
षष्ट्यांश (D60) · मुफ़्त · बिना साइन-अप
D60 चार्ट कैलकुलेटर (षष्ट्यांश)
षष्ट्यांश पराशर का सबसे सूक्ष्म विभाजन है और विंशोपक बल में सबसे अधिक भार इसी को मिलता है।
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कैलकुलेटर के बारे में
षष्ट्यांश (D60), सर्वर पर शास्त्रीय नियम से
- शास्त्रीय नियम से गणना, सामान्य भाजक से नहीं
- जन्म कुंडली के सामने वर्गोत्तम ग्रह चिह्नित
- जन्म विवरण केवल इस परिणाम के लिए, संग्रहीत नहीं
यही वह चार्ट भी है जिसे जन्म समय की चार मिनट की भूल पूरी तरह बदल देती है — इसलिए यह पृष्ठ पहले यह चेतावनी देता है, फिर फल।
षष्ट्यांश (D60) कुंडली का उदाहरण - 12 अप्रैल 1990, 10:30, नई दिल्ली
गणना: 12 अप्रैल 1990, 10:30, नई दिल्ली। D60 लग्न वृषभ है, जिसका स्वामी शुक्र है। नीचे के भाव इसी लग्न से पूर्ण-राशि पद्धति में गिने गए हैं।
| ग्रह | जन्म कुंडली की राशि | D60 राशि | D60 भाव | राशि स्वामी | वर्गोत्तम |
|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | मीन | वृश्चिक | 7 | मंगल | — |
| चंद्र | तुला | मेष | 12 | मंगल | — |
| मंगल | मकर | धनु | 8 | गुरु | — |
| बुध | मेष | मीन | 11 | गुरु | — |
| गुरु | मिथुन | कुंभ | 10 | शनि | — |
| शुक्र | कुंभ | कुंभ | 10 | शनि | वर्गोत्तम |
| शनि | मकर | मीन | 11 | गुरु | — |
| राहु | मकर | मीन | 11 | गुरु | — |
| केतु | कर्क | कन्या | 5 | बुध | — |
इस विभाजन में वर्गोत्तम ग्रह: शुक्र। जो ग्रह जन्म कुंडली और इस विभाजन में एक ही राशि में हो, वह दो स्तरों पर एक ही काम कर रहा होता है — परंपरा इसे बल नहीं, स्थिरता मानती है।
D60 के भीतर ग्रहों की गरिमा
विभाजन कुंडली में गरिमा ठीक वैसे ही देखी जाती है जैसे जन्म कुंडली में: उच्च, स्वराशि या नीच राशि का ग्रह किसी भी चार्ट में हो, एक ही तरह पढ़ा जाता है। वर्ग राशियों की सूची यह नहीं बताती, और इसी कारण विभाजन कुंडली निकालने लायक है, केवल देखने लायक नहीं।
इस D60 में: उच्च — कोई नहीं; स्वराशि — कोई नहीं; नीच — बुध। बाकी ग्रह सम, मित्र या शत्रु राशि में हैं, जिन्हें पूरी बल गणना आगे अलग करती है।
इस स्तंभ को जन्म कुंडली के साथ पढ़ें, अकेले नहीं। D1 में उच्च और यहाँ नीच ग्रह ऐसा वादा दिखाता है जो विभाजन में टिकता नहीं; उलटी स्थिति वह है जो कमज़ोर दिखकर भी टिकी रहती है। दोनों चार्टों की सहमति सबसे मज़बूत संकेत है, चाहे वह किसी भी दिशा में हो।
इस कुंडली की व्याख्या
इस चार्ट में आपका मूल स्व
आपके पूर्वजन्म कर्म व समग्रता (षष्ट्यंश) चार्ट में लग्न वृषभ में उदय होता है — इसलिए आपके कार्मिक-स्व के मूल में आप स्थिर, धैर्यवान और सुखप्रिय — आप सुरक्षा को महत्व देते हैं और कभी ज़िद्दी हो सकते हैं हैं।
आपका लग्नेश शुक्र दसवें भाव में मित्र राशि में (सहयोग प्राप्त) है — यहीं इस क्षेत्र की अधिकांश ऊर्जा बहती है। कार्यकारी शुभ ग्रह (पहले और छठे भावों का स्वामी) के रूप में यह इस क्षेत्र को सहारा व रक्षा देता है।
मुख्य बात — पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता
पहले भाव — इस चार्ट में पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का केंद्र — वृषभ में पड़ता है, इसलिए यह क्षेत्र वृषभ का स्वभाव लेता है: स्थिर, वफ़ादार, सुखप्रिय और कभी ज़िद्दी।
पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का स्वामी कहाँ है
आपके पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का स्वामी शुक्र है, और यह आपके दसवें भाव में मित्र राशि में (सहयोग प्राप्त) है। यह स्वामी जहाँ जाता है, पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता के विषय साथ ले जाता है।
दसवें भाव (केंद्र) में होकर यह पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता को आपके जीवन में प्रमुख व सक्रिय बनाता है।
मुख्य कारक
शनि, पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का स्वाभाविक कारक, मीन में ग्यारहवें भाव में सम राशि में है। कारक के रूप में यह पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का सार दिखाता है: अनुशासन, कर्तव्य, धैर्य और कठिन पाठ इस क्षेत्र को प्रबलता से रंगते हैं।
गुरु, पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का स्वाभाविक कारक, कुंभ में दसवें भाव में सम राशि में है। कारक के रूप में यह पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का सार दिखाता है: ज्ञान, वृद्धि, भाग्य और मूल्य इस क्षेत्र को प्रबलता से रंगते हैं।
सूर्य, पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का स्वाभाविक कारक, वृश्चिक में सातवें भाव में मित्र राशि में (सहयोग प्राप्त) है। कारक के रूप में यह पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का सार दिखाता है: आत्मा, अहं, सत्ता और आत्मविश्वास इस क्षेत्र को प्रबलता से रंगते हैं।
महत्वपूर्ण ग्रह-योग
आपके दसवें भाव में, गुरु-शुक्र ज्ञान व प्रेम मिलाता है — परिष्कृत व भक्तिमय, पर संबंधों को आदर्श बना सकता है।
आपके ग्यारहवें भाव में, बुध, शनि और राहु एक साथ आते हैं — बुद्धि, संवाद और अनुकूलनशीलता, अनुशासन, कर्तव्य, धैर्य और कठिन पाठ और महत्वाकांक्षा, आसक्ति, विदेशी और अपरंपरागत का बहुस्तरीय योग; यह क्षेत्र तीव्र व घटनापूर्ण रहेगा।
इस क्षेत्र को आकार देती दृष्टियाँ
सूर्य की दृष्टि अहं, सत्ता और दृश्यता जोड़ती है — यह आपके पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता पर पूर्ण दृष्टि डालता है।
शनि की दृष्टि अनुशासन, विलंब और गंभीर परीक्षा लाती है — यह आपके पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता पर विशेष दृष्टि डालता है।
आपके लग्न पर सूर्य और शनि की दृष्टि है, जो इस चार्ट का मूल स्वभाव गढ़ती है।
योग व विशेष शक्तियाँ
शनि इस वृषभ लग्न का योगकारक है (नौवें और दसवें भावों का स्वामी — केंद्र व त्रिकोण दोनों), एक शक्तिशाली, शुभ ग्रह। शनि जहाँ बैठा है (ग्यारहवें भाव) वह उन्नति का स्रोत बनता है।
आपके ग्यारहवें भाव में राजयोग बनता है: केंद्र-स्वामी व त्रिकोण-स्वामी वहाँ मिलते हैं, उन्नति, प्रतिष्ठा व सौभाग्य का वचन।
बुध मीन में नीच का है — यह जो दर्शाता है उसे सजग देखभाल व उपाय दें; फिर भी सुधरा जा सकता है।
शुक्र यहाँ भी वही राशि रखता है जो जन्म कुंडली में है — स्थिर रहने वाली विशेष शक्ति (इसे वर्गोत्तम कहते हैं)।
आपका गहनतम कर्म (षष्ट्यंश देवता)
षष्ट्यंश सूक्ष्मतम, सर्वाधिक कार्मिक परत है — हर ग्रह का आधा-अंश 60 देवताओं में से एक के अधीन आता है, जो उसके फल के पीछे पूर्वजन्म-गुण दर्शाता है:
• शुक्र → Deva (शुभ) — समर्थित व फल देने को तैयार.
