवी का मुख, रखें, या पास में उनका चित्र, और अपने घर की परंपरा के अनुसार साड़ी या ब्लाउज़ पीस, माला और गहनों से देवी का श्रृंगार करें। सामने श्रीयंत्र भी रख सकते हैं।
घी का दीपक और धूप जलाएँ, 'ॐ गं गणपतये नमः' से गणेश जी की पूजा करें, फिर 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' बोलते हुए महालक्ष्मी को हल्दी-कुमकुम, अक्षत, फूल, माला और फल अर्पित करें।
व्रत की पोथी से महालक्ष्मी व्रत कथा ऊँचे स्वर में पढ़ें, परिवार सुने, फिर आरती करें।
बहुत सी महिलाएँ दिन भर फल और व्रत के भोजन पर रहती हैं, या शाम तक कुछ नहीं खातीं, और शाम की आरती व नैवेद्य के बाद व्रत खोलती हैं; अपने परिवार की परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार रखें।
गोधूलि में फिर दीपक जलाएँ, शीरा या खीर जैसा मीठा नैवेद्य फल के साथ अर्पित करें, आरती गाएँ और प्रसाद बाँटें।
बहुत से परिवार शुक्रवार सुबह छोटी-सी उत्तर पूजा करके घट को आदर से हटाते हैं और अगले गुरुवार फिर नया घट स्थापित करते हैं; कुछ अपनी पारिवारिक परंपरा मानते हैं।
मास के अंतिम गुरुवार को पूजा के बाद पाँच या अधिक सुहागिनों को हल्दी-कुमकुम के लिए बुलाएँ, उन्हें भोजन या मिठाई कराएँ और हर एक को वाण दें, यानी नारियल, फल, ब्लाउज़ पीस और व्रत की पोथी जैसी छोटी भेंट।
ॐ गं गणपतये नमः
Om Gam Ganapataye Namah
अर्थ: ॐ, गं: गणों के स्वामी गणपति को नमस्कार; 'गं' उनका बीज अक्षर है, जिसकी व्याख्या गणपति अथर्वशीर्ष में है।
कब और कैसे: हर गुरुवार की पूजा की शुरुआत में 11 बार।
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
Om Shreem Mahalakshmyai Namah
अर्थ: ॐ, श्रीं: महालक्ष्मी को नमस्कार; 'श्रीं' उनका बीज अक्षर है।
कब और कैसे: मास के हर गुरुवार को अर्पण के बाद 108 बार।
ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
Om Mahalakshmyai cha vidmahe Vishnupatnyai cha dhimahi
Tanno Lakshmih prachodayat
अर्थ: हम महालक्ष्मी को जानें, विष्णु-पत्नी का ध्यान करें; लक्ष्मी हमें प्रेरणा दें।
कब और कैसे: कथा से पहले 11 या 21 बार।
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥
Namaste'stu mahamaye shripithe surapujite
Shankha-chakra-gada-haste Mahalakshmi namo'stu te
अर्थ: हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजमान, देवताओं से पूजित, शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।
कब और कैसे: महालक्ष्म्यष्टक का पहला श्लोक, जिसे परंपरा पद्म पुराण में इंद्र की स्तुति मानती है; हो सके तो हर गुरुवार आठों श्लोक पढ़ें।
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
Om jai Lakshmi Mata, maiya jai Lakshmi Mata.
Tumko nishidin sevat, Hari Vishnu Vidhata.
Om jai Lakshmi Mata.
Uma, Rama, Brahmani, tum hi jag-mata.
Surya-Chandrama dhyavat, Narad rishi gata.
Om jai Lakshmi Mata.
Durga roop niranjani, sukh sampatti data.
Jo koi tumko dhyavat, riddhi-siddhi dhan pata.
Om jai Lakshmi Mata.
Tum patal-nivasini, tum hi shubhdata.
Karm-prabhav-prakashini, bhavnidhi ki trata.
Om jai Lakshmi Mata.
Jis ghar mein tum rahtin, sab sadgun aata.
Sab sambhav ho jata, man nahin ghabrata.
Om jai Lakshmi Mata.
Tum bin yagya na hote, vastra na koi pata.
Khan-paan ka vaibhav, sab tumse aata.
Om jai Lakshmi Mata.
Shubh-gun mandir sundar, kshirodadhi-jata.
Ratna chaturdash tum bin, koi nahin pata.
Om jai Lakshmi Mata.
Mahalakshmi ji ki aarti, jo koi jan gata.
Ur anand samata, paap utar jata.
Om jai Lakshmi Mata.
यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'हरि विष्णु विधाता' की जगह 'हर-विष्णू-धाता', 'जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता' की जगह 'जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता', 'वस्त्र न कोई पाता' की जगह 'वस्त्र न हो पाता' और 'जो कोई जन गाता' की जगह 'जो कोई नर गाता' छपा है। छपा पाठ
इन गुरुवारों को मराठी व्रत पोथी से पढ़ी जाने वाली व्रत कथा सौराष्ट्र के राजा भद्रश्रवा और उनकी रानी सुरतचंद्रिका की है। मार्गशीर्ष के एक गुरुवार को महालक्ष्मी एक बूढ़ी स्त्री के रूप में महल आईं; अपने धन पर गर्व करने वाली और श्रृंगार में व्यस्त रानी ने उनका उपहास करके उन्हें द्वार से लौटा दिया।
लौटते हुए बूढ़ी स्त्री को छोटी राजकुमारी श्यामबाला मिली, जिसने आदर से उनका स्वागत किया और उनका परिचय पूछा। महालक्ष्मी ने उसे मार्गशीर्ष के गुरुवार का व्रत सिखाया: घट, पूजा, कथा और व्रत। श्यामबाला ने हर गुरुवार श्रद्धा से इसे निभाया, और समय आने पर उसका विवाह एक अच्छे घर में हुआ, जो खूब फला-फूला।
महल से लक्ष्मी के चले जाने पर राजा का वैभव घटता गया। जब विनम्र हुई रानी ने बेटी से व्रत सीखकर श्रद्धा से उसे रखा, तो लक्ष्मी की कृपा फिर घर लौट आई। कथा की सीख ही व्रत की सीख है: लक्ष्मी उस घर में टिकती हैं जहाँ हर अतिथि, चाहे कितना भी गरीब हो, आदर से स्वीकार किया जाता है।
भगवद्गीता के दसवें अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि महीनों में वे मार्गशीर्ष हैं, और यह मास साल के सबसे पवित्र महीनों में गिना जाता है। महाराष्ट्र में इसके गुरुवार महालक्ष्मी के हैं, जिनकी घर में घट स्थापित करके परिवार की खुशहाली, सौहार्द और समृद्धि के लिए पूजा होती है।
यह व्रत सबसे अधिक सुहागिनें, अक्सर परिवार के साथ, रखती हैं, और उद्यापन का हल्दी-कुमकुम और वाण महिलाओं के समुदाय को जोड़ता है। इसकी कथा विनम्रता और अतिथि-सत्कार सिखाती है, और मास के गुरुवार हर हफ्ते वही शांत अनुशासन लाते हैं: साफ घर, दीपक, कथा और साझा भोजन।
मास के हर गुरुवार सुबह और गोधूलि में घट के सामने घी का दीपक जलाएँ; परंपरा मानती है कि लक्ष्मी वहीं टिकती हैं जहाँ दीपक श्रद्धा से जलाया जाता है।
हर गुरुवार परिवार को सुनाते हुए व्रत कथा ऊँचे स्वर में पढ़ें; इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
उद्यापन में पड़ोस की सुहागिनों को हल्दी-कुमकुम और वाण देकर सम्मानित करें; माना जाता है कि व्रत की पोथी देने से व्रत का आशीर्वाद आगे बढ़ता है।
कथा की सीख के अनुसार, द्वार पर जो भी आए उसे आदर से स्वीकार करें और पानी या भोजन दें, खासकर गुरुवारों को।
हर गुरुवार 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' का 108 बार जप करें; परिवार इसे घर की समृद्धि के लिए कृतज्ञता की प्रार्थना के रूप में करते हैं।
मास के किसी गुरुवार किसी ज़रूरतमंद को चावल, गेहूँ या भोजन दें, लक्ष्मी जी के दिए हुए को बाँटते हुए।
इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।
| वर्ष | तारीख | स्थिति |
|---|---|---|
| 2026इस वर्ष | बुधवार, 9 दिसंबर 2026 से गुरुवार, 7 जनवरी 2027 तक | आने वाली |
| 2027 | सोमवार, 29 नवंबर से सोमवार, 27 दिसंबर 2027 तक | आने वाली |
| 2028 | शुक्रवार, 17 नवंबर से शनिवार, 16 दिसंबर 2028 तक | आने वाली |
दो पंचांग मार्गशीर्ष गुरुवार की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।
इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।
नई दिल्ली में मार्गशीर्ष मास बुधवार, 9 दिसंबर 2026 से शुरू होता है, और महाराष्ट्र के अमांत पंचांग के अनुसार व्रत तब से मास की अमावस्या तक हर गुरुवार रखा जाता है। आपके शहर के लिए साल के सभी गुरुवार इस पेज पर दिए गए हैं; उनमें अंतिम गुरुवार उद्यापन का है।
