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कृष्ण पक्ष · दशमी तिथि · चैत्र (पूर्णिमांत) / फाल्गुन (अमांत)

दशा माता व्रत 2027 कब है?

दशा माता व्रत 2027

157 दिन बाद

गुरु, 1 अप्रैल

2027 में दशा माता व्रत गुरुवार, 1 अप्रैल को है। नई दिल्ली में दशमी तिथि 31 मार्च, रात 10:17 से 2 अप्रैल, रात 12:46 तक रहेगी।

2028: सोमवार, 20 मार्च 2028

दशा माता व्रत कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह पूर्णिमांत गणना में चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि है। दक्षिण और पश्चिम भारत की अमांत गणना में यही तिथि फाल्गुन कृष्ण दशमी कहलाती है — दिन वही है, केवल महीने का नाम अलग। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

दशा माता व्रत 2027: तारीख और तिथि का समय

गुरुवार, 1 अप्रैल 2027

तिथि
दशमी, कृष्ण पक्ष
हिंदू मास
चैत्र (पूर्णिमांत) / फाल्गुन (अमांत)
तिथि आरंभ
31 मार्च, रात 10:17
तिथि समाप्त
2 अप्रैल, रात 12:46
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
1 अप्रैल, सुबह 6:11

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: दशा माता व्रत का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

दशा माता व्रत 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

दशा माता व्रत 2027 शुभ मुहूर्त

दशा माता व्रत, यानी उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में चैत्र कृष्ण दशमी, होली से शुरू होने वाले पक्ष का दसवाँ दिन, राजस्थान और मध्य प्रदेश की सुहागिन महिलाएँ रखती हैं, जो पीपल की पूजा करती हैं, दशा माता की कथा सुनती हैं और परिवार के सौभाग्य के लिए दस गाँठों वाला नया डोरा पहनती हैं। नई दिल्ली में यह गुरुवार, 1 अप्रैल 2027 को है; दशमी तिथि रात 10:16 (31 मार्च) से रात 12:45 (2 अप्रैल) तक रहेगी, और पूजा सुबह सूर्योदय (सुबह 6:11) के बाद होती है।

दशा माता व्रत 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
सूर्योदय (सुबह की पूजा)सुबह 6:11क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

पीपल की पूजा और कथा सुबह स्नान के बाद होती है; बहुत सी महिलाएँ दिन के एकमात्र भोजन से पहले इन्हें पूरा कर लेती हैं।

ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:39 से सुबह 5:25 तकरात के पंद्रह मुहूर्तों में चौदहवाँ, जो सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले ख़त्म होता है।

भोर से पहले का समय, जल्दी स्नान और पूजा की थाली तैयार करने के लिए।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • शुभ सुबह 6:11 से सुबह 7:45 तक
  • चर सुबह 10:51 से दोपहर 12:25 तक
  • लाभ दोपहर 12:25 से दोपहर 1:58 तक
  • अमृत दोपहर 1:58 से दोपहर 3:32 तक
  • शुभ शाम 5:05 से शाम 6:39 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

समय देखकर पूजा करने वाले परिवार सुबह का कोई शुभ चौघड़िया चुनते हैं, जो यहाँ दिन के बाकी चौघड़ियों के साथ दिए हैं।

अभिजीत मुहूर्तदोपहर 12:00 से दोपहर 12:50 तकदिन के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, स्थानीय दोपहर के आसपास।

दोपहर का मुहूर्त, उनके लिए जो सुबह पूजा न कर पाएँ; परंपरा से बुधवार को यह नहीं होता।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तदोपहर 12:00 से दोपहर 12:50शुभ
अमृत कालरात 12:38 से रात 2:25सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 4:39 से सुबह 5:25शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालदोपहर 1:58 से दोपहर 3:32
यमगण्ड कालसुबह 6:11 से सुबह 7:45
दुर्मुहूर्त (पहला)सुबह 10:20 से सुबह 11:10
दुर्मुहूर्त (दूसरा)दोपहर 3:19 से शाम 4:09
वर्ज्यम्दोपहर 1:54 से दोपहर 3:41

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए गुरुवार, 1 अप्रैल 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

दशा माता व्रत पूजा विधि

  1. दस दिन की कहानियाँ

    बहुत से घरों में महिलाएँ होलिका दहन के बाद रंगों वाले दिन से शुरू करके रोज़ दशा माता की एक कहानी कहती हैं, ताकि दसवीं कहानी दशमी को पूरी हो।

