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शुक्ल पक्ष · पूर्णिमा तिथि · मार्गशीर्ष

दत्तात्रेय जयंती 2026 कब है?

दत्तात्रेय जयंती 2026

58 दिन बाद

बुध, 23 दिसंबर

2026 में दत्तात्रेय जयंती बुधवार, 23 दिसंबर को है। नई दिल्ली में दत्तात्रेय पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:30 से रात 8:14 तक है।

2027: सोमवार, 13 दिसंबर 2027

दत्तात्रेय पूजा मुहूर्त

शाम 5:30 – रात 8:14

नई दिल्ली

दत्तात्रेय जयंती कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

दत्तात्रेय जयंती 2026: तारीख और तिथि का समय

बुधवार, 23 दिसंबर 2026

तिथि
पूर्णिमा, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
मार्गशीर्ष
तिथि आरंभ
23 दिसंबर, सुबह 10:48
तिथि समाप्त
24 दिसंबर, सुबह 6:58
दिन का निर्णय
प्रदोष काल
नई दिल्ली में प्रदोष काल
शाम 5:30 से रात 8:14

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: दत्तात्रेय जयंती का निर्णय सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके प्रदोष काल पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

अर्थ और परंपरा

दत्तात्रेय जयंती क्या है?

दत्तात्रेय जयंती (दत्त जयंती) अत्रि और अनसूया के पुत्र दत्तात्रेय का जन्मदिन है, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की एक साथ पूजा होती है। यह मार्गशीर्ष पूर्णिमा को मनाई जाती है — सबसे अधिक महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और गुजरात में।

  • दत्त का जन्म शाम को माना जाता है, इसलिए तारीख वह दिन है जिसके प्रदोष काल में पूर्णिमा हो — 2016 से 2029 तक हर साल द्रिक पंचांग की तारीख। सूर्योदय की पूर्णिमा इनमें से लगभग एक-तिहाई सालों में एक दिन बाद पड़ती है।
  • कई मंदिरों और घरों में पहले के सप्ताह में गुरुचरित्र का पाठ होता है, जो इसी दिन पूरा होता है, और शाम को जन्मोत्सव मनाया जाता है।
  • गाणगापुर, नरसोबाची वाडी और औदुंबर दत्त के सबसे प्रसिद्ध स्थानों में हैं।

दत्तात्रेय जयंती 2026 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

दत्तात्रेय जयंती 2026 दत्तात्रेय पूजा मुहूर्त

दत्त जयंती महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पुत्र भगवान दत्तात्रेय के जन्म का उत्सव है, जिनके एक ही रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश समाए हैं और जिन्हें आदिगुरु के रूप में पूजा जाता है। यह मार्गशीर्ष पूर्णिमा को उस दिन मनाई जाती है जिसकी संध्या में पूर्णिमा हो, क्योंकि दत्त जन्म शाम को मनाया जाता है। नई दिल्ली में यह बुधवार, 23 दिसंबर 2026 को है, और दत्त जन्म का प्रदोष काल है: शाम 5:30 से रात 8:14 तक।

दत्तात्रेय जयंती 2026 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 5:20 से सुबह 6:15 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।

भक्त भोर से पहले इस मुहूर्त में उठकर पूर्णिमा का स्नान करते हैं, हो सके तो नदी या तीर्थ-कुंड में, और बहुत से लोग दिन का नाम-जप या गुरुचरित्र पाठ इसी समय शुरू करते हैं।

सूर्योदयसुबह 7:10क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

नई दिल्ली में सूर्योदय के बाद व्रत रखने वाले संकल्प लेते हैं, और दत्त मंदिरों में दिन की शुरुआत पादुकाओं के अभिषेक से होती है।

दिन के शुभ चौघड़िया
  • लाभ सुबह 7:10 से सुबह 8:27 तक
  • अमृत सुबह 8:27 से सुबह 9:45 तक
  • शुभ सुबह 11:02 से दोपहर 12:20 तक
  • चर दोपहर 2:55 से शाम 4:12 तक
  • लाभ शाम 4:12 से शाम 5:30 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया, जिनमें परिवार शाम के जन्मोत्सव से पहले दत्तात्रेय की मूर्ति या पादुकाओं का अभिषेक और पूजा करते हैं।

