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शुक्ल पक्ष · अष्टमी तिथि · कार्तिक

गोपाष्टमी 2026 कब है?

गोपाष्टमी 2026

22 दिन बाद

मंगल, 17 नवंबर

2026 में गोपाष्टमी मंगलवार, 17 नवंबर को है। नई दिल्ली में अष्टमी तिथि 17 नवंबर, सुबह 4:20 से 18 नवंबर, सुबह 6:06 तक रहेगी।

2027: शनिवार, 6 नवंबर 2027

गोपाष्टमी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

गोपाष्टमी 2026: तारीख और तिथि का समय

मंगलवार, 17 नवंबर 2026

तिथि
अष्टमी, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
कार्तिक
तिथि आरंभ
17 नवंबर, सुबह 4:20
तिथि समाप्त
18 नवंबर, सुबह 6:06
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
17 नवंबर, सुबह 6:44

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: गोपाष्टमी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

अर्थ और परंपरा

गोपाष्टमी क्या है?

गोपाष्टमी कार्तिक शुक्ल अष्टमी है — परंपरा के अनुसार वह दिन जब बालक कृष्ण पहली बार बछड़ों के बजाय गायों को चराने ले गए। यह गौ और उनकी सेवा करने वालों का पर्व है, जो ब्रज, राजस्थान और पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है।

  • गाय-बछड़ों को नहलाकर सजाया और खिलाया जाता है; गौशालाओं में पूजा होती है, और कई परिवार गुड़ और हरा चारा अर्पित करते हैं।
  • यह गोवर्धन पूजा के एक सप्ताह बाद आती है — कार्तिक का वह दूसरा पर्व जो कृष्ण को ग्वाले के रूप में याद करता है।
  • तारीख वह दिन है जिसके सूर्योदय पर कार्तिक शुक्ल अष्टमी हो, जो 2016 से 2036 तक हर साल द्रिक पंचांग की तारीख से मेल खाता है।

गोपाष्टमी 2026 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

गोपाष्टमी 2026 शुभ मुहूर्त

गोपाष्टमी, कार्तिक शुक्ल अष्टमी, वह दिन है जब गाय और गोपाल रूप में श्रीकृष्ण की साथ-साथ पूजा होती है: परंपरा मानती है कि इसी दिन श्रीकृष्ण पहली बार गायें चराने ले गए थे। नई दिल्ली में यह मंगलवार, 17 नवंबर 2026 को है; परिवार गायों को नहलाते, सजाते और खिलाते हैं, ग्वालों का सम्मान करते हैं, गौशालाओं में दान देते हैं और श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं, और अष्टमी तिथि सुबह 4:20 से सुबह 6:05 (18 नवंबर) तक रहेगी।

गोपाष्टमी 2026 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
सूर्योदयसुबह 6:44क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

नई दिल्ली में सूर्योदय के बाद जल्दी स्नान करके दिन की पूजा शुरू करें; गाँवों और गौशालाओं में गायें बाहर जाने से पहले सुबह नहलाई और सजाई जाती हैं।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • चर सुबह 9:25 से सुबह 10:45 तक
  • लाभ सुबह 10:45 से दोपहर 12:05 तक
  • अमृत दोपहर 12:05 से दोपहर 1:26 तक
  • शुभ दोपहर 2:46 से शाम 4:06 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया, जिन्हें परिवार गौ पूजा, श्रीकृष्ण पूजा और दान के लिए चुनते हैं।

अभिजीत मुहूर्तसुबह 11:44 से दोपहर 12:27 तकदिन के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, स्थानीय दोपहर के आसपास।

दोपहर का मुहूर्त, ज़्यादातर शुभ कार्यों के लिए उत्तम, उन परिवारों के लिए जो दोपहर के आसपास पूजा करते हैं। बुधवार को अभिजीत मुहूर्त नहीं होता।

सूर्यास्त (गोधूलि)शाम 5:27सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज से ओझल होने का समय।

