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गुरु · सप्तम भाव (विवाह/साझेदारी)

गुरु सातवें भाव में

  • केंद्र
  • दिग्बल शून्य

विवाह के भाव में गुरु रक्षक की तरह है: शास्त्रीय ग्रंथ सदाचारी, विद्वान जीवनसाथी, गरिमापूर्ण वैवाहिक जीवन, साझेदारी से लाभ और सार्वजनिक व्यवहार में सम्मान बताते हैं।

भाव
सप्तम भाव (विवाह/साझेदारी) — जीवनसाथी, विवाह, व्यापारिक साझेदारी, सार्वजनिक छवि, खुले शत्रु, विदेश यात्रा।
ग्रह
गुरु: सबसे बड़ा नैसर्गिक शुभ ग्रह — ज्ञान, गुरु, संतान, धन, धर्म और सत्परामर्श का कारक
भाव का प्रकार
केंद्र भाव
दिग्बल
शून्य — इसका सबसे बली भाव पहला है
यहाँ से दृष्टि
ग्यारहवाँ, पहला, तीसरा भाव (अपने से पाँचवाँ, सातवाँ, नौवाँ)
इसकी महादशा
16 वर्ष

शास्त्रीय ग्रंथ क्या कहते हैं

कर्क, धनु या मीन में यह हंस योग बनाता है।

यह कानून, परामर्श और भरोसे पर बनी साझेदारियों के अनुकूल है; जीवनसाथी उम्र में बड़ा, अधिक समझदार या कुछ-कुछ शिक्षक जैसा हो सकता है।

राशि से कैसे बदलता है — हर लग्न के लिए

सातवें भाव की राशि लग्न पर निर्भर है, और उसी से गुरु का बल बदलता है। मकर लग्न में यहाँ कर्क आती है, जहाँ गुरु उच्च है; कर्क लग्न में मकर, जहाँ यह नीच है।

हर लग्न में गुरु सातवें भाव में
लग्नइस भाव की राशिबलकिन भावों का स्वामीयोग और भूमिका
मेषतुलाशत्रु राशि9 (भाग्य और पिता), 12 (व्यय और विदेश)—
वृषभवृश्चिकमित्र राशि8 (आयु और अचानक बदलाव), 11 (आय और लाभ)—
मिथुनधनुस्वराशि7 (विवाह और जीवनसाथी), 10 (करियर और प्रतिष्ठा)हंस योग (पंच महापुरुष)
कर्कमकरनीच6 (शत्रु, ऋण और रोग), 9 (भाग्य और पिता)नीच — नीचभंग देखें
सिंहकुंभसम राशि5 (संतान और बुद्धि), 8 (आयु और अचानक बदलाव)—
कन्यामीनस्वराशि4 (घर, माता और संपत्ति), 7 (विवाह और जीवनसाथी)हंस योग (पंच महापुरुष)
तुलामेषमित्र राशि3 (पराक्रम और भाई-बहन), 6 (शत्रु, ऋण और रोग)—
वृश्चिकवृषभशत्रु राशि2 (धन, वाणी और परिवार), 5 (संतान और बुद्धि)—
धनुमिथुनशत्रु राशि1 (व्यक्तित्व और स्वास्थ्य), 4 (घर, माता और संपत्ति)लग्नेश
मकरकर्कउच्च3 (पराक्रम और भाई-बहन), 12 (व्यय और विदेश)हंस योग (पंच महापुरुष)
कुंभसिंहमित्र राशि2 (धन, वाणी और परिवार), 11 (आय और लाभ)—
मीनकन्याशत्रु राशि1 (व्यक्तित्व और स्वास्थ्य), 10 (करियर और प्रतिष्ठा)लग्नेश

यह स्थिति कौन से योग बना सकती है

  • हंस योग (पंच महापुरुष): केंद्र में स्वराशि या उच्च का गुरु — मकर, मिथुन, कन्या लग्न में।

फल कब मिलता है

गुरु की महादशा 16 वर्ष चलती है। यह स्थिति सबसे स्पष्ट तब बोलती है — गुरु की महादशा में, दूसरी महादशाओं के भीतर इसकी अंतर्दशा में, और सातवें भाव के स्वामी की दशा में। शनि और गुरु का गोचर जब इस भाव या जन्म के ग्रह पर से गुज़रता है, तब भी यह जागती है।

गुरु की महादशा · अपनी दशा देखें — दशा कैलकुलेटर

उपाय

  • गुरु का मंत्र जपें: ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः. सूर्योदय के बाद पूर्व की ओर मुख करके बैठें — गुरुवार इसके लिए सबसे प्रबल दिन है। प्रतिदिन 5 माला (540 बार) जपें, 108 मनकों की माला पर गिनती रखते हुए। बिना रुके 40 दिन तक यह क्रम निभाएँ — इससे पारंपरिक 19,000 जप पूरे होते हैं।
  • गुरु का दान करें. चना दाल, हल्दी, पीला वस्त्र का दान गुरुवार को, दोपहर से पहले करें। इसे किसी शिक्षक, पुरोहित या गुरु को दें, या किसी सच्चे ज़रूरतमंद को। चुपचाप, स्वयं जाकर दें, धन्यवाद की अपेक्षा किए बिना।
  • गुरु के लिए दैनिक आचरण. हल्दी का तिलक लगाएँ; गुरुजनों और बड़ों का आदर करें। 40 दिन तक प्रतिदिन निभाएँ — नियमितता ही उपाय है।

नौ ग्रहों के उपाय · गुरु का पूरा मंत्र

अपनी कुंडली में देखें

कुंडली बनाएँ और भावों वाले कार्ड में सातवें भाव का कार्ड देखें: वह बताता है कि वहाँ कौन-सी राशि है, उसका स्वामी कहाँ है और कौन से ग्रह बैठे हैं — यानी गुरु सचमुच इस भाव में है या नहीं, और किस राशि में। ऊपर की तालिका की वह पंक्ति आपके लग्न की है।

अपनी मुफ़्त कुंडली बनाएँनमूना कुंडली पर इंटरैक्टिव कुंडली देखें

सातवें भाव में दूसरे ग्रह

दूसरे भावों में गुरु

सामान्य प्रश्न

क्या सातवें भाव में गुरु शुभ है या अशुभ?

अकेले इससे कोई फ़ैसला नहीं होता। यह कानून, परामर्श और भरोसे पर बनी साझेदारियों के अनुकूल है; जीवनसाथी उम्र में बड़ा, अधिक समझदार या कुछ-कुछ शिक्षक जैसा हो सकता है। मकर लग्न में यहाँ यह उच्च है। कर्क लग्न में नीच।

किस लग्न में सातवें भाव का गुरु सबसे अच्छा फल देता है?

मिथुन (स्वराशि); कन्या (स्वराशि); मकर (उच्च) लग्न। पूरी तालिका ऊपर है।

सातवें भाव का गुरु फल कब देता है?

गुरु की महादशा (16 वर्ष) में, दूसरी दशाओं में इसकी अंतर्दशा में, और इस भाव के स्वामी की दशा में।

सातवें भाव के गुरु के उपाय क्या हैं?

गुरु के मुफ़्त अभ्यास — बीज मंत्र, उसके दिन का दान और एक दैनिक आचरण — ऊपर दिए हैं। केवल एक स्थिति देखकर कोई रत्न नहीं सुझाया जाता।