सूर्यास्तशाम 5:30सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज से ओझल होने का समय।

नई दिल्ली में सूर्यास्त से प्रदोष शुरू होता है: पालना, फूल, गुलाल और सुंठवड़ा उससे पहले तैयार रखें, क्योंकि जन्मोत्सव गोधूलि के साथ मनाया जाता है।

प्रदोष काल: दत्त जन्मशाम 5:30 से रात 8:14 तकपूर्णिमा की शाम प्रदोष काल, जब तक पूर्णिमा रहे।

सूर्यास्त के बाद का वह समय जिसमें पूर्णिमा रहते दत्त जन्म मनाया जाता है: पालना झुलाया जाता है, पालना गीत गाए जाते हैं, फूल और गुलाल बरसाए जाते हैं, और फिर आरती होती है। मंदिर और घर जन्मोत्सव इसी समय में करते हैं।

चंद्रोदयशाम 4:36इस सूर्योदय के बाद और अगले सूर्योदय से पहले का पहला चंद्रोदय।

पूर्णिमा को चंद्रमा सूर्यास्त के आसपास उगता है; पूर्णिमा व्रत रखने वाले चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं, और बहुत से भक्त जन्मोत्सव के बाद प्रसाद से दिन का व्रत खोलते हैं।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अमृत कालरात 9:12 से रात 10:36सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 5:20 से सुबह 6:15शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालदोपहर 12:20 से दोपहर 1:37
यमगण्ड कालसुबह 8:27 से सुबह 9:45
दुर्मुहूर्त (पहला)सुबह 11:59 से दोपहर 12:40
वर्ज्यम्दोपहर 12:49 से दोपहर 2:13

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए बुधवार, 23 दिसंबर 2026 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

दत्तात्रेय जयंती पूजा विधि

  1. स्नान और संकल्प

    सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, हो सके तो पूर्णिमा पर नदी में डुबकी लगाएँ, और दत्तात्रेय पूजा का संकल्प लें; व्रत रखने वाले शाम के जन्मोत्सव तक व्रत रखते हैं।

  2. पूजा स्थान सजाएँ

    चौकी पर साफ़ वस्त्र बिछाकर तीन मुख और छह भुजाओं वाले, गाय और चार श्वानों के साथ दत्तात्रेय का चित्र या उनकी पादुकाएँ रखें; औदुंबर (गूलर) के पत्ते मिलें तो पास रखें।

  3. पहले गणेश पूजा

    घी का दीपक और धूप जलाकर जल, रोली, अक्षत और दूर्वा से गणेश जी की पूजा करें।

  4. अभिषेक और पूजा

    पादुकाओं या मूर्ति का पंचामृत से, फिर शुद्ध जल से अभिषेक करें, चंदन लगाएँ, और 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' जपते हुए फूल, तुलसी दल, धूप और दीप अर्पित करें।

  5. दत्त कथा का पाठ

    गुरुचरित्र का पाठ करें, या कम से कम उसका वह अध्याय जिसमें अनसूया के घर दत्त जन्म की कथा है; जिन परिवारों ने सात दिन का पाठ शुरू किया हो, वे इसे इसी दिन पूरा करते हैं, और बहुत से गुजराती घरों में दत्त बावनी का पाठ होता है।

  6. पालना सजाएँ

    सूर्यास्त से पहले एक छोटे पालने को फूलों से सजाएँ और उसमें दत्त की मूर्ति, या नए वस्त्र में लिपटा नारियल, नवजात की तरह रखें।

  7. गोधूलि में दत्त जन्म

    प्रदोष काल में पालना झुलाएँ और पालना गीत गाएँ, फूल और गुलाल बरसाएँ, शंख और घंटी बजाएँ, और 'श्री गुरुदेव दत्त' का जयघोष करें।

  8. आरती और नैवेद्य

    'त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती' आरती गाएँ और सुंठवड़ा, मिठाई, फल और सादे सात्विक भोजन का नैवेद्य लगाएँ।

  9. भोजन और दान

    ज़रूरतमंद या किसी साधु को भोजन दें, दत्त के साथी गाय और श्वानों को खिलाएँ, और प्रसाद से व्रत खोलें।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