  2. स्नान और संकल्प

    दशमी को जल्दी स्नान करें, त्योहार के कपड़े और गहने पहनें, और परिवार की कुशलता के लिए व्रत का संकल्प लें।

  3. थाली सजाएँ

    थाली में रोली, हल्दी, मेहँदी, काजल, अक्षत, फूल, दीपक, जल का लोटा, कच्चे सूत की लच्छी और नैवेद्य रखें, साथ में साल भर के लिए दस गाँठों वाला नया डोरा।

  4. पीपल की पूजा

    परिवार या मोहल्ले की दूसरी महिलाओं के साथ पीपल के पेड़ के पास जाएँ। जड़ में जल चढ़ाएँ, रोली, हल्दी, मेहँदी, काजल, अक्षत और फूल अर्पित करें, दीपक जलाएँ, और परिक्रमा करते हुए तने पर कच्चा सूत लपेटें।

  5. कथा सुनें

    पेड़ के नीचे बैठकर दशा माता की कथा, यानी राजा नल और रानी दमयंती की कहानी, कहें या सुनें; राजस्थानी घरों में कथा गणेश जी और लपसी-तपसी की छोटी कहानियों के साथ पूरी होती है।

  6. नया डोरा

    हल्दी में रँगे, दस गाँठों वाले कच्चे सूत के नए डोरे की पूजा करें और उसे गले में पहनें; पिछले साल का डोरा परिवार की रीति के अनुसार आदर से अलग रखा जाता है।

  7. पीपल की छाल

    बहुत सी महिलाएँ पीपल की छाल का एक छोटा टुकड़ा सोना मानकर घर लाती हैं और उसे परिवार की जमा-पूँजी के साथ रखती हैं।

  8. एक समय भोजन

    ज़्यादातर महिलाएँ पूजा के बाद एक समय भोजन करके व्रत रखती हैं; बहुत से घरों में यह सादा भोजन होता है, और कुछ इसे बिना नमक का रखती हैं।

  9. आशीर्वाद

    बड़ों के पैर छुएँ, प्रसाद बाँटें, और किसी ज़रूरतमंद महिला को कुछ दान दें।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

दशा माता व्रत पूजा सामग्री सूची

  • कच्चा सूत पीपल पर लपेटने और नए डोरे के लिए।
  • दस गाँठों वाला नया डोरा हल्दी में रँगा कच्चा सूत, जो साल भर गले में पहना जाता है।
  • रोली, हल्दी, मेहँदी और काजल पेड़ और देवी को अर्पित करने के लिए, सुहागिन के शृंगार की चीज़ें।
  • अक्षत और फूल पूजा के लिए।
  • जल का लोटा पीपल की जड़ में चढ़ाने के लिए।
  • घी का दीपक और धूप कथा के समय पेड़ के पास जलाने के लिए।
  • नैवेद्य घर की बनी कोई मिठाई, जैसे लपसी या हलवा, और फल।
  • थाली सब कुछ पेड़ तक ले जाने के लिए।

मंत्र · अर्थ के साथ

दशा माता व्रत के मंत्र

पीपल प्रणाम

मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे ।
अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नमः ॥

Mulato Brahma-rupaya madhyato Vishnu-rupine
Agratah Shiva-rupaya vriksha-rajaya te namah

अर्थ: हे वृक्षराज, आपको नमस्कार, जो जड़ में ब्रह्मा, बीच में विष्णु और शिखर पर शिव के रूप हैं। पीपल पूजा का पारंपरिक श्लोक।

कब और कैसे: पीपल की परिक्रमा से पहले हाथ जोड़कर।

पीपल पर भगवद्गीता

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥

Ashvatthah sarva-vrikshanam devarshinam cha Naradah
Gandharvanam Chitrarathah siddhanam Kapilo munih

अर्थ: सब वृक्षों में मैं अश्वत्थ, यानी पीपल, हूँ; देवर्षियों में नारद, गंधर्वों में चित्ररथ, और सिद्धों में कपिल मुनि। भगवद्गीता के दसवें अध्याय में श्रीकृष्ण के वचन; पीपल को भगवान विष्णु का रूप मानकर पूजने का कारण बताते हुए प्रायः यही श्लोक कहा जाता है।

कब और कैसे: पूजा से पहले पीपल के पास पढ़ें या स्मरण करें।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

Om Namo Bhagavate Vasudevaya

अर्थ: ॐ, भगवान वासुदेव को नमस्कार। विष्णु जी का बारह अक्षरों वाला मंत्र, जो भागवत पुराण में नारद जी बालक ध्रुव को देते हैं।

