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शुक्ल पक्ष · प्रतिपदा तिथि · आश्विन (पूर्णिमांत) / भाद्रपद (अमांत)

शारदीय नवरात्रि 2027 कब है?

शारदीय नवरात्रि 2027

339 दिन बाद

गुरु, 30 सितंबर

2027 में शारदीय नवरात्रि गुरुवार, 30 सितंबर से शुक्रवार, 8 अक्टूबर तक है — 9 दिन। यह शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है और 9 दिन चलता है।

2028: मंगलवार, 19 सितंबर से बुधवार, 27 सितंबर 2028 तक

शारदीय नवरात्रि कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि है। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यही तिथि आश्विन शुक्ल प्रतिपदा कहलाती है — दिन वही है, केवल महीने का नाम अलग। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

शारदीय नवरात्रि 2027: तारीख और तिथि का समय

गुरुवार, 30 सितंबर 2027

तिथि
प्रतिपदा, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
आश्विन (पूर्णिमांत) / भाद्रपद (अमांत)
तिथि आरंभ
30 सितंबर, सुबह 8:06
तिथि समाप्त
1 अक्टूबर, सुबह 5:36
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
30 सितंबर, सुबह 6:13

इस बार तिथि क्षय है। प्रतिपदा तिथि एक निर्णायक क्षण के बाद शुरू होकर अगले से पहले ख़त्म हो जाती है, यानी किसी को नहीं छूती, और सामान्य नियम दिन नहीं चुन पाता। पर्व रद्द नहीं होता: वह उस दिन मनाया जाता है जिस दिन यह तिथि चलती है, जो ऊपर की तारीख है। यह बताना ज़रूरी है — सिर्फ़ तारीख छापने का मतलब होता कि वह नियम लागू हुआ जो इस साल लागू नहीं हुआ।

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: शारदीय नवरात्रि का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

शारदीय नवरात्रि 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

शारदीय नवरात्रि 2027 शुभ मुहूर्त

शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल पक्ष की देवी की नौ रातें हैं, जिनमें हर दिन दुर्गा के नौ रूपों में से एक — शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक — की पूजा होती है। नवरात्रि 2027 नई दिल्ली में गुरुवार, 30 सितंबर 2027 को घटस्थापना से शुरू होती है, जब कलश स्थापित किया जाता है और जौ बोए जाते हैं। घटस्थापना का मुहूर्त सुबह 8:06 से सुबह 10:11 तक है; सुबह का समय कम हो या निकल जाए, तो अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:47 से दोपहर 12:34 तक मान्य विकल्प है।

शारदीय नवरात्रि 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
घटस्थापना मुहूर्तसुबह 8:06 से सुबह 10:11 तकप्रतिपदा तिथि में दिन का पहला तिहाई भाग, जहाँ तक हो सके चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग से बचकर; इसके बाद कलश स्थापना नहीं की जाती।

प्रतिपदा तिथि रहते दिन का पहला तिहाई भाग — धर्मशास्त्र में कलश स्थापना का यही समय है; जहाँ हो सके, द्विस्वभाव लग्न चुना जाता है और चित्रा नक्षत्र व वैधृति योग से बचा जाता है। स्नान, जौ बोना और कलश स्थापना हो सके तो इसी समय में करें।

घटस्थापना अभिजीत मुहूर्तसुबह 11:47 से दोपहर 12:34 तकप्रतिपदा पर अभिजीत मुहूर्त: सुबह का समय छोटा हो या छूट जाए तो यह विकल्प है।

प्रतिपदा पर दोपहर का अभिजीत मुहूर्त — जब सुबह का समय बहुत छोटा हो, चित्रा या वैधृति के कारण बाधित हो, या छूट जाए, तब का मान्य विकल्प। घटस्थापना दोपहर बाद या रात में नहीं की जाती।

ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:36 से सुबह 5:24 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।

सूर्योदय से पहले के दो मुहूर्त — स्नान, पूजा स्थान की सफ़ाई और सामग्री सजाने का पारंपरिक समय, ताकि घटस्थापना का समय शुरू होते ही कलश स्थापित हो सके।

