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शुक्ल पक्ष · पंचमी तिथि · माघ

बसंत पंचमी 2027 कब है?

बसंत पंचमी 2027

108 दिन बाद

गुरु, 11 फरवरी

2027 में बसंत पंचमी गुरुवार, 11 फरवरी को है। नई दिल्ली में पंचमी तिथि 11 फरवरी, रात 3:05 से 12 फरवरी, रात 3:19 तक रहेगी।

2028: सोमवार, 31 जनवरी 2028

बसंत पंचमी कोई तय अंग्रेज़ी तारीख नहीं है। यह अमांत गणना में माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है। बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे होते हैं, इसलिए इसकी अंग्रेज़ी तारीख हर साल लगभग एक महीने के दायरे में खिसकती है।

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नई दिल्ली के लिए गणना

बसंत पंचमी 2027: तारीख और तिथि का समय

गुरुवार, 11 फरवरी 2027

तिथि
पंचमी, शुक्ल पक्ष
हिंदू मास
माघ
तिथि आरंभ
11 फरवरी, रात 3:05
तिथि समाप्त
12 फरवरी, रात 3:19
दिन का निर्णय
सूर्योदय
नई दिल्ली में सूर्योदय
11 फरवरी, सुबह 7:02

ऊपर के दोनों क्षण — तिथि का आरंभ और समाप्ति — खगोल हैं और उन पर कोई विवाद नहीं। दिन उनकी व्याख्या है: बसंत पंचमी का निर्णय सूर्योदय के समय चल रही तिथि से होता है, इसलिए यह उस दिन का पर्व है जिसके सूर्योदय पर तिथि हो — सिर्फ़ उस दिन का नहीं जिस दिन तिथि शुरू हुई।

बसंत पंचमी 2027 के सभी मुहूर्त · नई दिल्ली

बसंत पंचमी 2027 शुभ मुहूर्त

बसंत पंचमी, जिसे वसंत पंचमी भी कहते हैं, माघ शुक्ल पंचमी का दिन है: वसंत ऋतु का स्वागत और विद्या, वाणी, संगीत और कला की देवी माँ सरस्वती की पूजा का पर्व। घर और स्कूल पीले रंग में सरस्वती पूजा करते हैं, किताबें और वाद्य माँ के चरणों में रखे जाते हैं, और छोटे बच्चे पहला अक्षर लिखते हैं। नई दिल्ली में बसंत पंचमी गुरुवार, 11 फरवरी 2027 को है, और सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7:02 से दोपहर 12:35 तक है, यानी पंचमी रहते पूर्वाह्न। बंगाल, बिहार, ओडिशा और असम में यह दिन सरस्वती पूजा कहलाता है; पंजाब में बसंत की पतंगें उड़ती हैं।

बसंत पंचमी 2027 के सभी मुहूर्त — नई दिल्ली
मुहूर्तनई दिल्ली में समयकिसके लिए
सरस्वती पूजा मुहूर्तसुबह 7:02 से दोपहर 12:35 तकपूर्वाह्न: सूर्योदय से दोपहर (दिन के मध्य) तक, जब तक पंचमी रहे।

पूर्वाह्न, यानी सूर्योदय से दोपहर तक, जब तक पंचमी रहे: माँ सरस्वती की पूजा का शास्त्रीय समय, और दिन का वही भाग जिससे तारीख तय होती है: पर्व उस दिन मनाया जाता है जिसके पूर्वाह्न में पंचमी रहती है, भले ही पंचमी अगले दिन के सूर्योदय तक भी रहे। घर, स्कूल और पंडाल सुबह पूजा करते हैं; जिस साल पंचमी सूर्योदय के बाद शुरू हो, मुहूर्त उसी के साथ खुलता है, और जिस साल पंचमी दोपहर से पहले खत्म हो, मुहूर्त भी उसी के साथ खत्म होता है, इसलिए जल्दी शुरू करें।

सूर्योदयसुबह 7:02क्षितिज पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखने का समय।

पूर्वाह्न, और उसके साथ पूजा का मुहूर्त, सूर्योदय से शुरू होता है, या जिस साल पंचमी बाद में शुरू हो, उस साल पंचमी के आरंभ से। परिवार उससे पहले स्नान करके, पीले कपड़े पहनकर चौकी सजा लेते हैं, ताकि मुहूर्त खुलते ही पूजा शुरू हो।

अभिजीत मुहूर्तदोपहर 12:13 से दोपहर 12:57 तकदिन के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, स्थानीय दोपहर के आसपास।

दोपहर का मुहूर्त, उनके लिए जो सुबह पूजा न कर पाएँ, और उन परिवारों के लिए जो इस दिन कोई संस्कार रखते हैं, जैसे बच्चे का विद्यारंभ, गृह प्रवेश या सगाई। परंपरा से बुधवार को अभिजीत मुहूर्त नहीं होता।