कब और कैसे: पीपल पर सूत लपेटते हुए हर परिक्रमा के साथ।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sarva-mangala-mangalye shive sarvartha-sadhike
Sharanye tryambake Gauri Narayani namo'stu te

अर्थ: हे सब मंगलों में मंगलमयी, कल्याणकारी, सब कार्य सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी, नारायणी, आपको नमस्कार। यह देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के ग्यारहवें अध्याय से है।

कब और कैसे: पूजा के अंत में घर के सौभाग्य के लिए देवी से।

कथा · कहानी और उसका अर्थ

दशा माता व्रत की कथा और महत्व

कथा

दशा का अर्थ है किसी की स्थिति या भाग्य, और दशा माता वे देवी हैं जो परिवार की बुरी दशा को अच्छी दशा में बदलती हैं। उनका व्रत राजस्थान और मध्य प्रदेश की लोक परंपरा है, जिसे सुहागिन महिलाएँ पति, संतान और घर की कुशलता के लिए रखती हैं, और इसकी कथा किसी पुराण से पढ़ी नहीं, माँ से बेटी तक कही-सुनी जाती है।

सबसे प्रसिद्ध कथा एक लोक रूप है, जो महाभारत से राजा नल और रानी दमयंती को लेती है। दमयंती ने दशा माता का व्रत रखा था और उसका डोरा पहना था; राजा ने सोचा कि कच्चे सूत का डोरा रानी के योग्य नहीं, और उसे तोड़कर आग में डाल दिया। उसी दिन से उनकी दशा बिगड़ गई: राज्य और धन चला गया, और वे एक-दूसरे से बिछड़कर कष्ट में भटकते रहे। जब दमयंती ने पूरी श्रद्धा से फिर व्रत रखा और नया डोरा पहना, तो उनका भाग्य लौट आया, राजा को राज्य वापस मिला और परिवार फिर एक हो गया।

कथा के ब्योरे गाँव-गाँव बदलते हैं, और बहुत से घरों में होली से दस दिनों तक दस कहानियाँ कही जाती हैं, जिनमें यह कहानी दशमी को आती है; सीख हर जगह एक ही है, कि श्रद्धा और धीरज परिवार को बुरे समय से पार ले जाते हैं।

महत्व

दशा माता घर के सौभाग्य का दिन है: महिलाएँ देवी से साल भर परिवार की दशा अच्छी रखने की प्रार्थना करती हैं, और गले में दस गाँठों वाला डोरा अगली दशमी तक उसी प्रार्थना की याद दिलाता है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव का निवास माना जाने वाला पीपल लंबे और छाया देने वाले जीवन का प्रतीक है।

यह होली के मौसम का समापन है, रंगों वाले दिन से गिनकर दसवें दिन और शीतला अष्टमी, यानी बसौड़ा, के जल्दी बाद। पश्चिम और दक्षिण भारत के अमांत पंचांगों में इसी दिन को फाल्गुन कृष्ण दशमी कहा जाता है; तिथि वही है, केवल महीने का नाम अलग है।

उपाय · परंपरा

दशा माता व्रत के पारंपरिक उपाय

डोरा पहनें

दस गाँठों वाला नया डोरा साल भर पहनें; परंपरा मानती है कि यह परिवार की दशा अच्छी रखता है।

पीपल को जल

पीपल की जड़ में जल चढ़ाएँ और शाम को उसके नीचे दीपक जलाएँ; मान्यता है कि पीपल की पूजा लंबी आयु देती है और बुरे समय को हल्का करती है।

छाल को जमा-पूँजी के साथ रखें

यदि परिवार पूजा से पीपल की छाल का टुकड़ा घर लाता है, तो परंपरा के अनुसार उसे जमा-पूँजी के साथ रखें, स्थायी समृद्धि के प्रतीक के रूप में; पेड़ को चोट पहुँचाए बिना केवल ढीली छाल का छोटा टुकड़ा लें।

पीपल लगाएँ

पीपल का पेड़ लगाएँ या किसी की देखभाल करें; परंपरा पीपल की सेवा को सबसे पुण्य कामों में गिनती है।

सौभाग्य बाँटें

किसी ज़रूरतमंद महिला या परिवार को अनाज, भोजन या वस्त्र दें; यह व्रत कहता है कि घर का सौभाग्य बाँटा जाए।