सूर्योदयसुबह 6:13क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

दिन, और उसका पहला तिहाई भाग जिसमें घटस्थापना होती है, आपके शहर के सूर्योदय से गिना जाता है।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • शुभ सुबह 6:13 से सुबह 7:42 तक
  • चर सुबह 10:41 से दोपहर 12:11 तक
  • लाभ दोपहर 12:11 से दोपहर 1:40 तक
  • अमृत दोपहर 1:40 से दोपहर 3:10 तक
  • शुभ शाम 4:39 से शाम 6:09 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया; कुछ परिवार, ख़ासकर गुजरात और महाराष्ट्र में, सुबह के मुहूर्त के भीतर इन्हीं में से कोई समय कलश के लिए चुनते हैं।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तसुबह 11:47 से दोपहर 12:34शुभ
अमृत कालरात 8:38 से रात 10:07सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:36 से सुबह 5:24शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालदोपहर 1:40 से दोपहर 3:10
यमगण्ड कालसुबह 6:13 से सुबह 7:42
दुर्मुहूर्त (पहला)सुबह 10:11 से सुबह 10:59
दुर्मुहूर्त (दूसरा)दोपहर 2:58 से दोपहर 3:45
वर्ज्यम्सुबह 11:46 से दोपहर 1:15

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए गुरुवार, 30 सितंबर 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

शारदीय नवरात्रि पूजा विधि

  1. एक दिन पहले तैयारी

    घर और पूजा का स्थान, हो सके तो ईशान कोण, साफ़ करें। सामग्री जुटा लें और संकल्प तय करें: कितने दिन व्रत रखेंगे, दुर्गा सप्तशती का पाठ करेंगे या नहीं, और अखंड ज्योत जलाएँगे या नहीं।

  2. प्रतिपदा पर स्नान और संकल्प

    सुबह जल्दी स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। दाएँ हाथ में जल, चावल और फूल लेकर अपना नाम, दिन और नौ दिनों का संकल्प बोलें, फिर जल छोड़ दें।

  3. जौ बोएँ (जवारे)

    मिट्टी के चौड़े पात्र या ट्रे में साफ़ मिट्टी बिछाएँ, उस पर जौ के दाने बिखेरें, ऊपर से मिट्टी की पतली परत डालें और जल छिड़कें। कलश इसी पर रखा जाएगा, और नौ दिनों में उगे जवारे नवमी या दशमी को अर्पित किए जाते हैं।

  4. कलश स्थापना

    घटस्थापना मुहूर्त में ताँबे, पीतल या मिट्टी के कलश पर स्वस्तिक बनाएँ, गले में मौली बाँधें और उसमें जल और थोड़ा गंगाजल भरें। उसमें सिक्का, सुपारी, हल्दी की गाँठ, दूर्वा और चावल डालें। मुँह पर आम के पाँच या सात पत्ते रखें, चावल भरे ढक्कन से ढकें, और ऊपर लाल चुनरी में लिपटा, मौली बँधा नारियल रखें। कलश मंत्र बोलते हुए कलश को जौ वाली मिट्टी पर स्थापित करें।

  5. देवी की स्थापना

    कलश के पास चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा रखें। पहले गणेश जी की पूजा करें, फिर देवी का आवाहन करें: रोली, चावल, लाल फूल, चुनरी, श्रृंगार सामग्री, धूप, दीप और भोग अर्पित करें।

  6. अखंड ज्योत, अगर संकल्प लिया है

    घी और मोटी बत्ती वाला पीतल का बड़ा दीपक, काँच की चिमनी के नीचे, कलश के पास जलाया जाता है जो नौ दिन लगातार जले। इसे तभी जलाएँ जब कोई सुबह-शाम घी डाल सके और यह पर्दों से दूर सुरक्षित रखा जा सके; हर पूजा में जलाया गया दीपक भी उतना ही मान्य है।

  7. सुबह और शाम की रोज़ की पूजा

    हर दिन कलश के पास ताज़े फूल और उस दिन का भोग चढ़ाएँ, उस दिन की देवी का मंत्र जपें, दुर्गा सप्तशती का कुछ भाग (तेरह अध्याय नौ दिनों में बाँटे जा सकते हैं) या दुर्गा चालीसा पढ़ें, और शाम की आरती में ‘जय अम्बे गौरी’ गाएँ। जौ पर हल्का जल छिड़कें।

  8. उस दिन के रूप की पूजा

    नौ रूप तिथि के अनुसार पूजे जाते हैं: प्रतिपदा को शैलपुत्री, द्वितीया को ब्रह्मचारिणी, तृतीया को चंद्रघंटा, चतुर्थी को कूष्मांडा, पंचमी को स्कंदमाता, षष्ठी को कात्यायनी, सप्तमी को कालरात्रि, अष्टमी को महागौरी और नवमी को सिद्धिदात्री। जब कोई तिथि दो दिन रहे या छूट जाए, तो देवी तिथि के साथ चलती हैं, जैसा नवरात्रि की दिन-अनुसार तालिका में दिखाया गया है।