शुभ चौघड़िया (दिन)
  • शुभ सुबह 7:02 से सुबह 8:25 तक
  • चर सुबह 11:12 से दोपहर 12:35 तक
  • लाभ दोपहर 12:35 से दोपहर 1:58 तक
  • अमृत दोपहर 1:58 से दोपहर 3:21 तक
  • शुभ शाम 4:45 से शाम 6:08 तक
दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया।

दिन के अमृत, शुभ, लाभ और चर चौघड़िया, उनके लिए जो खरीदारी, यात्रा या किसी नए कोर्स या वाद्य की शुरुआत चौघड़िया देखकर करते हैं।

उस दिन के शुभ समय

उस दिन के शुभ समय
मुहूर्तनई दिल्ली में समयप्रकृति
अभिजित मुहूर्तदोपहर 12:13 से दोपहर 12:57शुभ
अमृत कालरात 3:13 से सुबह 4:52सर्वाधिक शुभ
ब्रह्म मुहूर्तसुबह 5:19 से सुबह 6:11शुभ

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं

मुहूर्त शास्त्र इन अवधियों को नई शुरुआत के लिए छोड़ता है। यह परंपरा का वर्णन है, चेतावनी नहीं: पर्व अपने दिन मनाया ही जाता है, और इसके लिए कुछ ख़रीदने, सुधारने या उपाय करने की ज़रूरत नहीं।

जिन समयों में नए काम टाले जाते हैं
अवधिनई दिल्ली में समय
राहु कालदोपहर 1:58 से दोपहर 3:21
यमगण्ड कालसुबह 7:02 से सुबह 8:25
दुर्मुहूर्त (पहला)सुबह 10:44 से सुबह 11:28
दुर्मुहूर्त (दूसरा)दोपहर 3:10 से दोपहर 3:55
वर्ज्यम्शाम 5:19 से शाम 6:58

ऊपर का हर समय नई दिल्ली के लिए गुरुवार, 11 फरवरी 2027 के आसपास, इसी शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और सूर्य-चंद्रमा की स्थिति से निकाला गया है। हिंदू दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, इसलिए आधी रात के बाद का समय भी पिछली शाम का ही गिना जाता है; किसी दूसरी तारीख का समय उस तारीख के साथ लिखा है।

पूजा विधि · घर पर, क्रम से

बसंत पंचमी पूजा विधि

  1. स्नान और पीले वस्त्र

    सुबह जल्दी स्नान करें और पीले या सफेद कपड़े पहनें, जो माँ सरस्वती के और खिली सरसों के खेतों के रंग हैं। पूजा का स्थान साफ करें; पढ़ाई की मेज़ या संगीत का कमरा भी उतना ही उपयुक्त है।

  2. चौकी सजाएँ

    पूर्व या उत्तर की ओर मुख वाली चौकी रखें, उस पर पीला या सफेद कपड़ा बिछाएँ और माँ सरस्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित करें, पास में गणेश जी। जो परिवार कलश रखते हैं, वे एक ओर थोड़े चावल पर जल और आम के पत्तों वाला कलश रखें।

  3. किताबें, कलम और वाद्य माँ के चरणों में

    किताबें, कॉपियाँ, कलम, दवात और वाद्य यंत्र माँ के चरणों में रखें। विद्यार्थी अपनी पाठ्य-पुस्तकें रखें, चित्रकार अपनी कूचियाँ, संगीतकार अपनी वीणा, सितार, हारमोनियम या तबला।

  4. पवित्रीकरण और संकल्प

    तीन बार आचमन करें, अपने ऊपर और सामग्री पर गंगाजल छिड़कें, और दाहिने हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें: अपना नाम, गोत्र और स्थान, और यह कि आप ज्ञान और निर्मल बुद्धि के लिए माघ शुक्ल पंचमी पर माँ सरस्वती की पूजा कर रहे हैं।

  5. पहले गणेश पूजा

    'ॐ गं गणपतये नमः' बोलकर गणेश जी को जल, रोली, अक्षत, दूर्वा और मिठाई अर्पित करें, ताकि पूजा निर्विघ्न हो।

  6. माँ सरस्वती का आवाहन और पूजन

    हाथ जोड़कर 'ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः' बोलते हुए माँ सरस्वती का आवाहन करें। चरण और हाथ धोने के लिए जल, सफेद या पीला चंदन, अक्षत, पीली चुनरी, और पीले-सफेद फूल अर्पित करें: गेंदा, सरसों के फूल, चमेली, और बंगाल में पलाश और आम की मंजरी।

  7. भोग लगाएँ

    बूंदी के लड्डू या केसरिया चावल जैसी पीली मिठाई, बेर और मौसमी फल, और सुपारी वाला पान अर्पित करें। बंगाल में साल का पहला बेर यहीं चढ़ता है, और बहुत से परिवार माँ को चढ़ाने से पहले बेर नहीं खाते।

