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शुक्ल पक्ष · प्रतिपदा तिथि · चैत्र

गुड़ी पड़वा 2027 कब है?

गुड़ी पड़वा 2027

163 दिन बाद

बुध, 7 अप्रैल

2027 में गुड़ी पड़वा बुधवार, 7 अप्रैल को है। नई दिल्ली में प्रतिपदा तिथि 7 अप्रैल, सुबह 5:21 से 8 अप्रैल, सुबह 4:29 तक रहेगी।

2028: सोमवार, 27 मार्च 2028

गुड़ी पड़वा कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

गुड़ी पड़वा 2027: तारीख और तिथि का समय

बुधवार, 7 अप्रैल 2027

तिथि
प्रतिपदा, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
चैत्र
तिथि आरंभ
7 अप्रैल, सुबह 5:21
तिथि समाप्त
8 अप्रैल, सुबह 4:29
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
7 अप्रैल, सुबह 6:04

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: गुड़ी पड़वा का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

गुड़ी पड़वा 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

गुड़ी पड़वा 2027 शुभ मुहूर्त

गुड़ी पड़वा, यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, देश के बड़े हिस्से में हिंदू चंद्र वर्ष का पहला दिन है: महाराष्ट्र हर द्वार पर गुड़ी उठाता है, यानी कलश और रेशमी वस्त्र से सजा डंडा; कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना इसे छह स्वादों की पचड़ी के साथ उगादि के रूप में मनाते हैं; और उत्तर भारत में चैत्र नवरात्रि और नया विक्रम संवत शुरू होता है। नई दिल्ली में यह बुधवार, 7 अप्रैल 2027 को है; गुड़ी सुबह सूर्योदय (सुबह 6:04) के बाद उठाई जाती है, और प्रतिपदा तिथि सुबह 5:21 से सुबह 4:29 (8 अप्रैल) तक रहेगी।

गुड़ी पड़वा 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
सूर्योदय (गुड़ी उठाना)सुबह 6:04क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

गुड़ी सुबह, तेल लगाकर स्नान के बाद, सूर्योदय के कुछ देर बाद उठाई जाती है, ताकि वह नए साल के पहले सूर्य का स्वागत करे; वह दिन भर खड़ी रहती है।

अभिजीत मुहूर्त (कलश स्थापना का विकल्प)बुधवार को अभिजीत मुहूर्त नहीं होता: उस दिन यही दुर्मुहूर्त है।

दोपहर का मुहूर्त। जो परिवार सुबह चैत्र नवरात्रि का कलश स्थापित न कर पाएँ, वे इसे चुनते हैं, अगर तब तक प्रतिपदा चल रही हो; परंपरा से बुधवार को अभिजीत मुहूर्त नहीं होता।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • लाभ सुबह 6:04 से सुबह 7:39 तक
  • अमृत सुबह 7:39 से सुबह 9:14 तक
  • शुभ सुबह 10:48 से दोपहर 12:23 तक
  • चर दोपहर 3:33 से शाम 5:07 तक
  • लाभ शाम 5:07 से शाम 6:42 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

बहुत से परिवार नए साल के दिन नया काम शुरू करते हैं, सोना या वाहन खरीदते हैं, या गृह प्रवेश करते हैं, और इसके लिए दिन का कोई शुभ चौघड़िया चुनते हैं।

सूर्यास्त (गुड़ी उतारना)शाम 6:42सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज से ओझल होने का समय।

सूर्यास्त से पहले छोटी-सी प्रार्थना करके गुड़ी उतार ली जाती है; शक्कर की माला और नीम की पत्तियाँ प्रसाद के रूप में बाँटी जाती हैं।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अमृत कालशाम 4:01 से शाम 5:37सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:33 से सुबह 5:19शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालदोपहर 12:23 से दोपहर 1:58
यमगण्ड कालसुबह 7:39 से सुबह 9:14
दुर्मुहूर्त (पहला)सुबह 11:58 से दोपहर 12:48
वर्ज्यम्सुबह 6:24 से सुबह 8:00

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए बुधवार, 7 अप्रैल 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

