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शुक्ल पक्ष · सप्तमी तिथि · आश्विन

दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) 2027 कब है?

दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) 2027

345 दिन बाद

बुध, 6 अक्टूबर

2027 में दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) बुधवार, 6 अक्टूबर को है। नई दिल्ली में सप्तमी तिथि 6 अक्टूबर, रात 2:33 से 7 अक्टूबर, सुबह 4:13 तक रहेगी।

2028: सोमवार, 25 सितंबर 2028

दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) 2027: तारीख और तिथि का समय

बुधवार, 6 अक्टूबर 2027

तिथि
सप्तमी, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
आश्विन
तिथि आरंभ
6 अक्टूबर, रात 2:33
तिथि समाप्त
7 अक्टूबर, सुबह 4:13
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
6 अक्टूबर, सुबह 6:16

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

दुर्गा पूजा 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) 2027 शुभ मुहूर्त

दुर्गा पूजा बंगाल का शरद ऋतु का देवी महोत्सव है — षष्ठी पर देवी के बोधन से बिजया दशमी की विदाई तक; इसके तीन मुख्य दिन महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी हैं। दुर्गा पूजा की महासप्तमी 2027 नई दिल्ली में बुधवार, 6 अक्टूबर 2027 को है, जिस सुबह नवपत्रिका को स्नान कराया जाता है और प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा होती है। संधि पूजा 8 अक्टूबर, सुबह 6:04 से सुबह 6:52 तक पर है, और दशमी पर विसर्जन का समय 10 अक्टूबर, सुबह 6:18 से सुबह 8:38 तक है।

दुर्गा पूजा 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
संधि पूजा8 अक्टूबर, सुबह 6:04 से सुबह 6:52 तकअष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट — अष्टमी समाप्ति के क्षण के दोनों ओर एक-एक घटी।

महाअष्टमी के अंतिम 24 मिनट और महानवमी के पहले 24 मिनट — कुल 48 मिनट। ढाक की थाप के बीच देवी की चामुंडा रूप में 108 कमलों और 108 दीपों से पूजा होती है; यह पूजा का सबसे गहन क्षण है, और यह किसी भी समय — आधी रात को भी — पड़ सकता है।

दुर्गा विसर्जन10 अक्टूबर, सुबह 6:18 से सुबह 8:38 तकदशमी के दिन प्रातःकाल, दिन का पहला पाँचवाँ भाग।

बिजया दशमी पर विदाई की पूजा का समय: दशमी पूजा, दर्पण विसर्जन — जिसमें दर्पण में देवी के प्रतिबिंब को विदा किया जाता है — और विसर्जन (भासान) की शुरुआत। परिवार और समितियाँ सुबह या दोपहर बाद का समय मानती हैं, और शोभायात्रा अक्सर स्थानीय नियमों के अनुसार शाम तक चलती है।

महासप्तमी का सूर्योदयसुबह 6:16क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

नवपत्रिका (कोला बोउ) को भोर में नदी या तालाब में स्नान कराया जाता है, फिर सप्तमी पूजा शुरू होती है; पंडाल अक्सर सूर्योदय से पहले ही उसकी शोभायात्रा निकालते हैं।

सूर्यास्तशाम 6:02सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज से ओझल होने का समय।

पूजा के हर दिन सूर्यास्त के बाद धुनुची और ढाक के साथ संध्या आरती शुरू होती है।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अमृत कालरात 9:29 से रात 11:14सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:38 से सुबह 5:27शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालदोपहर 12:09 से दोपहर 1:37
यमगण्ड कालसुबह 7:44 से सुबह 9:12
दुर्मुहूर्त (पहला)सुबह 11:45 से दोपहर 12:32
वर्ज्यम्रात 2:43 से सुबह 4:28

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए बुधवार, 6 अक्टूबर 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

दुर्गा पूजा विधि

  1. महालया: उत्सव की शुरुआत

    पूजा से पहले की अमावस्या पर भोर में पितरों को तर्पण दें और पीढ़ियों पुरानी परंपरा के अनुसार ‘महिषासुरमर्दिनी’ का पाठ सुनें। देवी पक्ष शुरू होता है, और कारीगर प्रतिमाओं की आँखें बनाते हैं।