  9. उस दिन का रंग, अगर आप सूची मानते हैं

    नवरात्रि रंगों की प्रचलित सूची वार से चलती है: पहले दिन का रंग उस वार से जिस दिन नवरात्रि शुरू होती है, बाद के हर दिन का रंग उसी के वार से, और आठवाँ-नौवाँ दिन, जो पहले आ चुके वारों पर पड़ते हैं, उस वार का दूसरा रंग लेते हैं ताकि कोई रंग दोहराया न जाए। इस वर्ष के नौ रंग नवरात्रि रंगों वाले पेज पर हैं।

  10. व्रत रखें

    नवरात्रि का व्रत आम तौर पर फलाहारी होता है: फल, दूध-दही, और कुट्टू, सिंघाड़ा, राजगिरा, समा के चावल, साबूदाना, आलू और मखाने से बने व्यंजन, सेंधा नमक के साथ; अनाज, दालें, प्याज़ और लहसुन नहीं। कुछ लोग दिन में एक बार भोजन करते हैं, कुछ केवल पहला और अंतिम दिन (‘जोड़े’ का व्रत)। व्रत उतना ही रखें जितना स्वास्थ्य अनुमति दे।

  11. अष्टमी और नवमी: कन्या पूजन और हवन

    परिवार की रीति से अष्टमी या नवमी को लगभग दो से दस वर्ष की कन्याओं के पैर धोकर, तिलक लगाकर, हलवा-पूरी-चने खिलाकर और उपहार देकर उनका पूजन करें, और हवन से नौ दिन पूरे करें। अष्टमी से नवमी के मिलन पर संधि पूजा होती है।

  12. दशमी: कलश विसर्जन और पारण

    विजयादशमी की सुबह कलश को फूल चढ़ाएँ, नारियल उठाएँ, कलश का जल पूरे घर में छिड़कें, कुछ जवारे रख लें और बाकी बगीचे या साफ़ बहते जल में डालें। जिन परिवारों ने नवमी को व्रत नहीं खोला, वे अब पारण करते हैं।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

शारदीय नवरात्रि पूजा सामग्री सूची

  • मिट्टी का चौड़ा पात्र या ट्रे और साफ़ मिट्टी जौ बोने के लिए; छनी हुई बगीचे की मिट्टी सबसे अच्छी।
  • जौ मुट्ठी भर दाने; कुछ घरों में गेहूँ भी बोया जाता है।
  • ताँबे, पीतल या मिट्टी का कलश पवित्र कलश; मिट्टी का कलश पारंपरिक और सस्ता है।
  • गंगाजल और साफ़ जल कलश भरने के लिए।
  • आम के पत्ते (पाँच या सात) कलश के मुँह के लिए; अशोक के पत्ते भी मान्य हैं।
  • जटा वाला नारियल और लाल चुनरी या कपड़ा कलश के ऊपर, लपेटकर और मौली बाँधकर रखने के लिए।
  • मौली (कलावा) कलश के गले, नारियल और अपनी कलाई के लिए।
  • सिक्का, सुपारी, हल्दी की गाँठ और दूर्वा कलश में डालने के लिए।
  • अक्षत (साबुत चावल) कलश के ढक्कन और हर अर्पण के लिए।
  • रोली, कुमकुम, हल्दी और चंदन तिलक और कलश पर स्वस्तिक के लिए।
  • लकड़ी की चौकी और लाल कपड़ा देवी का आसन।
  • माँ दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा कलश के पास चौकी पर।
  • लाल चुनरी और श्रृंगार सामग्री बिंदी, सिंदूर, चूड़ियाँ, मेहंदी, काजल, दर्पण, कंघी — देवी को अर्पित।
  • लाल फूल और मालाएँ गुड़हल दुर्गा जी को प्रिय है; गेंदा भी चलेगा; रोज़ ताज़े फूल।
  • काँच की चिमनी वाला अखंड ज्योत का दीपक, घी और लंबी बत्तियाँ केवल तब, जब नौ दिन जलाने का संकल्प हो।
  • छोटे दीपक, घी या तेल, रुई की बत्तियाँ रोज़ की पूजा और आरती के लिए।
  • अगरबत्ती, धूप और कपूर रोज़ की पूजा और आरती के लिए।
  • दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा रोज़ के पाठ के लिए।
  • पान, सुपारी, लौंग और इलायची पूजा में अर्पित करने के लिए।
  • फल, मेवे और मिठाई रोज़ के भोग के लिए।
  • घंटी, शंख और आरती की थाली सुबह और शाम की आरती के लिए।
  • माचिस और जल का छोटा पात्र सुरक्षा के लिए दीपक के पास रखें।
  • व्रत की सामग्री: कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, समा के चावल, मखाने, सेंधा नमक नौ दिनों के व्रत के भोजन के लिए।
  • कन्या पूजन और हवन का सामान अष्टमी या नवमी के लिए: उपहार, चुनरियाँ, हलवा-पूरी-चने; हवन कुंड, आम की लकड़ी, सामग्री, सूखा नारियल।