• सूर्य → Kubera (शुभ) — समर्थित व फल देने को तैयार.
• चंद्र → Utpata (अशुभ) — परीक्षात्मक, सजग प्रयास व उपाय माँगता.
• मंगल → Ghora (अशुभ) — परीक्षात्मक, सजग प्रयास व उपाय माँगता.
• बुध → Kantaka (अशुभ) — परीक्षात्मक, सजग प्रयास व उपाय माँगता.
• गुरु → Heramba (शुभ) — समर्थित व फल देने को तैयार.
पूरा भाव-दर-भाव चित्र
आपके D60 का हर भाव पढ़ते हुए ताकि कुछ छूटे नहीं:
• पहले भाव (स्वयं, शरीर व स्वभाव) — वृषभ; स्वामी शुक्र दसवें में.
• दूसरे भाव (धन, परिवार व वाणी) — मिथुन; स्वामी बुध ग्यारहवें में.
• तीसरे भाव (साहस, भाई-बहन व प्रयास) — कर्क; स्वामी चंद्र बारहवें में.
• चौथे भाव (घर, माता व सुख) — सिंह; स्वामी सूर्य सातवें में.
• पाँचवें भाव (संतान, बुद्धि व सृजन) — कन्या; यहाँ: केतु; स्वामी बुध ग्यारहवें में.
• छठे भाव (बाधाएँ, स्वास्थ्य व सेवा) — तुला; स्वामी शुक्र दसवें में.
• सातवें भाव (साथी व सार्वजनिक व्यवहार) — वृश्चिक; यहाँ: सूर्य; स्वामी मंगल आठवें में.
• आठवें भाव (आयु, गोपनीयता व अचानक परिवर्तन) — धनु; यहाँ: मंगल; स्वामी गुरु दसवें में.
• नौवें भाव (भाग्य, धर्म व पिता) — मकर; स्वामी शनि ग्यारहवें में.
• दसवें भाव (करियर, प्रतिष्ठा व कर्म) — कुंभ; यहाँ: गुरु और शुक्र; स्वामी शनि ग्यारहवें में.
• ग्यारहवें भाव (लाभ, संपर्क व इच्छाएँ) — मीन; यहाँ: बुध, शनि और राहु; स्वामी गुरु दसवें में.
• बारहवें भाव (व्यय, हानि, विदेश व मोक्ष) — मेष; यहाँ: चंद्र; स्वामी मंगल आठवें में.
संसार इसे कैसे देखता है (आरूढ़ पद)
आपके पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का आरूढ़ पद (दृश्य, अनुभूत परिणाम) सिंह में पड़ता है। बाहरी संसार को यह क्षेत्र स्वाभिमानी, गर्मजोश, आत्मविश्वासी और छवि-सजग, जिसे सम्मान पसंद है *दिखता* है — चाहे भीतर कैसा भी लगे।
शक्तियाँ व रक्षाएँ
• पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता का कारक सूर्य अच्छी स्थिति में है — सच्चा आशीर्वाद।
• आपका लग्नेश शुक्र बलवान है, जो दृढ़ता व आत्म-दिशा देता है।
सुधारने योग्य चुनौतियाँ
• शनि आपके पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता पर दबाव डालते हैं — विलंब, टकराव या अपरंपरागत मोड़ की अपेक्षा करें जिन्हें परिपक्वता सुलझाती है।
आपका सबसे बलवान व सबसे कमज़ोर ग्रह
यहाँ आपका सबसे बलवान ग्रह सूर्य है (मित्र राशि में (सहयोग प्राप्त), सातवें भाव)। इसके उपहारों पर भरोसा करें — आत्मा, अहं, सत्ता और आत्मविश्वास — ये सबसे सहज बहते हैं।
आपका सबसे नाज़ुक ग्रह बुध है (नीच का (कमज़ोर, सावधानी), ग्यारहवें भाव)। यह जो दर्शाता है — बुद्धि, संवाद और अनुकूलनशीलता — उसे सजग प्रयास व नीचे दिए उपाय चाहिए।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर पूर्वजन्म कर्म व इस जीवन की समग्रता के लिए यह संतुलित चार्ट है — सच्चे आशीर्वाद कुछ वास्तविक चुनौतियों के साथ, केंद्रित प्रयास व यथार्थ अपेक्षाओं से सुधरता है।
दुर्बल बिंदुओं के उपाय
लक्षित उपाय ठीक उन्हीं ग्रहों को बल देते हैं जो दबाव में हैं, जिससे समय के साथ दुर्बल बिंदु नरम होते हैं। आपके चार्ट के लिए:
• बुध: ॐ बुधाय नमः जपें, सच्ची वाणी रखें, गायों को हरा चारा दें, विद्यार्थियों की मदद करें (बुधवार).