बुरे समय में धीरज

दमयंती को याद करें: परंपरा मानती है कि बुरी दशा डर से नहीं, श्रद्धा और धीरज से बदलती है।

परंपरा, संक्षेप में

दशा माता व्रत पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • जल्दी स्नान करें और शांत मन से व्रत रखें।
  • पीपल की पूजा करें, उस पर कच्चा सूत लपेटें और दूसरी महिलाओं के साथ कथा सुनें।
  • पूजा के बाद दस गाँठों वाला नया डोरा पहनें।
  • व्रत रखें तो एक समय सादा भोजन करें।
  • बड़ों के पैर छुएँ और प्रसाद बाँटें।

क्या न करें

  • डोरा न तोड़ें, न लापरवाही से फेंकें; कथा इसी भूल से सावधान करती है।
  • पीपल को न काटें, न नुकसान पहुँचाएँ।
  • घर में झगड़ा या कटु वचन न बोलें।
  • मांस या शराब न लें।
  • पेड़ के पास जलता दीपक अकेला न छोड़ें।

देश भर में

दशा माता व्रत की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

राजस्थान
महिलाएँ सुबह त्योहार के कपड़ों में पीपल के पास इकट्ठा होती हैं, सूत लपेटती हैं, कहानियाँ कहती हैं और नया डोरा पहनती हैं; बहुत से घरों में दस कहानियाँ होली से शुरू होती हैं।
मध्य प्रदेश
मालवा और बाकी प्रदेश में भी पीपल की वही पूजा, कथा और डोरा होता है।
बाहर बसे परिवार
मारवाड़ी और मालवी परिवार जहाँ भी रहते हैं, वहाँ यह व्रत रखते हैं, अक्सर किसी मंदिर के पीपल के पास।
गुजरात का दशामा व्रत
यह अलग व्रत है: आषाढ़ की अमावस्या से शुरू होने वाले दस दिन, जुलाई या अगस्त में, जिनमें ऊँट पर सवार दशामा की प्रतिमा रखी जाती है और अंत में विसर्जन होता है।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • एक समय भोजन पूजा के बाद एक बार; सादा और सात्त्विक।
  • लपसी गुड़ और घी में पका दलिया, राजस्थान का भोग और त्योहार की मिठाई।
  • हलवा सूजी या आटे का, नैवेद्य के लिए।
  • फल कड़ा व्रत रखने वालों के लिए।

आने वाले वर्षों में दशा माता व्रत की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में दशा माता व्रत की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षशुक्रवार, 13 मार्च 2026बीत गई
2027गुरुवार, 1 अप्रैल 2027आने वाली
2028सोमवार, 20 मार्च 2028आने वाली

पंचांगों में दशा माता व्रत की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग दशा माता व्रत की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: दशा माता व्रत का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

दशा माता व्रत से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में दशा माता व्रत कब है?

नई दिल्ली में दशा माता व्रत गुरुवार, 1 अप्रैल 2027 को है: उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में चैत्र कृष्ण दशमी, होली से शुरू होने वाले पक्ष का दसवाँ दिन, और दशमी तिथि रात 10:16 (31 मार्च) से रात 12:45 (2 अप्रैल) तक रहेगी। अमांत पंचांगों में इसी दिन को फाल्गुन कृष्ण दशमी कहा जाता है।

दशा माता व्रत की तिथि क्या है?

चैत्र (पूर्णिमांत) / फाल्गुन (अमांत) मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 31 मार्च, रात 10:17 से 2 अप्रैल, रात 12:46 तक है, और दशा माता व्रत का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

दूसरे कैलेंडर में दशा माता व्रत की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल दशा माता व्रत कब है?

2028 में सोमवार, 20 मार्च।

दशा माता पूजा का मुहूर्त क्या है?

अलग से कोई शास्त्रीय मुहूर्त नहीं है: पूजा दशमी की सुबह, सूर्योदय (सुबह 6:11) के बाद होती है, और समय देखने वाले परिवार सुबह का कोई शुभ चौघड़िया (शुभ: सुबह 6:11 से सुबह 7:45 तक; चर: सुबह 10:51 से दोपहर 12:25 तक; लाभ: दोपहर 12:25 से दोपहर 1:58 तक; अमृत: दोपहर 1:58 से दोपहर 3:32 तक; शुभ: शाम 5:05 से शाम 6:39 तक) लेते हैं। सुबह न हो सके, तो अभिजीत मुहूर्त (दोपहर 12:00 से दोपहर 12:50 तक) आम विकल्प है।

दशा माता की कहानी क्या है?