  8. वंदना और मंत्र जप

    'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला', 'सरस्वति नमस्तुभ्यं' और माँ के बीज मंत्र की एक माला (108 बार) करें। बंगाल में परिवार पुरोहित के पीछे दोहराते हुए 'जय जय देवी' से शुरू होने वाली पुष्पांजलि तीन बार देता है।

  9. बच्चे का पहला अक्षर

    घर में छोटा बच्चा हो, तो विद्यारंभ का यही दिन है: बंगाल में 'हाते खोड़ि', जिसमें बड़े बच्चे का हाथ पकड़कर स्लेट पर खड़िया से पहले अक्षर लिखवाते हैं; दूसरी जगहों पर किसी बड़े या शिक्षक की मदद से चावल पर या कागज़ पर ॐ या वर्णमाला लिखवाई जाती है।

  10. आरती

    घी के दीपक या कपूर से 'जय सरस्वती माता' आरती गाएँ, घंटी बजाएँ, हाथ जोड़कर पुष्पांजलि दें और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें।

  11. प्रसाद, और सुबह तक किताबें माँ के पास

    प्रसाद बाँटें। बंगाली और ओड़िया परंपरा में किताबें अगली सुबह तक माँ के चरणों में रहती हैं और उस दिन पढ़ाई के लिए नहीं खोली जातीं; अगले दिन छोटी-सी पूजा के बाद, बंगाल में दही और चिवड़े (दधिकर्म) के साथ, किताबें उठाई जाती हैं और मूर्ति विसर्जित होती है।

सामग्री · पहले से तैयार रखें

बसंत पंचमी पूजा सामग्री सूची

  • माँ सरस्वती की मूर्ति या चित्र सफेद कमल या हंस पर वीणा लिए; फ्रेम वाला चित्र भी ठीक है।
  • चौकी और पीला या सफेद कपड़ा पूजा की वेदी; माँ सरस्वती और वसंत के रंग।
  • आम के पत्तों वाला कलश वैकल्पिक, जिन परिवारों में परंपरा है; जल, पाँच आम के पत्ते, और चाहें तो नारियल।
  • पीले और सफेद फूल गेंदा, सरसों के फूल और चमेली; बंगाल और ओडिशा में पलाश और आम की मंजरी।
  • सफेद या पीला चंदन माँ का तिलक; सरल विकल्प हल्दी का लेप।
  • रोली, हल्दी और अक्षत तिलक, गणेश जी और किताबों के लिए; चावल में थोड़ी हल्दी मिलाने से वे पीले हो जाते हैं।
  • पीली चुनरी या वस्त्र माँ को अर्पित करने के लिए।
  • घी का दीपक, रुई की बत्ती और धूप पूजा और आरती के लिए।
  • कपूर, आरती की थाली और घंटी आरती के लिए; कपूर की जगह पाँच बत्तियों वाला घी का दीपक भी ठीक है।
  • किताबें, कलम, दवात और वाद्य माँ के चरणों में रखे जाते हैं: यही इस पूजा का मर्म है।
  • स्लेट और खड़िया बच्चे के पहले अक्षर (हाते खोड़ि) के लिए।
  • पीली मिठाई बूंदी या बेसन के लड्डू, केसरिया चावल, या घर की बनी कोई भी मिठाई।
  • बेर और मौसमी फल बंगाल में बेर इस दिन का फल है; बाकी जगह केला, सेब या संतरा।
  • केसर और चीनी इस दिन बनने वाले पीले मीठे चावल के लिए।
  • पान और सुपारी भोग के अंत में अर्पित।
  • गंगाजल पवित्रीकरण के लिए; न हो तो साफ जल।
  • पंचामृत केवल धातु की मूर्ति के स्नान के लिए: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर।
  • दही और चिवड़ा बंगाल में अगली सुबह विसर्जन से पहले दधिकर्म के लिए।
  • दूर्वा और गणेश जी के लिए मिठाई पहली पूजा गणेश जी की।

मंत्र · अर्थ के साथ

बसंत पंचमी के मंत्र और आरती

सरस्वती बीज मंत्र

ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः

Om Aim Saraswatyai Namah

अर्थ: ॐ, ऐं: माँ सरस्वती को नमस्कार। 'ऐं' माँ सरस्वती का बीज अक्षर है, वाणी और विद्या का नाद।

कब और कैसे: पूजा मुहूर्त में माला पर 108 बार; विद्यार्थी साल भर पढ़ाई से पहले इसे एक बार बोलते हैं।

या कुन्देन्दु (सरस्वती वंदना)

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता ।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥

Ya kundendu-tushara-hara-dhavala ya shubhra-vastravrita
Ya vina-vara-danda-mandita-kara ya shveta-padmasana
Ya brahmachyuta-shankara-prabhritibhir devaih sada pujita
Sa mam patu Sarasvati bhagavati nihshesha-jadyapaha