इस चार्ट के लिए श्रेष्ठ सलाह
• जीवन को कर्म चुकाने व कमाने दोनों रूप में देखें।
• अभी का सदाचार अगला अध्याय लिखता है।
• सेवा व स्मरण पुराने कार्मिक बोझ हल्के करते हैं।
षष्ट्यांश (D60) कुंडली क्या दिखाती है
D60 का शास्त्रीय विषय पूर्व जन्म कर्म है — जो अर्जित नहीं, साथ लाया गया है। कम आध्यात्मिक भाषा में कहें तो यह ग्रह-बल की अंतिम परीक्षा है: जो ग्रह D1, D9 और D60 तीनों में अच्छी स्थिति में टिकता है वह वास्तव में बलवान है, और जो जन्म कुंडली में बलवान दिखकर षष्ट्यांश में गिर जाता है वह ऐसे वादे का शास्त्रीय चित्र है जिसके पीछे कुछ नहीं।
यही वह वर्ग भी है जो जुड़वाँ जन्मों को अलग करता है। चार मिनट के अंतर से जन्मे दो बच्चों का नक्षत्र, नवमांश और लगभग हर सामान्य चार्ट-लक्षण एक ही होता है, पर लग्न चार मिनट में लगभग एक अंश चलता है और एक षष्ट्यांश आधा अंश का है — इसलिए D60 लग्न अलग हो जाता है। यही कारण है कि यह चार्ट उस जन्म समय पर बेकार है जिसे किसी ने मिनट तक दर्ज नहीं किया।
इस वर्ग की दो परतें हैं और इन्हें अक्सर मिला दिया जाता है। D60 राशि आधे-आधे अंश का समान विभाजन है और यही पृष्ठ इसकी गणना करता है। साठ देवता — घोर, राक्षस, देव, कुबेर, यम आदि — एक अलग गणना हैं जो विषम राशियों में आगे और सम राशियों में उल्टी चलती है। इस उलटाव के बिना देवता का नाम आधी स्थितियों में ग़लत निकलता है।
षष्ट्यांश (D60) की गणना विधि
प्रत्येक राशि को आधे-आधे अंश के साठ भागों में बाँटा जाता है और गणना उसी राशि से शुरू होती है। राशि के भीतर के अंशों को दो से गुणा कीजिए, बारह से भाग दीजिए, और शेष को उसी राशि से गिनिए — यही पराशर का नियम है।
चक्रीय शॉर्टकट, जिसमें राशि-क्रमांक को साठ से गुणा किया जाता है, सदा बारह का गुणज देता है यानी मेष — इसलिए उस विधि से बना D60 ग्रह की अपनी राशि को पूरी तरह फेंक देता है और पूरी कुंडली एक ही राशि में बैठ जाती है। यदि कहीं आपका D60 सारे ग्रह मेष में दिखाए तो वह कैलकुलेटर टूटा हुआ है, कुंडली असामान्य नहीं।
षष्ट्यांश (D60) के लिए जन्म समय की शुद्धता
एक षष्ट्यांश आधा अंश का है और लग्न लगभग चार मिनट में एक अंश चलता है, इसलिए D60 लग्न लगभग हर दो मिनट में बदलता है। पाँच या दस मिनट की गोलाई में लिखा जन्म समय दो-तीन समान रूप से संभव कुंडलियाँ छोड़ता है और उनमें से चुनने का कोई उपाय नहीं।