गुड़ी पड़वा पूजा विधि

  1. भोर में तेल स्नान

    जल्दी उठें, शरीर पर तेल मलकर स्नान करें; बहुत से घरों में पानी में नीम की कुछ पत्तियाँ डाली जाती हैं। नए या साफ कपड़े पहनें।

  2. घर और द्वार की सजावट

    घर साफ करें, द्वार पर रंगोली बनाएँ और मुख्य दरवाज़े पर आम के पत्तों और गेंदे का तोरण बाँधें।

  3. गुड़ी बनाएँ

    बाँस के लंबे डंडे के ऊपरी सिरे पर चटक रंग (पीला, हरा या लाल) का रेशमी कपड़ा या साड़ी बाँधें, साथ में नीम की टहनी, आम के पत्ते, फूलों की माला और शक्कर की माला (गाठी)। सबसे ऊपर तांबे, पीतल या चाँदी का लोटा उल्टा रखें और उस पर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएँ।

  4. गुड़ी उठाएँ और पूजें

    सूर्योदय के कुछ देर बाद मुख्य द्वार के दाहिनी ओर, खिड़की पर या छत पर गुड़ी उठाएँ, छोटी रंगोली या लकड़ी के आधार पर, ताकि वह गली से दिखे। हल्दी, कुमकुम, अक्षत, फूल, धूप और दीपक से पूजा करें और मिठाई अर्पित करें; यह ब्रह्मध्वज, यानी सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की पताका, का प्रतीक है।

  5. पहले नीम और गुड़

    नाश्ते से पहले नए साल का पहला भोजन थोड़ा-सा लें: गुड़ के साथ नीम की पत्तियाँ या फूल (महाराष्ट्र में इमली के साथ), या छह स्वादों वाली उगादि पचड़ी; यह याद दिलाता है कि साल में कड़वा भी आएगा और मीठा भी।

  6. पंचांग पूजन और श्रवण

    नए साल के पंचांग की हल्दी-कुमकुम से पूजा करें, फिर साल का भविष्यफल पढ़ें या सुनें, जैसे उगादि पर शाम को मंदिरों में पंचांग श्रवण होता है।

  7. चैत्र नवरात्रि: कलश स्थापना

    अगर आप चैत्र नवरात्रि रखते हैं, तो सुबह प्रतिपदा रहते कलश स्थापित करें: मिट्टी के पात्र में जौ बोएँ, जल भरे कलश में आम के पत्ते रखें, ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें, और नौ दिनों के लिए दीपक जलाएँ। माँ दुर्गा के पहले रूप शैलपुत्री की पूजा करें।

  8. नए साल की प्रार्थना

    हाथ जोड़कर नए साल में स्वास्थ्य और सुख-शांति की प्रार्थना करें। जिन परिवारों को आता हो, वे गुड़ी के सामने ब्रह्मध्वज का श्लोक बोलते हैं।

  9. उत्सव का भोजन और मिलना-जुलना

    महाराष्ट्र में पूरन पोली या श्रीखंड-पूरी, दक्षिण में ओब्बट्टु या बोब्बट्लु और आम का पुलिहोरा बनाएँ, बड़ों से और मंदिर में मिलने जाएँ; मुंबई, ठाणे और पुणे में शोभा यात्राओं में शामिल हों।

  10. गुड़ी उतारें

    सूर्यास्त से पहले छोटी-सी प्रार्थना करके गुड़ी उतारें और शक्कर की माला प्रसाद के रूप में बाँटें।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