मंत्र · अर्थ के साथ

शारदीय नवरात्रि के मंत्र और आरती

कलश स्थापना मंत्र

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः ।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः ॥

Kalashasya Mukhe Vishnuh Kanthe Rudrah Samashritah, Mule Tatra Sthito Brahma Madhye Matriganah Smritah

अर्थ: कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और मध्य में मातृगण निवास करते हैं।

कब और कैसे: कलश पूजा का पारंपरिक श्लोक: कलश को जौ वाली मिट्टी पर रखते समय एक बार, और फूल चढ़ाते समय फिर से पढ़ें।

नवार्ण मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे

Om Aim Hrim Klim Chamundayai Vichche

अर्थ: चामुंडा रूप देवी का नौ अक्षरों वाला मंत्र, जिसमें सरस्वती, लक्ष्मी और काली के बीज अक्षर हैं।

कब और कैसे: दुर्गा सप्तशती परंपरा में नवरात्रि का मुख्य मंत्र: नौ दिनों तक रोज़ एक माला (108), और नवमी के हवन में ‘स्वाहा’ के साथ।

नवदुर्गा के नौ मंत्र

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः
ॐ देवी स्कन्दमात्रे नमः
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः
ॐ देवी कालरात्र्यै नमः
ॐ देवी महागौर्यै नमः
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः

Om Devi Shailaputryai Namah
Om Devi Brahmacharinyai Namah
Om Devi Chandraghantayai Namah
Om Devi Kushmandayai Namah
Om Devi Skandamatre Namah
Om Devi Katyayanyai Namah
Om Devi Kalaratryai Namah
Om Devi Mahagauryai Namah
Om Devi Siddhidatryai Namah

अर्थ: देवी के नौ रूपों को नमस्कार — पर्वतराज की पुत्री शैलपुत्री से सिद्धि देने वाली सिद्धिदात्री तक।

कब और कैसे: उस दिन की तिथि के अनुसार रोज़ एक पंक्ति: सुबह की पूजा में उस दिन के रूप के लिए 108 बार।

या देवी सर्वभूतेषु (दुर्गा सप्तशती)

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

Ya Devi Sarvabhuteshu Shaktirupena Samsthita, Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah

अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।

कब और कैसे: दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय से। हर दिन की पूजा में तीन या ग्यारह बार पढ़ें।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये (दुर्गा सप्तशती)

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sarvamangalamangalye Shive Sarvarthasadhike, Sharanye Tryambake Gauri Narayani Namostu Te

अर्थ: हे सब मंगलों की मंगलरूपा, कल्याणकारी, सब कामनाएँ पूरी करने वाली, शरण देने वाली, त्रिनेत्री गौरी नारायणी — आपको नमस्कार है।

कब और कैसे: दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11, श्लोक 10। फूल चढ़ाते समय और शाम की आरती के अंत में पढ़ें।

आरती दुर्गा जी की आरती: जय अम्बे गौरी पूरी आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।

Jai Ambe Gauri, maiya jai Shyama Gauri.
Tumko nishdin dhyavat, Hari Brahma Shivri.
Om jai Ambe Gauri.

Maang sindoor virajat, tiko mrigmad ko.
Ujjwal se dou naina, chandravadan neeko.
Om jai Ambe Gauri.

Kanak saman kalevar, raktambar rajai.
Raktapushp gal mala, kanthan par sajai.
Om jai Ambe Gauri.

Kehari vahan rajat, khadag khappar dhari.
Sur-nar-munijan sevat, tinke dukhhari.
Om jai Ambe Gauri.

Kanan kundal shobhit, nasagre moti.
Kotik chandra divakar, sam rajat jyoti.
Om jai Ambe Gauri.

Shumbh-Nishumbh bidare, Mahishasur ghati.
Dhoomra vilochan naina, nishdin madmati.
Om jai Ambe Gauri.

Chand-Mund sanhare, Shonit Beej hare.
Madhu-Kaitabh dou mare, sur bhayheen kare.
Om jai Ambe Gauri.

Brahmani, Rudrani, tum Kamala rani.
Agam nigam bakhani, tum Shiv patrani.
Om jai Ambe Gauri.

Chaunsath yogini mangal gavat, nritya karat Bhairon.
Bajat taal mridanga, aru bajat damru.
Om jai Ambe Gauri.