  2. षष्ठी: बोधन, आमंत्रण और अधिवास

    शाम को बेल के पेड़ या बेल की डाली के नीचे देवी का बोधन (जागरण), आमंत्रण और शुभ वस्तुओं से अधिवास होता है। घर पर पूजा का कमरा साफ़ करें, दुर्गा और उनकी संतानों की तस्वीर के सामने आम के पत्तों और हरे नारियल वाला जल-घट रखें और दीपक जलाएँ। बहुत सी बंगाली माताएँ बच्चों के लिए षष्ठी का व्रत रखती हैं।

  3. सप्तमी: नवपत्रिका और प्राण प्रतिष्ठा

    भोर में नवपत्रिका — आठ और पौधों के साथ बँधा केले का पौधा, लाल किनारी की सफ़ेद साड़ी में — को स्नान कराकर कोला बोउ के रूप में गणेश जी के पास रखा जाता है; फिर प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा और सप्तमी पूजा होती है। घर पर घट के पास फूल, बेलपत्र, चंदन और मिठाई चढ़ाएँ और शाम का दीपक जलाएँ।

  4. अष्टमी की सुबह: पुष्पांजलि

    स्नान करके नए कपड़े पहनें, और जैसा बहुत से लोग करते हैं, अंजलि तक कुछ न खाएँ। पंडाल में जुड़े हाथों में फूल और बेलपत्र लेकर पुरोहित के बाद अंजलि के मंत्र दोहराएँ और फूल देवी के चरणों में अर्पित करें — आम तौर पर तीन बार।

  5. अष्टमी: कुमारी पूजा

    बहुत सी पूजाओं में, विशेष रूप से बेलूर मठ में, एक छोटी कन्या को देवी के रूप में सजाकर कुमारी पूजा होती है। इसे देखना, या घर की किसी छोटी बच्ची को नए कपड़े और मिठाई देकर सम्मान देना, इस दिन का हिस्सा है।

  6. संधि पूजा

    अष्टमी और नवमी के संधि काल में 108 दीप जलाएँ और 108 कमल चढ़ाएँ — पंडाल में, या घर पर कुछ कम दीप और फूल — जब देवी की चामुंडा रूप में पूजा होती है।

  7. नवमी: होम और भोग

    नवमी पूजा होम (हवन) के साथ पूरी होती है। भोग — खिचुड़ी, लाबड़ा, बेगुनी, चटनी और पायेश — ग्रहण करें, और शाम को धुनुची और ढाक के साथ आरती में शामिल हों; नवमी की रात पूजा की आख़िरी बड़ी रात होती है।

  8. दशमी: पूजा और दर्पण विसर्जन

    सुबह दशमी पूजा होती है और जल भरी थाली में रखे दर्पण में देवी का प्रतिबिंब देखा जाता है — यह दर्पण विसर्जन है, जो विसर्जन के समय में देवी की विदाई का संकेत है।

  9. देवी बरन और सिंदूर खेला

    विवाहित महिलाएँ देवी को विदा (बरन) करती हैं: उनके होठों से मिठाई छुआती हैं, माथे और चरणों पर पान और सिंदूर अर्पित करती हैं, फिर एक-दूसरे के माथे और गालों पर सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। अपने समुदाय की परंपरा के अनुसार ही शामिल हों, और किसी को सिंदूर लगाने से पहले पूछ लें।

  10. भासान और बिजया

    ढाक के साथ प्रतिमा नदी की ओर ले जाई जाती है, और लोग पुकारते हैं ‘आश्छे बोछोर आबार होबे’ — अगले वर्ष फिर होगी। घर लौटकर शांति जल छिड़का जाता है और बिजया शुरू होती है: बड़ों के पैर छुएँ, मित्रों को गले लगाएँ (कोलाकुली) और मिठाई बाँटें; रिश्तेदारों के घर कई दिनों तक आना-जाना चलता है।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