दत्तात्रेय जयंती पूजा सामग्री सूची

  • दत्तात्रेय का चित्र या पादुकाएँ तीन मुख, छह भुजाएँ, साथ में गाय और चार श्वान; प्रमुख दत्त तीर्थों में पादुकाओं की पूजा होती है।
  • चौकी और साफ़ वस्त्र पीला या केसरिया वस्त्र प्रचलित है।
  • पंचामृत अभिषेक के लिए दूध, दही, घी, शहद और शक्कर।
  • चंदन, रोली और अक्षत तिलक और पूजा के लिए।
  • फूल, माला और तुलसी दल सफ़ेद या पीले फूल और एक माला।
  • औदुंबर (गूलर) के पत्ते दत्त का प्रिय वृक्ष; मिल सकें तो।
  • घी का दीपक, धूप और कपूर पूजा और आरती के लिए।
  • छोटा पालना गोधूलि के जन्मोत्सव के लिए फूलों से सजा हुआ।
  • नारियल और नया वस्त्र उन परिवारों के लिए जो मूर्ति की जगह नारियल को पालने में रखते हैं।
  • गुलाल और फूलों की पंखुड़ियाँ जन्म के क्षण में बरसाने के लिए।
  • शंख और घंटी जन्मोत्सव और आरती में बजाने के लिए।
  • सुंठवड़ा सोंठ का चूर्ण, शक्कर, सूखा नारियल और मेवा: जन्मोत्सव का प्रसाद।
  • फल और मिठाई नैवेद्य के लिए।
  • गुरुचरित्र या दत्त स्तोत्र की पुस्तक दिन के पाठ के लिए।
  • रोटियाँ या अनाज गाय और श्वानों को खिलाने के लिए।

मंत्र · अर्थ के साथ

दत्तात्रेय जयंती के मंत्र और आरती

दत्त नाम-जप

दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा

Digambara Digambara Shripad Vallabha Digambara

अर्थ: हे दिगंबर, हे श्रीपाद श्रीवल्लभ, हे दिगंबर: दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं, ऐसे अवधूत दत्त को उनके नाम दिगंबर से, और इस युग में उनके पहले अवतार माने जाने वाले श्रीपाद श्रीवल्लभ के नाम से पुकारना।

कब और कैसे: दत्त का सबसे प्रिय जप, जो भजनों में गाया जाता है और दिन भर माला पर 108 बार या उससे अधिक जपा जाता है।

दत्त मंत्र

ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः

Om Dram Dattatreyaya Namah

अर्थ: ॐ, और दत्त का बीज अक्षर द्रां: भगवान दत्तात्रेय को नमस्कार।

कब और कैसे: पूजा में या शाम को, स्थिर मन से माला पर 108 बार।

दत्त गायत्री

ॐ दिगम्बराय विद्महे अवधूताय धीमहि ।
तन्नो दत्तः प्रचोदयात् ॥

Om Digambaraya vidmahe Avadhutaya dhimahi
Tanno Dattah prachodayat

अर्थ: हम दिगंबर को जानते हैं और सब बंधनों से मुक्त अवधूत का ध्यान करते हैं; दत्त हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। (बहुत से परिवार 'योगीश्वराय धीमहि' बोलते हैं, जो एक दूसरी दत्त गायत्री की पंक्ति है।)

कब और कैसे: दत्त अथर्वशीर्ष की गायत्री; सुबह की पूजा में 11 या 108 बार।

छह भुजाओं वाले दत्त का ध्यान श्लोक

माला कमण्डलुरधः करपद्मयुग्मे मध्यस्थपाणियुगले डमरुत्रिशूले ।
यन्न्यस्त ऊर्ध्वकरयोः शुभशङ्खचक्रे वन्दे तमत्रिवरदं भुजषट्कयुक्तम् ॥

Mala kamandalur adhah kara-padma-yugme madhyastha-pani-yugale damaru-trishule
Yan-nyasta urdhva-karayoh shubha-shankha-chakre vande tam Atri-varadam bhuja-shatka-yuktam

अर्थ: जिनके नीचे के कर-कमलों में माला और कमंडलु हैं, बीच के दो हाथों में डमरू और त्रिशूल, और ऊपर के हाथों में शुभ शंख और चक्र: अत्रि को वर देने वाले उन छह भुजाओं वाले दत्त को मैं प्रणाम करता हूँ। (कुछ पाठों में 'यन्न्यस्त' की जगह 'यस्यस्त' है; अर्थ वही है।)