Tum hi jag ki mata, tum hi ho bharta.
Bhaktan ki dukh harta, sukh sampati karta.
Om jai Ambe Gauri.

Bhuja char ati shobhit, var mudra dhari.
Manvanchhit phal pavat, sevat nar nari.
Om jai Ambe Gauri.

Kanchan thaal virajat, agar kapoor bati.
Shri Malketu mein rajat, koti ratan jyoti.
Om jai Ambe Gauri.

Shri Ambe ji ki aarti, jo koi nar gave.
Kahat Shivanand Swami, sukh-sampati pave.
Om jai Ambe Gauri.

Jai Ambe Gauri, maiya jai Shyama Gauri.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'चौंसठ योगिनि गावत' ('मंगल' के बिना), 'भैरों' की जगह 'भैरूँ' और 'अरु बाजत डमरू' की जगह 'औ बाजत डमरू' छपा है; बाकी पाठ वही है। छपा पाठ

कथा · कहानी और उसका अर्थ

शारदीय नवरात्रि की कथा और महत्व

कथा

दुर्गा सप्तशती के रूप में नवरात्रि में पढ़ा जाने वाला देवी माहात्म्य देवी के तीन युद्धों की कथा कहता है। महाकाली के रूप में वे भगवान विष्णु को जगाकर मधु और कैटभ का नाश कराती हैं; देवताओं की सम्मिलित शक्ति से प्रकट महालक्ष्मी के रूप में वे महिषासुर का वध करती हैं; और महासरस्वती के रूप में चंड, मुंड और रक्तबीज जैसे सेनापतियों सहित शुंभ और निशुंभ को परास्त करती हैं। नौ रातें उनकी इसी विजय के काल के रूप में मनाई जाती हैं।

देवी भागवत बताता है कि सीता जी के वियोग में दुखी श्रीराम को नारद मुनि ने लंका पर चढ़ाई से पहले आश्विन में नवरात्रि व्रत करने को कहा। श्रीराम ने किष्किंधा में नौ दिन उपवास और देवी की पूजा की; अष्टमी को देवी ने प्रकट होकर विजय का वचन दिया — और उसके बाद विजयादशमी आई।

घरों में पढ़ी जाने वाली प्रचलित व्रत कथा में एक भक्त ब्राह्मण की पुत्री सुमति का विवाह पिता के क्रोध में एक कुष्ठ रोगी से हो जाता है और वह उसके साथ वन चली जाती है। देवी प्रकट होकर बताती हैं कि पिछले जन्म में उसने अनजाने में नवरात्रि का व्रत रखा था; सुमति उसका पुण्य अर्पित करती है, पति स्वस्थ हो जाता है, और देवी यह व्रत उन सबके लिए बताती हैं जो उनकी कृपा चाहते हैं।

महत्व

नवरात्रि ऋतुओं के संधिकाल में आती है, और पितरों के पखवाड़े के बाद का पखवाड़ा देवी का होता है। हर रात देवी के नौ रूपों में से एक की पूजा होती है — हिमालय की पुत्री शैलपुत्री से, तपस्विनी ब्रह्मचारिणी और उग्र कालरात्रि होते हुए, महागौरी और सिद्धिदात्री तक — पर्वत की पुत्री से सिद्धि देने वाली तक की यह यात्रा बहुत से लोग साधक की यात्रा के रूप में देखते हैं।

कलश एक पात्र में समाए पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक है, जिसमें देवता निवास करते हैं, और उसके पास उगने वाले जौ वृद्धि और समृद्धि का संकेत हैं; इसीलिए नवरात्रि इन्हीं से शुरू होती है। व्रत, रोज़ का पाठ, अखंड ज्योत और अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन — ये चार साधनाएँ ज़्यादातर घरों में होती हैं।

वर्ष में चार नवरात्रियाँ होती हैं, पर दो व्यापक रूप से मनाई जाती हैं: वसंत की चैत्र नवरात्रि, जो राम नवमी पर समाप्त होती है, और शरद की शारदीय नवरात्रि, जो विजयादशमी के साथ पूरी होती है और महानवरात्रि कहलाती है। माघ और आषाढ़ की दो नवरात्रियाँ गुप्त नवरात्रि हैं।

उपाय · परंपरा

शारदीय नवरात्रि के पारंपरिक उपाय

उस दिन का भोग

एक प्रचलित सूची में, जो शास्त्र का नियम नहीं बल्कि लोक-परंपरा है, हर रूप का प्रिय भोग बताया गया है — शैलपुत्री को घी, ब्रह्मचारिणी को शक्कर, चंद्रघंटा को दूध या खीर, कूष्मांडा को मालपुआ, स्कंदमाता को केला, कात्यायनी को शहद, कालरात्रि को गुड़, महागौरी को नारियल और सिद्धिदात्री को तिल। इसे चढ़ाकर प्रसाद रूप में बाँटना रोज़ की सरल साधना है।