दुर्गा पूजा सामग्री सूची

  • लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय के साथ दुर्गा की तस्वीर बंगाल की पूजा का पारिवारिक रूप; केवल दुर्गा की तस्वीर भी ठीक है।
  • जल भरा घट (मिट्टी या पीतल का) थोड़ी मिट्टी या चावल पर रखें, मुँह पर आम के पत्ते लगाएँ।
  • डंठल वाला हरा नारियल घट के ऊपर रखने के लिए।
  • आम के पत्ते पाँच या सात, घट के मुँह के लिए।
  • बेलपत्र बोधन और अंजलि में फूलों के साथ।
  • फूल: शिउली, गुड़हल, कमल, गेंदा शिउली (हरसिंगार) पूजा के मौसम का फूल है; लाल गुड़हल दुर्गा जी को प्रिय है।
  • 108 कमल पंडाल में संधि पूजा के लिए; घर पर कुछ कमल या कोई भी फूल।
  • 108 छोटे दीपक, घी और बत्तियाँ संधि पूजा के लिए; घर पर कम भी चलेंगे।
  • सिंदूर और आलता देवी बरन और सिंदूर खेला के लिए।
  • शाँखा-पोला और लोहा विवाहित बंगाली महिला की शंख, लाल मूँगे और लोहे की चूड़ियाँ, सिंदूर खेला के समय पहनी जाती हैं।
  • लाल किनारी वाली सफ़ेद साड़ी सिंदूर खेला और अष्टमी की अंजलि का पारंपरिक पहनावा।
  • शंख आरती और विदाई के समय बजाने के लिए।
  • धुनुची (मिट्टी का धूपदान), नारियल का रेशा और धुनो (राल) शाम की आरती के नृत्य के लिए; खुली या हवादार जगह पर ही जलाएँ।
  • अगरबत्ती, कपूर और घी का दीपक (प्रदीप) रोज़ की पूजा और आरती के लिए।
  • चंदन, चावल और दूर्वा तिलक और अर्पण के लिए।
  • मिठाई (संदेश, नारकेल नाड़ू) और फल नैवेद्य, देवी बरन और बिजया के लिए।
  • पान और सुपारी देवी बरन में अर्पित करने के लिए।
  • दर्पण और जल भरी थाली दशमी के दर्पण विसर्जन के लिए।
  • गंगाजल पूजा स्थान की शुद्धि और शांति जल के लिए।
  • नए कपड़े परिवार, विशेषकर बच्चों के लिए, जो पूजा के दिनों में पहली बार पहने जाते हैं।

मंत्र · अर्थ के साथ

दुर्गा पूजा के मंत्र

पुष्पांजलि मंत्र (पहली बार)

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥

Om Jayanti Mangala Kali Bhadrakali Kapalini, Durga Shiva Kshama Dhatri Svaha Svadha Namostu Te

अर्थ: जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, शिवा, क्षमा, धात्री, स्वाहा और स्वधा — आपको नमस्कार है।

कब और कैसे: अर्गला स्तोत्र का श्लोक, बंगाल में प्रचलित शब्द-क्रम में, अष्टमी अंजलि की पहली बार में बोला जाता है; पुरोहित के बाद दोहराकर फूल और बेलपत्र अर्पित करें।

पुष्पांजलि मंत्र (दूसरी बार)

ॐ महिषघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि ।
आयुरारोग्यविजयं देहि देवि नमोऽस्तु ते ॥

Om Mahishaghni Mahamaye Chamunde Mundamalini, Ayurarogyavijayam Dehi Devi Namostu Te

अर्थ: हे महिषासुर का वध करने वाली, महामाया, चामुंडा, मुंडमाला धारण करने वाली देवी, आयु, आरोग्य और विजय दीजिए; आपको नमस्कार है।

कब और कैसे: अष्टमी अंजलि की दूसरी बार का श्लोक, जैसा बंगाल की दुर्गोत्सव पद्धतियाँ देती हैं; पुरोहित के बाद दोहराकर फूल और बेलपत्र अर्पित करें।

पुष्पांजलि मंत्र (तीसरी बार)

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sarvamangalamangalye Shive Sarvarthasadhike, Sharanye Tryambake Gauri Narayani Namostu Te

अर्थ: हे सब मंगलों की मंगलरूपा, कल्याणकारी, सब कामनाएँ पूरी करने वाली, शरण देने वाली, त्रिनेत्री गौरी नारायणी — आपको नमस्कार है।

कब और कैसे: दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11, श्लोक 10; अंजलि की तीसरी बार इसी से शुरू होती है।

पुष्पांजलि मंत्र (तीसरी बार, आगे)