गोधूलि, यानी शाम का वह समय जब गायें धूल उड़ाती घर लौटती हैं, उनकी दूसरी बार दीपक से पूजा करने और उनके खुरों की धूल माथे पर लगाने का पारंपरिक समय है।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तसुबह 11:44 से दोपहर 12:27शुभ
अमृत कालशाम 5:11 से शाम 6:56सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:58 से सुबह 5:51शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालदोपहर 2:46 से शाम 4:06
यमगण्ड कालसुबह 9:25 से सुबह 10:45
दुर्मुहूर्त (पहला)सुबह 8:53 से सुबह 9:36

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए मंगलवार, 17 नवंबर 2026 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

गोपाष्टमी पूजा विधि

  1. स्नान और संकल्प

    जल्दी स्नान करें, साफ कपड़े पहनें, और दाहिने हाथ में जल लेकर गोपाष्टमी पर गाय और गोपाल रूप श्रीकृष्ण की पूजा का संकल्प लें।

  2. गाय को नहलाएँ और सजाएँ

    घर में गाय हो तो गाय और बछड़े को नहलाकर सजाएँ: हल्दी-रोली के निशान, जहाँ परंपरा हो वहाँ सींगों पर मेहंदी या रंग, गेंदे की माला, घंटियाँ और पीठ पर कपड़ा। घर में गाय न हो तो किसी गौशाला जाकर वहाँ की पूजा में शामिल हों।

  3. गाय और बछड़े की पूजा

    माथे पर रोली और हल्दी का तिलक करें, अक्षत, फूल और माला अर्पित करें, दीपक और धूप जलाएँ और 'गावो मे अग्रतः सन्तु' मंत्र बोलें। माँ के साथ बछड़े की भी पूजा करें।

  4. भोजन कराएँ

    हरा चारा, गुड़ के साथ आटे की रोटी, भीगे चने, केले या मौसमी सब्ज़ियाँ और पानी दें। हाथ से, प्यार से खिलाएँ, और प्लास्टिक में या बासी कुछ भी न दें।

  5. गाय की परिक्रमा

    हाथ जोड़कर गाय और बछड़े की सात परिक्रमा करें, या जितनी आपके घर की परंपरा हो, और आदर से उसकी पीठ या माथे को छुएँ।

  6. ग्वालों का सम्मान

    गायों की देखभाल करने वालों का सम्मान करें: ग्वाले या गौशाला के कर्मचारियों को तिलक करें और कपड़े, मिठाई या धन भेंट करें, जैसा ब्रज के गाँवों में होता था।

  7. गोपाल रूप में श्रीकृष्ण की पूजा

    घर पर लड्डू गोपाल या श्रीकृष्ण की मूर्ति को ग्वाले के रूप में सजाएँ, छोटी लाठी, बाँसुरी, मोरपंख और खिलौने वाली गाय के साथ, और 'कृष्णाय वासुदेवाय' बोलते हुए माखन-मिश्री, दूध की मिठाई और तुलसी अर्पित करें। 'आरती कुंजबिहारी की' गाएँ।

  8. गौशाला में दान

    अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी गौशाला या पशु आश्रय को चारा, गुड़, दवाइयाँ या धन दें।

  9. गोधूलि की पूजा

    शाम को जब गायें घर लौटें, तो दीपक से उनकी फिर पूजा करें और पुरानी परंपरा के अनुसार उनके खुरों की धूल माथे पर लगाएँ।

  10. प्रसाद

    प्रसाद बाँटें, और दिन का भोजन सादा और शाकाहारी रखें।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

