वक्रतुण्ड श्लोक
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
Vakratunda mahakaya suryakoti-samaprabha
nirvighnam kuru me deva sarva-karyeshu sarvada
अर्थ: हे टेढ़ी सूंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव: मेरे सब कार्य सदा निर्विघ्न करें।
कब और कैसे: पूजा, और कोई भी काम, शुरू करते समय। पारंपरिक मंगल श्लोक; इसका कोई शास्त्रीय स्रोत प्रमाणित नहीं हो सका।
गणानां त्वा (वैदिक आवाहन)
ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥
Om gananam tva ganapatim havamahe kavim kavinam upamashravastamam
jyeshtharajam brahmanam brahmanaspata a nah shrinvann utibhih sida sadanam
अर्थ: हे गणों के स्वामी, कवियों में कवि, सबसे यशस्वी, प्रार्थनाओं के ज्येष्ठ राजा, हम आपको पुकारते हैं: हमारी सुनें, अपनी कृपा के साथ आएँ और आसन ग्रहण करें।
कब और कैसे: आवाहन के समय, जब मूर्ति को आसन पर बिठाया जाता है। ऋग्वेद के दूसरे मंडल से, ब्रह्मणस्पति का सूक्त जिसे परंपरा गणपति का मानती है।
आवाहन और स्थापना
ॐ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । आवाहयामि, स्थापयामि ॥
Om Shri Siddhivinayakaya Namah. Avahayami, sthapayami.
अर्थ: ॐ, सिद्धि देने वाले श्री सिद्धिविनायक को नमस्कार: मैं आपका आवाहन करता/करती हूँ, आपको स्थापित करता/करती हूँ।
कब और कैसे: घर की स्थापना के सरल शब्द, मूर्ति को अक्षत के आसन पर बिठाते समय; इस चतुर्थी पर गणेश जी की पूजा सिद्धिविनायक नाम से होती है।
गणेश मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
Om Gam Ganapataye Namah
अर्थ: ॐ; गं, गणपति का बीज अक्षर: गणपति को नमस्कार।
कब और कैसे: हर अर्पण के साथ, और जप के रूप में 108 बार, जितने दिन वे रहें। इस बीज अक्षर की व्याख्या गणपति अथर्वशीर्ष में है।
गणेश गायत्री
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि ।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥
Om Ekadantaya vidmahe Vakratundaya dhimahi
tanno Dantih prachodayat
अर्थ: हम एकदंत को जानें, वक्रतुंड का ध्यान करें; वे दंती हमें प्रेरणा दें।
कब और कैसे: उत्सव के किसी भी दिन 11 या 108 बार जप। यह गणपति अथर्वशीर्ष का आठवाँ श्लोक है।
दूर्वा अर्पण के नाम
ॐ गणाधिपाय नमः । ॐ उमापुत्राय नमः । ॐ अघनाशनाय नमः । ॐ विनायकाय नमः । ॐ ईशपुत्राय नमः । ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः । ॐ एकदन्ताय नमः । ॐ इभवक्त्राय नमः । ॐ मूषकवाहनाय नमः । ॐ कुमारगुरवे नमः ॥
Om Ganadhipaya Namah. Om Umaputraya Namah. Om Aghanashanaya Namah. Om Vinayakaya Namah. Om Ishaputraya Namah. Om Sarvasiddhipradayakaya Namah. Om Ekadantaya Namah. Om Ibhavaktraya Namah. Om Mushakavahanaya Namah. Om Kumaragurave Namah.
अर्थ: गणों के स्वामी को नमस्कार; उमा के पुत्र को; पापों का नाश करने वाले को; विघ्न हरने वाले विनायक को; शिव के पुत्र को; सब सिद्धियाँ देने वाले को; एकदंत को; हाथी जैसे मुख वाले को; मूषक पर सवार को; कुमार (कार्तिकेय) के बड़े भाई और गुरु को।
कब और कैसे: जैसा स्कंद पुराण (केदार खंड, अध्याय 11) कहता है: दसों नामों में से हर एक के साथ दूर्वा का एक जोड़ा; इक्कीसवीं पत्ती सब नामों के साथ एक बार।
स्यमंतक श्लोक (चंद्रमा दिख जाए तो)
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥
Simhah Prasenam avadhit simho Jambavata hatah
sukumaraka ma rodis tava hy esha Syamantakah
अर्थ: सिंह ने प्रसेन को मारा, और सिंह को जाम्बवान ने मारा। हे सुकुमार, रोओ मत: यह स्यमंतक मणि तुम्हारी ही है।
कब और कैसे: इस चतुर्थी पर चंद्रमा दिख जाए तो यह श्लोक बोलें, या नीचे कथा में स्यमंतक की कहानी सुनें। विष्णु पुराण (अंश 4, अध्याय 13) की मणि वाली कथा में जाम्बवान की गुफा में बालक को चुप कराती धाय के यही शब्द हैं।
क्षमा प्रार्थना
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां नैव हि जानामि क्षमस्व परमेश्वर ॥
Avahanam na janami na janami visarjanam
pujam naiva hi janami kshamasva parameshvara
अर्थ: मैं न आवाहन जानता/जानती हूँ, न विसर्जन, न पूजा की विधि: हे परमेश्वर, मुझे क्षमा करें।
कब और कैसे: हर पूजा के अंत में, और खास तौर पर विसर्जन से पहले की उत्तर पूजा में। यह गीता प्रेस की 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' का पाठ है; बहुत से लोग 'पूजां चैव न जानामि' बोलते हैं, भाव वही है।
आरती गणेश जी की आरती: जय गणेश देवा पूरी आरती
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
Jai Ganesh jai Ganesh, jai Ganesh deva.
Mata jaki Parvati, pita Mahadeva.
Ek dant dayavant, char bhuja dhari.
Mathe sindoor sohe, moose ki savari.
Jai Ganesh jai Ganesh, jai Ganesh deva.
Mata jaki Parvati, pita Mahadeva.
Paan chadhe phool chadhe, aur chadhe meva.
Ladduan ka bhog lage, sant karen seva.
Jai Ganesh jai Ganesh, jai Ganesh deva.
Mata jaki Parvati, pita Mahadeva.
Andhan ko aankh det, kodhin ko kaya.
Banjhan ko putra det, nirdhan ko maya.
Jai Ganesh jai Ganesh, jai Ganesh deva.
Mata jaki Parvati, pita Mahadeva.
'Soor' Shyam sharan aaye, saphal kije seva.
Mata jaki Parvati, pita Mahadeva.
Jai Ganesh jai Ganesh, jai Ganesh deva.
Mata jaki Parvati, pita Mahadeva.
यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में 'माथे सिंदूर सोहे' की जगह 'मस्तक सिन्दूर सोहे' है, 'पान चढ़े' वाला पद 'अंधन को आंख देत' के बाद है और उसकी दोनों पंक्तियाँ उलटे क्रम में हैं, और अंत में 'सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा' वाले पद की जगह 'दीनन की लाज राखो शम्भु-सुतवारी, कामना को पूरा करो जग बलिहारी' छपा है। छपा पाठ