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि ।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Srishtisthitivinashanam Shaktibhute Sanatani, Gunashraye Gunamaye Narayani Namostu Te

अर्थ: हे सनातनी, सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति, गुणों का आधार और गुणमयी नारायणी — आपको नमस्कार है।

कब और कैसे: दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11, श्लोक 11; तीसरी बार में ‘सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये’ के बाद बोला जाता है।

दुर्गा मंत्र

ॐ दुं दुर्गायै नमः

Om Dum Durgayai Namah

अर्थ: ॐ, बीज अक्षर ‘दुं’ के साथ माँ दुर्गा को नमस्कार।

कब और कैसे: घर के घट के पास रोज़ दीप और फूल अर्पित करते समय: 108 बार, या हर अर्पण के साथ।

विसर्जन श्लोक

गच्छ गच्छ परं स्थानं स्वस्थानं परमेश्वरि ।
यत्र ब्रह्मादयो देवा न विदुः परमं पदम् ॥

Gachchha Gachchha Param Sthanam Svasthanam Parameshvari, Yatra Brahmadayo Deva Na Viduh Paramam Padam

अर्थ: हे परमेश्वरी, अपने उस परम धाम को पधारें, जिस परम पद को ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते।

कब और कैसे: कालिका पुराण (57.169) का विदाई श्लोक, दशमी के विसर्जन पर घट को थोड़ा हिलाते समय या प्रतिमा के प्रस्थान से पहले बोला जाता है।

कथा · कहानी और उसका अर्थ

दुर्गा पूजा की कथा और महत्व

कथा

महिषासुर, जो भैंसे और मनुष्य का रूप बदल सकता था, वरदान पा चुका था कि कोई पुरुष या देवता उसे नहीं मार सकेगा, और उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। देवताओं के क्रोध से एक महान तेज उठा जिससे देवी प्रकट हुईं; हर देवता ने उन्हें अपना अस्त्र दिया, पर्वतराज ने सिंह दिया, और उन्होंने युद्ध करके महिषासुर का वध किया। बंगाल उन्हें ठीक इसी रूप में पूजता है — दस भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी, चरणों में सिंह और भाले के नीचे असुर — जैसा दुर्गा सप्तशती में वर्णन है।

शरद ऋतु की इस पूजा को ‘अकाल बोधन’ — असमय जागरण — कहा जाता है। देवी की पूजा वसंत की थी, पर बंगाल की कृत्तिवासी रामायण में श्रीराम ने रावण से अंतिम युद्ध से पहले शरद ऋतु में बेल वृक्ष के नीचे देवी को जगाया — इसीलिए आज भी षष्ठी को बेल के नीचे बोधन होता है।

बंगाल के गीतों में देवी उमा भी हैं — पर्वतराज हिमालय और मेनका की पुत्री, जो वर्ष में एक बार अपने चार बच्चों, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय, के साथ मायके आती हैं और दशमी को पति शिव के घर कैलाश लौट जाती हैं। आगमनी गीत उनका स्वागत करते हैं; बिजया के गीत और विसर्जन के आँसू उन्हें विदा करते हैं।

महत्व

दुर्गा पूजा देवी के दो रूपों को जोड़ती है: अहंकार के असुर का नाश करने वाली योद्धा, और कुछ दिनों के लिए घर आई प्रिय बेटी, जिसे फिर जाना है। इसीलिए एक ही उत्सव में गंभीर संधि पूजा भी है और सिंदूर खेला व बिजया की आँसू भरी, आनंद भरी विदाई भी।

यह पूरे समुदाय का उत्सव है — कुमारटुली के कारीगर, ढाकी, मोहल्ले की सार्वजनिक (बारोवारी) पूजाएँ और बड़े घरानों की पुरानी पारिवारिक (बोनेदी बाड़ी) पूजाएँ। यूनेस्को ने कोलकाता की दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में रखा है।

दुर्गा पूजा और नवरात्रि एक ही पखवाड़े में आती हैं, पर अलग ढंग से मनाई जाती हैं: उत्तर और पश्चिम भारत की नवरात्रि नौ रातों के व्रत और देवी के नौ रूपों पर केंद्रित है; बंगाल की पूजा अंतिम पाँच दिनों और संतानों सहित दुर्गा की प्रतिमा पर।