गोपाष्टमी पूजा सामग्री सूची

  • रोली, हल्दी और अक्षत गाय के तिलक और पूजा के लिए।
  • गेंदे की मालाएँ और फूल गाय, बछड़े और श्रीकृष्ण के लिए।
  • घंटियाँ और गाय की पीठ के लिए कपड़ा पारंपरिक सजावट; साफ, हल्का कपड़ा जो पशु को परेशान न करे।
  • मेहंदी या प्राकृतिक रंग जहाँ सींग रंगने की परंपरा हो; पशु को नुकसान पहुँचाने वाला पेंट या तेल कभी नहीं।
  • घी का दीपक, धूप और कपूर गौ पूजा, गोधूलि की पूजा और श्रीकृष्ण की आरती के लिए।
  • हरा चारा गाय का अपना भोजन, सबसे उत्तम भेंट।
  • गुड़ के साथ आटे की रोटी घर की ओर से गाय को दी जाने वाली पारंपरिक भेंट।
  • भीगे चने, केले या मौसमी सब्ज़ियाँ हाथ से, सीमित मात्रा में खिलाने के लिए।
  • लोटे में जल गाय के लिए और पूजा के लिए।
  • लड्डू गोपाल या श्रीकृष्ण की मूर्ति ग्वाले के श्रृंगार के लिए छोटी लाठी, बाँसुरी, मोरपंख और खिलौने वाली गाय के साथ।
  • माखन-मिश्री और दूध की मिठाई श्रीकृष्ण का भोग।
  • तुलसी दल श्रीकृष्ण के भोग के लिए।
  • ग्वालों के लिए भेंट ग्वाले या गौशाला के कर्मचारियों के लिए कपड़े, मिठाई या धन।
  • गौशाला के लिए दान चारा, गुड़, दवाइयाँ या धन।

मंत्र · अर्थ के साथ

गोपाष्टमी के मंत्र और आरती

गौ प्रार्थना (गावो मे अग्रतः)

गावो मे अग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः ।
गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥

Gavo me agratah santu gavo me santu prishthatah
Gavo me hridaye santu gavam madhye vasamyaham

अर्थ: गायें मेरे आगे हों, गायें मेरे पीछे हों, गायें मेरे हृदय में हों; मैं गायों के बीच निवास करूँ।

कब और कैसे: गौ-पूजा का श्लोक, इसी रूप में भविष्य पुराण (उत्तर पर्व 19) में; महाभारत के गोदान वाले उपदेश में इसका मिलता-जुलता रूप है। गाय की पूजा करते हुए हाथ जोड़कर एक या तीन बार बोलें।

गायों को नमस्कार

नमो गोभ्यः श्रीमतीभ्यः सौरभेयीभ्य एव च ।
नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्यो नमो नमः ॥

Namo gobhyah shrimatibhyah saurabheyibhya eva cha
Namo brahmasutabhyashcha pavitrabhyo namo namah

अर्थ: श्रीमती, सुरभि की पुत्री गायों को नमस्कार; ब्रह्मा की पुत्रियों, पवित्र गायों को बार-बार नमस्कार।

कब और कैसे: पद्म पुराण (सृष्टि खंड 34) और अग्नि पुराण (292) से, जो इसे गायों को प्रणाम का श्लोक बताते हैं; माला और भोजन अर्पित करते हुए बोलें।

कृष्णाय वासुदेवाय

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥

Krishnaya Vasudevaya Haraye Paramatmane
Pranata-klesha-nashaya Govindaya namo namah

अर्थ: वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण, हरि, परमात्मा को, जो शरण आए लोगों का कष्ट हरते हैं, उन गोविंद को बार-बार नमस्कार।

कब और कैसे: भागवत पुराण से। गोपाल रूप श्रीकृष्ण को भोग लगाते हुए 11 या 108 बार।

हरे कृष्ण महामंत्र

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥

Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare
Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare

अर्थ: भगवान के सोलह नाम, हरि, राम और कृष्ण से प्रार्थना।

कब और कैसे: कलिसंतरण उपनिषद् से; गोपाष्टमी पर गौशाला और इस्कॉन मंदिरों में कीर्तन में गाया जाता है, या तुलसी की माला पर जपा जाता है।

आरती श्रीकृष्ण की आरती: आरती कुंजबिहारी की पूरी आरती

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली,
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै।
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा,
बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

Aarti Kunjbihari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.
Aarti Kunjbihari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.

Gale mein baijanti mala, bajavai murli madhur bala.
Shravan mein kundal jhalkala, Nand ke anand Nandlala.
Gagan sam ang kanti kali, Radhika chamak rahi aali.
Latan mein thadhe Banmali,
Bhramar si alak, kasturi tilak, chandra si jhalak,
Lalit chhavi Shyama pyari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.
Aarti Kunjbihari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.