यह चेतावनी D60 के लिए वैकल्पिक नहीं है। अशुद्ध जन्म समय पर बना षष्ट्यांश कोई अर्थ नहीं रखता। यदि आपके पास भरोसेमंद समय नहीं है तो ईमानदार रास्ता यही है कि जन्म कुंडली और नवमांश पढ़कर रुक जाएँ।
षष्ट्यांश (D60) की सीमाएँ — यह क्या नहीं बताता
D60 किसी पिछले जन्म का विवरण नहीं देता। यह जन्म कुंडली का एक विभाजन है। शास्त्रीय भाषा कर्म की है और उसका ईमानदार अनुवाद यह है कि यह चार्ट उन परिस्थितियों का वर्णन करता है जिनसे व्यक्ति आरंभ करता है — यह वर्णन है, इतिहास नहीं।
कठिन D60 कोई कार्मिक दंड नहीं है और न ही किसी उपाय को खरीदने का कारण। इस वर्ग पर आधारित भय-आधारित पाठ इसीलिए आम हैं क्योंकि यह अंतिम सुनाई देता है। यह अंतिम नहीं है, और इस साइट पर इसके आधार पर कुछ भी नहीं बेचा जाता।
इस पृष्ठ पर कुछ भी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है।
D60 चार्ट कैलकुलेटर (षष्ट्यांश) - सामान्य प्रश्न
D60 या षष्ट्यांश कुंडली क्या है?
साठवाँ वर्ग: हर राशि को आधे-आधे अंश के साठ भागों में उसी राशि से गिनकर बाँटा जाता है। पराशर विंशोपक बल में इसे सोलह वर्गों में सबसे अधिक भार देते हैं और इसे कुंडली की सबसे गहरी परत के लिए पढ़ा जाता है।
D60 के लिए जन्म समय कितना सटीक चाहिए?
मिनट तक, और अधिमानतः शुद्ध किया हुआ। एक षष्ट्यांश आधा अंश का है और लग्न चार मिनट में लगभग एक अंश चलता है, इसलिए चार मिनट की भूल D60 लग्न को दो भाग खिसका देती है।
किसी और साइट पर मेरे D60 के सारे ग्रह मेष में क्यों हैं?
क्योंकि उस टूल ने चक्रीय शॉर्टकट लगाया है — राशि-क्रमांक गुणा साठ, जो सदा बारह का गुणज यानी मेष देता है। शास्त्रीय नियम उसी राशि से गिनने का है। यही भूल D12 को भी तोड़ती है।
क्या D60 से सचमुच जुड़वाँ अलग किए जाते हैं?
तकनीकी आधार यही है। कुछ मिनट के अंतर से जन्मे दो बच्चों के सभी स्थूल चार्ट-लक्षण एक होते हैं और सबसे पहले D60 लग्न अलग होता है। पर यह तभी सार्थक है जब दोनों जन्म समय मिनट तक दर्ज हों।
साठ षष्ट्यांश देवता क्या हैं?
उन्हीं साठ भागों से जुड़ी एक अलग गणना — घोर, राक्षस, देव, कुबेर, यम आदि — जो विषम राशियों में आगे और सम राशियों में उल्टी चलती है। यह पृष्ठ D60 राशि की गणना करता है; देवता-सूची अलग है और उलटाव के बिना आधी स्थितियाँ ग़लत नाम पाती हैं।
क्या D60 को D9 से पहले पढ़ना चाहिए?
नहीं। पहले D1, फिर D9, और अंत में बल की अंतिम जाँच के रूप में D60। पराशर बल-निर्णय में D60 को सबसे अधिक भार देते हैं, पर चार्ट की तरह पढ़ा जाने वाला वर्ग नवमांश है।