दुर्गा सप्तशती का पाठ

नौ दिनों में सप्तशती का पाठ, या समय कम हो तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र, नवरात्रि साधना का पारंपरिक हृदय है और माना जाता है कि इससे देवी की रक्षा मिलती है।

हर शाम द्वार पर दीपक

नवरात्रि की हर शाम घर के द्वार पर घी या तेल का दीपक जलाना देवी को घर में आमंत्रित करने की पुरानी परंपरा है।

जवारों को प्रेम से देखें

लोक परंपरा घने और हरे जवारों को अच्छे वर्ष का संकेत मानती है; वे जैसे भी उगें, कृतज्ञता से अर्पित करें और कुछ पूजा स्थान या तिजोरी में रखें।

लाल चुनरी अर्पण

घर पर या मंदिर में देवी को लाल चुनरी चढ़ाना परिवार की कुशलता और सुहागिनों के सौभाग्य के लिए नवरात्रि का आम संकल्प है।

कन्याओं और भूखों के लिए दान

भूखों को भोजन, और किसी बच्ची की किताबों या फ़ीस में मदद, कन्या पूजन के भाव को एक सुबह से आगे ले जाते हैं।

परंपरा, संक्षेप में

शारदीय नवरात्रि पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • घटस्थापना सुबह के मुहूर्त में करें, ज़रूरत हो तो अभिजीत मुहूर्त में।
  • कलश ईशान कोण में, साफ़ और ऊँचे स्थान पर रखें।
  • नौ दिन सुबह-शाम छोटी पूजा और आरती करें।
  • जौ की मिट्टी नम रखें, पानी से भरी नहीं।
  • व्रत उतना ही रखें जितना स्वास्थ्य अनुमति दे, और पर्याप्त पानी पिएँ।
  • अखंड ज्योत जलाएँ तो काँच की चिमनी में, पर्दों से दूर रखें।
  • अष्टमी या नवमी को परिवार की रीति से कन्या पूजन करें।

क्या न करें

  • कलश स्थापना रात में या दोपहर बाद न करें।
  • अखंड ज्योत को बिना देखरेख न छोड़ें, न उसका घी खत्म होने दें।
  • फलाहारी व्रत में अनाज, दालें, प्याज़, लहसुन या साधारण नमक न पकाएँ।
  • गर्भावस्था, मधुमेह या बीमारी में निर्जल या निराहार व्रत न रखें; फल-दूध का व्रत चुनें और डॉक्टर से पूछें।
  • बहुत से परिवार नौ दिनों में बाल, नाखून काटने और शेव करने से बचते हैं; अपने घर की परंपरा मानें।
  • कलश का जल, जौ या पुराने फूल कूड़े में न फेंकें; बगीचे, गमले या साफ़ बहते जल में डालें।

देश भर में

शारदीय नवरात्रि की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

गुजरात
गरबो — भीतर दीपक वाला छिद्रों भरा मिट्टी का घड़ा, जो देवी का प्रतीक है — के चारों ओर नौ रातों का गरबा और डांडिया; अंबाजी में भारी भीड़ उमड़ती है।
पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा
अंतिम पाँच दिन दुर्गा पूजा के होते हैं — षष्ठी को बोधन, फिर सप्तमी, अष्टमी, नवमी और बिजया दशमी।
महाराष्ट्र
हर घर में घटस्थापना, महिलाओं द्वारा दिन-ब-दिन पहने जाने वाले नौ रंग, हाथी के चित्र के चारों ओर लड़कियों के भोंडला या हादगा गीत, और तुलजापुर, माहूर और कोल्हापुर की अंबाबाई के दर्शन के लिए भारी भीड़।
उत्तर भारत
हर रात रामलीला, घटस्थापना पर जवारे, अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन, रात भर के जगराते, और वैष्णो देवी की यात्रा।
तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश
गोलू (बोम्मई कोलू) — घर में सीढ़ियों पर सजी गुड़ियाँ — जहाँ महिलाएँ हल्दी-कुमकुम और सुंडल के लिए एक-दूसरे के घर जाती हैं; नवमी को सरस्वती और आयुध पूजा, और कर्नाटक में मैसूरु दशहरा।
तेलंगाना
बतुकम्मा, फूलों के ढेर के चारों ओर महिलाओं के गीतों का उत्सव, पहले दिनों से चलता है और दुर्गाष्टमी के आसपास समाप्त होता है।
केरल
यहाँ नवरात्रि मुख्यतः सरस्वती की है: ‘पूजा वैप्पु’ के लिए किताबें रखी जाती हैं और विजयादशमी को बच्चे पढ़ाई शुरू करते हैं।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • कुट्टू की पूरी या पकौड़े व्रत की मुख्य रोटी; घी या मूँगफली के तेल में तलें।
  • सिंघाड़े के आटे का हलवा या पूरी व्रत का मीठा या नमकीन व्यंजन।
  • साबूदाना खिचड़ी या वड़ा आलू और मूँगफली के साथ, जीरा और सेंधा नमक से छौंका हुआ।
  • समा के चावल बहुत से घरों में आलू की सब्ज़ी के साथ चावल की तरह खाए जाते हैं।
  • व्रत के आलू जीरा, हरी मिर्च और सेंधा नमक के साथ पके आलू।
  • मखाने की खीर या भुने मखाने हल्का और पेट भरने वाला व्रत का नाश्ता।
  • फल, दूध, दही और मेवे फलाहारी व्रत का आधार।
  • उस दिन का भोग प्रचलित सूची में पहले से नौवें दिन तक: घी, शक्कर, खीर, मालपुआ, केला, शहद, गुड़, नारियल और तिल।