सबसे प्रसिद्ध कथा राजा नल और रानी दमयंती की लोक कहानी है: राजा ने दमयंती का दशा माता का डोरा तोड़कर आग में डाल दिया, और उनका भाग्य पलट गया; वे राज्य खोकर कष्ट में भटकते रहे, जब तक दमयंती ने फिर व्रत रखकर नया डोरा नहीं पहना और उनके अच्छे दिन नहीं लौटे। पूरी कथा ऊपर दी गई है।

दशा माता कौन हैं?

दशा माता देवी का लोक रूप हैं, जो परिवार की दशा, यानी उसकी स्थिति और भाग्य, की स्वामिनी मानी जाती हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश की सुहागिन महिलाएँ चैत्र कृष्ण दशमी को पीपल के पास उनकी पूजा करती हैं और साल भर घर का भाग्य अच्छा रखने की प्रार्थना करती हैं।

दशा माता की पूजा कैसे करें?

जल्दी स्नान के बाद परिवार या मोहल्ले की महिलाएँ रोली, हल्दी, मेहँदी, काजल, अक्षत, फूल, जल, दीपक और कच्चे सूत वाली थाली लेकर पीपल के पास जाती हैं। वे पेड़ को जल चढ़ाकर पूजती हैं, परिक्रमा करते हुए उस पर सूत लपेटती हैं, कथा सुनती हैं, और गले में दस गाँठों वाला नया डोरा पहनती हैं।

दशा माता की पूजा सामग्री क्या है?

कच्चा सूत, हल्दी में रँगा दस गाँठों वाला नया डोरा, रोली, हल्दी, मेहँदी, काजल, अक्षत, फूल, जल का लोटा, घी का दीपक, धूप, और नैवेद्य के लिए घर की बनी लपसी या हलवा और फल, सब एक थाली में।

दशा माता का डोरा क्या है?

यह हल्दी में रँगा, दस गाँठों वाला कच्चे सूत का धागा है, जिसकी पीपल के पास पूजा होती है और जिसे पूजा के बाद गले में पहना जाता है। महिलाएँ इसे व्रत की निशानी के रूप में साल भर पहनती हैं और अगली दशा माता पर नया डोरा पहनती हैं।

दशा माता की दस कहानियाँ कौन सी हैं?

बहुत से घरों में होली से दशमी तक दस दिनों तक रोज़ एक कहानी कही जाती है। कहानियाँ परिवार-परिवार में अलग होती हैं; राजा नल और रानी दमयंती की कथा मुख्य है, जो दशमी को कही जाती है, और राजस्थानी परंपरा में कथा गणेश जी और लपसी-तपसी की छोटी कहानियों से पूरी होती है। यह गाइड मुख्य कथा देता है, जो हर परंपरा में एक है।

क्या दशा माता और गुजरात का दशामा व्रत एक ही हैं?

नहीं। गुजरात का दशामा व्रत अलग है: आषाढ़ की अमावस्या से शुरू होने वाले दस दिन, जुलाई या अगस्त में, जिनमें ऊँट पर सवार दशामा की प्रतिमा रखी जाती है और अंत में विसर्जन होता है। राजस्थान और मध्य प्रदेश की दशा माता होली के दस दिन बाद पीपल पूजा का एक दिन है, जिसकी तारीख यह पेज बताता है।

दशा माता का व्रत कैसे रखें?

ज़्यादातर महिलाएँ सुबह की पूजा के बाद एक समय सादा, सात्त्विक भोजन करके व्रत रखती हैं, और कुछ उस भोजन में नमक नहीं लेतीं। बीमार, बुज़ुर्ग या गर्भवती महिलाएँ हल्का व्रत रख सकती हैं; उपवास से ज़्यादा पूजा और कथा का महत्व है।

क्या दशा माता की आरती है?

दशा माता की पूजा लोकगीतों और भजनों से होती है, जो क्षेत्र-क्षेत्र में अलग हैं, और कोई एक मानक आरती नहीं है; बहुत से घर पूजा 'ॐ जय जगदीश हरे' जैसी सामान्य आरती से पूरी करते हैं।

दशा माता पर पीपल की पूजा क्यों होती है?

परंपरा पीपल की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शिखर पर शिव का वास मानती है, और भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वृक्षों में वे अश्वत्थ, यानी पीपल, हैं। बहुतों को छाया देने वाला यह लंबी आयु का पेड़ उसी स्थायी सौभाग्य का प्रतीक है जो यह व्रत माँगता है।