उपाय · परंपरा

दुर्गा पूजा के पारंपरिक उपाय

अष्टमी पर अंजलि

महाअष्टमी पर बिना कुछ खाए पुष्पांजलि देना पूजा का सबसे व्यापक भक्ति-कर्म है; माना जाता है कि इससे वर्ष भर परिवार पर देवी की रक्षा रहती है।

बच्चों के लिए षष्ठी का व्रत

बहुत सी बंगाली माताएँ पूजा की षष्ठी पर बच्चों की कुशलता के लिए व्रत रखती हैं; बहुत से घरों में उस दिन चावल नहीं, केवल फल या लूची खाई जाती है।

संधि पूजा में 108 दीप

संधि पूजा में 108 दीप जलाने में शामिल होना, या घर पर 48 मिनट तक कुछ दीप जलाना, बाधाएँ दूर करने वाला माना जाता है।

सौभाग्य के लिए सिंदूर खेला

दशमी पर विवाहित महिलाएँ देवी को और एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं — परंपरा से लंबे और सुखी दांपत्य के लिए — मायके आई बेटी की विदाई के रूप में।

भोग बाँटना

पूजा का भोग समुदाय के साथ खाना और दूसरों को परोसना अपने आप में प्रसाद और सेवा माना जाता है।

बिजया प्रणाम

बिजया पर बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना, और जो न आ सकें उन्हें मिठाई भेजना, उन रिश्तों को बनाए रखता है जिनका यह उत्सव है।

परंपरा, संक्षेप में

दुर्गा पूजा पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • अंजलि साफ़ हाथों से, और हो सके तो कुछ खाने से पहले दें।
  • पंडाल की भीड़ में पानी साथ रखें और बच्चों का हाथ पकड़े रहें।
  • सिंदूर खेला में शामिल हों तो पारंपरिक लाल किनारी वाली सफ़ेद साड़ी पहनें।
  • किसी को सिंदूर लगाने से पहले पूछ लें।
  • विसर्जन से पहले चढ़ावे से प्लास्टिक और थर्मोकोल हटा दें।
  • बिजया पर बड़ों के पैर छुएँ और मिठाई लेकर उनसे मिलने जाएँ।

क्या न करें

  • पंडाल के द्वार पर धक्का-मुक्की न करें, ख़ासकर रात में।
  • धुनुची पर्दों, सूखी सजावट के पास या बंद कमरों में न जलाएँ।
  • प्रतिमा या घट के साथ प्लास्टिक, फॉयल या सिंथेटिक कपड़ा विसर्जित न करें।
  • त्वचा पर रासायनिक रंग वाला सिंदूर न लगाएँ; प्राकृतिक या त्वचा के लिए सुरक्षित सिंदूर लें।
  • विसर्जन की जल्दी में दर्पण विसर्जन और विदाई की पूजा न छोड़ें।
  • अस्पतालों के पास तेज़ संगीत न बजाएँ; स्थानीय ध्वनि सीमा का ध्यान रखें।