अर्थ: जो कुंद के फूल, चंद्रमा और बर्फ के हार जैसी धवल हैं, जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ वीणा और वरमुद्रा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमल पर विराजती हैं, और जिनकी ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सब देवता सदा पूजा करते हैं, वे भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें और बुद्धि की सारी जड़ता दूर करें।

कब और कैसे: एक सरस्वती स्तोत्र का पहला श्लोक, जो स्कूलों और घरों में माँ की वंदना के रूप में गाया जाता है। पूजा के आरंभ में और फिर पुष्पांजलि के समय एक बार बोलें।

सरस्वति नमस्तुभ्यं

सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि ।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥

Sarasvati namastubhyam varade kamarupini
Vidyarambham karishyami siddhir bhavatu me sada

अर्थ: हे वर देने वाली, इच्छा अनुसार रूप धारण करने वाली सरस्वती, आपको नमस्कार; मैं विद्या आरंभ कर रहा हूँ, मुझे सदा उसमें सिद्धि मिले।

कब और कैसे: बच्चे के विद्यारंभ पर, नई किताब या नया कोर्स शुरू करने से पहले, और विद्यार्थी पढ़ाई से पहले; एक या तीन बार।

आरती सरस्वती जी की आरती: जय सरस्वती माता पूरी आरती

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
जय सरस्वती माता॥

चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥
जय सरस्वती माता॥

बाएं कर में वीणा, दाएं कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥
जय सरस्वती माता॥

देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया।
पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥
जय सरस्वती माता॥

विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो॥
जय सरस्वती माता॥

धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥
जय सरस्वती माता॥

माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी ज्ञान भक्ति पावे॥
जय सरस्वती माता॥

जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता।
सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
जय सरस्वती माता॥

Jai Saraswati Mata, maiya jai Saraswati Mata.
Sadgun vaibhav shalini, tribhuvan vikhyata.
Jai Saraswati Mata.

Chandravadani padmasini, dyuti mangalkari.
Sohe shubh hans savari, atul tejdhari.
Jai Saraswati Mata.

Bayen kar mein veena, dayen kar mala.
Sheesh mukut mani sohe, gal motiyan mala.
Jai Saraswati Mata.

Devi sharan jo aaye, unka uddhar kiya.
Paithi Manthara dasi, Ravan sanhar kiya.
Jai Saraswati Mata.

Vidya gyan pradayini, gyan prakash bharo.
Moh agyan aur timir ka, jag se naash karo.
Jai Saraswati Mata.

Dhoop deep phal meva, Maa sweekar karo.
Gyanchakshu de Mata, jag nistar karo.
Jai Saraswati Mata.

Maa Saraswati ki aarti, jo koi jan gave.
Hitkari sukhkari gyan bhakti pave.
Jai Saraswati Mata.

Jai Saraswati Mata, jai jai Saraswati Mata.
Sadgun vaibhav shalini, tribhuvan vikhyata.
Jai Saraswati Mata.

यह आरती उसी रूप में है जैसे आम तौर पर गाई जाती है। गीता प्रेस के 'आरती-संग्रह' में कई पंक्तियाँ अलग हैं: 'देवी शरण जो आए' की जगह 'देव शरण में आये', 'रावण संहार किया' की जगह 'असुर-संहार किया', पाँचवें पद की जगह 'वेद-ज्ञान-प्रदायिनि, बुद्धि-प्रकाश करो। मोहाज्ञान तिमिर का सत्वर नाश करो', 'माँ स्वीकार करो' की जगह 'पूजा स्वीकार करो' और 'जग निस्तार करो' की जगह 'सब गुण-ज्ञान भरो'। छपा पाठ

कथा · कहानी और उसका अर्थ

बसंत पंचमी की कथा और महत्व

कथा

सृष्टि की एक प्रचलित कथा कहती है कि जब ब्रह्मा जी ने संसार रचा, तो उन्हें वह मौन लगा: रूप था, पर न ध्वनि, न शब्द, न गीत। उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, और एक तेजस्वी देवी प्रकट हुईं, हाथों में वीणा, पुस्तक और माला लिए। उनके वीणा बजाते ही नदियाँ कलकल करने लगीं, पक्षी गाने लगे और सब प्राणियों को वाणी मिली; ब्रह्मा जी ने उन्हें सरस्वती, वाणी और ज्ञान की देवी, नाम दिया, और परंपरा माघ शुक्ल पंचमी को उनके प्राकट्य का दिन मानती है।

माँ सरस्वती वीणा वाली छवि से भी पुरानी हैं। ऋग्वेद में वे एक महान नदी हैं, जिन्हें माताओं में श्रेष्ठ, नदियों में श्रेष्ठ और देवियों में श्रेष्ठ कहा गया है, और उनका प्रवाह प्रेरित वाणी का प्रवाह बन जाता है; बाद की परंपरा उन्हें वाक्, यानी स्वयं वाणी, और ब्रह्मा जी की शक्ति मानती है। वे श्वेत वस्त्रों में, श्वेत कमल या हंस पर दिखाई जाती हैं; हंस, जो कहा जाता है दूध को पानी से अलग कर देता है, जैसे विवेक सच को झूठ से।