आने वाले वर्षों में शारदीय नवरात्रि की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में शारदीय नवरात्रि की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षरविवार, 11 अक्टूबर से सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 तकबीत गई
2027गुरुवार, 30 सितंबर से शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2027 तकआने वाली
2028मंगलवार, 19 सितंबर से बुधवार, 27 सितंबर 2028 तकआने वाली

पंचांगों में शारदीय नवरात्रि की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग शारदीय नवरात्रि की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: शारदीय नवरात्रि का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

शारदीय नवरात्रि से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में शारदीय नवरात्रि कब है?

शारदीय नवरात्रि 2027 नई दिल्ली में गुरुवार, 30 सितंबर 2027 को घटस्थापना के साथ शुरू होती है, उसके बाद नौ दिन चलते हैं और फिर विजयादशमी आती है। प्रतिपदा तिथि सुबह 8:06 से सुबह 5:35 (1 अक्टूबर) तक है; दिन-अनुसार तालिका और इस वर्ष के रंग नवरात्रि वाले पेजों पर हैं।

शारदीय नवरात्रि कितने दिन का होता है?

इस बार 9 दिन — गुरुवार, 30 सितंबर से शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2027 तक। दोनों छोर हर साल चंद्रमा और सूर्य की स्थिति से निकाले जाते हैं, इसलिए दिनों की गिनती भी साल-दर-साल बदल सकती है।

अगले साल शारदीय नवरात्रि कब है?

2028 में मंगलवार, 19 सितंबर।

कलश स्थापना (घटस्थापना) का शुभ मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली में घटस्थापना का मुहूर्त सुबह 8:06 से सुबह 10:11 तक है, प्रतिपदा रहते दिन के पहले तिहाई भाग में। सुबह का समय कम हो या छूट जाए, तो अभिजीत मुहूर्त, सुबह 11:47 से दोपहर 12:34 तक, मान्य विकल्प है। कलश स्थापना दोपहर बाद या रात में नहीं होती।

घर पर घटस्थापना कैसे करें?

साफ़ मिट्टी की ट्रे में जौ बोएँ। कलश पर स्वस्तिक बनाएँ, मौली बाँधें, उसमें जल और गंगाजल के साथ सिक्का, सुपारी, हल्दी, दूर्वा और चावल डालें, मुँह पर आम के पत्ते रखें, चावल भरा ढक्कन लगाएँ और ऊपर लाल चुनरी में लिपटा नारियल रखें। मुहूर्त में कलश मंत्र के साथ इसे मिट्टी पर स्थापित करें, फिर देवी की स्थापना और पूजा करें।

नवरात्रि व्रत कथा क्या है?

सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली कथा दुर्गा सप्तशती है — मधु-कैटभ, महिषासुर, और शुंभ-निशुंभ पर देवी की विजय। देवी भागवत बताता है कि श्रीराम ने लंका जाने से पहले नवरात्रि व्रत किया, और प्रचलित व्रत पुस्तिका सुमति की कथा कहती है, जिसके पति नवरात्रि व्रत के पुण्य से स्वस्थ हुए। तीनों का संक्षिप्त रूप ऊपर दिया है।

नवरात्रि के रंग कैसे तय होते हैं?