कब और कैसे: पूजा से पहले एक बार, दत्त के रूप का ध्यान करते हुए: ब्रह्मा की माला और कमंडलु, शिव का डमरू और त्रिशूल, और विष्णु का शंख और चक्र।

गुरु श्लोक

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

Gurur Brahma Gurur Vishnuh Gurur Devo Maheshvarah
Guruh sakshat Parabrahma tasmai Shri Gurave namah

अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही देव महेश्वर हैं; गुरु साक्षात परब्रह्म हैं। उन श्रीगुरु को मेरा नमस्कार।

कब और कैसे: दत्त जयंती पर हाथ जोड़कर बोला जाता है, क्योंकि दत्त वह गुरु हैं जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर एक हैं।

आरती दत्त आरती: त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती (संत एकनाथ, मराठी) पूरी आरती

त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा।
त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्य राणा।
नेती नेती शब्द न ये अनुमाना।
सुरवर मुनिजन योगी समाधी न ये ध्याना॥

जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता।
आरती ओवाळिता हरली भवचिंता॥

सबाह्य अभ्यंतरी तू एक दत्त।
अभाग्यासी कैंची कळेल ही मात।
पराही परतली तेथे कैंचा हेत।
जन्ममरणाचाही पुरलासे अंत॥

दत्त येऊनिया उभा ठाकला।
भावे साष्टांगेसी प्रणिपात केला।
प्रसन्न होऊनि आशीर्वाद दिधला।
जन्ममरणाचा फेरा चुकविला॥

दत्त दत्त ऐसें लागले ध्यान।
हरपले मन झाले उन्मन।
मी तू पणाची झाली बोळवण।
एका जनार्दनी श्रीदत्तध्यान॥

Trigunatmak traimurti Datta ha jana.
Triguni avatar trailokya rana.
Neti neti shabda na ye anumana.
Survar munijan yogi samadhi na ye dhyana.

Jai dev jai dev jai Shri Gurudatta.
Aarti ovalita harli bhavchinta.

Sabahya abhyantari tu ek Datta.
Abhagyasi kainchi kalel hi maat.
Parahi paratli tethe kaincha het.
Janmamaranachahi puralase ant.

Datta yeuniya ubha thakla.
Bhave sashtangesi pranipat kela.
Prasanna houni ashirvad didhla.
Janmamaranacha phera chukavila.

Datta Datta aise lagle dhyan.
Harpale man jhale unman.
Mi tu panachi jhali bolvan.
Eka Janardani Shri Dattadhyan.

संत एकनाथ की मराठी आरती, उसी रूप में जैसे आम तौर पर गाई जाती है। यह गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में नहीं है; यहाँ जुड़े छपे मराठी आरती-संग्रह में 'शब्द' की जगह 'शब्दें', 'जन्ममरणाचाही' की जगह 'जन्ममरणाचा' और 'भावे साष्टांगेसी' की जगह 'सद्भावे साष्टांगे' है। छपा पाठ

कथा · कहानी और उसका अर्थ

दत्तात्रेय जयंती की कथा और महत्व

कथा

महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूया अपने पतिव्रत के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थीं। लोक में प्रचलित कथा कहती है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश उनकी परीक्षा लेने आए: अत्रि जी की अनुपस्थिति में वे संन्यासियों के वेश में आश्रम पहुँचे और ऐसी शर्त पर भिक्षा माँगी जिसे कोई पतिव्रता स्वीकार न कर सके, कि वे निर्वस्त्र होकर भोजन परोसें।

अनसूया अतिथि को खाली नहीं लौटाती थीं। उनके पतिव्रत के प्रभाव से तीनों देव उनके सामने शिशु बन गए; उन्होंने माँ की तरह उन्हें भोजन कराया और झुलाकर सुलाया, और वे उनके आश्रम में उनके बालक बनकर रहे।