देश भर में

दुर्गा पूजा की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

कोलकाता और पश्चिम बंगाल
थीम पंडालों वाली मोहल्ले की बारोवारी पूजाएँ, बड़े घरानों की पुरानी बोनेदी बाड़ी पूजाएँ, बेलूर मठ की कुमारी पूजा, और हुगली के किनारे विसर्जन की शोभायात्राएँ; प्रतिमाएँ कुमारटुली में बनती हैं।
असम और त्रिपुरा
दुर्गा पूजा लगभग बंगाल की तरह, कस्बों और गाँवों में सामुदायिक पूजाओं के साथ; असम में इस मौसम में कामाख्या मंदिर में भी विशेष पूजा होती है।
ओडिशा
दुर्गा पूजा, जिसमें कटक की प्रतिमाएँ चाँदी की बारीक नक्काशी वाली पृष्ठभूमि (चांदी मेढ़) के लिए प्रसिद्ध हैं, साथ ही स्थानीय रूपों में देवी की मंदिर-पूजा।
बिहार और झारखंड
सप्तमी को पंडालों के पट खुलते हैं, अष्टमी-नवमी को मेले लगते हैं, और दशमी को विसर्जन होता है।
दिल्ली, मुंबई और हर जगह के बंगाली समुदाय
बंगाली संस्थाएँ पूजा करती हैं — दिल्ली का सी.आर. पार्क और मुंबई के शिवाजी पार्क का बंगाल क्लब प्रसिद्ध हैं — अंजलि, भोग और सांस्कृतिक संध्याओं के साथ।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • भोग की खिचुड़ी घी में बनी चावल और मूँग दाल की खिचड़ी, पूजा के भोग का मुख्य हिस्सा।
  • लाबड़ा, बेगुनी और चटनी मिली-जुली सब्ज़ी, बेसन में तले बैंगन, और मीठी टमाटर या कच्चे पपीते की (‘प्लास्टिक’) चटनी, खिचुड़ी के साथ।
  • पायेश चावल की खीर, भोग की मिठाई।
  • लूची और आलूर दम त्योहार का शाकाहारी भोजन, ख़ासकर अष्टमी पर, जब बहुत से बंगाली घरों में मछली-मांस नहीं बनता।
  • नवमी पर मटन करी बहुत से बंगाली घरों की नवमी की परंपरा।
  • नारकेल नाड़ू, निमकी और घुगनी बिजया पर आने वालों को दी जाने वाली नारियल की मिठाई और नमकीन।

आने वाले वर्षों में दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षशनिवार, 17 अक्टूबर 2026बीत गई
2027बुधवार, 6 अक्टूबर 2027आने वाली
2028सोमवार, 25 सितंबर 2028आने वाली

पंचांगों में दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) की तारीख अलग क्यों होती है

2027 में, नई दिल्ली के लिए: कुछ पंचांग विसर्जन का समय एक दिन पहले, नवमी की दोपहर बाद, देते हैं। यहाँ समय दशमी की सुबह (प्रातःकाल) का है, जैसे बिजया दशमी मनाई जाती है।

दो पंचांग दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) कब है?

दुर्गा पूजा षष्ठी से बिजया दशमी तक चलती है। पहला मुख्य दिन, महासप्तमी, नई दिल्ली में बुधवार, 6 अक्टूबर 2027 को है, और सप्तमी तिथि रात 2:33 से सुबह 4:13 (7 अक्टूबर) तक है; उसके बाद महाअष्टमी और महानवमी आती हैं, संधि पूजा 8 अक्टूबर, सुबह 6:04 से सुबह 6:52 तक पर है, और दशमी पर विसर्जन का समय 10 अक्टूबर, सुबह 6:18 से सुबह 8:38 तक है।

दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) की तिथि क्या है?

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 6 अक्टूबर, रात 2:33 से 7 अक्टूबर, सुबह 4:13 तक है, और दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

दूसरे कैलेंडर में दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल दुर्गा पूजा (महा सप्तमी) कब है?

2028 में सोमवार, 25 सितंबर।

दुर्गा पूजा के हर दिन क्या होता है?

महालया पर तर्पण से उत्सव शुरू होता है। षष्ठी को देवी का बोधन; सप्तमी को नवपत्रिका स्नान और प्राण प्रतिष्ठा; अष्टमी को अंजलि, कुमारी पूजा और संधि पूजा; नवमी को होम और भोग; और दशमी को दर्पण विसर्जन, सिंदूर खेला, विसर्जन और बिजया।

दुर्गा पूजा कितने दिन की होती है?

मुख्य उत्सव पाँच दिन का है, षष्ठी से दशमी तक, जिनमें सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन बड़े दिन हैं। मौसम लगभग एक सप्ताह पहले महालया से शुरू होता है, और बिजया का मिलना-जुलना विसर्जन के बाद कई दिनों तक चलता है।

क्या दुर्गा पूजा और नवरात्रि एक ही हैं?

दोनों देवी के एक ही पर्व-काल में, एक ही पखवाड़े में आती हैं, पर अलग ढंग से मनाई जाती हैं: नवरात्रि नौ रातों के व्रत और दुर्गा के नौ रूपों पर केंद्रित है, जबकि बंगाल की दुर्गा पूजा अंतिम पाँच दिनों और चार संतानों सहित दुर्गा की प्रतिमा पर।

सिंदूर खेला क्या है और इसमें कौन शामिल हो सकता है?