गुड़ी पड़वा पूजा सामग्री सूची

  • बाँस का लंबा डंडा गुड़ी के लिए; साफ किया हुआ, चाहें तो कपड़े की पट्टी लपेटकर।
  • चटक रंग का रेशमी कपड़ा या साड़ी पीला, हरा या लाल, डंडे के ऊपरी सिरे पर बाँधने के लिए।
  • उल्टा रखने के लिए तांबे, पीतल या चाँदी का लोटा गुड़ी के शिखर का कलश।
  • नीम की टहनियाँ और आम के पत्ते गुड़ी पर बाँधने के लिए; नीम साल के पहले भोजन के लिए भी।
  • फूलों की माला और शक्कर की माला (गाठी) गुड़ी के लिए; शक्कर की माला प्रसाद में बँटती है।
  • हल्दी, कुमकुम और अक्षत लोटे पर स्वस्तिक और पूजा के लिए।
  • फूल, धूप और घी का दीपक गुड़ी पूजन के लिए।
  • रंगोली के रंग और तोरण द्वार और गुड़ी के आधार के लिए।
  • नीम की पत्तियाँ या फूल, गुड़ और इमली साल के पहले कड़वे-मीठे भोजन के लिए।
  • उगादि पचड़ी के लिए नीम के फूल, नया गुड़, इमली, कच्चा आम, चुटकी भर नमक और हरी मिर्च या काली मिर्च: छह स्वाद।
  • नया पंचांग पूजा और साल का भविष्यफल पढ़ने के लिए।
  • नवरात्रि कलश के लिए साफ मिट्टी और जौ वाला मिट्टी का पात्र, जल का कलश, पाँच आम के पत्ते, लाल कपड़े में नारियल, मौली, लाल चुनरी और नौ दिन का दीपक।
  • नैवेद्य के लिए मिठाई पूरन पोली, श्रीखंड या घर की बनी कोई भी मिठाई।

मंत्र · अर्थ के साथ

गुड़ी पड़वा के मंत्र और आरती

ब्रह्मध्वज श्लोक (गुड़ी के लिए)

ब्रह्मध्वज नमस्तेऽस्तु सर्वाभीष्टफलप्रद ।
प्राप्तेऽस्मिन्वत्सरे नित्यं मद्गृहे मङ्गलं कुरु ॥

Brahmadhvaja namaste'stu sarvabhishta-phalaprada
Prapte'smin vatsare nityam mad-grihe mangalam kuru

अर्थ: हे ब्रह्मा की पताका, सब मनोकामनाओं का फल देने वाली, आपको नमस्कार; इस आए हुए नए साल में मेरे घर में सदा मंगल करें।

कब और कैसे: उठाई गई गुड़ी की पूजा के बाद हाथ जोड़कर एक बार; यह महाराष्ट्र की गृह-परंपरा का श्लोक है, जो मराठी पूजा-पुस्तकों में छपता है; इसका कोई पुराना मूल ग्रंथ ज्ञात नहीं है।

शैलपुत्री ध्यान (नवरात्रि का पहला दिन)

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥

Vande vanchhita-labhaya chandrardha-krita-shekharam
Vrisharudham shuladharam Shailaputrim yashasvinim

अर्थ: मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए मैं उन यशस्विनी शैलपुत्री, पर्वतराज की पुत्री, को प्रणाम करता हूँ जो मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करती हैं, बैल पर सवार हैं और त्रिशूल धारण करती हैं।

कब और कैसे: नवरात्रि के पहले दिन का ध्यान श्लोक, कलश स्थापना के बाद 1, 3 या 11 बार।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sarva-mangala-mangalye shive sarvartha-sadhike
Sharanye tryambake Gauri Narayani namo'stu te

अर्थ: हे सब मंगलों में मंगलमयी, कल्याणकारी, सब कार्य सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी, नारायणी, आपको नमस्कार। यह देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के ग्यारहवें अध्याय से है।

कब और कैसे: नवरात्रि में हर दिन पूजा और आरती के समय एक या तीन बार।

या देवी सर्वभूतेषु

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

Ya devi sarvabhuteshu shaktirupena samsthita
Namastasyai namastasyai namastasyai namo namah

अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार, बार-बार नमस्कार। यह देवी माहात्म्य के पाँचवें अध्याय में देवताओं की स्तुति से है।

कब और कैसे: नवरात्रि के नौ दिनों में, खासकर दीपक जलाते समय।

आरती दुर्गा जी की आरती: जय अम्बे गौरी पूरी आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।

Jai Ambe Gauri, maiya jai Shyama Gauri.
Tumko nishdin dhyavat, Hari Brahma Shivri.
Om jai Ambe Gauri.