जब सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती अपने पतियों को खोजती हुई आईं और अनसूया से उन्हें लौटाने की विनती की, तो अनसूया ने देवों को उनका रूप लौटा दिया। प्रसन्न होकर देवों ने वर माँगने को कहा, और अनसूया ने माँगा कि वे उनके पुत्र बनकर जन्म लें। महाराष्ट्र में सबसे प्रिय रूप में तीनों देव एक साथ तीन मुख और छह भुजाओं वाले दत्तात्रेय बनकर जन्मे। भागवत पुराण में अत्रि जी की लंबी तपस्या के बाद ब्रह्मा का अंश चंद्रमा, विष्णु का अंश दत्त और शिव का अंश दुर्वासा ऋषि बनकर जन्मा।

उनका नाम ही कथा कहता है: पुत्र की कामना करने वाले अत्रि से भगवान ने कहा कि मैंने स्वयं को तुम्हें दे दिया, इसलिए वे दत्त कहलाए, और अत्रि के पुत्र होने से आत्रेय। भागवत उन्हें विष्णु के अवतारों में गिनता है, जिन्होंने प्रह्लाद, राजा अलर्क और अन्य लोगों को आत्मज्ञान का उपदेश दिया।

भागवत में एक अवधूत, यानी बंधनों से मुक्त होकर विचरने वाले संन्यासी, जिन्हें परंपरा दत्तात्रेय मानती है, राजा यदु को बताते हैं कि उन्होंने प्रकृति के चौबीस गुरुओं से सीखा: पृथ्वी से सहनशीलता, समुद्र से शांति, मधुमक्खी से अनेक फूलों से थोड़ा-थोड़ा लेना, और मकड़ी से यह कि भगवान जगत को स्वयं से रचते हैं और फिर अपने में समेट लेते हैं। इसीलिए दत्त वह गुरु हैं जो पूरी सृष्टि से सीखते हैं।

महत्व

दत्त जयंती गुरु तत्व का उत्सव है। दत्तात्रेय एक ही रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश, यानी सृष्टि, पालन और संहार को धारण करते हैं, और आदिगुरु, योगियों के ईश्वर और हर बंधन से मुक्त अवधूत के आदर्श के रूप में पूजे जाते हैं। अवधूत गीता उनकी मानी जाती है, और त्रिपुरा रहस्य परशुराम को दिया गया उनका उपदेश है।

उनका रूप स्वयं एक उपदेश है: पीछे खड़ी गाय को पृथ्वी या कामधेनु, चार श्वानों को चार वेद, और औदुंबर वृक्ष को उनका निवास माना जाता है। गुरुवार उनका साप्ताहिक दिन है, और उनका जन्मदिन मार्गशीर्ष की पूर्णिमा है, उस मास की जिसे गीता में श्रीकृष्ण अपना कहते हैं।

दक्खन के दत्त संप्रदाय में पीठापुरम के श्रीपाद श्रीवल्लभ और कारंजा व गाणगापुर के नृसिंह सरस्वती उनके अवतार माने जाते हैं, जिनका जीवन मराठी ग्रंथ गुरुचरित्र में है, और भक्त अक्कलकोट के स्वामी समर्थ जैसे बाद के संतों को भी इसी रूप में देखते हैं।

उपाय · परंपरा

दत्तात्रेय जयंती के पारंपरिक उपाय

गुरुचरित्र का पाठ

गुरुचरित्र का पाठ करें, या उसका दत्त जन्म वाला अध्याय पढ़ें; सात दिन का पाठ रखने वाले परिवार उसके पारंपरिक नियम, यानी शुद्धता और सादा भोजन, निभाते हैं।

गाय और श्वानों को भोजन

दत्त के साथ गाय और चार श्वान रहते हैं, इसलिए उनके दिन इन्हें भोजन कराना स्वाभाविक भेंट है; परंपरा की तरह प्रेम से रोटी या अनाज दें।

दत्त के नाम पर भिक्षा

दत्त भिक्षा पर जीने वाले विचरते संन्यासी हैं, इसलिए किसी साधु या भूखे को भोजन देना उन्हीं को अर्पण माना जाता है।

औदुंबर की परिक्रमा

औदुंबर (गूलर) के पेड़ को जल दें और दत्त का नाम जपते हुए उसकी परिक्रमा करें; भक्त मानते हैं कि दत्त उसकी छाया में निवास करते हैं।

नाम-जप

'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' या 'श्री गुरुदेव दत्त' माला पर या भजन में जपें; इसे मार्गदर्शन और शांति की प्रार्थना के रूप में रखा जाता है, किसी फल के वादे के रूप में नहीं।