बिजया दशमी पर, प्रतिमा के प्रस्थान से पहले, विवाहित महिलाएँ देवी को सिंदूर अर्पित करके एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। परंपरा से यह विवाहित महिलाओं का था; आज बहुत सी पूजाएँ उन सभी महिलाओं का स्वागत करती हैं जो शामिल होना चाहें, जबकि कुछ पुरानी रीति मानती हैं — अपने समुदाय की रीति मानें और किसी को सिंदूर लगाने से पहले पूछ लें।

संधि पूजा कितने बजे है?

संधि पूजा महाअष्टमी के अंतिम 24 मिनट और महानवमी के पहले 24 मिनट, कुल 48 मिनट की होती है। नई दिल्ली में यह 8 अक्टूबर, सुबह 6:04 से सुबह 6:52 तक पर है। यह तिथि से चलती है, इसलिए दिन में भी पड़ सकती है और देर रात भी।

दुर्गा विसर्जन कब है?

बिजया दशमी पर। विदाई की पूजा और दर्पण विसर्जन सुबह या दोपहर बाद के समय में होते हैं, नई दिल्ली में 10 अक्टूबर, सुबह 6:18 से सुबह 8:38 तक; विसर्जन की शोभायात्रा अक्सर स्थानीय नियमों के अनुसार शाम तक चलती है।

दुर्गा विसर्जन का मंत्र क्या है?

कालिका पुराण का विदाई श्लोक परमेश्वरी से अपने परम धाम को पधारने की प्रार्थना करता है: ‘गच्छ गच्छ परं स्थानं स्वस्थानं परमेश्वरि’। यह ऊपर अर्थ सहित दिया गया है; और भक्तों की पुकार ‘आश्छे बोछोर आबार होबे’ उनसे अगले वर्ष फिर आने को कहती है।

महालया क्या है?

महालया वह अमावस्या है जो पितृ पक्ष को समाप्त कर देवी पक्ष शुरू करती है। बंगाल में भोर में पितरों को तर्पण और ‘महिषासुरमर्दिनी’ के पाठ से यह दिन मनाया जाता है; यह लगभग एक सप्ताह बाद आने वाली पूजा का संदेशवाहक है।

अष्टमी की अंजलि में कौन-से मंत्र बोले जाते हैं?

आम तौर पर तीन बार अंजलि होती है: पहली बार ‘ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी’, दूसरी बार ‘ॐ महिषघ्नि महामाये’, और तीसरी बार ‘सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये’ के साथ ‘सृष्टिस्थितिविनाशानां’। पुरोहित हर पंक्ति बोलते हैं, भक्त दोहराते हैं, फिर फूल और बेलपत्र अर्पित करते हैं। सभी ऊपर अर्थ सहित दिए गए हैं।

नवपत्रिका या कोला बोउ क्या है?

नौ पौधे — केला, कच्चू (अरबी), हल्दी, जयंती, बेल, अनार, अशोक, मान कच्चू और धान — एक साथ बाँधकर सप्तमी की भोर में स्नान कराए जाते हैं और लाल किनारी की साड़ी पहनाई जाती है। हर पौधा देवी के एक रूप का प्रतीक है, और इसे गणेश जी के पास रखा जाता है, इसीलिए इसे प्यार से उनकी दुल्हन, कोला बोउ, कहते हैं।

क्या घर पर दुर्गा पूजा कर सकते हैं?

हाँ, सरल रूप में। दुर्गा की तस्वीर के सामने आम के पत्तों और हरे नारियल वाला जल-घट रखें, षष्ठी से दशमी तक रोज़ फूल, बेलपत्र, दीपक और मिठाई चढ़ाएँ, संधि काल में दीप जलाएँ, और दशमी को विदाई करें। पंडाल की पूर्ण प्रतिमा-पूजा पुरोहित करते हैं।

क्या दुर्गा पूजा और दशहरा एक ही हैं?

दोनों एक ही दिन मिलते हैं। दुर्गा पूजा का अंतिम दिन, बंगाल की बिजया दशमी, वही दिन है जिसे शेष भारत दशहरा या विजयादशमी के रूप में मनाता है; पर दुर्गा पूजा देवी का पूरा उत्सव है, और दशहरा उसका दसवाँ दिन।