यही दिन वसंत का स्वागत भी है, जो कामदेव का सखा है: सरसों पीली खिल उठती है, आम में बौर आता है, और ब्रज में होली के चालीस दिन बसंत पंचमी से शुरू होते हैं, जब वृंदावन के मंदिरों में पहला गुलाल खेला जाता है और होलिका दहन के लिए डांडा गाड़ा जाता है।

महत्व

बसंत पंचमी विद्या का दिन है: विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, संगीतकार और कलाकार अपने काम के साधनों की पूजा करते हैं, बच्चे पढ़ाई शुरू करते हैं, और स्कूलों में सरस्वती पूजा होती है। पीला रंग, जो इस मौसम के सरसों के खेतों का और माँ सरस्वती के प्रसाद का रंग है, पहना भी जाता है और पकवानों में भी आता है। इस दिन को श्री पंचमी भी कहते हैं, और कुछ परिवार सरस्वती जी के साथ लक्ष्मी जी की भी पूजा करते हैं।

परंपरा बसंत पंचमी को साल के अबूझ मुहूर्तों में गिनती है, यानी वे दिन जो स्वयं शुभ हैं, जब विवाह, गृह प्रवेश और नए काम बिना मुहूर्त खोजे किए जाते हैं; फिर भी बहुत से परिवार विवाह के लिए मुहूर्त निकलवाते हैं। प्रयागराज के कुंभ और माघ मेले के सालों में यह प्रमुख स्नान पर्वों में से एक है।

उपाय · परंपरा

बसंत पंचमी के पारंपरिक उपाय

माँ के नाम से पढ़ाई की शुरुआत

नई कॉपी के पहले पन्ने पर ॐ, या 'ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः' लिखें और उसे खोलने से पहले 'सरस्वति नमस्तुभ्यं' बोलें। यह साल की पढ़ाई माँ के आशीर्वाद से शुरू करने का पारंपरिक तरीका है।

पीले फूल और पीली मिठाई

माँ सरस्वती को गेंदे या सरसों के फूल और पीली मिठाई अर्पित करें। परंपरा पीले रंग को माँ और वसंत से जोड़ती है, और यह भेंट सीखी हुई बातों के लिए कृतज्ञता से दी जाती है।

किताबें और कॉपी-कलम दान करें

किसी ज़रूरतमंद बच्चे या स्कूल को किताबें, कॉपियाँ या कलम दें। इस दिन के सब दानों में परंपरा विद्या दान को सबसे श्रेष्ठ मानती है।

गुरुजनों का सम्मान

इस दिन अपने शिक्षकों और बड़ों के पैर छुएँ, या उन्हें फोन करें। माँ सरस्वती की पूजा उन्हीं के माध्यम से होती है जो ज्ञान आगे बढ़ाते हैं।

माँ के लिए गाएँ या बजाएँ

संगीतकार और नर्तक माँ सरस्वती के सामने छोटी-सी प्रस्तुति देते हैं, अक्सर वसंत का कोई राग, जैसे बसंत या बहार। परिवार इसे स्वयं कला की भेंट मानते हैं।

मधुर वाणी

माँ सरस्वती वाणी की देवी हैं; परंपरा कहती है कि यह दिन कठोर या झूठे शब्दों से दूर रहे।

परंपरा, संक्षेप में

बसंत पंचमी पर क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • पीले या सफेद कपड़े पहनें और पूजा में पीले फूल रखें।
  • पंचमी रहते पूर्वाह्न के मुहूर्त में माँ सरस्वती की पूजा करें।
  • किताबें, कलम और वाद्य माँ के चरणों में रखें।
  • इस दिन बच्चे का विद्यारंभ, या कोई नया कोर्स या वाद्य, शुरू करें।
  • ज़रूरतमंद बच्चों को किताबें या कॉपी-कलम दें।
  • अपने शिक्षकों और बड़ों के पैर छुएँ।
  • जहाँ परंपरा हो, पतंग केवल सूती धागे से उड़ाएँ।

क्या न करें

  • किताबों पर पैर न रखें, न उन्हें इधर-उधर फेंकें; आज उनकी पूजा होती है।
  • वाणी की देवी के दिन कटु वचन या झूठ न बोलें।
  • पतंग के लिए काँच वाला या नायलॉन मांझा न लें।
  • हो सके तो पूजा में काले कपड़े न पहनें; पीला और सफेद इस दिन के रंग हैं।
  • अगर परिवार सात्विक रहता है, तो पूजा के दिन मांस और मदिरा से दूर रहें।