Maang sindoor virajat, tiko mrigmad ko.
Ujjwal se dou naina, chandravadan neeko.
Om jai Ambe Gauri.

Kanak saman kalevar, raktambar rajai.
Raktapushp gal mala, kanthan par sajai.
Om jai Ambe Gauri.

Kehari vahan rajat, khadag khappar dhari.
Sur-nar-munijan sevat, tinke dukhhari.
Om jai Ambe Gauri.

Kanan kundal shobhit, nasagre moti.
Kotik chandra divakar, sam rajat jyoti.
Om jai Ambe Gauri.

Shumbh-Nishumbh bidare, Mahishasur ghati.
Dhoomra vilochan naina, nishdin madmati.
Om jai Ambe Gauri.

Chand-Mund sanhare, Shonit Beej hare.
Madhu-Kaitabh dou mare, sur bhayheen kare.
Om jai Ambe Gauri.

Brahmani, Rudrani, tum Kamala rani.
Agam nigam bakhani, tum Shiv patrani.
Om jai Ambe Gauri.

Chaunsath yogini mangal gavat, nritya karat Bhairon.
Bajat taal mridanga, aru bajat damru.
Om jai Ambe Gauri.

Tum hi jag ki mata, tum hi ho bharta.
Bhaktan ki dukh harta, sukh sampati karta.
Om jai Ambe Gauri.

Bhuja char ati shobhit, var mudra dhari.
Manvanchhit phal pavat, sevat nar nari.
Om jai Ambe Gauri.

Kanchan thaal virajat, agar kapoor bati.
Shri Malketu mein rajat, koti ratan jyoti.
Om jai Ambe Gauri.

Shri Ambe ji ki aarti, jo koi nar gave.
Kahat Shivanand Swami, sukh-sampati pave.
Om jai Ambe Gauri.

Jai Ambe Gauri, maiya jai Shyama Gauri.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'चौंसठ योगिनि गावत' ('मंगल' के बिना), 'भैरों' की जगह 'भैरूँ' और 'अरु बाजत डमरू' की जगह 'औ बाजत डमरू' छपा है; बाकी पाठ वही है। छपा पाठ

कथा · कहानी और उसका अर्थ

गुड़ी पड़वा की कथा और महत्व

कथा

परंपरा मानती है कि ब्रह्मा जी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सूर्योदय के समय सृष्टि की रचना शुरू की, इसीलिए चंद्र गणना का नया साल इसी दिन से शुरू होता है; धर्मशास्त्र के निबंध ग्रंथों में ब्रह्म पुराण का उद्धृत एक श्लोक यही कहता है। गुड़ी ब्रह्मा जी की पताका, ब्रह्मध्वज, के रूप में उठाई जाती है, और इस दिन को युगादि या उगादि, यानी युग का आरंभ, भी कहते हैं।

महाराष्ट्र इसमें अपनी स्मृतियाँ जोड़ता है: कहा जाता है कि गुड़ी उन ध्वजाओं की याद है जो विजय के बाद श्रीराम के अयोध्या लौटने पर उनके स्वागत में फहराई गईं, और राजा शालिवाहन की विजय की, जिनके नाम का शालिवाहन शक संवत आज भी इसी दिन से गिना जाता है। उत्तर भारत इसी प्रतिपदा से राजा विक्रमादित्य के नाम का नया विक्रम संवत गिनता है।

यही सुबह चैत्र नवरात्रि शुरू करती है। इसका पहला दिन शैलपुत्री का है, पर्वतराज हिमवान की पुत्री, वे देवी जो पिछले जन्म में सती थीं और फिर पार्वती के रूप में जन्मीं; इसके बाद के नौ दिन नवमी पर श्रीराम के जन्म के साथ पूरे होते हैं।

महत्व

गुड़ी पड़वा एक आरंभ है: चंद्र वर्ष का, वसंत की फसल के मौसम का, चैत्र नवरात्रि का। गुड़ी, यानी उल्टे कलश और चटक रेशम से सजा डंडा, विजय और सुख-समृद्धि का प्रतीक है, और नीम-गुड़ का पहला कड़वा-मीठा स्वाद कहता है कि साल दोनों लाएगा। बहुत से परिवार इस दिन सोना, वाहन या घर खरीदते हैं, या कारोबार शुरू करते हैं, जिसे परंपरा साल के सबसे शुभ दिनों में गिनती है।