गुरु का सम्मान

दत्त ने चौबीस गुरुओं से सीखा: अपने गुरु के चरण छुएँ, जिसने आपको कुछ सिखाया उसका धन्यवाद करें, या उनके जन्मदिन पर कुछ नया सीखना शुरू करें।

गुरुवार की उपासना

बहुत से भक्त इसी दिन से दत्त की साप्ताहिक गुरुवार उपासना शुरू करते हैं, उनके नाम और एक सादी भेंट के साथ।

परंपरा, संक्षेप में

दत्तात्रेय जयंती पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • पूर्णिमा रहते सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में दत्त जन्म मनाएँ।
  • पहले गणेश जी की, फिर दत्त की मूर्ति या पादुकाओं की पूजा करें।
  • गुरुचरित्र या दत्त जन्म का अध्याय पढ़ें।
  • गाय और श्वानों को खिलाएँ, और ज़रूरतमंदों को भोजन दें।
  • दिन भर 'श्री गुरुदेव दत्त' और 'दिगंबरा दिगंबरा' जपें।
  • दिन सात्विक रखें; व्रत हो तो शाम की आरती के बाद प्रसाद से खोलें।

क्या न करें

  • दत्त के दिन भोजन माँगने वाले किसी को खाली हाथ न लौटाएँ; परंपरा कहती है कि गुरु किसी भी रूप में आ सकते हैं।
  • दत्त के साथी श्वानों और गायों को न सताएँ, न भगाएँ।
  • मांस और मदिरा से दूर रहें, और घर में कलह न करें।
  • गुरुचरित्र का पाठ व्रत के रूप में, उसके नियम परिवार या मंदिर से जाने बिना शुरू न करें।
  • पालने, वस्त्र और फूलों के पास जलते दीपक को अकेला न छोड़ें।

देश भर में

दत्तात्रेय जयंती की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

महाराष्ट्र
नरसोबाची वाडी, औदुंबर, कारंजा, माहूर और अक्कलकोट के दत्त स्थानों पर कई दिन उत्सव चलता है, गुरुचरित्र पाठ, कीर्तन और पालकी शोभायात्रा के साथ; गोधूलि में पालना, पालना गीत और सुंठवड़ा प्रसाद के साथ जन्मोत्सव मनाया जाता है।
कर्नाटक
कलबुर्गी ज़िले का गाणगापुर, जहाँ नृसिंह सरस्वती रहे और उनकी निर्गुण पादुकाओं की पूजा होती है, जयंती पर भारी भीड़ खींचता है; कृष्णा नदी के तट पर कुरवपुर श्रीपाद श्रीवल्लभ की स्मृति सँजोता है।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना
श्रीपाद श्रीवल्लभ की जन्मभूमि पीठापुरम में उनके महासंस्थानम में जयंती मनाई जाती है, और तेलुगु राज्यों के दत्त मंदिरों में अभिषेक और भजन होते हैं।
गुजरात
श्रद्धालु जूनागढ़ के पास गिरनार की सीढ़ियाँ चढ़कर गुरु दत्तात्रेय शिखर तक जाते हैं, जहाँ उनकी पादुकाओं की पूजा होती है, और बहुत से घरों में रंग अवधूत महाराज की दत्त बावनी का पाठ होता है।
उत्तर भारत
यहाँ जयंती मुख्य रूप से दत्त मंदिरों में और दत्त संप्रदाय के अनुयायियों द्वारा मनाई जाती है, जबकि घरों में मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर नदी स्नान, दान और सत्यनारायण कथा होती है।
महानुभाव संप्रदाय
महाराष्ट्र का महानुभाव संप्रदाय, जो दत्त को अपने पाँच कृष्णों में से एक मानता है, भी इस दिन को श्रद्धा से मनाता है।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • सुंठवड़ा सोंठ का चूर्ण, शक्कर, सूखा नारियल और मेवा: जन्म का प्रसाद, जो महाराष्ट्र में राम और कृष्ण के जन्मोत्सव की तरह दत्त जन्म पर भी बाँटा जाता है।
  • घेवड़े की भाजी महाराष्ट्र के कुछ परिवार घेवड़ा (सेम) की भाजी चढ़ाते हैं, गुरुचरित्र की उस कथा की याद में जिसमें श्रीगुरु ने एक गरीब घर की सादी भेंट स्वीकार की।
  • शीरा या खीर नैवेद्य के लिए सादी मिठाई।
  • फलाहार शाम तक व्रत रखने वालों के लिए फल, दूध और साबूदाना या राजगिरा के व्यंजन।
  • पंचामृत अभिषेक का पंचामृत, जो प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है।