देश भर में

बसंत पंचमी की क्षेत्रीय परंपराएँ और भोग

क्षेत्र के अनुसार

पश्चिम बंगाल
हर घर, स्कूल और कॉलेज में सरस्वती पूजा, बसंती (पीली) साड़ियों में लड़कियाँ, पुष्पांजलि, छोटे बच्चों का हाते खोड़ि, और खिचुड़ी भोग; बेर चढ़ाने से पहले नहीं खाया जाता, और अगले दिन दधिकर्म के बाद मूर्ति विसर्जित होती है।
बिहार और झारखंड
हर गली में विद्यार्थियों के लगाए सरस्वती पूजा के पंडाल, संगीत, प्रसाद, और विसर्जन की शोभायात्रा।
ओडिशा और असम
स्कूलों और कॉलेजों में सरस्वती पूजा, किताबें पूजकर माँ के पास छोड़ी जाती हैं, और मंदिरों में बच्चे पहले अक्षर लिखते हैं।
पंजाब
बसंत पतंगों का त्योहार है: पीले कपड़े और पगड़ियाँ, पीले चावल, और सरसों के खेतों के ऊपर पतंगों से भरा आसमान।
ब्रज (मथुरा और वृंदावन)
होली के चालीस दिन शुरू होते हैं: बांके बिहारी मंदिर में गुलाल खेला जाता है और फाल्गुन पूर्णिमा के अलाव के लिए होलिका का डांडा गाड़ा जाता है।
उत्तराखंड
श्री पंचमी: परिवार पीले कपड़े पहनते हैं, द्वार पर और सिर पर जौ की बालियाँ रखते हैं, और बहुत से गाँवों में बच्चों की पढ़ाई शुरू होती है।
तेलंगाना
बासर के ज्ञान सरस्वती मंदिर में परिवार छोटे बच्चों को अक्षराभ्यास, यानी पहली बार अक्षर लिखने, के लिए लाते हैं।
दिल्ली (सूफ़ी बसंत)
हज़रत निज़ामुद्दीन की दरगाह पर पीले कपड़ों में श्रद्धालु सरसों के फूल चढ़ाते हैं, यह परंपरा अमीर ख़ुसरो से जुड़ी मानी जाती है।
नेपाल
श्री पंचमी: मंदिरों और स्कूलों में सरस्वती पूजा होती है, और बच्चों को पहले अक्षर सिखाए जाते हैं।

भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन

  • केसरिया चावल (मीठे चावल) केसर या हल्दी, चीनी, घी और मेवे के साथ पके चावल: इस दिन की पीली मिठाई।
  • बूंदी और बेसन के लड्डू माँ सरस्वती को अर्पित और प्रसाद में बँटने वाली पीली मिठाई।
  • खिचुड़ी भोग (बंगाल) चावल और मूँग दाल की खिचुड़ी, लाबड़ा, बेगुनी, टमाटर की चटनी और पायेश के साथ।
  • कुल (बेर) की चटनी (बंगाल) बेर की चटनी, जो माँ को बेर चढ़ाने के बाद बनती है।
  • केसर हलवा या शीरा केसर वाला सूजी का हलवा, आसान पीला भोग।
  • सरसों का साग और पीले चावल (पंजाब) बसंत पर सरसों का साग और मीठे पीले चावल।
  • मौसमी फल बेर, केला, संतरा, और भोजन में इस मौसम की पहली हरी मटर और गाजर।

आने वाले वर्षों में बसंत पंचमी की तारीख

इस साल और उसके बाद के दो साल। हर पंक्ति नई दिल्ली के लिए उसी गणना से निकली है, किसी सूची से नहीं ली गई।

आने वाले वर्षों में बसंत पंचमी की तारीख
वर्षतारीखस्थिति
2026इस वर्षशुक्रवार, 23 जनवरी 2026बीत गई
2027गुरुवार, 11 फरवरी 2027आने वाली
2028सोमवार, 31 जनवरी 2028आने वाली

पंचांगों में बसंत पंचमी की तारीख अलग क्यों होती है

दो पंचांग बसंत पंचमी की तारीख में एक दिन का अंतर दिखाएँ, तो ज़रूरी नहीं कि उनमें से एक ग़लत हो। लगभग सारा अंतर चार कारणों से आता है।

  1. तिथि सूर्योदय पर शुरू नहीं होती। तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट की होती है, इसलिए वह कभी दो दिनों के निर्णायक क्षण को छूती है और कभी किसी को नहीं। ऐसे में अलग नियम अलग दिन चुनते हैं।
  2. महीने की गणना। उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है। कृष्ण पक्ष का वही पखवाड़ा दोनों में अलग महीने के नाम से जाना जाता है, इसलिए "अमुक मास की कृष्ण तिथि" वाला पर्व एक महीने के अंतर पर भी पढ़ा जा सकता है।
  3. दिन कौन-सा क्षण तय करता है। अधिकतर व्रत उस दिन के होते हैं जिसके सूर्योदय पर तिथि हो, पर सब नहीं: बसंत पंचमी का निर्णय सूर्योदय से होता है। जो पंचांग हर पर्व पर सूर्योदय का नियम लगाते हैं, वे कई पर्वों को एक दिन खिसका देते हैं।
  4. शहर। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं — भारत के भीतर एक घंटे से भी ज़्यादा। दिल्ली के लिए निकाली गई तारीख किसी दूसरे शहर में एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