एक ही दिन के कई नाम हैं: महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा और गोवा में संवसर पाडवो, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में उगादि, कश्मीरी पंडितों का नवरेह, मणिपुर का साजिबु चेइराओबा और उत्तर भारत का हिंदू नववर्ष; सिंधी समाज नए चाँद के पहले दर्शन पर, उसी दिन या अगले दिन, चेटी चंड मनाता है। सौर कैलेंडर मानने वाले समाज अपना नया साल मेष संक्रांति पर मनाते हैं, जिसे तटीय कर्नाटक सौरमान उगादि कहता है।

उपाय · परंपरा

गुड़ी पड़वा के पारंपरिक उपाय

पहले नीम और गुड़

नए साल की सुबह किसी भी चीज़ से पहले थोड़ा नीम गुड़ के साथ खाएँ। परंपरा, और आयुर्वेद की ऋतुचर्या, इसे गर्म महीनों की शुद्ध शुरुआत मानती है।

धूप की ओर गुड़ी

गुड़ी सुबह ऐसी जगह उठाएँ जहाँ धूप पड़े और वह दिखे; मान्यता है कि यह साल भर के लिए घर में सौभाग्य का स्वागत करती है।

कुछ नया शुरू करें

इस दिन कोई नया काम, पढ़ाई या कोई अच्छी आदत शुरू करें। परंपरा नए साल के दिन को ही नई शुरुआत के लिए शुभ मानती है।

साल का पंचांग सुनें

नए पंचांग की पूजा करें और साल का पंचांग-पाठ सुनें। परिवार इसे साल की शुरुआत उसके पर्वों और ऋतुओं की जानकारी के साथ करने के लिए निभाते हैं।

नवरात्रि का दीपक

अगर आप चैत्र नवरात्रि रखते हैं, तो कलश के पास दीपक जलाएँ और नौ दिन सुरक्षित रूप से जलने दें; मान्यता है कि इससे घर में माँ की उपस्थिति बनी रहती है।

दान से साल की शुरुआत

गर्मी शुरू होते समय किसी ज़रूरतमंद को भोजन, पानी या पंखा दें; परंपरा मानती है कि दान से शुरू हुआ साल अच्छा जाता है।

परंपरा, संक्षेप में

गुड़ी पड़वा पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • सुबह तेल लगाकर स्नान करें और नए या साफ कपड़े पहनें।
  • सूर्योदय के बाद ऐसी जगह गुड़ी उठाएँ जहाँ वह दिखे, और सूर्यास्त से पहले उतार लें।
  • दिन का पहला भोजन नीम और गुड़, या उगादि पचड़ी, हो।
  • नए पंचांग की पूजा करें और साल का पाठ सुनें।
  • व्रत रखते हों तो सुबह प्रतिपदा रहते नवरात्रि का कलश स्थापित करें।
  • बड़ों से और मंदिर में मिलें और साथ मिलकर नए साल का स्वागत करें।

क्या न करें

  • टूटे या गंदे डंडे पर गुड़ी न उठाएँ, न उसका कपड़ा ज़मीन से छूने दें।
  • सूर्यास्त के बाद गुड़ी खड़ी न छोड़ें।
  • नए साल की शुरुआत झगड़े या कटु वचन से न करें।
  • प्रतिपदा खत्म होने के बाद नवरात्रि का कलश स्थापित न करें; प्रतिपदा रहते अभिजीत मुहूर्त लें।
  • नवरात्रि के दीपक को पर्दों के पास अकेला न छोड़ें।