Kanakmay mor mukut bilsai, devta darsan ko tarsain.
Gagan son suman rasi barsai.
Baje murchang, madhur mirdang, gwalin sang,
Atul rati gop kumari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.
Aarti Kunjbihari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.

Jahan te prakat bhai Ganga, sakal man harini Shri Ganga.
Smaran te hot moh bhanga,
Basi Shiv sees, jata ke beech, harai agh keech,
Charan chhavi Shri Banwari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.
Aarti Kunjbihari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.

Chamakti ujjwal tat renu, baj rahi Vrindavan benu.
Chahun disi gopi gwal dhenu,
Hansat mridu mand, chandni chand, katat bhav phand,
Ter sun deen dukhari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.
Aarti Kunjbihari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.

Aarti Kunjbihari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.
Aarti Kunjbihari ki, Shri Giridhar Krishna Murari ki.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में यह ब्रज वर्तनी में छपी है ('गिरधर', 'कृष्नमुरारी', 'बृन्दाबन'), और उसमें 'सकल मन हारिणि श्री गंगा' की जगह 'सकल-मल-हारिणि श्रीगंगा' (सारे मल हरने वाली) है। छपा पाठ

कथा · कहानी और उसका अर्थ

गोपाष्टमी की कथा और महत्व

कथा

भागवत पुराण बताता है कि जब श्रीकृष्ण और बलराम बचपन से निकलकर पौगंड अवस्था में पहुँचे, तो ब्रज के बड़ों ने उन्हें ग्वाला बना दिया: अब वे घर के पास केवल बछड़े नहीं चराते थे, बल्कि गायों को वृंदावन के वनों में चराने ले जाते थे। परंपरा मानती है कि नंद बाबा ने इस पहली यात्रा के लिए कार्तिक शुक्ल अष्टमी चुनी, इसीलिए यह दिन गोपाष्टमी कहलाता है, यानी ग्वाले की अष्टमी।

लोक-परंपरा इस दिन से एक दूसरी कथा भी जोड़ती है। भागवत बताता है कि जब श्रीकृष्ण ने इंद्र के तूफ़ान से ब्रज को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया, तो उसके बाद सब गायों की माता सुरभि ने अपने दूध से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया, और इंद्र ने उनका अभिषेक करके उन्हें गोविंद, यानी गायों का रक्षक, नाम दिया। ब्रज में बहुत से लोग इसे गोवर्धन पूजा के बाद आने वाली अष्टमी पर मानते हैं, और यह भी गोपाष्टमी पर गायों की पूजा का एक कारण है।

तब से यह दिन गाय को घर की माता और श्रीकृष्ण को उसके रखवाले गोपाल के रूप में सम्मान देता है। ब्रज के गाँवों में गायें नहलाई, सजाई और खिलाई जाती हैं, ग्वालों का सम्मान होता है, और श्रीकृष्ण को लाठी और बाँसुरी वाले ग्वाल-बाल के रूप में सजाया जाता है।

महत्व

गोपाष्टमी ग्रामीण भारत के दिल की दो बातें एक साथ लाती है: गाय, जिसने खेती को दूध, घी और बैल की शक्ति दी, और गोपाल श्रीकृष्ण, जिन्होंने उससे प्रेम किया और उसकी रक्षा की। इस दिन गाय की पूजा उस संबंध के लिए धन्यवाद है और पशुओं की देखभाल की याद भी।

यह पवित्र कार्तिक मास में, गोवर्धन पूजा और देवउठनी एकादशी के बीच आती है, और अगले दिन अक्षय या आँवला नवमी पर आँवले के पेड़ की पूजा होती है। आज यह दिन गौशालाओं और बूढ़ी व बेसहारा गायों की देखभाल में सहयोग का समय भी है।

उपाय · परंपरा

गोपाष्टमी के पारंपरिक उपाय

अपने हाथ से गाय को खिलाएँ

किसी गाय को गुड़ के साथ रोटी, हरा चारा या केले प्यार से हाथ से खिलाएँ। मान्यता है कि गाय को खिलाने से घर में आशीर्वाद आता है, और यह दया का सरल काम है।