इसीलिए यह पेज अपनी गणना दिखाता है। अगर आपके पंडित या घर के पंचांग में दूसरा दिन लिखा है, तो ऊपर दिए तिथि के क्षण आम तौर पर बता देंगे कि क्यों — और बिना कारण बताए दी गई तारीख से यह ज़्यादा काम का है।

आगे आने वाले त्योहार

बसंत पंचमी से जुड़े सामान्य प्रश्न

2027 में बसंत पंचमी कब है?

नई दिल्ली में बसंत पंचमी गुरुवार, 11 फरवरी 2027 को है। यह माघ शुक्ल पंचमी है, यानी माघ के शुक्ल पक्ष का पाँचवाँ दिन, और पंचमी तिथि रात 3:05 से रात 3:18 (12 फरवरी) तक रहेगी। चंद्रमा पर आधारित होने से यह हर साल जनवरी या फरवरी के अलग दिन पड़ती है।

बसंत पंचमी की तिथि क्या है?

माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि। नई दिल्ली में यह तिथि 11 फरवरी, रात 3:05 से 12 फरवरी, रात 3:19 तक है, और बसंत पंचमी का दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है।

दूसरे कैलेंडर में बसंत पंचमी की तारीख अलग क्यों है?

मुख्य रूप से चार कारणों से। तिथि निर्णायक क्षण पर दो दिन चल सकती है या किसी दिन नहीं; उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत अमांत महीने मानता है, जिससे कृष्ण पक्ष का नाम बदल जाता है; पंचांग इस पर भी अलग हैं कि दिन का कौन-सा क्षण पर्व तय करता है; और सूर्योदय व चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। ऊपर दिए तिथि के क्षण खगोल हैं; दिन उनकी व्याख्या है।

अगले साल बसंत पंचमी कब है?

2028 में सोमवार, 31 जनवरी।

बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?

मुहूर्त पूर्वाह्न है, यानी पंचमी रहते सूर्योदय से दोपहर तक: नई दिल्ली में यह सुबह 7:02 से दोपहर 12:35 तक है। घर, स्कूल और पंडाल सुबह पूजा करते हैं। बाद में ही पूजा कर पाएँ, तो पंचमी रहते दोपहर का अभिजीत मुहूर्त (दोपहर 12:13 से दोपहर 12:57 तक) आम विकल्प है।

घर पर सरस्वती पूजा कैसे करें?

स्नान करके पीले कपड़े पहनें और पीले या सफेद कपड़े पर माँ सरस्वती को गणेश जी के साथ स्थापित करें। किताबें, कलम और वाद्य माँ के चरणों में रखें, संकल्प लें, पहले गणेश जी की पूजा करें, फिर माँ को चंदन, अक्षत, पीले-सफेद फूल और पीली मिठाई अर्पित करें। वंदना और बीज मंत्र बोलें, आरती गाएँ और प्रसाद बाँटें। ऊपर दी गई पूजा विधि इसी क्रम में है।

सरस्वती पूजा की सामग्री लिस्ट क्या है?

माँ सरस्वती की मूर्ति या चित्र, पीले या सफेद कपड़े वाली चौकी, पीले और सफेद फूल, सफेद चंदन, रोली, हल्दी और अक्षत, पीली चुनरी, घी का दीपक, धूप, कपूर, पीली मिठाई, बेर और मौसमी फल, पान-सुपारी, गंगाजल, और पूजी जाने वाली किताबें, कलम और वाद्य। बच्चे का विद्यारंभ हो, तो स्लेट और खड़िया।

सरस्वती पूजा में कौन सा मंत्र बोलें?

माँ का बीज मंत्र 'ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः' 108 बार; वंदना 'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला', जो स्कूलों में रोज़ गाई जाती है; और कोई भी नई पढ़ाई शुरू करने से पहले 'सरस्वति नमस्तुभ्यं'। बंगाल में परिवार पुरोहित के पीछे 'जय जय देवी' से शुरू होने वाली पुष्पांजलि तीन बार देता है। तीनों संस्कृत पाठ अर्थ सहित मंत्र वाले भाग में हैं।

क्या बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा एक ही हैं?

हाँ, दोनों एक ही दिन हैं। उत्तर भारत इसे बसंत या वसंत पंचमी, यानी वसंत के स्वागत, के रूप में जानता है, जिसके केंद्र में माँ सरस्वती की पूजा है; बंगाल, बिहार, ओडिशा और असम इसे सरस्वती पूजा कहते हैं और घरों, स्कूलों और पंडालों में मनाते हैं। कुछ परंपराएँ इसे श्री पंचमी भी कहती हैं।

बसंत पंचमी क्यों मनाई जाती है?