आने वाले वर्षों में दत्तात्रेय जयंती की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में दत्तात्रेय जयंती की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षबुधवार, 23 दिसंबर 2026आने वाली
2027सोमवार, 13 दिसंबर 2027आने वाली
2028शुक्रवार, 1 दिसंबर 2028आने वाली

पंचांगों में दत्तात्रेय जयंती की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग दत्तात्रेय जयंती की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: दत्तात्रेय जयंती का निर्णय प्रदोष काल से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

दत्तात्रेय जयंती से जुड़े सामान्य प्रश्न

2026 में दत्तात्रेय जयंती कब है?

नई दिल्ली में दत्त जयंती 2026 बुधवार, 23 दिसंबर 2026 को है, मार्गशीर्ष पूर्णिमा। पूर्णिमा तिथि सुबह 10:47 से सुबह 6:58 (24 दिसंबर) तक रहेगी, और दत्त जन्म उसी शाम के प्रदोष काल में मनाया जाता है: शाम 5:30 से रात 8:14 तक।

दत्तात्रेय जयंती की तिथि क्या है?

मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 23 दिसंबर, सुबह 10:48 से 24 दिसंबर, सुबह 6:58 तक है, और दत्तात्रेय जयंती का दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में चल रही तिथि से तय होता है।

नई दिल्ली में दत्तात्रेय जयंती का शुभ मुहूर्त क्या है?

23 दिसंबर को शाम 5:30 से रात 8:14 तक। यह प्रदोष काल और पूर्णिमा तिथि का मेल है, नई दिल्ली के लिए निकाला गया — अवधि आपके शहर के सूर्यास्त के साथ बदलती है, और तिथि उसके बीच में भी ख़त्म हो सकती है।

दूसरे कैलेंडर में दत्तात्रेय जयंती की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल दत्तात्रेय जयंती कब है?

2027 में सोमवार, 13 दिसंबर; 2028 में शुक्रवार, 1 दिसंबर।

कुछ पंचांगों में दत्त जयंती पूर्णिमा से एक दिन पहले क्यों दिखती है?

दत्त का जन्म संध्या में माना जाता है, इसलिए जयंती उस दिन मनाई जाती है जिसके प्रदोष काल में, यानी सूर्यास्त के बाद, मार्गशीर्ष पूर्णिमा हो। जब पूर्णिमा दिन में शुरू होती है तो वही शाम जयंती होती है, जबकि सूर्योदय की तिथि गिनने वाले पंचांग पूर्णिमा व्रत और स्नान अगले दिन दे सकते हैं।

दत्त का जन्म किस समय हुआ था?

परंपरा दत्त का जन्म मार्गशीर्ष पूर्णिमा की संध्या में मानती है, इसलिए मंदिर और घर सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में जन्मोत्सव मनाते हैं। नई दिल्ली में यह समय है: शाम 5:30 से रात 8:14 तक।

दत्त जयंती क्या है, और भगवान दत्तात्रेय कौन हैं?

दत्त जयंती भगवान दत्तात्रेय का जन्मदिन है। वे महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पुत्र हैं, जिनकी पूजा तीन मुख और छह भुजाओं वाले एक रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में होती है; वे आदिगुरु और योगियों के ईश्वर माने जाते हैं, और भागवत उन्हें विष्णु के अवतारों में गिनता है।

दत्त जयंती की कथा क्या है?

ब्रह्मा, विष्णु और महेश अनसूया के पतिव्रत की परीक्षा लेने आए और उनसे निर्वस्त्र होकर भिक्षा देने को कहा; उनके पतिव्रत के प्रभाव से तीनों शिशु बन गए और अनसूया ने माँ की तरह उनकी देखभाल की। देवियों की विनती पर देव अपने रूप में लौटे, और उन्होंने अनसूया को वर दिया कि वे उनके पुत्र बनकर जन्म लेंगे।

दत्त जयंती पर कौन सा मंत्र जपें?