गौशाला में दान

अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी गौशाला या पशु आश्रय को बूढ़ी और बीमार गायों की देखभाल के लिए चारा, दवाइयाँ या धन दें।

पशुओं की देखभाल करने वालों का सम्मान

किसी ग्वाले, डेयरी कर्मचारी या गौशाला के कर्मचारी को भेंट दें; परंपरा गाय के साथ उसके रखवाले का भी सम्मान करती है।

गोधूलि की धूल

गोधूलि में लौटती गायों की उड़ाई धूल माथे पर लगाएँ, ब्रज की विनम्रता और आशीर्वाद की पुरानी परंपरा।

गोपाल रूप श्रीकृष्ण

लड्डू गोपाल को ग्वाले के रूप में सजाकर 'कृष्णाय वासुदेवाय' बोलते हुए माखन-मिश्री अर्पित करें; परिवार इसे कोमलता और समृद्धि से भरे घर की प्रार्थना के रूप में करते हैं।

गायों के लिए प्लास्टिक नहीं

जहाँ गायें चरती हों वहाँ से प्लास्टिक की थैलियाँ उठाएँ, और प्लास्टिक में लिपटा भोजन कभी न दें। शहर में गायों की यही सबसे काम की सेवा है।

परंपरा, संक्षेप में

गोपाष्टमी पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • अष्टमी रहते तिलक, फूल और दीपक से गाय और बछड़े की पूजा करें।
  • गायों को ताज़ा चारा, गुड़ के साथ रोटी या फल हाथ से और सीमित मात्रा में खिलाएँ।
  • घर में गाय न हो तो किसी गौशाला जाएँ या उसकी सहायता करें।
  • ग्वालों और गायों की देखभाल करने वालों का सम्मान करें।
  • लड्डू गोपाल को ग्वाले के रूप में सजाएँ और माखन-मिश्री का भोग लगाएँ।
  • गायों के पास शांति से जाएँ और बच्चों को किसी बड़े के साथ ही पशुओं के पास रखें।

क्या न करें

  • गायों को प्लास्टिक, बासी या खराब भोजन, या अधिक मात्रा में मिठाई न खिलाएँ।
  • सजावट के लिए पशु पर केमिकल वाला रंग या तेल न लगाएँ।
  • घबराई हुई, बीमार या बहुत छोटे बछड़े वाली गाय को परेशान न करें।
  • किसी रस्म के लिए सड़क पर गायों को न मारें, न दौड़ाएँ, न डराएँ।
  • इस दिन मांस या शराब न लें।
  • दीपक या धूप पशुओं या उनके चारे के पास न छोड़ें।

देश भर में

गोपाष्टमी की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

ब्रज (मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना)
इस पर्व का हृदय: गायें नहलाई और सजाई जाती हैं, मंदिरों में श्रीकृष्ण का ग्वाल श्रृंगार होता है, और गौशालाएँ हज़ारों गायों की पूजा और भोजन कराती हैं।
नाथद्वारा (राजस्थान)
पुष्टिमार्ग की श्रीनाथजी की हवेली अपनी गायों और ग्वाल श्रृंगार के साथ उत्सव मनाती है, और गोपाष्टमी नाथद्वारा की पिछवाई चित्रकला का प्रिय विषय है।
राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश
बहुत से गाँवों में गायों को सजाया जाता है, गुड़ और रोटी खिलाई जाती है, और ग्वालों को भेंट दी जाती है।
इस्कॉन और वैष्णव मंदिर
मंदिरों की गौशालाओं में गोपाष्टमी बड़ा उत्सव है: गायों की पूजा और भोजन, विग्रहों का ग्वाल श्रृंगार, और दिन भर कीर्तन।
महाराष्ट्र और गुजरात
यहाँ साल का गौ-पर्व वसुबारस या गोवत्स द्वादशी है, दिवाली की शुरुआत में, पर मंदिरों और गौशालाओं में गोपाष्टमी भी मनाई जाती है।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • माखन-मिश्री मिश्री के साथ मक्खन, श्रीकृष्ण का प्रिय भोग।
  • दूध की मिठाई पेड़ा, रबड़ी या खीर, दूध के उपहार का उत्सव।
  • गुड़ के साथ रोटी गायों के लिए; परिवार सादा शाकाहारी भोजन करता है।
  • पंचामृत पूजा के बाद प्रसाद के रूप में।