इस बार 30 दिन — बुधवार, 9 दिसंबर 2026 से गुरुवार, 7 जनवरी 2027 तक। दोनों छोर हर साल चंद्रमा और सूर्य की स्थिति से निकाले जाते हैं, इसलिए दिनों की गिनती भी साल-दर-साल बदल सकती है।
5: 10, 17, 24 और 31 दिसंबर तथा 7 जनवरी। ये वे गुरुवार हैं जिनके सूर्योदय पर अमांत मार्गशीर्ष मास चल रहा हो — बुधवार, 9 दिसंबर 2026 से गुरुवार, 7 जनवरी 2027 तक, नई दिल्ली के लिए निकाले गए। व्रत का उद्यापन प्रायः अंतिम गुरुवार को होता है।
2027 में सोमवार, 29 नवंबर; 2028 में शुक्रवार, 17 नवंबर।
साल के अनुसार चार या पाँच: चंद्र मास लगभग साढ़े उनतीस दिन का होता है, इसलिए किसी साल उसमें चार और किसी साल पाँच गुरुवार आते हैं। व्रत सभी गुरुवारों को रखा जाता है, और उद्यापन अंतिम गुरुवार को होता है।
यह मराठी व्रत पोथी की महालक्ष्मी व्रत कथा है: महालक्ष्मी बूढ़ी स्त्री के रूप में राजा भद्रश्रवा के महल आईं और घमंडी रानी ने उनका अपमान किया, पर राजकुमारी श्यामबाला ने उनका स्वागत किया, गुरुवार का व्रत सीखा और निभाया, और फली-फूली। जब रानी ने भी विनम्र होकर व्रत रखा, तो लक्ष्मी की कृपा लौट आई। यह हर गुरुवार ऊँचे स्वर में पढ़ी जाती है; संक्षेप ऊपर है।
घर साफ करें, रंगोली बनाएँ और घट स्थापित करें: चावल की ढेरी पर सिक्का, सुपारी और दूर्वा वाला जल का कलश, पाँच पत्ते और नारियल, साथ में देवी का मुखवटा या चित्र। पहले गणेश जी, फिर हल्दी-कुमकुम, फूल और फल से महालक्ष्मी की पूजा करें, कथा पढ़ें, आरती करें, और गोधूलि में फिर नैवेद्य अर्पित करें।
लाल कपड़े वाला चौरंग, चावल, कलश, सिक्का, सुपारी, दूर्वा, आम या पान के पाँच पत्ते, नारियल, महालक्ष्मी का मुखवटा या चित्र, साड़ी या ब्लाउज़ पीस, हल्दी-कुमकुम, अक्षत, फूल, घी का दीपक, धूप, फल, नैवेद्य और व्रत की पोथी। पूरी सूची ऊपर है।
मास के अंतिम गुरुवार को सामान्य पूजा और कथा के बाद पाँच या अधिक सुहागिनों को बुलाएँ, उन्हें हल्दी-कुमकुम, भोजन या मिठाई और वाण दें: नारियल, फल, ब्लाउज़ पीस और व्रत की पोथी। बहुत से परिवार उस दिन किसी ज़रूरतमंद को भोजन या अन्न भी देते हैं।
पूरे भारत में 'ॐ जय लक्ष्मी माता' गाई जाती है, और महाराष्ट्र के परिवार व्रत की पोथी से अपनी मराठी महालक्ष्मी आरती भी गाते हैं। 'ॐ जय लक्ष्मी माता' का पूरा पाठ ऊपर दिया गया है।
कोई एक मुहूर्त नहीं है। पूजा और कथा सुबह स्नान के बाद होती हैं, और आरती व नैवेद्य फिर गोधूलि में। पंचांग देखने वाले परिवार दिन का राहु काल टालते हैं, जो गुरुवार को दोपहर बाद के शुरुआती भाग में पड़ता है; रोज़ का पंचांग आपके शहर के लिए हर गुरुवार का समय बताता है।
परंपराएँ अलग हैं। बहुत सी महिलाएँ शाम की आरती और नैवेद्य तक कुछ नहीं खातीं, या केवल फल और साबूदाना, भगर जैसे व्रत के भोजन लेती हैं, फिर सादा शाकाहारी भोजन करती हैं; कुछ सुबह की पूजा के बाद एक बार खाती हैं। अपने परिवार की परंपरा मानें और सेहत बिगाड़ने वाला व्रत न रखें।
मार्गशीर्ष के गुरुवारों को, उस मास में जिसे गीता में श्रीकृष्ण अपना कहते हैं, घर की खुशहाली और सौहार्द के लिए महालक्ष्मी की पूजा के लिए। कथा की सीख, कि लक्ष्मी वहीं टिकती हैं जहाँ अतिथि का आदर हो, व्रत और उद्यापन के हल्दी-कुमकुम से जीवित रहती है।
मास की अमावस्या से पहले का अंतिम गुरुवार; आपके शहर के लिए गिनी गई साल के गुरुवारों की सूची इस पेज पर उसे दिखाती है। उद्यापन उसी गुरुवार को होता है।
द्वार पर और घट के सामने रंगोली: भीतर आते लक्ष्मी जी के छोटे पदचिह्न, कमल, कलश, स्वस्तिक या सरल किनारी, चावल के आटे या रंगों से। बहुत सी महिलाएँ हर गुरुवार नई रंगोली बनाती हैं।
इसे सबसे अधिक सुहागिनें रखती हैं, पर अविवाहित लड़कियाँ, पुरुष और पूरे परिवार भी रखते हैं, और पूजा व कथा घर का कोई भी सदस्य कर सकता है। ज़रूरी है हर गुरुवार साफ घर, कथा और आदर भरे मन के साथ इसे निभाना।