देश भर में

गुड़ी पड़वा की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

महाराष्ट्र (गुड़ी पड़वा)
हर द्वार पर गुड़ी, रंगोली, गिरगाँव, ठाणे, डोंबिवली और पुणे की शोभा यात्राएँ, नीम-गुड़, और पूरन पोली या श्रीखंड-पूरी।
गोवा (संवसर पाडवो)
कोंकणी नववर्ष: द्वार पर गुड़ी, नीम-गुड़, और नए पंचांग की पूजा और पाठ।
कर्नाटक (उगादि)
बेवु-बेल्ला, यानी नीम और गुड़, इस याद के साथ बाँटा जाता है कि जीवन दोनों लाता है; भोजन में ओब्बट्टु या होलिगे, और शाम को पंचांग श्रवण।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना (उगादि)
छह स्वादों की उगादि पचड़ी, बोब्बट्लु, आम का पुलिहोरा, साल के भविष्यफल का पंचांग श्रवणम, और कवि सम्मेलनम, यानी कवियों की सभाएँ।
उत्तर भारत (हिंदू नववर्ष)
नया विक्रम संवत शुरू होता है, चैत्र नवरात्रि का कलश स्थापित होता है, जौ बोए जाते हैं और घर-मंदिर सजते हैं।
कश्मीर (नवरेह)
कश्मीरी पंडित नए साल की सुबह सबसे पहले चावल, अखरोट, नया पंचांग, फूल, दही और दर्पण वाली थाली देखते हैं।
मणिपुर (साजिबु चेइराओबा)
मैतेई नववर्ष, जिसमें द्वार पर विशेष भोजन अर्पित होता है और अच्छे साल के लिए पहाड़ी पर चढ़ाई की जाती है।
सिंधी समाज (चेटी चंड)
इसी के आसपास, चेत के नए चाँद के पहले दर्शन पर, सिंधी समाज चेटी चंड मनाता है: झूलेलाल जयंती और सिंधी नववर्ष।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • उगादि पचड़ी नीम के फूल, नया गुड़, इमली, कच्चा आम, नमक और मिर्च: कड़वा, मीठा, खट्टा, कसैला, नमकीन और तीखा, साल के छह स्वाद।
  • नीम और गुड़ (बेवु-बेल्ला, कडुलिंब) महाराष्ट्र और कर्नाटक में नए साल का कड़वा-मीठा पहला भोजन।
  • पूरन पोली चने की दाल और गुड़ भरी रोटी, महाराष्ट्र की त्योहार की मिठाई।
  • श्रीखंड-पूरी केसर और इलायची वाला मीठा चक्का दही, पूरियों के साथ।
  • ओब्बट्टु, होलिगे या बोब्बट्लु उगादि के लिए दक्षिण की मीठी रोटियाँ।
  • आम का पुलिहोरा कच्चे आम वाले चावल, भोजन में मौसम का पहला आम।
  • नवरात्रि का फलाहार नौ दिन का व्रत शुरू करने वालों के लिए फल, साबूदाना और कुट्टू।

आने वाले वर्षों में गुड़ी पड़वा की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में गुड़ी पड़वा की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षगुरुवार, 19 मार्च 2026बीत गई
2027बुधवार, 7 अप्रैल 2027आने वाली
2028सोमवार, 27 मार्च 2028आने वाली

पंचांगों में गुड़ी पड़वा की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग गुड़ी पड़वा की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: गुड़ी पड़वा का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

गुड़ी पड़वा से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में गुड़ी पड़वा कब है?

नई दिल्ली में गुड़ी पड़वा बुधवार, 7 अप्रैल 2027 को है। यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है, चैत्र के शुक्ल पक्ष का पहला दिन, और प्रतिपदा तिथि सुबह 5:21 से सुबह 4:29 (8 अप्रैल) तक रहेगी। यही दिन दक्षिण में उगादि, चैत्र नवरात्रि का पहला दिन और नए विक्रम संवत की शुरुआत है।

गुड़ी पड़वा की तिथि क्या है?

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 7 अप्रैल, सुबह 5:21 से 8 अप्रैल, सुबह 4:29 तक है, और गुड़ी पड़वा का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

दूसरे कैलेंडर में गुड़ी पड़वा की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल गुड़ी पड़वा कब है?

2028 में सोमवार, 27 मार्च।

गुड़ी उठाने का शुभ मुहूर्त क्या है?