आने वाले वर्षों में गोपाष्टमी की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में गोपाष्टमी की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षमंगलवार, 17 नवंबर 2026आने वाली
2027शनिवार, 6 नवंबर 2027आने वाली
2028बुधवार, 25 अक्टूबर 2028आने वाली

पंचांगों में गोपाष्टमी की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग गोपाष्टमी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: गोपाष्टमी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

गोपाष्टमी से जुड़े सामान्य प्रश्न

2026 में गोपाष्टमी कब है?

नई दिल्ली में गोपाष्टमी 2026 मंगलवार, 17 नवंबर 2026 को है, कार्तिक शुक्ल अष्टमी, दिवाली की गोवर्धन पूजा के लगभग एक हफ्ते बाद। अष्टमी तिथि सुबह 4:20 से सुबह 6:05 (18 नवंबर) तक रहेगी; गौ पूजा दिन में अष्टमी रहते होती है, और फिर गोधूलि में जब गायें घर लौटती हैं।

गोपाष्टमी की तिथि क्या है?

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 17 नवंबर, सुबह 4:20 से 18 नवंबर, सुबह 6:06 तक है, और गोपाष्टमी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

दूसरे कैलेंडर में गोपाष्टमी की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल गोपाष्टमी कब है?

2027 में शनिवार, 6 नवंबर; 2028 में बुधवार, 25 अक्टूबर।

गोपाष्टमी क्या है?

गोपाष्टमी गाय और गोपाल रूप श्रीकृष्ण का पर्व है, जो कार्तिक के शुक्ल पक्ष की आठवीं तिथि को मनाया जाता है। नाम में गोप, यानी ग्वाला, और अष्टमी जुड़े हैं, क्योंकि परंपरा मानती है कि इसी दिन श्रीकृष्ण पहली बार गायें चराने ले गए थे।

गोपाष्टमी क्यों मनाई जाती है?

उस दिन की याद में, जब परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण और बलराम ग्वाले बने और पहली बार गायों को वृंदावन के वनों में ले गए, और गोवर्धन उठाने के बाद श्रीकृष्ण को गायों के रक्षक गोविंद के रूप में सम्मान मिला। यह घर की माता गाय और उसकी देखभाल करने वालों के प्रति धन्यवाद का दिन है।

गोपाष्टमी की कहानी क्या है?

भागवत पुराण बताता है कि पौगंड अवस्था में पहुँचने पर ब्रज के बड़ों ने श्रीकृष्ण और बलराम को पूरे गो-धन का ग्वाला बनाया; परंपरा कहती है कि नंद बाबा ने उनके गायों के साथ पहले दिन के लिए कार्तिक शुक्ल अष्टमी चुनी। लोक-परंपरा इसी अष्टमी पर वह दिन भी मानती है जब गोवर्धन के बाद सुरभि ने दूध से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और इंद्र ने उन्हें गोविंद नाम दिया।

गोपाष्टमी की पूजा कैसे करें?

स्नान करके संकल्प लें, फिर गाय और बछड़े को नहलाकर सजाएँ, रोली और हल्दी लगाएँ, फूल, माला और दीपक अर्पित करें, चारा, गुड़ के साथ रोटी या फल खिलाएँ और उनकी परिक्रमा करें। ग्वालों को भेंट दें, माखन-मिश्री से गोपाल रूप श्रीकृष्ण की पूजा करें, गौशाला में दान दें, और शाम को फिर गायों की पूजा करें।

गोपाष्टमी पर क्या करना चाहिए, और गाय को क्या खिलाएँ?