यह विद्या और वाणी की देवी माँ सरस्वती का उत्सव है, जिनका प्राकट्य परंपरा इसी दिन मानती है, और वसंत का स्वागत, जब सरसों पीली खिलती है। विद्यार्थी, कलाकार और संगीतकार अपने काम के साधनों की पूजा करते हैं, बच्चे पढ़ना शुरू करते हैं, और ब्रज में होली के चालीस दिन शुरू होते हैं।

बसंत पंचमी पर पीले कपड़े क्यों पहनते हैं?

पीला इस मौसम का रंग है, जब सरसों के खेत खिले होते हैं, और परंपरा सफेद के साथ पीले को ही माँ सरस्वती की पूजा का रंग मानती है। इसलिए पीले कपड़े पहने जाते हैं, पीले फूल चढ़ते हैं और पीली मिठाई और केसरिया चावल बनते हैं। यह परंपरा है, नियम नहीं; पीला न हो तो सफेद या कोई हल्का रंग पहनें।

क्या बसंत पंचमी पर विवाह या गृह प्रवेश कर सकते हैं?

परंपरा बसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त मानती है, और बहुत से विवाह, सगाई और गृह प्रवेश इस दिन अलग मुहूर्त निकाले बिना होते हैं। जो परिवार फिर भी मुहूर्त चाहते हैं, वे दिन के शुभ समय, जैसे अभिजीत मुहूर्त (दोपहर 12:13 से दोपहर 12:57 तक) या किसी शुभ चौघड़िया (शुभ: सुबह 7:02 से सुबह 8:25 तक; चर: सुबह 11:12 से दोपहर 12:35 तक; लाभ: दोपहर 12:35 से दोपहर 1:58 तक; अमृत: दोपहर 1:58 से दोपहर 3:21 तक; शुभ: शाम 4:45 से शाम 6:08 तक), में तय करते हैं।

क्या बसंत पंचमी पर पढ़ाई करनी चाहिए?

बंगाली और ओड़िया परंपरा में माँ के चरणों में रखी किताबें अगली सुबह तक वहीं रहती हैं और उस दिन पढ़ाई के लिए नहीं खोली जातीं; अगले दिन की पूजा के बाद पढ़ाई फिर शुरू होती है। दूसरी जगहों पर बहुत से परिवार इसका उल्टा करते हैं और पूजा के बाद बच्चों से थोड़ा पढ़वाते-लिखवाते हैं, ताकि शुरुआत माँ के आशीर्वाद से हो। अपने परिवार की परंपरा मानें।

सरस्वती पूजा में क्या भोग लगाएँ, मीठे चावल कैसे बनाएँ?

माँ सरस्वती को पीली और सफेद मिठाई चढ़ती है: बूंदी या बेसन के लड्डू, केसरिया चावल, बेर और मौसमी फल, और बंगाल में खिचुड़ी। मीठे चावल के लिए चावल को केसर की कुछ पत्तियों या चुटकी भर हल्दी के साथ उबालें, फिर घी, चीनी, इलायची और मेवे के साथ तब तक पकाएँ जब तक दाने चमकदार और अलग-अलग न हो जाएँ।

क्या बसंत पंचमी पर बाल कटवाना या नॉनवेज खाना मना है?

कोई शास्त्र इस दिन बाल कटवाने को मना नहीं करता, पर बहुत से परिवार पूजा के दिन बाल-नाखून नहीं काटते और भोजन सात्विक, शाकाहारी रखते हैं। बंगाल की सरस्वती पूजा का भोग भी शाकाहारी खिचुड़ी है। अपने परिवार की परंपरा मानें।

पंजाब में बसंत पंचमी पर पतंग क्यों उड़ाते हैं?

पंजाब में, और उत्तर-पश्चिम भारत के पुराने शहरों में, बसंत लंबे समय से पतंगों का त्योहार रहा है: लोग पीले कपड़े पहनते हैं, पीले चावल खाते हैं और सरसों के खेतों के ऊपर पतंगें उड़ाकर वसंत का स्वागत करते हैं। केवल सूती धागा लें, काँच वाला या नायलॉन मांझा कभी नहीं, जो पक्षियों और राहगीरों को घायल करता है।

क्या सरस्वती पूजा के उपाय से परीक्षा में अच्छे नंबर आते हैं?

कोई उपाय पढ़ाई की जगह नहीं ले सकता, और किसी के साथ गारंटी नहीं जुड़ी है। इस गाइड के उपाय, माँ के नाम से कॉपी शुरू करने से लेकर किसी बच्चे को किताबें देने तक, श्रद्धा और कृतज्ञता के पारंपरिक काम हैं, जो बहुत से विद्यार्थियों को शांत मन से शुरुआत करने में मदद करते हैं। इन्हें निभाएँ, और पढ़ते रहें।