गुड़ी के लिए अलग से कोई शास्त्रीय मुहूर्त नहीं है: यह सुबह, तेल स्नान के बाद, सूर्योदय (सुबह 6:04) के कुछ देर बाद उठाई जाती है और सूर्यास्त (शाम 6:42) से पहले उतार ली जाती है। जो परिवार शुभ समय चाहते हैं, वे सुबह के किसी शुभ चौघड़िया में गुड़ी उठाते हैं, जो यहाँ दिन के बाकी शुभ चौघड़ियों के साथ दिए हैं (लाभ: सुबह 6:04 से सुबह 7:39 तक; अमृत: सुबह 7:39 से सुबह 9:14 तक; शुभ: सुबह 10:48 से दोपहर 12:23 तक; चर: दोपहर 3:33 से शाम 5:07 तक; लाभ: शाम 5:07 से शाम 6:42 तक)।

गुड़ी कैसे बनाएँ और कैसे उठाएँ?

बाँस के लंबे डंडे के ऊपर चटक रेशमी कपड़ा, नीम की टहनी, आम के पत्ते, फूलों की माला और शक्कर की माला बाँधें, और सबसे ऊपर कुमकुम के स्वस्तिक वाला तांबे या पीतल का लोटा उल्टा रखें। सूर्योदय के बाद इसे मुख्य द्वार के पास या छत पर उठाएँ, हल्दी, कुमकुम, फूल और दीपक से पूजें, और सूर्यास्त से पहले उतार लें।

गुड़ी पड़वा का अर्थ क्या है?

गुड़ी वह ध्वज जैसा डंडा है जो द्वार पर उठाया जाता है, और पड़वा प्रतिपदा, यानी पक्ष के पहले दिन, का मराठी शब्द है। तो गुड़ी पड़वा गुड़ी वाली प्रतिपदा है: चैत्र का पहला दिन, चंद्र नववर्ष, जब विजय और स्वागत के प्रतीक के रूप में गुड़ी उठाई जाती है।

गुड़ी पड़वा क्यों मनाया जाता है?

यह चंद्र नववर्ष है: परंपरा मानती है कि ब्रह्मा जी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि की रचना शुरू की, और गुड़ी उनकी पताका के रूप में उठाई जाती है। महाराष्ट्र श्रीराम के अयोध्या लौटने और राजा शालिवाहन की विजय को भी याद करता है, जिनका शक संवत इसी दिन से शुरू होता है। इसी से साल की फसल का मौसम और चैत्र नवरात्रि शुरू होती है।

क्या गुड़ी पड़वा और उगादि एक ही हैं?

हाँ, दोनों एक ही नववर्ष का दिन हैं, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ: महाराष्ट्र गुड़ी उठाता है और नीम-गुड़ खाता है; कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना इसे उगादि कहते हैं, छह स्वादों की पचड़ी खाते हैं और पंचांग सुनते हैं। उत्तर भारत इसे हिंदू नववर्ष और चैत्र नवरात्रि की शुरुआत के रूप में मनाता है।

उगादि कब है?

उगादि गुड़ी पड़वा के ही दिन, यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को, आता है: नई दिल्ली में बुधवार, 7 अप्रैल 2027 को। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में दिन की शुरुआत तेल स्नान और द्वार पर आम के पत्तों के तोरण से होती है, सबसे पहले उगादि पचड़ी खाई जाती है, और शाम को साल का पंचांग सुना जाता है। तटीय कर्नाटक का सौरमान उगादि, यानी सौर नववर्ष, अलग से मेष संक्रांति पर मनाया जाता है।

उगादि पचड़ी क्या है, इसके छह स्वाद कौन से हैं?

उगादि पचड़ी तेलुगु और कन्नड़ नववर्ष का पहला भोजन है: नीम के फूल (कड़वा), नया गुड़ (मीठा), इमली (खट्टा), कच्चा आम (कसैला और खट्टा), चुटकी भर नमक और हरी मिर्च या काली मिर्च (तीखा)। साथ खाए गए छह स्वाद कहते हैं कि साल हर तरह के अनुभव लाएगा, और सबको स्वीकार करना है।

चैत्र नवरात्रि कब से शुरू है, कलश स्थापना कब करें?