गाय की पूजा करें और उसे खिलाएँ, किसी गौशाला की सहायता करें और गायों की देखभाल करने वालों का सम्मान करें। ताज़ा हरा चारा, गुड़ के साथ आटे की रोटी, भीगे चने, केले या मौसमी सब्ज़ियाँ हाथ से और सीमित मात्रा में दें; प्लास्टिक, बासी भोजन या ज़्यादा मिठाई कभी नहीं, इनसे गायें बीमार होती हैं।

घर में गाय न हो तो गोपाष्टमी कैसे मनाएँ?

किसी गौशाला या मंदिर की गौशाला जाकर वहाँ की पूजा में शामिल हों, रास्ते में मिली किसी गाय को गुड़ के साथ रोटी खिलाएँ, या गौशाला को चारा और दवाइयाँ दें। घर पर ग्वाले के रूप में सजे गोपाल श्रीकृष्ण की पूजा करें और दिन की कथा पढ़ें।

क्या गोपाष्टमी का कोई मुहूर्त है?

कोई एक तय मुहूर्त नहीं है। पूजा दिन में अष्टमी रहते की जाती है (नई दिल्ली में सुबह 4:20 से सुबह 6:05 (18 नवंबर) तक), और बहुत से परिवार शुभ चौघड़िया (चर: सुबह 9:25 से सुबह 10:45 तक; लाभ: सुबह 10:45 से दोपहर 12:05 तक; अमृत: दोपहर 12:05 से दोपहर 1:26 तक; शुभ: दोपहर 2:46 से शाम 4:06 तक) देखते हैं। शाम को गोधूलि में जब गायें घर लौटती हैं, तब फिर उनकी पूजा होती है।

गोपाष्टमी पर लड्डू गोपाल का श्रृंगार कैसे करें?

छोटे ग्वाले के रूप में: सादी धोती और पगड़ी, मोरपंख, छोटी लाठी और बाँसुरी, अक्सर पास में खिलौने वाली गाय और बछड़ा, और वन के फूलों की माला। उन्हें माखन-मिश्री और दूध की मिठाई का भोग लगाएँ।

इस्कॉन में गोपाष्टमी कैसे मनाई जाती है?

इस्कॉन मंदिर अपनी गौशालाओं में इसे बड़े उत्सव के रूप में मनाते हैं: गायें और बैल नहलाए, सजाए और खिलाए जाते हैं, भक्त उन्हें प्रसाद देते हैं, विग्रहों का ग्वाल श्रृंगार होता है, और गायों के साथ श्रीकृष्ण की लीलाओं पर प्रवचन के साथ दिन भर कीर्तन चलता है।

गोपाष्टमी पर कौन सा मंत्र बोलें?

गाय के लिए महाभारत के श्लोक 'गावो मे अग्रतः सन्तु' और 'नमो गोभ्यः श्रीमतीभ्यः'; श्रीकृष्ण के लिए 'कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने' और हरे कृष्ण महामंत्र। इनके पाठ और अर्थ मंत्र वाले भाग में हैं।

साल में गोपाष्टमी कितनी बार आती है?

एक बार। गोपाष्टमी कार्तिक शुक्ल अष्टमी है, इसलिए साल में एक बार, गोवर्धन पूजा के लगभग एक हफ्ते बाद आती है। दूसरा गौ-पर्व, वसुबारस या गोवत्स द्वादशी, अलग दिन है, दिवाली की शुरुआत में।

क्या गोपाष्टमी पर व्रत रखा जाता है?

व्रत ज़रूरी नहीं है। कुछ भक्त गौ पूजा या शाम तक फलाहार व्रत रखते हैं, और बहुत से लोग दिन सादा और शाकाहारी रखते हैं। दिन का सार गायों की पूजा, उन्हें खिलाना और उनकी देखभाल है।

गोपाष्टमी के अगले दिन कौन सा पर्व है?

अक्षय नवमी, जिसे आँवला नवमी भी कहते हैं, कार्तिक शुक्ल नवमी को: आँवले के पेड़ की पूजा होती है, परिवार उसके नीचे भोजन करते हैं, और इस दिन के दान को अक्षय, यानी कभी न घटने वाला, कहा जाता है। उसके कुछ दिन बाद देवउठनी एकादशी आती है।