नाम-जप 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा', मंत्र 'ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः', दत्त गायत्री और छह भुजाओं वाले दत्त का ध्यान श्लोक, और साथ में गुरु श्लोक 'गुरुर्ब्रह्मा', क्योंकि दत्त में तीनों देव एक हैं। पूरे पाठ और अर्थ मंत्र खंड में हैं।

दत्त की कौन सी आरती गाई जाती है?

संत एकनाथ की मराठी आरती 'त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा', जिसकी टेक 'जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता' है, दत्त मंदिरों और घरों में गाई जाती है; पूरी आरती ऊपर दी गई है।

घर पर दत्त जयंती की पूजा कैसे करें?

स्नान करके संकल्प लें, गणेश पूजा करें, फिर दत्त की मूर्ति या पादुकाओं का पंचामृत से अभिषेक करके चंदन, फूल और तुलसी अर्पित करें और गुरुचरित्र पढ़ें। गोधूलि में मूर्ति या नारियल को पालने में रखें, पालना गीत गाएँ, फूल बरसाएँ, आरती गाकर सुंठवड़ा चढ़ाएँ, फिर गाय, श्वानों और ज़रूरतमंदों को भोजन दें।

दत्त जयंती पर क्या पढ़ा जाता है?

मुख्य ग्रंथ गुरुचरित्र है, जो श्रीपाद श्रीवल्लभ और नृसिंह सरस्वती का मराठी जीवन-चरित है: बहुत से परिवार सात दिन का पाठ जयंती पर पूरा करते हैं, और कुछ लोग दत्त जन्म का अध्याय पढ़ते हैं। बहुत से गुजराती घरों में दत्त बावनी का पाठ होता है, और उनके उपदेश में रुचि रखने वाले अवधूत गीता पढ़ते हैं।

क्या दत्त जयंती पर व्रत रखते हैं?

बहुत से भक्त सूर्योदय से शाम के जन्मोत्सव तक व्रत रखते हैं, ज़रूरत हो तो फल, दूध या साबूदाना लेकर, और आरती के बाद प्रसाद से व्रत खोलते हैं। व्रत भक्ति है, नियम नहीं; अपने परिवार की परंपरा मानें।

दत्त जयंती पर पालना क्या है?

पालना वह लोरी है जो जन्म के क्षण में गाई जाती है, जब सजे हुए पालने में दत्त की मूर्ति या नारियल झुलाया जाता है। दत्त के मराठी पालने मंदिरों और घरों में गाए जाते हैं, और उनके शब्द हर परिवार और परंपरा में कुछ अलग होते हैं।

दत्त के प्रमुख मंदिर कहाँ हैं?

कर्नाटक का गाणगापुर; महाराष्ट्र के नरसोबाची वाडी, औदुंबर, कारंजा, माहूर और अक्कलकोट; आंध्र प्रदेश का पीठापुरम; और गुजरात में गिरनार का गुरु दत्तात्रेय शिखर दत्त उपासना के सबसे प्रसिद्ध स्थानों में हैं, और जयंती पर सभी में श्रद्धालु उमड़ते हैं।

स्वामी समर्थ का दत्त जयंती से क्या संबंध है?

अक्कलकोट के स्वामी समर्थ के भक्त उन्हें दत्त का अवतार मानते हैं, इसलिए उनके मठों और मंदिरों में दत्त जयंती विशेष पूजा, पाठ और प्रसाद के साथ मनाई जाती है।

दत्तात्रेय के तीन मुख, गाय और चार श्वान क्यों हैं?

तीन मुख ब्रह्मा, विष्णु और महेश की एकता दिखाते हैं, और छह हाथों में उनके चिह्न हैं। गाय को पृथ्वी या कामधेनु और चार श्वानों को चार वेद माना जाता है, यानी वह ज्ञान जो गुरु के पीछे-पीछे चलता है।

क्या दत्त जयंती हमेशा गुरुवार को होती है?

नहीं। जयंती मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर होती है, इसलिए उसका वार हर साल बदलता है। गुरुवार दत्त का साप्ताहिक दिन है, और भक्त हर गुरुवार भी उनकी पूजा करते हैं।