चैत्र नवरात्रि इसी दिन, प्रतिपदा को, नई दिल्ली में बुधवार, 7 अप्रैल 2027 से शुरू होती है। कलश, यानी घटस्थापना, सुबह प्रतिपदा रहते (सुबह 5:21 से सुबह 4:29 (8 अप्रैल) तक) की जाती है, परंपरा से दिन के पहले भाग में; ऐसा न हो पाए, तो प्रतिपदा रहते अभिजीत मुहूर्त (इस वर्ष बुधवार होने से नहीं) आम विकल्प है।

चैत्र नवरात्रि के रंग कौन से हैं?

नवरात्रि के हर दिन के एक रंग की सूचियाँ हाल की लोकप्रिय परंपरा हैं, और अलग-अलग स्रोत अलग सूचियाँ देते हैं, इसलिए यह पेज किसी एक को नियम के रूप में नहीं देता। परंपरा से माँ की पूजा में लाल और पीला पहना जाता है; जो साफ और चटक हो, वह पहनें।

हिंदू नववर्ष क्या है, कौन सा संवत शुरू होता है?

हिंदू नववर्ष उत्तर भारत का चंद्र नववर्ष है, जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है, जब विक्रम संवत का नया साल लगता है; महाराष्ट्र और दक्कन में इसी दिन शालिवाहन शक का साल बदलता है। साल की संख्या हर साल बदलती है, और पंचांग इसी तारीख पर उसे छापते हैं।

उगादि पर घोषित होने वाला तेलुगु साल का नाम क्या है?

तेलुगु और कन्नड़ पंचांग हर साल को साठ संवत्सरों के चक्र से एक नाम देते हैं, जिसकी शुरुआत प्रभव से होती है; उगादि पर पंचांग श्रवणम नए साल का नाम और वर्षा, फसल और हर राशि का भविष्यफल बताता है। नाम हर साल बदलता है और उगादि पंचांगम में छपा होता है।

चांद्रमान और सौरमान उगादि में क्या अंतर है?

चांद्रमान उगादि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाने वाला चंद्र नववर्ष है, जिसे कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का बड़ा भाग मानता है। सौरमान उगादि सौर नववर्ष है, जो सूर्य के मेष में प्रवेश पर तटीय कर्नाटक के सौर कैलेंडर मानने वाले समाज मनाते हैं; यही सौर नववर्ष केरल में विषु और तमिलनाडु में पुथांडु कहलाता है।

गुड़ी पड़वा पर क्या बनाते हैं?

दिन की शुरुआत नीम-गुड़ या उगादि पचड़ी से होती है, और उत्सव के भोजन में महाराष्ट्र में पूरन पोली या श्रीखंड-पूरी, कर्नाटक में ओब्बट्टु या होलिगे, और आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में बोब्बट्लु के साथ आम का पुलिहोरा बनता है। नवरात्रि का व्रत शुरू करने वाले फल और फलाहार लेते हैं।

क्या गुड़ी पड़वा पर सोना, वाहन या घर खरीदना शुभ है?

परंपरा गुड़ी पड़वा को साल के सबसे शुभ दिनों में गिनती है: महाराष्ट्र में यह साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है, यानी वे साढ़े तीन दिन जो अपने आप में शुभ माने जाते हैं, अक्षय तृतीया, दशहरा और आधे मुहूर्त के रूप में दिवाली पाडवा के साथ। बहुत से परिवार इस दिन सोना, वाहन या घर खरीदते हैं, या कारोबार शुरू करते हैं, और कुछ परिवार दिन का कोई शुभ चौघड़िया (लाभ: सुबह 6:04 से सुबह 7:39 तक; अमृत: सुबह 7:39 से सुबह 9:14 तक; शुभ: सुबह 10:48 से दोपहर 12:23 तक; चर: दोपहर 3:33 से शाम 5:07 तक; लाभ: शाम 5:07 से शाम 6:42 तक) चुनते हैं; फैसला स्वयं ठोस आर्थिक समझ पर होना चाहिए, तारीख पर नहीं।