प्रचलित सूची वार से चलती है: पहले दिन का रंग उस वार से जिस दिन नवरात्रि शुरू होती है, बाद के हर दिन का रंग उसके अपने वार से, और आठवाँ-नौवाँ दिन, जो पहले आ चुके वारों पर पड़ते हैं, उस वार का दूसरा रंग लेते हैं, ताकि कोई रंग न दोहराया जाए। यह परंपरा है, शास्त्र का नियम नहीं; इस वर्ष के नौ रंग नवरात्रि रंगों वाले पेज पर हैं।

नवरात्रि व्रत में क्या खाना चाहिए?

फल, दूध, दही और मेवे, साथ में कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा के आटे, समा के चावल, साबूदाना, आलू, शकरकंद और मखाने से बने व्यंजन, घी में सेंधा नमक, जीरा और हरी मिर्च के साथ। अनाज, दालें, प्याज़, लहसुन और साधारण नमक नहीं खाए जाते।

नवरात्रि व्रत के नियम क्या हैं?

पहले दिन संकल्प लें; संकल्प के अनुसार केवल फलाहार या दिन में एक बार भोजन करें; घर सात्विक रखें, प्याज़, लहसुन, मांस और शराब के बिना; सुबह-शाम दीपक और पूजा करें; और कन्या पूजन व हवन के बाद, या दशमी को, व्रत खोलें। व्रत उतना ही रखें जितना स्वास्थ्य अनुमति दे।

नवरात्रि पूजा के लिए कौन-सी सामग्री चाहिए?

घटस्थापना के लिए: मिट्टी की ट्रे और मिट्टी, जौ, कलश, गंगाजल, आम के पत्ते, लाल चुनरी के साथ नारियल, मौली, सिक्का, सुपारी, हल्दी, दूर्वा, चावल और रोली। नौ दिनों के लिए: लाल कपड़े वाली चौकी पर दुर्गा जी की तस्वीर, लाल फूल, श्रृंगार सामग्री, दीपक और घी, धूप, कपूर, फल-मिठाई और दुर्गा सप्तशती। पूरी सूची ऊपर है।

नवरात्रि का व्रत कब खोलें?

बहुत से परिवार नवमी को हवन और कन्या पूजन के बाद व्रत खोलते हैं। धर्मशास्त्र पारण दशमी को, नवमी तिथि समाप्त होने के बाद, बताते हैं, और नौ दिन व्रत रखने वाले बहुत से परिवार यही मानते हैं। प्रार्थना के बाद हल्के सात्विक भोजन से व्रत खोलें।

क्या शाम को घटस्थापना कर सकते हैं?

नहीं। परंपरा में कलश दिन के पहले भाग में, प्रतिपदा रहते, स्थापित होता है; दोपहर बाद या रात में नहीं। सुबह का समय छूट जाए तो दोपहर के आसपास का अभिजीत मुहूर्त, सुबह 11:47 से दोपहर 12:34 तक, लें।

पीरियड्स में नवरात्रि पूजा कैसे करें?

परंपराएँ अलग-अलग हैं। बहुत से परिवारों में पीरियड्स के दिनों में महिला कलश, प्रतिमा या अखंड ज्योत को नहीं छूती और परिवार का कोई और सदस्य पूजा करता है, जबकि वह व्रत जारी रखती है और मन में प्रार्थना या जप करती है; बहुत से परिवार अब यह नियम नहीं मानते। अपने परिवार की परंपरा और अपनी सुविधा के अनुसार करें।

क्या नवरात्रि व्रत में चाय या कॉफ़ी पी सकते हैं?

फलाहारी व्रत रखने वाले ज़्यादातर परिवारों में दूध वाली चाय या कॉफ़ी चलती है; कठोर या निर्जल व्रत रखने वाले इससे बचते हैं। यह घर की परंपरा है, शास्त्र का नियम नहीं — बस इसे दिन भर पानी और भोजन की जगह न लेने दें।

क्या पुरुष नवरात्रि का व्रत रख सकते हैं?

हाँ। नवरात्रि व्रत देवी के हर भक्त के लिए है — पुरुष, महिलाएँ, युवा और बुज़ुर्ग — और देवी भागवत में स्वयं श्रीराम यह व्रत रखते हैं। बच्चे, बुज़ुर्ग और अस्वस्थ लोग हल्का व्रत रख सकते हैं या केवल रोज़ की पूजा कर सकते हैं।

अगर नवरात्रि का व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?

परंपरा इसमें कोमल है: अगली पूजा में देवी से क्षमा माँगें, वहीं से व्रत जारी रखें, और चाहें तो थोड़ा दान या नवार्ण मंत्र की एक अतिरिक्त माला कर लें। संकल्प और भक्ति एक भूल से बड़े हैं।